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अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

बदलता मौसम और बदलती संवेदनाएँ - अलका मिश्रा

बदलता मौसम और बदलती संवेदनाएँ - अलका मिश्रा

इरा वेब पत्रिका का यह अंक इस बार आपके पास अत्यंत विलंब से आ रहा है इसके लिये हम आपसे क्षमाप्रार्थी हैं। इस विलंब के पीछे हमारी टीम की कुछ व्यक्तिगत परेशानियाँ रहीं जिसके कारण पत्रिका पर काम करना संभव न हो सका। आगे से पत्रिका अपने निर्धारित समय से आपके पास पहुँच सके इसके लिये हमने इसके स्वरूप को ‘मासिक' से ‘द्विमासिक' करने का निर्णय लिया है। आशा है कि आपका स्नेह एवं सहयोग पहले की भाँति हमें प्राप्त होता रहेगा।  

जुलाई का महीना आते ही मन वर्षा की रिमझिम, मिट्टी की सोंधी ख़शबू और हरियाली की कल्पना करता है। किंतु पिछले कुछ वर्षों की तरह इस वर्ष भी मौसम ने हमें यह एहसास कराया है कि प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। कहीं मूसलाधार वर्षा से जनजीवन अस्त-व्यस्त है, तो कहीं सूखे और भीषण गर्मी ने लोगों का जीवन कठिन बना दिया है। यह केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति की गंभीर चेतावनी है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।
 
दुर्भाग्य से विकास की हमारी वर्तमान अवधारणा भी अनेक प्रश्न खड़े करती है। शहरों में पुराने मकानों को तोड़कर बहुमंजिला अपार्टमेंट बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही दशकों पुराने, विशाल और छायादार वृक्ष बड़ी संख्या में काटे जा रहे हैं। कंक्रीट के जंगल तेजी से फैल रहे हैं और हरियाली सिमटती जा रही है। परिणामस्वरूप शहरों का तापमान बढ़ रहा है, वर्षा का प्राकृतिक चक्र प्रभावित हो रहा है, भूजल का स्तर गिर रहा है और जलवायु परिवर्तन की समस्या और गंभीर होती जा रही है।
 
विकास आवश्यक है, लेकिन वह प्रकृति की क़ीमत पर नहीं होना चाहिए। समय की माँग है कि सरकारें ऐसी प्रभावी नीतियाँ और कड़े कानून बनाएँ जिनके अंतर्गत बिना पर्याप्त पर्यावरणीय आँकलन के बड़े पेड़ों की कटाई पर रोक लगे। यदि किसी कारणवश वृक्ष काटना अनिवार्य हो, तो उसके स्थान पर कई नए वृक्ष लगाना और उनके संरक्षण की कानूनी ज़िम्मेदारी भी सुनिश्चित की जाए। शहरी विकास की प्रत्येक परियोजना में हरित क्षेत्र, वर्षा जल संचयन और पर्यावरण संरक्षण को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। विकास तभी सार्थक है जब वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवनदायी वातावरण छोड़ सके।

मौसम की यह अनिश्चितता हमारे सामाजिक जीवन में भी दिखाई देती है। भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल दुनिया की चकाचौंध ने हमें पहले से अधिक जुड़ा हुआ तो दिखाया है, पर भीतर से कहीं अधिक अकेला भी बना दिया है। संवाद कम हो रहे हैं, संवेदनाएँ सिमट रही हैं और धैर्य का स्थान अधीरता लेती जा रही है।
 
ऐसे समय में साहित्य की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि समय का साक्षी है। वह उन प्रश्नों को उठाता है जिन्हें अक्सर शोर में दबा दिया जाता है। वह हमें प्रकृति से प्रेम करना, मनुष्य से मनुष्य का रिश्ता निभाना और कठिन परिस्थितियों में भी आशा का दीप जलाए रखना सिखाता है।

हमारे इस अंक की रचनाएँ, हमें विश्वास है कि ये पाठकों को केवल साहित्यिक आनंद ही नहीं देंगी, बल्कि प्रकृति, समाज और मानवीय मूल्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भी बोध कराएँगी।
 
आइए, इस वर्षा ऋतु में केवल धरती को ही नहीं, अपने मन को भी करुणा, सह-अस्तित्व और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व से सींचें। यदि आज हमने प्रकृति की पुकार नहीं सुनी, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी। विकास और पर्यावरण का संतुलन ही एक सुरक्षित, समृद्ध और संवेदनशील भविष्य की आधारशिला है।

इरा वेब पत्रिका का यह अंक इस बार आपके पास अत्यंत विलंब से आ रहा है इसके लिये हम आपसे क्षमाप्रार्थी हैं। इस विलंब के पीछे हमारी टीम की कुछ व्यक्तिगत परेशानियाँ रहीं जिसके कारण पत्रिका पर काम करना संभव न हो सका। आगे से पत्रिका अपने निर्धारित समय से आपके पास पहुँच सके इसके लिये हमने इसके स्वरूप को ‘मासिक' से ‘द्विमासिक' करने का निर्णय लिया है। आशा है कि आपका स्नेह एवं सहयोग पहले की भाँति हमें प्राप्त होता रहेगा।  
 
 
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2 Total Review
S

Seema Singh

16 July 2026

हर बार की तरह समसामयिक संपादकीय, वाकई पर्यावरण पर सजगता आज की आवश्यकता ही नहीं वरन अनिवार्यता है। मौसम का बदलाव प्रकृति की चेतावनी है अगर अब भी नहीं चेते टोबहट देर हो जाएगी। आभार इस अपरिहार्य विषय पर ध्यान दिलाने का आभार🙏

वसंत जमशेदपुरी

14 July 2026

समयानुकूल है संपादकीय, हम केवल विकास पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं, पर्यावरण की चिंता नहीं कर रहे, फलस्वरूप प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है

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रचनाकार परिचय

अलका मिश्रा

ईमेल : alkaarjit27@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि-27 जुलाई 1970 
जन्मस्थान-कानपुर (उ० प्र०)
शिक्षा- एम० ए०, एम० फिल० (मनोविज्ञान) तथा विशेष शिक्षा में डिप्लोमा।
सम्प्रति- प्रकाशक ( इरा पब्लिशर्स), काउंसलर एवं कंसलटेंट (संकल्प स्पेशल स्कूल), स्वतंत्र लेखन तथा समाज सेवा
विशेष- सचिव, ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन 
लेखन विधा- ग़ज़ल, नज़्म, गीत, दोहा, क्षणिका, आलेख 
प्रकाशन- बला है इश्क़ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित
101 महिला ग़ज़लकार, हाइकू व्योम (समवेत संकलन), 'बिन्दु में सिन्धु' (समवेत क्षणिका संकलन), आधुनिक दोहे, कानपुर के कवि (समवेत संकलन) के अलावा देश भर की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं यथा- अभिनव प्रयास, अनन्तिम, गीत गुंजन, अर्बाबे कलाम, इमकान आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
रेख़्ता, कविता कोष के अलावा अन्य कई प्रतिष्ठित वेब पत्रिकाओं हस्ताक्षर, पुरवाई, अनुभूति आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्पादन- हिज्र-ओ-विसाल (साझा शेरी मजमुआ), इरा मासिक वेब पत्रिका 
प्रसारण/काव्य-पाठ- डी डी उत्तर प्रदेश, के टी वी, न्यूज 18 आदि टी वी चैनलों पर काव्य-पाठ। रेखता सहित देश के प्रतिष्ठित काव्य मंचों पर काव्य-पाठ। 
सम्मान-
साहित्य संगम (साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था तिरोड़ी, बालाघाट मध्य प्रदेश द्वारा साहित्य शशि सम्मान, 2014 
विकासिका (साहित्यिक सामजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था कानपुर द्वारा ग़ज़ल को सम्मान, 2014
संत रविदास सेवा समिति, अर्मापुर एस्टेट द्वारा संत रवि दास रत्न, 2015
अजय कपूर फैंस एसोसिएशन द्वारा कविवर सुमन दुबे 2015
काव्यायन साहित्यिक संस्था द्वारा सम्मानित, 2015
तेजस्विनी सम्मान, आगमन साहित्य संस्था, दिल्ली, 2015
अदब की महफ़िल द्वारा महिला दिवस पर सम्मानित, इंदौर, 2018, 2019 एवं 2020
उड़ान साहित्यिक संस्था द्वारा 2018, 2019, 2021 एवं 2023 में सम्मानित
संपर्क- एच-2/39, कृष्णापुरम
कानपुर-208007 (उत्तर प्रदेश) 
 
मोबाइल- 8574722458