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पिता होना- सुधा गोयल

पिता होना- सुधा गोयल

यह वह वक्त था, जब लड़कियाँ अकेली घर से बाहर नहीं निकलती थीं। आप उन परम्पराओं से बग़ावत करना सिखा रहे थे। और मैं क़दम-क़दम आपके सिखाए या दिखाए रास्ते पर चल रही थी। आप मुझे गढ़ रहे थे। हिम्मत से आगे बढ़ा रहे थे। मैं आपका सपना थी और आप वह सपना पूरा कर रहे थे। आप राजनैतिक जलसों में भी साथ ले जाने लगे थे। राजनीति का क-ख-ग भी आपसे सीखे रही थी।

फादर्स डे यानी पिता-दिवस पर मेरे मन में कुछ दबा छिपा सामने आना चाहता है। हाँ, मैं जहाँ से बात शुरू कर रही हूँ, वह यह है कि मैंने या मेरे किसी भाई-बहन ने आपको पिताजी, भाईजी, बाबूजी, पापाजी या डैडी नहीं कहा। पापाजी या डैडी तब चलन में नहीं था। यह इक्कीसवीं सदी की पढ़ी-लिखी पीढ़ी की देन है। पिताजी भी नहीं कहा। कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। पता नहीं क्यों? या तो माँ ने नहीं सिखाया, संयुक्त परिवार में मेरे ताऊजी के बच्चे आपको चाचाजी बुलाते थे। उनकी देखा-देखी हम भी चाचाजी पुकारने लगे। न आपने, न माँ ने हमें चाचाजी कहने पर कभी टोका। खैर, चाचाजी! आज मैं अपने जीवन की पिचहतर साल पुरानी स्मृतियाँ आपसे शेयर कर रही हूँ। आप जहाँ भी हों, पढ़ लेना।

छोटी थी, याद नहीं कि कभी आपने प्यार से सिर पर हाथ रखा हो या कभी आपकी गोद में चढ़ी हूँ। कोई बात नहीं, शायद उस समय पिता बच्चों को गोद में नहीं लिया करते थे। ऐसी ज़रूरत महसूस नहीं हुई। पर अब पिताओं द्वारा अपने बच्चे का जितना ध्यान रखा जाता है, दुहराया जाता है- देखकर छन्न-से कुछ टूट-सा जाता है। पैदा होकर दुनिया में आ गये, आ गये तो जैसे-तैसे पलना और बढ़ना था ही। यह कुदरत का नियम है।

हाँ, कभी-कभी आप सब बच्चों को गंगा स्नान के लिए ले जाते। आप चलते थे और हमें आपका साथ देने के लिए दौड़ना पड़ता था। घाट पहुँचकर आप थोड़ी देर के लिए तख्त पर बैठकर घाट वाले से बातें करते। आपके जान-पहचान वाले भी आ जाते। हम भी वहाँ रेत के घरोंदे बनाने लगते। जब खेलकर थक जाते तो जल में उतर जाते। उस समय जल हमारे घुटनों से थोड़ा ऊपर कमर तक आता था। हम अपनी फ्रॉक में छोटी-छोटी मछलियाँ भर लेते थे। गिनते और फिर जल में छोड़ देते।

यह खेल भी कुछ देर चलता। आप दूर से भी हम सब पर नज़र रखते। दस मिनिट बाद ही आपका आदेश होता, जल से बाहर निकलो। हम आज्ञाकारी बच्चे की तरह निकल आते। अपने कपड़े बदलते और तख्त पर आकर बैठ जाते। तब तक आप भी स्नान कर लेते। अपने साथ हमारे कपड़े भी जल में डुबकी लगाकर निचोड़ कर ले आते। चलते समय हम माथे पर चंदन लगवाते। एक बात और, एक छोटी बाल्टी में गंगाजल लेकर चलते, जिसमें जानबूझकर रखी गयी मछली उछल-कूद मचाती रहती और उस जल को घर लाकर कुएं में डाल देते। अगले दिन कुएं में झाँक कर देखते कि मछली कितनी बड़ी हुई। अक्सर मछली पनिहारिनों की बाल्टी में निकल जाती।

लौटते समय उस रेतीले रास्ते में लगने वाली बाड़ियों से हमें ककड़ी और खीरे दिलवाते। खरबूजे और तरबूज घर आ जाते। बड़े होने पर पता लगा कि पिताजी गंगा की रेती में होने वाली फ़सल ठेके पर देते थे। गंगा स्नान के बहाने फ़सल का मुआयना भी कर आते थे। यह उनका लाड़ था- दुलार था, जिसका कोई दिखावा नहीं था। आप साथ हैं, यही हमारा अभिमान था।

दुकान से लौटने पर शाम को आप सब बच्चों के लिए फल या मिठाई अवश्य लाते। हम सबको आपके लौटने का इंतज़ार रहता। अपने हाथ से सबको आवाज़ लगाकर देते और जो बचता माँ को थमा देते। यह था आपका प्यार जताना।

शाम को खाना खाने के बाद आप हमसे स्कूल की बातें पूछते। गिनती पहाड़े भी सुनते यानी यह था आपका अनुशासन। अक्सर आप हमें कहानियाँ भी सुनाते। राम और कृष्ण को सुनने के साथ-साथ चंद्रकांता संतति की तिलस्मी कहानियाँ हम बड़े ध्यान से सुनते और चमत्कृत होते। पिताजी इतनी कहानियाँ कहाँ से लाते हैं, सोचकर रह जाते, पूछा कभी नहीं। उनका कहानी सुनाने का अपना अलग ढंग था। वे अपने बचपन के किस्से भी सुनाते। हमें आश्चर्य होता। बीच में हम टोक कर सवाल भी पूछ लेते। वे बड़ी सहजता से समझा देते।

अगली शाम फिर कहानियों के नाम होती। तब यह नहीं पता था कि चंद्रकांता संतति एक उपन्यास है। चंद्रकांता संतति सन् 1987 में पुस्तकालय से लेकर पढ़ा।
आपका स्वभाव बड़ा कड़क, आपको हँसते हुए कभी नहीं देखा। हाँ, कभी-कभी मुस्करा देते। जब तक आप घर में रहते, सब सहमे-सहमे-से रहते, जैसे हवा भी ठहर गयी हो। ज़िद्द थी या अनुशासन कि आप यदि दिन को रात कहें तो रात ही माननी पड़ेगी। यानी आपके नज़रिए से ज़िंदगी चलानी पड़ेगी। मैं नहीं जानती कि मुझमें ऐसा क्या था कि आपकी डांट कभी नहीं खायी। बिना कहे ही आप मन की बात समझ जाते। मुझे पढ़ना है, आप माँ के विरोध के बावजूद कॉलेज में दाखिला करा आये। म्यूजिक नाइट में घर से कोई नहीं गया। आपने स्टूडेंट का टिकट लेकर मुझे भेज दिया। आपने ही मुझे भयमुक्त जीवन जीना सिखाया।

अक्सर आप खारिज के कार्यक्रमों में या सांयकालीन कक्षाओं में मुझे पढ़ने भेज देते। शहर के बाहर भी अकेली चली जाती, यह आपका मुझ पर विश्वास था। यह वह वक्त था, जब लड़कियाँ अकेली घर से बाहर नहीं निकलती थीं। आप उन परम्पराओं से बग़ावत करना सिखा रहे थे। और मैं क़दम-क़दम आपके सिखाए या दिखाए रास्ते पर चल रही थी। आप मुझे गढ़ रहे थे। हिम्मत से आगे बढ़ा रहे थे। मैं आपका सपना थी और आप वह सपना पूरा कर रहे थे। आप राजनैतिक जलसों में भी साथ ले जाने लगे थे। राजनीति का क-ख-ग भी आपसे सीखे रही थी।

अपने पैरों पर खड़े होना भी आपने सिखाया। यह था ज़िंदगी का एक ख़ास क़दम। जब आपने एक इंटर कॉलेज में सहायक अध्यापिका के रूप में मुझे नियुक्ति-पत्र लाकर थमाया। आपने मेरा भविष्य बाँच लिया था कि जीवन में मुझे क्या बनना है। मैं छोटी-छोटी रचनाएँ लिखकर नवभारत टाइम्स में भेजा करती थी। आप पढ़ते और सराहते। पग-पग पर आपके कठोर अनुशासन में मैं आगे बढ़ रही थी। माँ ने टोका-टाकी बंद कर दी थी। अपनी दुकान का हिसाब-किताब, खाता ठीक रखना, व्यापारी पत्राचार सब आप सिखा रहे थे। आप ही मेरी पाठशाला, आप ही गुरु और मैं आपकी कामना।

आपको जुदा हुए पचपन साल हो गये। आपने जो रास्ते मुझे दिखाये, जो बीजारोपण किया, मैं नहीं जानती थी कि वे सब इस प्रकार पल्लवित होकर वृक्ष बनेंगे। हाँ, एक बात बताना तो भूल ही रही हूँ कि मुझे नहीं मालूम था कि आपका और माँ का जन्मदिन कब था, या आपकी वैवाहिक वर्षगाँठ कब होती है, कभी आपको विश नहीं किया। उस समय यह प्रथा थी ही नहीं और लड़कियों का जन्मदिन याद रखना आवश्यक नहीं था। बस आपका जाना याद है। इक्कीसवीं सदी की देन पिता-दिवस मुझे बहुत कुछ सिखा गया है। उसे शब्दों में नहीं बाँध पा रही।

हाँ, एक छोटा-सा वाक़या याद रहा है। उसे बिना लिखे बात अधूरी रह जाएगी। मैं उस समय सात साल की बच्ची रही होऊंगी। हमें सिखाया गया था कि बड़ों का नाम नहीं लेते। आपका नाम सूरज था। हमारे घर में न तो कभी सूरज निकला न छिपा। बस दिन निकलता रहा और छिपता रहा। आज भी सूरज नहीं निकलता।

कक्षा दो की बात है। अयोध्या सिंह उपाध्याय जी की कविता हमारी किताब में थी। अध्यापिका ने उस कविता की रीडिंग करने के लिए मुझे खड़ा कर दिया। पहली पंक्ति थी- सूरज निकला, चिड़िया बोलीं। मैंने सूरज छोड़ कर आगे पढ़ दिया। टीचर ने टोका- "ढंग से पढ़ो।" फिर वही, अब डांट खानी थी कि तभी एक छात्रा बोली- "बहनजी, ये सूरज नहीं बोलेगी, ये इसके पिताजी का नाम है।" पूरी कक्षा ठहाकों से गूँज उठी।

आप जहाँ से भी मुझे देख रहे हैं, मुझे लग रहा है कि आपकी आँखें भी नम हैं। और एक हल्की-सी मुस्कुराहट आपके चेहरे पर है, इतना ही।

- प्रणाम चाचाजी

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रचनाकार परिचय

सुधा गोयल

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