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प्यार करना चाहिए- ललन चतुर्वेदी

प्यार करना चाहिए- ललन चतुर्वेदी

मैं जल नहीं रहा हूँ. आपको प्रेम की ताकत बतलाना चाह रहा हूँ. एक से एक बढ़कर एक अद्भुत प्रेमी जोड़े मिले. मैं ईर्ष्यालु आदमी नहीं हूँ. दूसरे का धन देखकर खुश हो जाता हूँ- आनक धन से धनवंती रे कुब्जा भेल रानी. आपको प्यार न मिले तो कोई दूसरा भी प्यार नहीं करे. अजीब हालत है दुनिया की! दुष्यंत की तरह उदार बनिए- मेरे सीने में नहीं,तेरे सीने में ही सही ,हो आग कहीं भी,आग जलनी चाहिए. सब ठाकुर के जीव हैं. उन्हें खेलने-कूदने दे. अभी उनके घुटने मजबूत हैं .वे घुटने टेक कर प्रपोज करते हैं. अपने प्यार का इजहार करते है. यही तो उमर है पगले. उन्हें गलती से मिस्टेक करने दो भाई। 

पहले भी कह चुका हूँ। दोहरा रहा हूँ। देर-सवेर हो सकती है लेकिन कहने से कभी नहीं चूकता. लेखक हूँ- एक जिम्मेदार प्राणी. सोचने-समझने में थोड़ा समय लगता है। आप जानते ही हैं घटना हो जाने के बाद माहौल थोड़ा शांत हो जाता है तब पुलिस मौका ए-वारदात पर पहुँचती हैँ वह भी अन्तर्यामी तो है नहीं. वैसे ही, अच्छा लेखक कुछ ठहर-सुस्ताकर लिखता हैँ बड़ा लेखक तो लम्बा ब्रेक लेता है और अचानक पाँच सौ पेज का नोवेल लेकर प्रकट होता है. लोग कहते हैं कि इस बार का नोबेल भारत में ही आएगा। खैर, जाने दीजिए इन बातों को। मुद्दे की बात करने के पहले परसाई जी का स्मरण कर लूँ। यह मेरे लिए मंगलाचरण है. तुलसी दास ने तो स्मरण करने के क्षेत्र में जो विश्व रिकार्ड बनाया वह शिव-धनुष की तरह है। उसे कोई नहीं तोड़ सकता. इसीलिए मैं केवल परसाई जी को याद करता हूँ। हमारे व्यंग्य के पुरोधा हैं. वह कहते थे दैनिक घटना क्रम पर नजर रखो। उन पर लिखो. शाश्वत के चक्कर में मत पड़ो। आज के लेखक उनकी बात सुनते ही नहीं हैं। जो लिखेंगे शाश्वत ही लिखेंगे। परिणाम देखिये कि रचना महीने भर भी जीवित नहीं बच पाती है। सो, मैं सावधान हूँ। शाश्वत के चक्कर में नहीं हूँ। पल-पल के मजे ले रहा हूँ. इस प्रस्तावना से आप उब गए होंगे। चलिए थोड़ा आपको सब्ज बाग़ की सैर कराता हूँ।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि चौदह फरवरी प्रेमियों का दिन है। अपना परब-त्यौहार की तिथि याद हो कि न याद हो, भला,यह भी कोई भूलने वाला दिन है! जो भी हो प्रेमियों ने सात दिनों तक कौन-कौन सा डे मनाया, उन पर चर्चा करूँ तो अधिक लम्बा हो जाएगा। इसीलिए सीधे वेलेंटाइन पर ही आता हूँ. अपनी स्थिति स्पष्ट कर दूँ। आपको भी जानकार अच्छा लगेगा। मैं सात दिनों वाला नहीं हूँ, सात फेरे वाला हूँ. सात जनम तक साथ निभाने वाला और मर कर भी प्यार करने वाला। कोई ऐरू-गेरू नहीं हूँ. अधिकृत प्रेमी हूँ .इसीलिए मुझे पति कहा जाता है. यह मेरा अंतिम प्रोमोशन है। इसके बाद कोई पद नहीं है. परम पद प्राप्त हो चुका है. मुझे खुशी होती है कि मैंने प्यार का पेटेंट करा लिया है. मैं अपनी बड़ाई करने लग जाता हूँ. खैर,इसमें कोई बुराई नहीं है। यह अपनी पीठ अपने खुजलाने का समय है। दूसरे लोग तो सेहत बिगाड़ने के लिए पड़े हुए हैं। अतः आत्मप्रशंसा का आसव दैनिक रूप से सेवन करते रहना जरूरी है। यह सेहत के लिए संजीवनी है।
काम की बात करूँ तो कल जब सोशल मीडिया पर आया तो मेरा घमंड चकनाचूर हो गया. प्रेम लबालब भरा हुआ था, छलक रहा था. मेरे यहाँ छलकना को अच्छा नहीं माना जाता। चाहे दूध हो या पानी, पात्र में रहे तो अच्छा। पात्र से गिरने पर फिसलने और अपवित्र होने की संभावना बनी रहती है। कुछ लोगों का मानना है कि प्रेम भी पात्र तक ही सीमित रहे। मेरी दृष्टि कुछ अलग है और उदार भी। चीजें हैं तो दिखनी चाहिए और पूरी पारदर्शिता के साथ दिखनी चाहिए। कुछ अच्छा दिखता है तो कूढ़मगजों का दिल दुखने लगता है. प्रेम से बढ़कर पावन कुछ भी नहीं। इसका प्रचार-प्रसार हमारी सभ्यता-संस्कृति के लिए श्रेयस्कर है. खैर,सोशल मीडिया पर प्रेम की बाढ़ मैं भी बह गया. मेरी आँखें भी छलक गयी। ये खुशी के आँसू थे। मैंने ईश्वर का धन्यवाद किया कि बार-बार ये दिन आये. मेरा मन नहीं भरा। बिना नहाये-धोवाए पंचमुखी हनुमान जी के पास पहुँच गया। जानते हैं क्यों? इसलिए कि हनुमान जी ब्रह्मचारी होते हुए भी प्रेम के देवता है। वे गृहस्थी बसाने वाले देव है। सुग्रीव से लेकर भगवान् राम तक की गृहस्थी उन्होंने बसाई थी। प्रेमियों के लिए हनुमानजी से विश्वसनीय कोई नहीं है। मेरा तो विश्वास है। आप अपना जानिए. रोज युद्ध, खून-खराबा आदि की खबरें सुन-सुन कर मन विचलित होता रहता है. ऐसे में कुछ सुकून के पल मिले। अपनी पहुँच फेसबुक तक ही है. इन्स्टा, ट्विटर आदि पर जाने के लिए मन मचलता है लेकिन थोड़ा कंट्रोल करके रखा है. आँखों पर अत्याचार करना उचित नहीं. नैन है तो चैन है। नैन है तब तो अच्छे दिन देख रहा हूँ. न जाने अभी कौन सा दिन देखना बाकी रह गया है. बहरहाल, फेसबुक पर सैर करते हुए अनेक प्रेमी जोड़े से मुलाक़ात हुई. नैन जुड़ा गया। सच बोल रहा हूँ. इस उमर में झूठ क्यों बोलूँगा. एक रील देखकर बड़ा भावुक हो गया. परिचित अनुज हैं। पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम का वह वीडियो घंटे भर में वायरल हो गया। मैंने सोचा कि आग लगे इस कविताई में। पाँच-दस लाइक के लिए तरस जाता हूँ. और यहाँ लोग क्षण भर में वायरल हो जा रहे है. मैं जल नहीं रहा हूँ। आपको प्रेम की ताकत बतलाना चाह रहा हूँ. एक से एक बढ़कर एक अद्भुत प्रेमी जोड़े मिले. मैं ईर्ष्यालु आदमी नहीं हूँ. दूसरे का धन देखकर खुश हो जाता हूँ- आनक धन से धनवंती रे कुब्जा भेल रानी. आपको प्यार न मिले तो कोई दूसरा भी प्यार नहीं करे. अजीब हालत है दुनिया की! दुष्यंत की तरह उदार बनिए- मेरे सीने में नहीं,तेरे सीने में ही सही, हो आग कहीं भी, आग जलनी चाहिए। सब ठाकुर के जीव हैं. उन्हें खेलने-कूदने दे। अभी उनके घुटने मजबूत हैं। वे घुटने टेक कर प्रपोज करते हैं. अपने प्यार का इजहार करते है. यही तो उमर है पगले. उन्हें गलती से मिस्टेक करने दो भाई. जानम समझा करो. प्यार ना मिलने पर मर जावां का दर्द आप क्या समझेंगे. कठकरेजी लोगों को समझाना मुश्किल काम है। कल को किसने देखा है? आज नहीं करेंगे तो कब करेंगे? वे तो जानते ही हैं कि एक दिन घुटने बदलवाने की उम्र आनी ही है. अवसर का लाभ उठाना चाहिए। बस एक ही सावधानी अपेक्षित है- राइट टाइम राइट च्वायस। 
आपको जानकार सुखद नहीं दुखद आश्चर्य होगा कि इस विशाल लोकतांत्रिक देश में प्यार के लिए कोई जगह सुरक्षित नहीं है. रेल से लेकर विमान तक और सरकारी सेवाओं में भी जगह आरक्षित और सुरक्षित कर यात्रा से लेकर जीवन तक मंगलमय बना सकते हैं लेकिन प्यार करते हुए आप सर्वत्र और सदैव सशंकित और असुरक्षित हैं. गुस्सा आता है। प्यार न हो गया अपराध हो. इस धरती पर प्रार्थना-घर, पूजा-स्थल से लेकर श्मशान, कब्रगाह तक सुरक्षित रूप से उपलब्ध है लेकिन प्यार के लिए कोई सुरक्षित जगह हो तो बताइए. खुले में, बारिश में, धूप में। आँधी-तूफ़ान में बच्चे प्यार कर रहे हैं। इस पर भी आपको आपत्ति है। प्यार करने के लिए बच्चे ही तो बचे हैं। उन्हें प्यार करने दीजिए। वे नफ़रत तो नहीं कर रहे हैं। वे अन्य लोगों की तरह जाति-धर्म तो नहीं पूछ रहे हैं। मेरे पास तो न पैसा है,न पावर. यदि सक्षम होता, तो हर शहर में एक वृहत प्रेमगाह बनवाता। जहाँ बच्चे बेरोक-टोक आते। मुफ्त वाई-फाई फैसिलिटी, चाय-कॉफ़ी आदि उपलब्ध कराता. प्यार से बढ़कर नैतिक और जरूरी कोई दूसरा काम नहीं है। एक नेक काम पर भी आपकी भृकुटि तनी हुई है। श्रीमानों, नवजवानों के इस प्रेम-प्रस्ताव पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करें। प्रेम से बढ़कर कोई योग नहीं। करने की चीज है। प्यार करना चाहिए।

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रचनाकार परिचय

ललन चतुर्वेदी

ईमेल : lalancsb@gmail.com

निवास : रांची (झारखण्ड)

मूल नाम- ललन कुमार चौबे
जन्मतिथि- 10 मई, 1966
जन्मस्थान- बैजलपुर, मुज़फ्फ़रपुर (बिहार)
शिक्षा- एम०ए० (हिन्दी), बी० एड, नेट जेआरएफ
प्रकाशन- 'प्रश्नकाल का दौर', 'बुद्धिजीवी और गधे' (व्यंग्य संग्रह), 'ईश्वर की डायरी', 'यह देवताओं का सोने का समय है' एवं 'आवाज़ घर' (कविता संग्रह) प्रकाशित। साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएँ एवं व्यंग्य प्रकाशित।
संपर्क- 202, असीमलता अपार्टमेंट, मानसरोवर एन्क्लेव, हटिया, रांची (झारखण्ड)- 834003
मोबाइल- 9431582801