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'प्रेमाश्रम' वास्तव में सपनों के भारत की एक कल्पना है- के० पी० अनमोल

'प्रेमाश्रम' वास्तव में सपनों के भारत की एक कल्पना है- के० पी० अनमोल

इस उपन्यास को 'गोदान' की पूर्व-पीठिका कहना पूरी तरह सही जान पड़ता है। दोनों में एक स्पष्ट अंतर दोनों के अंत में है। प्रेमाश्रम, जहाँ आदर्शोन्मुखी यथार्थ पर ख़त्म होता है और अंत में सब सकारात्मक होता है, वहीं गोदान, त्रासद यथार्थ पर समाप्त होता है और शायद इसीलिए वह प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कृति साबित होता है।

कल प्रेमचंद का उपन्यास प्रेमाश्रम पढ़कर ख़त्म किया। यह वर्ष 1922 की रचना है और आदर्शवादोन्मुखी यथार्थवाद लिए हुए है। इस उपन्यास को उनकी महान कृति 'गोदान' की पूर्व-पीठिका माना जाता है। पढ़ते हुए यह बात सच भी लगती है। इसकी मुख्य कथा औपनिवेशिक भारत की सामंती व्यवस्था तथा तत्कालीन किसान जीवन की त्रासदी पर केन्द्रित है। लेकिन जैसा कि माना जाता है कि प्रेमचंद के लेखन में हम तत्कालीन भारत के सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश से परिचित होते हैं, यहाँ भी यह बात सही साबित होती है। उपन्यास अपनी मुख्य कथा के साथ अनेक उपकथाओं तथा घटना-क्रमों के माध्यम से विभिन्न विमर्शों एवं विषयों पर महत्त्वपूर्ण चर्चा करता है। बीसवीं सदी के गुलाम भारत के ज़मींदारों का अपने राजा-महाराजाओं व ब्रिटिश हुकूमत के प्रति व्यवहार तथा ग़रीब भारतीय किसानों की उपेक्षा और उनके प्रति क्रूरतापूर्ण आचरण, रईसों की स्थिति एवं मानसिकता तथा ग़रीब जनता का जीवन और उनकी विषम परिस्थितियाँ, महिलाओं की उस समय की स्थिति, सामाजिक मान्यताएँ एवं रहन-सहन, उस समय के धर्म का स्वरूप तथा अंधविश्वास की स्थिति आदि कितने ही ऐसे विषय हैं, जिन पर यह उपन्यास बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाता है।

कथा के नायक प्रेमशंकर हैं, जो ख़ुद एक ज़मींदार परिवार से हैं लेकिन किसान व जाति हित के लिए समर्पित एक देवता-पुरुष हैं। वे अमेरिका से कृषि शास्त्र पढ़कर लौटे हैं और एकदम सादा जीवन जीते हुए हाजीपुर गाँव में अपने निजी प्रयासों से एक कृषिशाला खोले हुए हैं। उनका लक्ष्य है, ग्रामीण किसानों को कृषि के नवीनतम तरीक़ों से अवगत करवाकर उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाना। पूरे उपन्यास में उनका संतोष, समर्पण और संघर्ष देखे जाने योग्य है। उनके इन्हीं गुणों की बदौलत उनकी कीर्ति भी निरन्तर बढ़ती जाती है। अंत में वे न केवल लखनपुर एवं हाजीपुर के किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने में सफल होते हैं बल्कि अपने जीवन से अनेक लोगों को सादगी, समर्पण और मेहनत का पाठ भी पढ़ाते हैं। ज्वाला सिंह, डॉ० प्रियनाथ चोपड़ा, वकील इरफान अली, ईजाद अली जैसे कितने ही प्रतिष्ठित लोग अंग्रेजों की नौकरी अथवा अपना विलासपूर्ण जीवन छोड़कर उनके साथ रहकर जाति सेवा में संलग्न हो जाते हैं। साथ ही समाज को अपने भतीजे मायाशंकर के रूप में एक ऐसा आदर्श राजा देने में भी सफल होते हैं, जो स्वयं को किसानों का स्वामी नहीं, बल्कि सखा मानता है, उनके साथ बैठकर भोजन करता है, उनकी फ़िक्र करता है।

दूसरी तरफ कथा का खलनायक है ज्ञानशंकर। ये प्रेमशंकर का सगा भाई है और लखनपुर का जागीरदार भी। यह एक नीच प्रवृति का कुटिल व्यक्ति है, जो पूरी कथा में अपने छल-छद्मों से दूसरों की सम्पत्ति हड़पने और अपने आपको स्थापित करने में प्रयासरत रहता है। वह अपने मंसूबों में पूरी तरह सफल भी रहता है लेकिन बिलकुल अंत में उसके सपनों का साम्राज्य बुरी तरह ध्वस्त होकर गिरता है और वह अपने हाथों अपना अंत करने को विवश होता है। यह पात्र अधिकतर भारतीय सामन्तों का प्रतिनिधित्व करता है। उसके जीवन का दर्दनाक अंक होना बुराई और असुरी प्रवृत्ति का अंजाम तक पहुँचना है। उसी प्रकार प्रेमशंकर की कीर्ति का स्थापित होना अच्छाई का परिणाम है।

इन दो मुख्य पात्रों के साथ कथा को रोचक बनाने के लिए अनेक-अनेक पात्र हैं, जो पाठक मन पर अपना प्रभाव जमाने में सफल होते हैं। इनमें उपरोक्त दोनों पात्रों के चाचा प्रभाशंकर, दोनों की पत्नियाँ- श्रद्धा तथा विद्यावती। ज्ञानशंकर के ससुर लखनऊ के राय कमलानंद और साली गोरखपुर की रानी गायत्री देवी, ज्वालासिंह, उनकी पत्नी शीलमणि, वकील इरफ़ान अली, मौलवी ईजाद अली, गौस ख़ान, डॉ० प्रियनाथ, दारोगा दयाशंकर, ज्ञानशंकर के बेटे मायाशंकर, दयाशंकर के बेटे तेज़शंकर-पद्मशंकर और लखनपुर की जनता, जिनमें मनोहर, कादिर ख़ान, बलराज, बिसेसर शाह, दुखरन भगत आदि हैं। ये सभी पात्र प्रतीकात्मक रूप से किसी न किसी वर्ग अथवा स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रेमचंद की पात्र-योजना भी अद्भुत होती है। इन सभी पात्रों में दोनों मुख्य पात्रों के साथ-साथ रानी गायत्री देवी अपनी प्रतिभा तथा गुणसम्पन्नता के कारण विशिष्ट छाप छोड़ती हैं, हालाँकि कई अन्य पात्र भी सालों तक ज़ेहन में घर कर लेने वाले हैं।

मैंने यह उपन्यास 'रंगभूमि' के प्रभाव के कारण उठाया था। तत्कालीन भारतीय समाज और ग्रामीण जीवन का जैसा वर्णन 'रंगभूमि' और 'गोदान' में मिलता है, उसका और आनंद लेने के लिए मन व्याकुल था। ख़ासकर 'रंगभूमि' का इम्पेक्ट ऐसा था कि उसका ख़त्म होना भीतर एक छटपटाहट भर गया था। उसी अनुभव को जीने की तलाश में एक दिन 'प्रेमाश्रम' का पीडीएफ मिला। आरम्भ के कुछ पृष्ठ पढ़ते ही वही अनुभव जीवन्त होता लगा तो तुरन्त पुस्तक ले आया और पढ़ना शुरू किया। ख़त्म करने पर वही तसल्ली मिली, जिसकी प्यास थी।

इसकी कहानी आरम्भ में पाठकों को बाँध पाने में थोड़ा समय लेती है। कुछ अध्याय पढ़ने के बाद अनुभव हो रहा था कि शायद यहाँ प्रेमचंद अपने स्तर से उन्नीस हो रहे हैं लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने के बाद कथा ने ऐसा जकड़ा कि चार-पाँच ही दिन में उपन्यास ख़त्म करना पड़ा। कहानी आरम्भ में पाठकों को बाँध पाने में थोड़ा समय लेती है लेकिन केवल दो दिन में आधे से ज़्यादा पुस्तक पढ़ जाना, मेरे लिए इसलिए अजीब है क्योंकि मैं गद्य की किताबों को चबा-चबाकर पढ़ता हूँ। दिन में मुश्किल से 4-5 पृष्ठ और महीने- दो महीने में पूरी किताब।

इस उपन्यास को 'गोदान' की पूर्व-पीठिका कहना पूरी तरह सही जान पड़ता है। दोनों में एक स्पष्ट अंतर दोनों के अंत में है। प्रेमाश्रम, जहाँ आदर्शोन्मुखी यथार्थ पर ख़त्म होता है और अंत में सब सकारात्मक होता है, वहीं गोदान, त्रासद यथार्थ पर समाप्त होता है और शायद इसीलिए वह प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कृति साबित होता है। हालाँकि मेरी दृष्टि में रंगभूमि, गोदान से अधिक बड़ी रचना है और प्रेमाश्रम कमतर तो बिलकुल नहीं। इस उपन्यास के पात्र प्रेमशंकर जहाँ रंगभूमि के सूरदास तथा कुँवर विनय सिंह की याद दिलाते हैं, वहीं मनोहर व बलराज, गोदान के होरी तथा गोबर की। पुस्तक का शीर्षक लगभग अंत में जाकर सार्थक होता प्रतीत होता है। आधे से ज़्यादा पढ़े जाने तक मन में यह बात बराबर उठती है कि पुस्तक का नाम 'प्रेमाश्रम' क्यूँ दिया गया होगा लेकिन जब प्रेमशंकर के प्रयास सार्थक होते हैं और हाजीपुर में उनकी कृषिशाला के पास एक ऐसी बस्ती बस जाती है, जहाँ प्रेमशंकर सहित कई परिवार स्नेह, संतोष एवं समानता के साथ रहने लगते हैं। यही बस्ती लेखक की कल्पना का 'प्रेमाश्रम' है, जिसकी परिणति वे समस्त देश में देखना चाहते हैं। उन सबमें सबसे सुखद है मायाशंकर का मित्र-भवन, जहाँ भावी राजा माया, कई रईसों के बच्चे और नौकरों के बच्चे एक ही तरह पूरी समानता के साथ रहते हैं।

उपन्यास में सर्वाधिक मार्मिक है मनोहर द्वारा गौस ख़ान की हत्या के बाद लखनपुर के ग्रामीणों की दुर्गति तथा सर्वाधिक सुखद है उसी गाँव में अंत में रामराज्य जैसा वातावरण। सर्वाधिक मनोरंजक है ज्ञानशंकर के ससुर राय कमलानंद का जीवन, जो अंत में संन्यास धारण कर नामी महात्मा बन जाते हैं तो सबसे रोचक है ज्ञानशंकर व गायत्री देवी का कृष्ण-राधा भक्ति में पगा प्रेम-प्रसंग। प्रेमशंकर की पत्नी श्रद्धा के प्रति सर्वाधिक सहानुभूति होती है और तेज़शंकर-पद्मशंकर की मृत्यु का सर्वाधिक दुःख होता है। ये दोनों भैरव मंत्र सिद्ध करने के फेर में अंधविश्वास की भेंट चढ़ते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि उपन्यास का हर पात्र कथा को मज़बूती प्रदान करता है।

इस उपन्यास में जहाँ प्रेमचंद भारतीय ग्रामीण जनता के दुखद जीवन का विश्वसनीय चित्रण करते हैं, सामंतो- जागीरदारों के क्रूर और विलास- वैभवपूर्ण जीवन का उद्घाटन करते हैं, वहीं समाज में व्याप्त धर्माडम्बरों तथा अंधविश्वास की प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हैं। कादिर ख़ान के माध्यम से मुसलमानों के भारतीय समाज में रम जाने को दर्शाते हैं, वहीं गौस ख़ान- मौलवी ईजाद अली द्वारा दोनों प्रमुख धर्मों के एक-दूसरे पर संदेह को भी उजागर करते हैं। श्रद्धा के रूप में पारंपरिक विचारों की, शील गुणसंपन्न तथा धर्म-भीरु स्त्री को सामने रखते हैं तो गायत्री के रूप में पढ़ी-लिखी, आत्मविश्वासी तथा आधुनिक विचारों वाली स्त्री से परिचय करवाते हैं। अनाथालयों-संस्थाओं की असलियत प्रकट कर उनकी स्वार्थी प्रवृत्ति का पर्दाफाश करते हैं तो लोभी अफ़सरों-अधिकारियों की भी खबर लेते हैं। उपन्यास की कथा में अवध के किसान आन्दोलन, महात्मा गांधी के सत्याग्राह एवं ट्रस्टीशिप सिद्धान्त तथा ब्रिटिश हुकूमत के प्रति भारतीयों के असंतोष का प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है। कथाओं में उपकथाओं का ऐसा समावेश है कि कहीं भी बोरियत तथा उलझाव बिलकुल अनुभव नहीं होता।

'प्रेमाश्रम' वास्तव में रामराज्य अथवा सपनों के भारत की एक कल्पना है, जिसमें किसान समृद्धि तथा स्वाभिमान के साथ जीवनयापन कर सकें। ग़रीब और मज़दूर अपने श्रम और ईमानदारी के साथ गुज़र-बसर कर सकें। सभी धर्मों-जातियों के लोग एक-दूसरे के साथ शांति और सहभागिता के साथ मिल-जुलकर रह सकें तथा अमीर-सामर्थ्यवान वर्ग निम्न वर्ग के साथ सहानुभूति और सहयोग के द्वारा अपने क्षेत्र, अपनी जाति, अपने देश की तरक्की और ख़ुशहाली की इबारत गढ़ सकें।

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
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1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
4. 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन।
5. ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों का संपादन।
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