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क्या खोया- क्या पाया का आकलन : टेसू लेके ही टरे- डॉ० मधु संधु

क्या खोया- क्या पाया का आकलन : टेसू लेके ही टरे- डॉ० मधु संधु

इन कहानियों में प्रवासी मन की पीड़ा, सांस्कृतिक चित्र, सम्बन्धों के घेरे, नियति के घात, बहुमुखी चुनौतियाँ, अतीत की भावुक स्मृतियाँ और अपने देश की याद अधिकांशत: यहाँ-वहाँ बिखरी हैं।

टेसू लेके ही टरे विगत 24 वर्षों से बहुसांस्कृतिक देश आस्ट्रेलिया में, कंगारुओं की धरती पर रह रही भारत की प्रवासी कहानीकार, कवयित्री, ग़ज़लकार, संपादक, अनुवादक, शिक्षिका एवं पत्रकार रेखा राजवंशी का 2026 में प्रकाशित कहानी संकलन है। 1999 में ‘अनुभूति के गुलमोहर’, 2011 में ‘कंगारुओं के देश में’, 2023 में ‘जीवित रहेगी स्त्री’ काव्य संग्रह, 2016 में ‘मुट्ठी भर चाँदनी’, 2024 में ‘इश्क है, ख़्वाब है, कहानी है’ ग़ज़ल संग्रह के अतिरिक्त कहानियों, लघुकथाओं, लोककथाओं, बाल साहित्य पर भी उनकी अनेक रचनाएँ आ चुकी हैं। ‘टेसू लेके ही टरे’ में उनकी दस कहानियाँ हैं- ‘टेसू लेके ही टरे’, ‘घंटियाँ’, ‘सपने और सच्चाई’, ‘मेन टू’, ‘वापसी’, ‘आर्नी’, ‘नई शुरुआत’, ‘सूर्य की तलाश’, ‘मुक्ति’ तथा ‘मिस्टर एक्स’।

इन कहानियों में प्रवासी मन की पीड़ा, सांस्कृतिक चित्र, सम्बन्धों के घेरे, नियति के घात, बहुमुखी चुनौतियाँ, अतीत की भावुक स्मृतियाँ और अपने देश की याद अधिकांशत: यहाँ-वहाँ बिखरी हैं। ‘टेसू लेके ही टरे’ में सिडनी में भारतीयों द्वारा मनाए जा रहे दशहरे का पर्व और टेसू का गीत लेखिका की अनंत देशीय स्मृतियों को जीवंत कर देता है और भावुक मन जालौन जिले के उरई शहर की अतीत यात्रा पर चला आता है। यहाँ दादा-दादी का सर्राफा, आढ़तिया कारोबार, साबो/ सावित्री बुआ, चाचियाँ, भाभी और संयुक्त परिवार के अनेक बच्चे हैं। यह संकलन की सबसे सशक्त कहानी है। ‘टेसू लेके ही टरे’ में दशहरा पर्व पर टेसू और झाँझी के विवाह की उस लोक कथा का उल्लेख है, जिसके बाद देश में शादियों का सीजन आरंभ होता है। जन्माष्टमी को मंदिरों में बनने वाली झाँकी बर्फ की सिल्लियों से बनाए गए कैलाश पर्वत का भी अंकन है। कहानी में महाभारत के भीम के बेटे घटोत्कच के बेटे बर्बरीक का उल्लेख है। ‘टेसू लेके ही टरे’ में भारत-पाक युद्ध में पिता की रीढ़ में बम का छर्रा अटकना और सरकार की हृदयहीनता का उल्लेख है। त्रासदी यह है कि घर के बच्चे अनाथ और बोझ हो जाते हैं, कान्वेंट स्कूलों से निकालकर अनाथों की तरह परिवार के अन्य सदस्यों में बाँट दिये जाते हैं।

‘घंटियाँ’ में आस्ट्रेलिया का जुलाई का महीना, लगातार बारिश, तेज़ हवाओं, सर्दी/जुकाम और हड्डियों में चुभने वाली ठंड है। अपूर्व और श्रेया दशकों पहले इस देश में आए थे। नौकरी, मकान, बच्चों की शादियाँ- सब काम निपटा चुके हैं। अपूर्व को टिटिनस की लाइलाज बीमारी हो जाती है। साउंड थेरेपी या ब्रेन ट्रेनिंग से इसका कुछ उपचार तो किया जा सकता है, पर इसका कोई इलाज नहीं। अपूर्व अंतत: इसे जीवन संगीत मान लेता है।

‘मुक्ति’ में पार्किसन पीड़ित, परावलम्भी, बेबस, दयनीय, लाचार अस्सी वर्षीय वृद्ध पति; थकी-हारी, भयभीत पत्नी और पच्चास वर्ष लंबे वैवाहिक जीवन के बेपनाह प्यार की अनंत स्मृतियाँ हैं, जिनमें आर्थिक ऊँचाइयाँ, बेटा, विश्व भ्रमण, क्लब, दावतें, फोटोग्राफी तथा और भी बहुत कुछ है। कहानी उस पत्नी की है, जिसके पति को बीमारी ने इतना बेबस, आत्मकेंद्रित और असुरक्षित कर दिया है कि हर समय की उपस्थिति और टहल उसे चूर-चूर कर मानों किसी अदृश्य बीमारी से पीड़ित कर देती है, यहाँ तक कि वह मुक्ति की कामना करने लगती है।

‘मिस्टर एक्स’ सिडनी के इटैलियन रेस्टोरेन्ट में काम करने वाली उस लूचिया की कहानी है, जिसे पाँच वर्ष पहले रोम छोड़ना पड़ा था। डॉक्टर बनने की चाह रखने वाली लूचिया को क्रूर आर्थिक स्थितियाँ, ग़रीबी कॉल गर्ल बना देती हैं। इसे एक अनाम डिटेक्टिव और कॉल गर्ल की प्रेम कहानी कह सकते है। यहाँ उस समय का वर्णन है, जब रोम में हर ओर बम धमाके, विस्फोट, अंतर्राष्ट्रीय जासूसी नेटवर्क, भ्रष्टाचार, संगठित अपराध, माफिया, राजनीतिक साजिशों का बोलबाला था- "रोम बदल रहा है। राजनीतिक अस्थिरता है। एक रिपब्लिक से एंपायर बन गया है, पावर रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी से हटकर एक सेंट्रलाइज्ड इंपीरियल अथॉरिटी में बदल गई, जिसमें सम्राट के पास सबसे ज़्यादा पावर थी।"

‘सपने और सच्चाई’ के रमन और लक्ष्मी अट्ठाईस वर्ष पहले ख़ाली हाथ (रे और लैक्स) कंगारूओं की धरती पर उतरे थे। आज वे अनेक मोटलों के मालिक हैं। अपना घर है, उच्च शिक्षित बच्चे सूर्या और शीला हैं। लगता मानों सब कुछ पा लिया। पाँव तले से ज़मीन तब खिसक जाती है, जब बेटा ड्रग लेने और ड्रग का धंधा करने लगता है और बेटी बताती है कि वह ‘गे’ है। लीना उसकी पार्टनर है। वह उससे प्यार करती है। अगर घर में संवाद बंद हो जाए तो बच्चे बाहर अपनी खुशियाँ ढूँढने लगते हैं। सच छुपाने लगते हैं। घर वह होता है, जहाँ बच्चे बिना डर के अपना सच बाँट सकें। जहाँ गिरने वाले को हाथ पकड़ उठाया जा सके- "सपने वह भी होते हैं, जहाँ आपके बच्चे, अपनी-अपनी सच्चाईयों के साथ, आप के पास लौट सकें। जहाँ वे ख़ुश रह सकें।"

‘सूर्य की तलाश’ को स्त्री उत्पीड़न की कहानी कह सकते हैं। कहानी की मारग्रेट जीवन भर सूर्य की उस रोशनी के स्थायीत्व को ढूँढती रहती है, जो कभी उसके पास टिक नहीं पाती। उसकी पहली शादी डेविड से हुई और वह उसके चार बच्चों की माँ बनी। लेकिन दिन-रात के गाली-गलौच और मारपीट से तंग आकार वह उसे छोड़ देती है। दस साल बाद वह न्यूजीलैंड की नेवी में काम करने वाले जैकब के संपर्क में आती है, जो उसकी प्रेग्नेंसी का सुन हमेशा के लिए चला जाता है। सोलह वर्ष बाद वह तीसरी शादी अपने से 19 वर्ष छोटे ईरान के इमरान से करती है और वह ड्रग एडिक्ट निकलता है। जीवन के ये दाँव-पेंच इतने भारी पड़ते हैं कि उसकी असमय मृत्यु हो जाती है। ‘सूर्य की तलाश’ कहानी कहती है कि बच्चों के लिए माँ ही रोशनी होती है। मारग्रेट के बच्चे उससे नफ़रत करते हैं, क्योंकि बच्चों को रोशनी- संरक्षण माँ ही दे सकती है। उसके घर छोड़ देने पर बड़ी बेटी को दिन में छोटे भाई-बहनों का हर दायित्व निभाना पड़ता है और रात में पिता के मित्र के रेप का शिकार होना पड़ता है।

‘मेन टू’ पुरुष उत्पीड़न या पुरुष विमर्श की कहानी है। 32 वर्षीय सोफ़्टवेयर इंजीनियर आरव मेहता विगत दस वर्ष से सिडनी में अकेला रह रहा था। माता-पिता अकेलेपन से निजात दिलाने के लिए भारत की प्रीति से उसकी शादी करते हैं। जीवन सामान्य चल रहा था, लेकिन रेसिडेंसी मिलते ही प्रीति बदल जाती है। मारपीट के झूठे आरोप कुछ ऐसे लगाती है कि आरव को जेल हो जाती है, सामाजिक प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाती है, नौकरी छूट जाती है, तलाक के कारण आधी संपत्ति उसे देनी पड़ती है। किराये के छोटे-से अपार्टमेंट में रहना पड़ता है। ‘व्हाइट रिबन’ और ‘बियोंड ब्लू’ संस्थाओं के संपर्क आते ही उसकी मुलाक़ात चार्ल्स, जैक, माइकल, बलजिंदर जैसे अनेक ऐसे लोगों से होती है, जिनकी पत्नियों और प्रेमिकाओं ने उन पर शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, आर्थिक अत्याचार किए हैं। देखता- सोचता है- "कौन कहता है कि सिर्फ महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं, यहाँ तो महिलाओं ने ही पुरुष अत्याचार की पराकाष्ठा कर रखी है।" वह मेल राइट्स वालन्टियर बन सेमिनारों में बोलता है, लिखता है और पीड़ित पुरुषों की मदद करता है।

विदेश जाकर व्यक्ति अपने गाँव, घर, शहर, देश लौट तो नहीं पाता, पर व्यक्ति और वस्तु- दोनों उसे सदैव घेरे रखते हैं। ‘वापसी’ का महावीर चौबीस की उम्र में सिडनी आया था और फिर पूरा जीवन यहीं बिता दिया। पत्नी की मृत्यु और बच्चों के अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाने के बाद वह डिमेन्शिया की चपेट में आ जाता है। आस्ट्रेलिया की सारी यादें मिट जाती हैं और पुरानी यादें उजली होने लगती हैं। डिमेन्शिया दशकों बाद उसे पिता के खेतों, माँ के चूल्हे, हँसती-बतियाती बहनों की यादों के मेले में वापसी करा देता है, उसका बुढ़ापा छीन बचपन लौटा देता है।

‘नई शुरुआत’ मीरा और रोहित के जीवट की कहानी है। उन्हें सिडनी आए 22 वर्ष हो चुके हैं। जीवन मज़े से चल रहा था कि अचानक मीरा अफेशिया-वाचाघात रोग की शिकार हो जाती है- यानी जीभ, होंठ और दिमाग़ के बीच संतुलन टूट जाता है। अस्पताली इलाज के बाद भी उसे स्पीच थेरेपी, फिजीयोथेरेपी, आक्युपेशनल थेरेपी के लिए ले जाया जाता है। पति और बेटी का साथ उसकी मदद करते हैं। यहाँ अपने जैसे लोगों के बीच रहकर आत्मविश्वास लौटने लगता है। कहानी का संदेश यही है कि शब्दों को खोकर भी जीवन की भाषा सीखी जा सकती है-
"मैं.... गिर गई थी.... लेकिन .... अब उठ गई हूँ।
धीरे... पर... चल रही हूँ।
और .... मैं.... अकेली नहीं हूँ।
आप सब मेरे साथ हैं।”

‘आर्नी‘ पशु प्रेम तथा संरक्षण की कहानी है। जर्मन शेफर्ड ‘आर्नी‘ ही एनी की फॅमिली है। वह आस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड राज्य की राजधानी ब्रिस्बेन के सबर्ब विनम में रहती है और आर्नी तीन साल से उसके साथ है। आर्नी के प्रति एनी का लगाव, प्रेम उसके बॉयफ्रेंड से बर्दाश्त नहीं होता। वह उसे कार में बंद कर कार वैली की तरफ धकेल देता है। दिनों बाद आर्नी का मृत शरीर मिलता है। एनी का जीवन ही अस्त-व्यस्त हो जाता है, जो तब तक सामान्य नहीं हो पाता, जब तक उसे माँ एक छोटा-सा पपी होप नहीं भेंट करती। कहानी पशु प्रेम, पशु संरक्षण, पशुओं के प्रति आत्मीयता का स्वर लिए है।

पुस्तक बंद करने के बाद भी कुछ वाक्य मस्तिष्क में हलचल मचाये रखते हैं-
1. उम्मीद ही तो आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती है। जैसे अंधेरे के बीच एक जलता चिराग या बादलों से घिरे घुप आकाश में चमकता ध्रुवतारा, जो बराबर सबको दिशा दिखाता है।
2. इंसान की असली परीक्षा तब होती है, जब उसके भीतर ही शोर मच रहा हो। बाहरी दुनिया से भाग सकते हो, लेकिन अपने कान के भीतर बजती घण्टियों से कहाँ जाओगे।
3. चुनौतियाँ ही संभावनाओं को जन्म देती हैं, अगर उन पर विजय पा ली जाए, तो सफलता अपने आप पीछे चली आती है।
4. जो लोग कुछ करना चाहते हैं, वे रिस्क से नहीं डरते, वे रिस्क मैनेज करते हैं।
5. सूर्य की तलाश करो, उसका प्रकाश हमें जीवन देता है।
6. प्रेम दूसरों को उनके गुणों और दोषों के साथ स्वीकार करने की क्षमता है। एक भावना है, जो बदले में कुछ भी अपेक्षा नहीं करती।
7. समय कभी दोस्त नहीं होता।

‘टेसू लेके ही टरे’ की कहानियाँ देशी-विदेशी जीवन के, नारी और पुरुष विमर्श तथा उत्पीड़न के, युवा और वृद्धावस्था के, स्वस्थ और रुग्ण शरीर के, संघर्ष और क्षमता के, नियति और जीवट के, देश-प्रशासन और राजनीति के अनेकानेक चित्र लिए है। पात्र सपनों का महल बनाने के लिए आस्ट्रेलिया आते हैं, बना भी लेते हैं। पर कहानीकार की दृष्टि क्या खोया, क्या पाया का लगातार आकलन कर रही है। यहाँ संस्कृत के श्लोक/ मंत्र भी आए हैं। ‘मिस्टर एक्स’ में इतालवी भाषा के वाक्य और गीत हैं।

 

 

पुस्तक- टेसू लेके ही टरे
लेखिका- रेखा राजवंशी
प्रकाशक- शिवना, सीहोर (मध्य प्रदेश)
संस्करण- प्रथम, 2026
मूल्य- 200 रुपए

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रचनाकार परिचय

मधु संधु

ईमेल : madhu_sd19@yahoo.co.in

निवास : अमृतसर (पंजाब)

सम्प्रति- सर्जक, आलोचक और कोशकार, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष।
प्रकाशन- बीस पुस्तकें और देश-विदेश की प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, लघुकथाएँ, शोधपत्र, समीक्षाएँ प्रकाशित।
विशेष- द संडे इंडियन ने 21वीं सदी की 111 हिन्दी लेखिकाओं में गणना की है
संपर्क- 13, प्रीत विहार, पो० ऑ०- आर. एस. मिल, सिमरन हॉस्पिटल के निकट, जी. टी. रोड, अमृतसर (पंजाब)- 143105
मोबाइल- 6280880398