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रचनात्मक विस्तार का एक महत्वपूर्ण पड़ाव : राहतों के नाम पर बेचैनियाँ- डॉ० अविनाश भारती

रचनात्मक विस्तार का एक महत्वपूर्ण पड़ाव :  राहतों के नाम पर बेचैनियाँ- डॉ० अविनाश भारती

संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें शामिल प्रत्येक ग़ज़ल अपने अलग भाव-संसार और अनुभव के साथ सामने आती है। कहीं सामाजिक विडम्बनाओं पर तीखा व्यंग्य है, कहीं राजनीतिक व्यवस्था के खोखलेपन पर चोट है, कहीं रिश्तों की नमी और टूटन है तो कहीं स्त्री-जीवन की गहरी पीड़ा और संघर्ष है।

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के वर्तमान परिदृश्य में महिला ग़ज़लकारों की उपस्थिति लगातार मज़बूत होती दिखाई दे रही है। हिन्दी ग़ज़ल के शुरुआती दौर में जहाँ महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम थी, वहीं आज अनेक महिला ग़ज़लकार इस विधा को नई दृष्टि, नया अनुभव और नई संवेदना दे रही हैं। इन ग़ज़लकारों ने यह सिद्ध किया है कि ग़ज़ल केवल प्रेम और व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित विधा नहीं है, बल्कि समाज, राजनीति, स्त्री-जीवन, संघर्ष, विसंगतियों और मानवीय रिश्तों की जटिलताओं को भी पूरी ताकत के साथ अभिव्यक्त कर सकती है। इसी सक्रिय और सशक्त महिला ग़ज़ल लेखन की परंपरा में अब अनामिका सिंह 'अना' का नाम भी प्रमुखता से जुड़ता दिखाई देता है। अनामिका सिंह अलग-अलग साहित्यिक विधाओं में लगातार सक्रिय रही हैं। दोहा, नवगीत, कविता जैसी विधाओं में उन्होंने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है और पाठकों के बीच एक अलग पहचान बनाई है। विशेष रूप से नवगीत और दोहा-लेखन में उनकी रचनात्मकता को साहित्यिक जगत ने सराहा है। अब उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह पाठकों के समक्ष है, जो यह संकेत देता है कि उन्होंने ग़ज़ल विधा में भी गंभीरता और परिपक्वता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। राहतों के नाम पर बेचैनियाँ उनके रचनात्मक विस्तार का एक महत्वपूर्ण पड़ाव कहा जा सकता है।

श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह में कुल 75 ग़ज़लें संकलित हैं। संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें शामिल प्रत्येक ग़ज़ल अपने अलग भाव-संसार और अनुभव के साथ सामने आती है। कहीं सामाजिक विडम्बनाओं पर तीखा व्यंग्य है, कहीं राजनीतिक व्यवस्था के खोखलेपन पर चोट है, कहीं रिश्तों की नमी और टूटन है तो कहीं स्त्री-जीवन की गहरी पीड़ा और संघर्ष है। इन ग़ज़लों को पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि अनामिका सिंह 'अना' अपने आसपास के जीवन और समाज को बहुत ध्यान से देखती हैं और उन्हीं अनुभवों को अपनी रचनाओं में सरल लेकिन प्रभावी अंदाज़ में अभिव्यक्त करती हैं।

इस संग्रह की भूमिका सुपरिचित ग़ज़लकार व ग़ज़ल-आलोचनक द्वय डॉ० भावना और के० पी० अनमोल ने लिखी है। दोनों साहित्यिक हस्तियों की उपस्थिति पुस्तक के प्रति पाठकों का विश्वास और भी मज़बूत करती है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अनामिका सिंह ने अपनी ग़ज़लों में भाषा को बोझिल या कृत्रिम बनाने की कोशिश नहीं की है। उनकी भाषा सीधी, सहज और बोलचाल के बेहद क़रीब है। यही कारण है कि संग्रह की ग़ज़लें पढ़ते समय पाठक को कहीं भी कठिनता या बनावटीपन महसूस नहीं होता।

विशेष रूप से ध्यान देने वाली बात यह है कि अनामिका सिंह ने कई ग़ज़लों में अंग्रेज़ी के उन शब्दों का प्रयोग किया है, जो आज की सामान्य बातचीत और जनजीवन का हिस्सा बन चुके हैं। कुछ लोग इसे लेकर मतभेद रख सकते हैं कि हिन्दी ग़ज़लों में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग कितना उचित है, लेकिन यह भी सच है कि साहित्य अपने समय और समाज से अलग नहीं होता। आज का समाज जिस मिश्रित भाषा में संवाद कर रहा है, साहित्य में उसका आना स्वाभाविक है। अनामिका सिंह ने इसी यथार्थ को स्वीकार किया है। यह प्रयोग उनकी ग़ज़लों को आज की पीढ़ी के और अधिक क़रीब ले जाता है। नई पीढ़ी का पाठक इन ग़ज़लों को पढ़ते हुए सहज महसूस करेगा क्योंकि उसे इसमें अपनी रोज़मर्रा की भाषा की झलक दिखाई देगी।

संग्रह में स्त्री-विमर्श से जुड़े अनेक शेर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि एक स्त्री होने के नाते ग़ज़लकार ने महिलाओं के संघर्ष, त्याग, सामाजिक दबाव, अपमान, ज़िम्मेदारियों और उनके भीतर पलती इच्छाओं को बहुत क़रीब से देखा और महसूस किया है। उनकी ग़ज़लों में स्त्री केवल करुणा की प्रतीक बनकर नहीं आती, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकार के प्रति सजग भी दिखाई देती है। यही कारण है कि उनके शेरों में स्त्री-जीवन की सच्चाइयाँ बनावटी नहीं लगतीं, बल्कि जीवन के वास्तविक अनुभवों से निकली हुई जान पड़ती हैं।

संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें केवल भावुकता नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना भी बराबर मौजूद है। ग़ज़लकार ने आम आदमी की समस्याओं, व्यवस्था की विसंगतियों, राजनीतिक अवसरवाद और सामाजिक असमानताओं को अपनी ग़ज़लों में जगह दी है। कई शेर ऐसे हैं, जो पढ़ने के बाद देर तक मन में बने रहते हैं। वहीं कुछ शेर अपनी मासूम संवेदना और मानवीय स्पर्श से पाठक को भीतर तक छू लेते हैं। यही संतुलन इस संग्रह को एकरस होने से बचाता है।

अनामिका सिंह की ग़ज़लों की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी संप्रेषणीयता है। वे कठिन शब्दों और भारी-भरकम प्रतीकों के सहारे प्रभाव पैदा करने की कोशिश नहीं करतीं। उनकी ग़ज़लें सीधे पाठक के अनुभव संसार से जुड़ती हैं। यही कारण है कि यह संग्रह केवल गंभीर साहित्यिक पाठकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामान्य पाठकों द्वारा भी पसंद किया जाएगा। यह संग्रह उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो पहली बार ग़ज़ल पढ़ना शुरू कर रहे हैं, क्योंकि इसकी भाषा और कथ्य दोनों उन्हें सहज रूप से अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

कुछ शेर पाठकों के अवलोकन के लिए उद्धृत हैं-

वक़्त रहते ज़ुबां खोल दो लड़कियो,
ज़िन्दगी की हमें चाबियाँ चाहिए।

ये लकड़ियाँ नहीं हैं, हैं ये लड़कियाँ ‘अना’
घर को चलाया करती हैं गुलफ़ाम लड़कियाँ।

गालियाँ माँ-बहन की सुनकर भी,
औरतों ने कहाँ बुरा माना।

डोलियाँ कितनी ही उठीं अब तक,
कुछ ही उनमें से थीं मगर राज़ी।

फिर मुहब्बत की बस्तियाँ होंगी,
हम बसाने को हों अगर राज़ी।

बूढ़ी आँखों में भी बचपन पलता है,
गले लगाकर उस बचपन को माने दो।

सिंक रही हैं सियासी ‘अना’ रोटियाँ,
बाँटकर मुल्क की मूढ़ आवाम को।

सारे नारे, सारे वादे झूठे हैं,
झोपड़पट्टी में भी जाकर देखा है।

काम होगा, ज़रूर ही होगा,
दाम कुछ हाथ में अगर रख दो।

रूठ गयी है गौरैया,
छत पर दाना-पानी रख।

देह का क्या कुसूर है, बोलो,
सोचते होंगे अधबने किन्नर।

अब यह सवाल हो सकता है कि- 'यह संग्रह किसलिए पढ़ा जाना चाहिए?' तब मैं बतौर पाठक यही कह सकता हूँ कि- 'यह संग्रह केवल ग़ज़लों का संकलन भर नहीं है, बल्कि हमारे समय की सामाजिक, मानवीय और भावनात्मक स्थितियों का दस्तावेज़ भी है। इन ग़ज़लों में जीवन की बेचैनी है, आम आदमी की चिंता है, स्त्री की आवाज़ है, टूटते रिश्तों की कसक है और बदलते समाज की तस्वीर भी है।'

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ग़ज़लकार ने अपनी बात को बिना किसी कृत्रिमता के पाठकों तक पहुँचाया है। उनकी भाषा ऐसी है, जो सीधे दिल और दिमाग़ दोनों पर असर छोड़ती है। ऐसा महसूस होता है, जैसे आम लोगों की बोली-भाषा को ही ग़ज़ल का रूप दे दिया गया हो। यही वजह है कि यह संग्रह हर वर्ग के पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखता है।

बहरहाल, अनामिका सिंह 'अना' जी को इस महत्वपूर्ण और पठनीय ग़ज़ल-संग्रह के लिए हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएँ।

 


पुस्तक : राहतों के नाम पर बेचैनियाँ
विधा : ग़ज़ल
रचनाकार : अनामिका सिंह 'अना'
प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ : 110

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रचनाकार परिचय

अविनाश भारती

ईमेल : avinash9889@gmail.com

निवास : मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार)

जन्मस्थान- मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार)
जन्मतिथि- 08 जनवरी 1995
शिक्षा- पी० एचडी० (शोधरत)
सम्प्रति- सहायक प्राध्यापक
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल एवं आलेख।
प्रकाशन- अदम्य (ग़ज़ल संग्रह, संपादन)
कई साझा संकलनों में ग़ज़लें प्रकाशित। हंस, वागर्थ, साहित्य अमृत, ककसाड़, गीत गागर, हरिगंधा, प्रेरणा अंशु, श्री साहित्यारंग, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर, हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, कविता कोश, अमर उजाला काव्य आदि पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण- दूरदर्शन एवं आकाशवाणी, पटना पर निरंतर ग़ज़लों का प्रसारण।
सम्मान/पुरस्कार- नागार्जुन काव्य सम्मान, 2020
निवास- साहेबगंज, मुज़फ्फ़रपुर (बिहार)
मोबाइल नं०- 9931330923