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शब्दों का ही नहीं, सघन व सशक्त अनुभूतियों का आईना- कुलदीप सिंह भाटी

शब्दों का ही नहीं, सघन व सशक्त अनुभूतियों का आईना- कुलदीप सिंह भाटी

कवि की कविताओं में देश-प्रेम है, तो प्रकृति के प्रति प्रेम भी। कवि कहता है कि जिस प्रकार एक बीज में एक पेड़ समाहित होता है, उसी प्रकार एक-एक नागरिक में उसका देश। यदि बीज, पेड़ से विद्रोह नहीं करता तो फिर देश के लोग अपने ही देश से क्यों दग़ाबाज़ी करते हैं? यहाँ 'दग़ाबाज़ी' भष्टाचार, नौकरशाही, कर्तव्यों की अवहेलना, पुरातात्विक धरोहरों के प्रति हमारी उदासीनता, प्रदूषण आदि चिन्ताओं तक व्यापित है।

कविताएँ कवि के मन की भावनाओं का प्रकटीकरण है। किंतु कवि की भावनाओं का वितान केवल व्यष्टि न होकर समष्टि तक व्यापित होता है। कवि की दृष्टि वैयक्तिक होती है, किंतु दृश्य सार्वभौमिक होते हैं। इन दृश्यों से ही विषयों का चुनाव होता है, जिसमें प्रेम से पीड़ा तक संवदेना के सभी स्तर हो सकते हैं। इसी तरह के विषयों की विविधता लिए संग्रह है- 'शब्द जब बन जाता है आईना'। इस संग्रह के रचनाकार कवि डॉ० नवीन दवे 'मनावत' हैं।

स्वयं कवि के शब्दों में इस काव्य-संग्रह की कविताएँ ‘परिवेश से सीधा संवाद’ करती हैं, शब्दों से अनेकानेक प्रश्न करती हैं। विचार अभिव्यक्ति व्यक्ति के मनोभावों से प्रभावित होती है, जिसके लिए शब्दों का सहारा लिया जाता है। व्यक्ति के शब्दों का चुनाव उसके व्यक्तित्व का आईना होता है। इसलिए हम सबको सोच-विचार कर शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। संग्रह की पहली ही रचना 'शब्द आईना है' में कवि कहता है कि-

शब्द आईना ही होते हैं
जो बताते हैं
आदमी की औक़ात
कि वह कितना गिरता है
या गिरे हुए को उठाता है

कवि सांचौर जैसे क़स्बाई संस्कृति में पले-बढ़े हैं, फिर भी ग्रामीण और शहरी परिवेश, सभ्यता व संस्कृति से भली-भांति परिचित हैं। कविता 'इसी प्रश्न पर' में कवि शहरों में लुप्त होती जा रही संवेदनाओं को लेकर न केवल चिंतित है बल्कि अपनी इसी चिन्ता को वह व्यंग्यात्मक शैली में लिखते हुए कहते हैं-

जल गई
किसी ग़रीब की
झोपड़ी
पर ये तो शहर है!

बस इसी प्रश्न पर मन अड़ा है..?

इसी क्रम में कवि एक अन्य कविता 'गाँव रहने दो' में गाँव को देवभूमि और भारत की परिभाषा बताता है, जिसका हम विश्वपटल पर गर्व करते हैं। कवि का गाँव के प्रति विशेष लगाव के पीछे वहाँ संवेदनशील संस्कृति होना है। इसी को विस्तार देते हुए कवि अपनी कविता 'वर्तमान' में कहते हैं-

वर्तमान को इतना
सारगर्भित बनाओ
ताकि अनुसरण कर सके भविष्य
जैसे हम करते हैं
बेहतरीन अतीत के दर्शन
चौपालों और संवेदनाओं के इर्द-गिर्द

कवि प्रेम की बात करता है। अपनी कविता 'प्रेम समर्पण है' में वह कहता है कि प्रेम ‘आदमी की ज़रूरत’ है। कवि प्रेम को समर्पण का दूसरा नाम देकर प्रेम में त्याग की भावना को पोषित करते दिखता है। स्वार्थों की शिला से चोटिल होकर गश खाते सम्बंधों के लिए यह कविता महत्वपूर्ण परामर्श है।

आज की भागदौड़ वाली ज़िन्दगी में जिस प्रकार हम परिवार के बड़े-बुज़ुर्गों की उपेक्षा करते हैं, इसको लेकर भी कवि चिंतित है। इन बुज़ुर्गों के पास जीवनागत यात्रा का एक वृहद व लंबा अनुभव होता है किंतु हम इनकी उपेक्षा कर अनुभवजनित ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। नई पीढ़ी को प्रेरणा देते हुए वे अपनी कविता 'एक पल बैठो' में लिखते हैं कि-

कभी एक पल बैठो
उन बुज़ुर्गों के पास
जिन्होंने सींचे हैं
संस्कार और संस्कृति के पौधे
जिसकी छाँव में
हर्षोल्लास हो रहा है हमारा जीवन

आज की भौतिकवादी दुनिया में हमारी सोशल लाइफ एक इलेक्ट्रानिक गैजेट जिसे मोबाइल कहते हैं, में सिमट गई है। दुनिया की दयनीय स्थिति में मोबाइल ने सबसे ज़्यादा साथ दिया है और उसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने। हम देखते हैं कि रील ने हमारी रिलायबलिटी, कमेंट ने क्रिएटिविटी, लाइक ने लॉयल्टी और स्टेटस व स्टोरी ने सिन्सिबलिटी को नकारात्मक रूप से बहुत ज़्यादा प्रभावित किया है। कवि लिखते हैं-

स्टेटस केवल औपचारिक लगाए जाते हैं
ताकि नाराज़ नहीं हों रिश्ते
फेसबुक में हज़ारों मित्र हैं
पर यथार्थ में सब मौन हैं
पड़ोसी को लाइक करता हूँ कई बार
पर समकक्ष आने पर उपेक्षा का भाव आ जाता है

कवि की कविताओं में देश-प्रेम है, तो प्रकृति के प्रति प्रेम भी। कवि कहता है कि जिस प्रकार एक बीज में एक पेड़ समाहित होता है, उसी प्रकार एक-एक नागरिक में उसका देश। यदि बीज, पेड़ से विद्रोह नहीं करता तो फिर देश के लोग अपने ही देश से क्यों दग़ाबाज़ी करते हैं? यहाँ 'दग़ाबाज़ी' भष्टाचार, नौकरशाही, कर्तव्यों की अवहेलना, पुरातात्विक धरोहरों के प्रति हमारी उदासीनता, प्रदूषण आदि चिन्ताओं तक व्यापित है। कवि के संग्रह में सदी के सबसे भयानक सच कोरोना को लेकर भी कुछ कविताएँ हैं। कोरोना को कवि ने हमें प्रकृति से जुड़ने और इसका संरक्षण करने की एक कुदरती चेतावनी माना है। कवि अपनी कविताओं ‘धरती के विरुद्ध’, ‘एक संकल्प ज़रूरी है’, ‘रिश्तों की परख’, ‘अंतिम संवाद’ आदि से हमें सावचेत करते हैं कि यदि हम अब भी न सम्भले तो, हो सकता है कि हमें आगे और भी विकट समस्याएँ झेलनी पड़ सकती हैं।

कवि की कविता 'बेटी शब्द ही हरदम सुनाई दे' एक सहज, सरल व सुंदर भावप्रवण रचना है। इसे पढ़ते हुए आपको यकायक कवयित्री निर्मला पुतुल की रचना 'उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!' स्मृत हो आती है। 'बेटियों की दुनिया' और 'विदाई के साथ' कविताएँ भी बेटियों के स्नेहिल मन और विदाई के दुर्गम सच की बयानगी है।

कवि दूरदर्शी हैं। उनकी रचना 'आज भी निर्दोष है' कवि की इसी दूरदर्शिता की परिचायक है। आज जबकि विश्व के अनेक देश युद्धरत हैं, कवि हथियारों से सवाल करते हैं कि-

कितनी ताक़त से
चीर सकते हो
ख़ून की दो बूँद टपकने से पहले
आदमी की रूह को!

यह केवल प्रश्न नहीं, हथियारों की विवशता है। हथियार तो मशीन है, निर्जीव और उतने ही निर्दोष भी क्योंकि कवि ने हथियारों के पक्ष में लिखा है कि युद्धों के लिए अंततः इंसान ही ज़िम्मेदार है। युद्धों व संघर्ष के पीछे समन्वय व समझाइश के अभाव को कारण बताते हुए कवि लिखता है-

आदमी की समन्वयता की कमी
और अधैर्य से पड़ जाता हूँ
उन दोषी हाथों में!
कभी समझाइश में अभाव में
तो कभी भड़काने वाले
सभ्य जनसमूह के....
पर यथार्थ में
हम (हथियार) आज भी निर्दोष हैं

कवि सृजन करें और अपने सृजनकर्ता को भूल जाए, यह भूल होना संभव नहीं है। माँ बोलना जितना सहज है, उतना ही कठिन है- माँ पर लिखना। कवि की इन पंक्तियों से हर व्यक्ति अक्षरशः सहमत होगा-

कविता लिख देता हूँ
हाथी से चींटी तक
ब्रह्मांड के अंतिम छोर तक
पर क़लम रुक जाती है
माँ पर कविता लिखते समय

इसी कविता में वे आगे लिखते हैं-

माँ पर कविता लिखना मतलब
ब्रह्मा को लिखना
नियति को चुनौती देना
जो परे है मेरी कविता से

माँ को शब्दातीत और अवर्णनीय कहने वाले कवि ने इस संग्रह में घृणा, युद्ध, प्रेम, प्रकृति, समय, सृजन, जाति, मज़हब, नारी के साथ आत्महत्या जैसे सूक्ष्म व संवेदनशील विषयों पर विचाराभिव्यक्ति की हैं। कवि की भाषा-शैली सुगढ़ है। हिंदी भाषा के वृहद अध्ययन का प्रभाव इनकी लेखन शैली पर देखा जा सकता है। फिर भी आपको यहाँ क्लिष्टता नहीं मिलेगी। प्रयोग की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कवि ने तकनीकी शब्दावली और नए शब्दों जैसे फेसबुक, लाइक, स्टेटस, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, इंटरनेट, गैलेरी, डाउनलोड, डिलीट, बटन, फोल्डर, पासवर्ड, कोलेस्ट्रॉल आदि शब्दों का भी समुचित प्रयोग किया है।

हिंदी के प्रोफेसर कवि डॉ० नवीन दवे 'मनावत' का यह प्रथम संग्रह है। रचनाधर्मिता के स्तर पर इसे पर्याप्त रूप से परिपक्व सृजन कहा जा सकता है। अच्छी व विचारों से घनीभूत कविताएँ पाठक से धैर्य माँगती हैं। कुछ इसी तरह के धैर्य का परिचय आपको यहाँ भी रखना पड़ सकता है। सामान्य संग्रहों से इतर यह संग्रह 168 पेजों वाला अपेक्षाकृत लंबा संग्रह है, जिसमें 80 के लगभग कविताएँ हैं। बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित यह संग्रह गुणवत्तापूर्ण है। कुछ वर्तनी व व्याकरणिक त्रुटियों को नज़रअंदाज़ किया जाए तो संग्रह की कविताएँ सघन विचारों वाली हैं। कवि डॉ० नवीन दवे मनावत को हार्दिक बधाई और अनवरत सृजनरत रहने की शुभकामनाएँ।

 

 


समीक्ष्य पुस्तक- शब्द जब बन जाता है आईना
विधा- काव्य
रचनाकार- डॉ० नवीन दवे 'मनावत'
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर (राज.)

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रचनाकार परिचय

कुलदीप सिंह भाटी

ईमेल : ks08857@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 18 मई, 1988
जन्मस्थान- जोधपुर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० (राजनीति विज्ञान)
संप्रति- भारतीय स्टेट बैंक में वरिष्ठ सहयोगी के रूप में कार्यरत
प्रकाशित पुस्तकें- काव्य संग्रह 'सृजन सौरभ' एवं 'धूप और धरती का प्रेम' प्रकाशित
संपर्क- कालूराम जी की बावड़ी, कैनरा बैंक के पीछे, गली संख्या- 1, सूरसागर, जोधपुर (राजस्थान)- 342024
मोबाइल- 9413461694