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प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की बाईसवीं कड़ी

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की बाईसवीं कड़ी

जानती हो शिखा, जब प्रीति गयी थी, मेरे पास प्रणय था। मेरे अकेलेपन का साथी। उस समय जो भी महसूस करते, एक-दूसरे से साझा करते। वह काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रहा। पर तुम्हारा सोचकर मेरा जी घबराता था, क्योंकि मुझे सार्थक के व्यवहार के बारे में सब पता था।

शिखा यथार्थ को कुछ-कुछ महसूस कर रही थी। तभी ख़ुद को भविष्य के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रही थी। बहुत अपेक्षाएँ करना समीर और शिखा की आदतों में नहीं था। पहले समीर और शिखा सारे घर में एक-दूसरे के लिए हुआ करते थे। अब समीर की यादें सारे घर में उसके इर्द-गिर्द घूमती थीं। कभी इस कमरे से तो कभी उस कमरे से, शिखा को समीर की आहटें और बातें सुनाई देती थीं। शिखा ने ख़ुद को दूसरे कामों में व्यस्त रखना भी प्रारंभ कर दिया था, ताकि जीवन सामान्य होने लगे। पर इतने सालों का साथ इतनी जल्दी छूटता कहाँ है? यह शिखा को भली-भाँति पता था।

प्रखर पूरे तेरह दिन तक लगातार उसके घर आता रहा था। ड्राइंग रूम में घंटों बैठकर शिखा को चोर निगाहों से देखता रहता। सार्थक के घर में होने से वह शिखा की कोई मदद नहीं कर पाता था, पर उसे यह एहसास दिलाने की कोशिश करता कि वह हमेशा साथ है। प्रखर ने सार्थक से भी दोस्ती कर ली थी। सार्थक को भी प्रखर का स्वभाव पसंद आया। तभी जाते-जाते वह प्रखर से बोला- "अंकल, मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ कि आप और माँ कॉलेज में साथ-साथ पढ़े हैं। आप तीनों की बहुत अच्छी अन्डरस्टैन्डींग थी। लगभग रोज़ ही आप तीनों का साथ में उठना-बैठना था। अंकल, मैं अभी माँ को अपने साथ नहीं ले जा सकता, और माँ भी नहीं जाना चाहती।... चूँकि माँ घर में अकेली रह गयी हैं, अगर आप ध्यान रख लेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा। उन्हें कभी भी कोई ज़रूरत होगी तो मैं आ जाऊँगा।"

प्रखर ने सिर हिलाकर उसको सहमति दी। पर सार्थक की बात सुनकर मन ही मन सोच-विचार करने लगा- 'आज की पीढ़ी कितनी समझदार हो गयी है। अपनी सुगमताओं और सुविधाओं का ध्यान में रखकर कितनी सहजता से सार्थक ने अपनी ज़िम्मेदारी को बेहिचक प्रखर के कंधों पर डाल दिया था। लाइफ मूवस ऑन की रिदम पर चलने वाली पीढ़ी जीवन को कितने अलग तरीके से जीती है। आज पहली बार प्रखर ने व्यावहारिक रूप में देखा। इस पीढ़ी को जब ख़ुद के लिए निर्णय लेने होते हैं, तब यह अपनी बातों का ताना-बाना अपने स्वार्थों और सुविधाओं के इर्द-गिर्द बहुत अच्छे से बुन लेते हैं। प्रखर ने जिस महकमे में काम किया था, वहाँ हर तरह के किस्से उसने सुने थे। न जाने ऐसे कितने एडवोकेट के संपर्क में वह आज भी था, जिनके पास केसेज़ की भरमार थी। बदलते समय में बहुत स्वार्थी सोच होने से किसी भी व्यक्ति के विषय में भविष्यवाणी कर पाना आसान नहीं था।

शिखा ने सार्थक की सभी बातें प्रखर से साझा कीं। सार्थक की बातों को भी प्रखर ने सुना। साथ ही प्रखर को समीर की बताई हुई सार्थक से जुड़ी कई बातें याद आयीं, जिन्हें उसने सिर्फ प्रखर से साझा किया था। समीर ने उन बातों को कभी शिखा से साझा नहीं किया, क्योंकि वह हर बात को माँ बनकर सोचती आयी थी।
सार्थक का व्यवहार भी व्यक्तिवादी सोच से जुड़ा था। उसमें माँ की संवेदनाओं और पीड़ाओं को महसूस करने की इच्छा कहीं नहीं थी। फिलहाल बस हर समस्या के व्यावहारिक समाधान खोजने की मंशा थी। इसके पीछे उसकी पत्नी का व्यवहार भी कहीं कारक था।

सार्थक ने घर से जाने के बाद समीर या शिखा को कभी भी अपने दिल की कोई बात नहीं बतायी। उसने वही किया, जो उसको ठीक लगा। उसने दोनों के इस घर में शिफ्ट होने पर कभी उनकी कोई मदद करने का नहीं सोचा। जबकि बेटे को पता होना चाहिए, उम्र के इस पड़ाव पर घर जमाने में बच्चों की अगर मदद मिल जाए तो आसानी हो जाती है। शनिवार-रविवार उसकी छुट्टी ही रहती थी, और लखनऊ से आगरा ओवर-नाइट यात्रा थी। अगर वह प्लान करता तो आ सकता था। भविष्य में सार्थक शिखा के लिए क्या करेगा या नहीं करेगा, अभी तो यही प्रश्नचिह्न था। उसे तो अपनी गृहस्थी सँभालने के लिए अभी बहुत युद्ध करने थे। प्रखर को सार्थक के बारे में काफ़ी बातें पता थीं। पर यह बात सार्थक को नहीं पता थी।

सार्थक ने अपने मन की भावना प्रखर के सामने रखकर उसके लिए थोड़ी सुगमता कर दी थी। एक स्त्री के अकेले रह जाने के बाद किसी भी पुरुष का उसे सहयोग करना इतना आसान नहीं होता। यह प्रखर बहुत अच्छे से जानता था। जब प्रखर अनजान लोगों की मदद करता रहा था तो शिखा को छोड़ना उसके बस में नहीं था।

जैसे-जैसे समय गुज़रा प्रखर काका या काकी को भेजकर शिखा की मदद करवाने लगा। सार्थक जिस रोज़ लखनऊ वापस गया, प्रखर उसे छोड़ने स्टेशन गया क्योंकि उस रोज़ कैब वालों ने हड़ताल कर रखी थी। सार्थक को ट्रेन में बैठाकर प्रखर जब घर लौटा तो सीधा शिखा के घर गया। समीर के जाने के बाद शिखा से उसे मिलना था। शिखा के इतना परेशान होने पर भी, प्रखर उसके साथ तसल्ली के पाँच मिनट भी नहीं गुज़ार पाया था। जैसे ही प्रखर ने डोर-बेल बजायी, शिखा ने दरवाज़ा खोला। सामने प्रखर को पाकर वह रोने लगी। गुज़रे हुए तेरह दिनों में शिखा ने जितनी समीर की कमी महसूस की थी, उसे उतनी ही प्रखर की याद आयी थी। पग-पग पर साथी बना प्रखर पहले तो आत्मीय बनकर उसके साथ सालों-साल मानसिक यात्रा पर चलता रहा। अब उम्र के इस पड़ाव पर मिलने के बाद मानसिक यात्रा हो या शरीरी प्रखर हमेशा समीर और उसके साथ ही रहा।

प्रखर ने जैसे ही शिखा को देखा, उसे न जाने क्यों लगा कि वह एक अरसे बाद शिखा से मिला है। शिखा की आँखों से झाँकता अकेलापन प्रखर को अपना ही अकेलापन लगा।
"अंदर आने को नहीं कहोगी शिखा? सार्थक को अच्छे से स्टेशन छोड़ आया हूँ।"
शिखा के सहमति से सिर हिलाने पर जैसे ही प्रखर अंदर आया, शिखा उसके गले से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। प्रखर ने शिखा से कहा-
"कबसे सोच रहा था कि तुम्हें अपने साथ लेकर बैठूँ। तुम्हारे कुछ दुख-दर्द बाँटूँ। पर वक़्त मौका ही नहीं दे रहा था। इन तेरह दिनों में मेरे भी रात-दिन कैसे गुज़रे हैं, यह मैं ही जानता हूँ। जब भी तुम्हारे बारे में सोचता कि तुम अकेली घर में क्या कर रही होगी, कहीं बहुत टूट तो नहीं रही होगी? बैचेन हो जाता था। फोन तुम लेती नहीं थी। कैसे बाँटता तुम्हारे दु:ख शिखा! तुम्हें परेशान होते हुए नहीं देख सकता। ख़ुद को आहत करके मुझे भी आहत करोगी।"

प्रखर गले लगी हुई शिखा के बालों में लगातार उँगलियाँ चला रहा था। प्रखर सालों-साल के बाद शिखा से गले मिला था। आज न जाने क्यों शिखा कुछ कमज़ोर भी लगी। समीर के बारे में सोच-सोच कर शिखा ने ख़ुद को हलकान कर रखा था। आज सवेरे से ही शिखा तेज सिर दर्द से परेशान थी। तभी प्रखर ने कहा-
"जानती हो शिखा, जब प्रीति गयी थी, मेरे पास प्रणय था। मेरे अकेलेपन का साथी। उस समय जो भी महसूस करते, एक-दूसरे से साझा करते। वह काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रहा। पर तुम्हारा सोचकर मेरा जी घबराता था, क्योंकि मुझे सार्थक के व्यवहार के बारे में सब पता था। मै यह भी सोच रहा था कि उसके जाने के बाद तुम ख़ाली घर में कितना अकेला महसूस कर रही होगी।"

प्रखर का लगातार धीर-धीरे बोलना और साथ में ही उसके बालों में अपनी उँगलियाँ चलाना शिखा को राहत दे रहा था। उसने एक शब्द भी प्रखर से नहीं बोला। चुपचाप उसके गले लगी रही। उसका कुछ भी बोलने का मन नहीं था। इस क्षण में वह सिर्फ़ प्रखर को महसूस करना चाहती थी, ताकि कुछ देर को अपनी पीड़ा भूल सके। जैसे ही शिखा की आँखों में नींद आना शुरू हुई, उसने प्रखर से कहा-
"सवेरे से मेरे सिर में काफ़ी दर्द था। मेरे बालों में तुम्हारे हाथ फेरने से, अब मुझे बहुत राहत है। शायद तभी मुझे नींद आने लगी है प्रखर! अब तुम भी घर जाकर आराम करो। मैं ठीक हूँ, हम फोन पर बात करेंगे।"

"तेरह दिन से तुमको अपने गले लगाने के लिए तरस गया था शिखा। अपने प्रिय इंसान को कष्ट में देखना कितना कष्टदायक होता है, यह तुम समझ सकती हो, इसलिए सीधा चला आया। ख़ुद को जितनी जल्दी हो सके सँभाल लो। तुम्हें परेशानी में नहीं देख सकता। तभी तो सार्थक को स्टेशन छोड़ने के बाद सीधा तुम्हें देखने आ गया। तुम्हारी उपस्थिति मेरे लिए भी बहुत ज़रूरी है शिखा! यह बात हमेशा याद रखना। काका को बोलकर आया था, सार्थक को स्टेशन छोड़कर जल्द वापस आ रहा हूँ। खाना तैयार रखें, वह भी बाट जोह रहे होंगे। तुमने खाना खा लिया न!"
शिखा के सहमति में सिर हिलाने पर प्रखर ने कहा- "मैं अब चलता हूँ।” बोलकर प्रखर अपने घर चला गया।

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रचनाकार परिचय

प्रगति गुप्ता

ईमेल : pragatigupta.raj@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 23 सितंबर, 1966
जन्मस्थान- आगरा (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- एम०ए० (समाजशास्त्र, गोल्ड मैडलिस्ट)
सम्प्रति- लेखन व सोशल-मेडिकल क्षेत्र में काउंसिलिंग
प्रकाशन- तुम कहते तो, शब्दों से परे एवं सहेजे हुए अहसास (काव्य-संग्रह), मिलना मुझसे (ई-काव्य संग्रह), सुलझे..अनसुलझे!!! (प्रेरक संस्मरणात्मक लेख), माँ! तुम्हारे लिए (ई-लघु काव्य संग्रह), पूर्ण-विराम से पहले (उपन्यास), भेद (लघु उपन्यास), स्टेप्लड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात (कहानी संग्रह), इन्द्रधनुष (बाल कथा संग्रह)
हंस, आजकल, वर्तमान साहित्य, भवंस नवनीत, वागर्थ, छत्तीसगढ़ मित्र, गगनांचल, मधुमती, साहित्य भारती, राजभाषा विस्तारिका, नई धारा, पाखी, अक्षरा, कथाबिम्ब, लमही, कथा-क्रम, निकट, अणुव्रत, समावर्तन, साहित्य-परिक्रमा, किस्सा, सरस्वती सुमन, राग भोपाली, हिन्दुस्तानी ज़ुबान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, दैनिक नवज्योति, पुरवाई, अभिनव इमरोज, हिन्दी जगत, पंकज, प्रेरणा, भारत दर्शन सहित देश-विदेश की लगभग 350 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन और अनुवाद।
कविता अनवरत, कविता अभिराम, शब्दों का कारवां, समकालीन सृजन, सूर्य नगरी की रश्मियाँ, स्वप्नों की सेल्फ़ी, कथा दर्पण रत्न, छाया प्रतिछाया, सतरंगी बूंदें, संधि के पटल पर आदि साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण-
जयपुर दूरदर्शन से चर्चा व आकाशवाणी से सृजन का नियमित प्रसारण
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में कविता का स्थान विषय पर टी.वी. पर एकल साक्षात्कार
संपादन- अनुभूतियाँ प्रेम की (संपादित काव्य संकलन)
विशेष-
राजस्थान सिन्धी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' का अनुवाद।
कहानियों और कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' पर शोध।
प्रतिष्ठित कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'कथाबिम्ब' के संपादक मण्डल में क्षेत्रवार संपादक
कहानियों व कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के लिए दो वर्ष तक नियमित 'ज़रा सोचिए' स्तंभ
सम्मान/पुरस्कार-
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (भोपाल) द्वारा 'तुम कहते तो' काव्य संग्रह पर 'श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार' (2018)
'अदबी उड़ान काव्य साहित्य पुरस्कार' काव्य संग्रह तुम कहते तो और शब्दों से परे पुरस्कृत व सम्मानित (2018)
साहित्य समर्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय 'डॉ० कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता' श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार (2019 और 2020)
विद्योत्तमा फाउंडेशन, नाशिक द्वारा 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' कहानी संग्रह 'विद्योत्तमा साहित्य सम्राट सम्मान' से पुरस्कृत (2021)
श्री कमल चंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार 2021
कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित 'माँ धनपति देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान' 2021, विशेष सम्मान व पुरस्कार
लघु उपन्यास भेद पुरस्कृत मातृभारती 2020
विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 'साहित्य सारंग' से सम्मानित (2018)
अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में 'समाज रत्न' से सम्मानित (2018)
डॉ० प्रतिमा अस्थाना साहित्य सम्मान, आगरा (2022)
कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय सम्मान 'रघुनंदन त्रिवेदी कथा सम्मान' स्टेपल्ड पर्चियांँ संग्रह को- 2023
पंडित जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान द्वारा 'इंद्रधनुष' बाल कथा संग्रह को 'बाल साहित्य सृजक' सम्मान 2023 
जयपुर साहित्य संगीति द्वारा 'कुछ यूँ हुआ उस रात' को विशिष्ट श्रेष्ठ कृति सम्मान 2023
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