Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा 'नवजन्मा' पर सीमा सिंह की मीमांसा

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा 'नवजन्मा' पर  सीमा सिंह की मीमांसा

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी द्वारा रचित लघुकथा ‘नवजन्मा’ हिंदी लघुकथा साहित्य की एक उत्कृष्ट बानगी है। यह रचना न केवल सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करती है, बल्कि अपनी विशिष्ट शिल्पगत बारीकियों के माध्यम से पाठक की संवेदनाओं को भी झकझोरती है। इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लघुकथा के मानकों का बड़ी शालीनता से पालन करती चली है बिना किसी आडंबर और शोर के।

लघुकथा- नवजन्मा
रचनाकार- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
___________
 
जिलेसिंह शहर से वापस आया तो आँगन में पैर रखते ही उसे अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ लगा। दादी ने ऐनक नाक पर ठीक से रखते हुई उदासी-भरी आवाज़ में कहा- "जिल्ले! तेरा तो इभी से सिर बँध ग्या रे! छोरी हुई है!"
जिलेसिंह के माथे पर एक लकीर खिंच गई।
 
"भाई लड़का होता तो ज़्यादा नेग मिलता। मेरा भी नेग मारा गया।" बहन फूलमती ने मुँह बनाया- "पहला जापा था। सोचा था- खूब मिलेगा।"
 
जिले सिंह का चेहरा तन गया। माथे पर दूसरी लकीर भी उभर आई।
 
माँ कुछ नहीं बोली। उसकी चुप्पी और अधिक बोल रही थी। जैसे कह रही हो, जूतियाँ घिस जाएँगी ढंग का लड़का ढूँढ़ने में। पता नहीं किस निकम्मे के पैरों में पगड़ी रखनी पड़ जाए।
 
तमतमाया जिलेसिंह मनदीप के कमरे में घुसा। बाहर की आवाज़ें वहाँ पहले ही पहुँच चुकी थीं। नवजात कन्या की आँखें मुँदी हुई थीं। पति को सामने देखकर मनदीप ने डबडबाई आँखें पोंछते हुए अपना मुँह अपराध भाव से दूसरी ओर घुमा लिया।
 
जिलेसिंह तीर की तरह लौटा और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ चौपाल वाली गली की ओर मुड़ गया।
 
"सुबह का गया अभी शहर से आया था। तुम दोनों को क्या ज़रूरत थी इस तरह बोलने?" माँ भुनभनाई। घर में और भी गहरी चुप्पी छा गई।
 
कुछ ही देर में जिलेसिंह लौट आया। उसके पीछे-पीछे सन्तु ढोलिया गले में ढोल लटकाए आँगन के बीचों-बीच आ खड़ा हुआ।
"बजाओ!" जिलेसिंह की भारी भरकम आवाज़ गूँजी।
तिड़क-तिड़-तिड़-तिड़ धुम्म, तिड़क धुम्म्म! ढोल बजा।

मुहल्ले वाले एक साथ चौंक पड़े। जिलेसिंह ने अल्मारी से अपनी तुर्रेदार पगड़ी निकाली; जिसे वह शादी-ब्याह या बैसाखी जैसे मौके पर ही बाँधता था। ढोल की गिड़गिड़ी पर उसने पूरे जोश से नाचते हुए आँगन के तीन-चार चक्कर काटे। जेब से सौ का नोट निकाला और मनदीप के कमरे में जाकर नवजात के ऊपर वार-फेर की और उसकी अधमुँदी आँखों को हलके-से छुआ। पति के चेहरे पर नज़र पड़ते ही मनदीप की आँखों के सामने जैसे उजाले का सैलाब उमड़ पड़ा हो। उसने छलकते आँसुओं को इस बार नहीं पोंछा।

बाहर आकर जिलेसिंह ने वह नोट सन्तु ढोलिया को थमा दिया। 
सन्तु और ज़ोर से ढोल बजाने लगा- तिड़-तिड़-तिड़ तिड़क-धुम्म, तिड़क धुम्म्म!तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म!
 
 

कथा मीमांसा
_______
 
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी द्वारा रचित लघुकथा ‘नवजन्मा’ हिंदी लघुकथा साहित्य की एक उत्कृष्ट बानगी है। यह रचना न केवल सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करती है, बल्कि अपनी विशिष्ट शिल्पगत बारीकियों के माध्यम से पाठक की संवेदनाओं को भी झकझोरती है।
 
इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लघुकथा के मानकों का बड़ी शालीनता से पालन करती चली है बिना किसी आडंबर और शोर के। कथा स्वयं कहती चलती है कि नियम का पालन करने के लिए रचना को नीरस अथवा बनावटी होने की कतई आवश्यकता नहीं है। कथा में सहजता बनाए रखने के साथ-साथ, बड़ी सरलता से सरलता का निर्वहन हुआ है। इसका शीर्षक, कथा का प्रमुख आकर्षण है, जो अपने भीतर कथा का संपूर्ण सार समेटे हुए है, जहाँ एक ओर यह नवजात कन्या के जन्म का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर यह जिलेसिंह के भीतर एक प्रगतिशील और मानवीय सोच के ‘नवजन्म’ को भी रेखांकित करता है। इस लघुकथा का शिल्प अत्यंत प्रभावोत्पादक है। लघुकथा की सफलता उसके ‘लाघव’ यानी संक्षिप्तता में निहित होती है और यहाँ लेखक ने कम से कम शब्दों में एक बहुत बड़े फलक की कहानी कह दी है।
 
कथा का प्रारंभ एक भारी सन्नाटे और उदासी के साथ होता है, जो पाठक के मन में जिज्ञासा और तनाव एक साथ उत्पन्न करता है। इस कथा की भाषा की बात करें तो यह अत्यंत सहज, प्रवाहमयी और परिवेश के अनुकूल है। कथा में आंचलिक भाषा के प्रयोग ने पात्रों को जीवंत बना दिया है। ‘सिर बँध ग्या’, ‘इभी से’, ‘नेग मारा गया’ और ‘जापा’ जैसे शब्द; आंचलिक परिवेश की यथार्थपरक गूँज पैदा करते हैं। लघुकथा की दूसरी बड़ी विशेषता संवाद अत्यंत छोटे लेकिन अर्थपूर्ण हैं। दादी और बहन के संवाद जहाँ समाज की संकीर्णता और स्वार्थ को उजागर करते हैं, वहीं जिलेसिंह की चुप्पी उसकी आंतरिक बेचैनी और बाद में उसका गर्जनापूर्ण ‘बजाओ!’ शब्द उसके दृढ़ निश्चय को प्रकट करता है। भाषा में बिंबों का प्रयोग बहुत सधा हुआ है, जैसे माथे पर लकीरों का खिंचना- क्रोध और द्वंद्व का बिंब है, तो ‘उजाले का सैलाब’ मन की शांति और आनंद का प्रतीक है।
 
शिल्प की दृष्टि से इस लघुकथा में प्रतीकों का चयन बहुत सटीक है। ‘तुर्रेदार पगड़ी’ जिसे जिलेसिंह शादी-ब्याह जैसे बड़े मौकों पर बाँधता था, उसे बेटी के जन्म पर पहनना एक क्रांतिकारी प्रतीक है। यूँ तो आम जीवन में पगड़ी अक्सर पुरुष के अहंकार या खानदानी इज़्ज़त से जोड़ी जाती है, जिसे माँ ‘किसी निकम्मे के पैरों में रखने’ की बात कर रही थी। लेकिन जिलेसिंह उसी पगड़ी को पहनकर बेटी के उत्सव में नाचता है और यह संदेश देता है कि बेटी सम्मान को कम नहीं करती बल्कि वह स्वयं एक उत्सव है। इसी प्रकार ‘ढोल’, जो पारंपरिक रूप से केवल बेटों के जन्म पर बजाया जाता था, यहाँ उस परंपरा को तोड़कर बेटी के लिए बजवाया गया है। यह शिल्पगत चुनाव समाज की जड़ मान्यताओं पर एक करारी चोट है।
 
प्रस्तुति की दृष्टि से हिमांशु जी ने मनोवैज्ञानिक चित्रण पर विशेष बल दिया है। पात्रों का व्यवहार उनकी सोच का आईना है। माँ की चुप्पी जहाँ भविष्य के भय और सामाजिक दबाव को दिखाती है, वहीं मनदीप का अपनी आँखें पोंछना और अपराध-बोध से मुँह मोड़ना स्त्री की उस नियति को दर्शाता है, जहाँ वह स्वयं को ही बेटी के जन्म के लिए अपराधी मानने लगती है। इस लघुकथा का अंत अत्यंत प्रभावशाली है। लेखक ने जिलेसिंह के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज में बदलाव के लिए शब्दों से अधिक कार्यों की आवश्यकता होती है। जब वह ढोल की थाप पर नाचता है, तो वह केवल एक नृत्य नहीं होता, बल्कि वह सदियों से चले आ रहे मौन और शोक को तोड़ने की एक उद्घोषणा होती है।
 
‘नवजन्मा’ लघुकथा अपनी सुदृढ़ भाषा, मारक शैली और सधे हुए शिल्प के कारण एक श्रेष्ठ रचना बन पड़ी है। लेखक ने बिना किसी उपदेशात्मकता के पाठक को सोचने पर विवश कर दिया है। यह कथा सिद्ध करती है कि एक छोटी-सी घटना किस प्रकार एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की संवाहिका बन सकती है। इसकी प्रस्तुति इतनी सघन है कि पाठक स्वयं को जिलेसिंह के साथ उस आँगन में खड़ा महसूस करता है और अंत में ढोल की आवाज़ के साथ एक नई आशा का अनुभव करता है। इस लघुकथा की प्रासंगिकता बेजोड़ है, यह अपने लेखन काल में जितनी प्रासंगिक रही होगी, उतनी ही आने वाले समय में भी रहेगी। जब तक समाज में एक भी बेटी का तिरस्कार होता रहेगा तब तक यह कथा अपनी संपूर्णता के साथ खड़ी दिखाई देगी।

6 Total Review
S

Sudershan Ratnakar

29 July 2026

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’जी की लघुकथा नव जन्मा उत्कृष्ट लघुकथा है। सीमा सिंह जी ने बहुत सुंदर और सटीक समीक्षा की है । हार्दिक बधाई

D

Dr vandna Sharma

27 July 2026

लघु कथा बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है बधाई आदरणीय 🙏 एक जरूरी समस्या को केंद्र में रख कर बुनी गई, सहज भाषा से सजी उत्कृष्ट रचना। समीक्षा अधिक लंबी हो गई है जैसे किसी पुस्तक पर लिखी जाती है। बहुत बढ़िया लिखा है।

D

Dr.Trutpi M. Joshi

27 July 2026

बहुत ही सुंदर लघुकथा । सीमाजी ने सही कहा है कि रामेश्वरजी ने प्रस्तुत कथा में मनोवैज्ञानिक चित्रण ज्यादा प्रस्तुत किया है। वैसे भी हिमांशुजीकी कथा में मनोवैज्ञानिक चित्रण सहज ही उतर आता हैं। बहुत ही सरलरूप से बड़ी मार्मिक बातों की प्रस्तुति हो जाती है,आपकी लघुकथाओं में।

सतीश कुमार

27 July 2026

लघु परन्तु विस्तृत! छोटी सी कहानी में लेखक ने पात्रों की भावनाओं का सही चित्रण किया है साथ ही साथ आधुनिक समाज में भी लडकी पैदा होने पर उत्तपन्न भेदभाव को भी सादगी से प्रस्तुत किया है।

S

Seema Singh

27 July 2026

बहुत शुक्रिया अलका जी

A

Alka Mishra

19 July 2026

बहुत सुंदर समीक्षा की है आपने। जितनी हक़ीक़त बयान करती कंबोज जी ने लघुकथा कही उतनी ही डूबकर आपने मीमांसा लिखी। आप दोनों को हार्दिक बधाई।

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

सीमा सिंह

ईमेल : libra.singhseema@gmail.com

निवास : ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 30 नवम्बर 1973 
जन्मस्थान- बदायूँ (उत्तर प्रदेश)
लेखन विधा- लघुकथा एवं कहानी
शिक्षा- स्नातकोत्तर – (हिंदी साहित्य, मनोविज्ञान।) 
संप्रति- महासचिव,शक्ति ब्रिगेड सामाजिक एवम् साहित्यिक संस्था, सदस्य, सम्पादक मंडल, लघुकथा कलश (अर्धवार्षिक पत्रिका) एवं स्वतंत्र लेखन 
प्रकाशन- • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-28 (छह नवोदिताओं की छियासठ कथाएँ), लघुकथा-अनवरत संकलन (साझा संकलन), नई सदी की धमक (साझा संकलन), स्त्री-पुरुष सम्बन्धी लघुकथाएँ (साझा संकलन), उद्गार (सांझा संकलन) सहित चालीस से अधिक साझा संकलनों में सम्मिलित।
• लघुकथा कलश पत्रिका, शोध-दिशा पत्रिका, दृष्टि पत्रिका, साहित्य अमृत पत्रिका, मृगमरीचिका पत्रिका, चेतना पत्रिका, मरु गुलशन के साथ ही पंजाबी पत्रिका गुसाइयाँ में अनुवाद सहित विभिन्न पत्रिकाओं में। • दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान,अमर उजाला, महानगर मेल, लोकजंग सांध्य दैनिक सहित विभिन्न समाचार पत्रों में। • yourstoryclub.com, openbooksonline.com, laghukatha.com, pratilipi.com वेबसाईट, तथा सेतु (Pittsburgh), हस्ताक्षर, अटूट बंधन सहित कई अन्य वेब पत्रिकाओं में
प्रसारण- बोल हरियाणा, रेडियो पर रवि यादव द्वारा लघुकथाओं का पाठ।
सम्मान/ पुरस्कार- कलश लघुकथा गौरव सम्मान - 2017
ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा - महादेवी वर्मा सम्मान - 2017 आशा किरण समृद्धि फाउंडेशन द्वारा - शिक्षा गौरव सम्मान - 2017
रोटरी क्लब इलीट द्वारा - हिंदी भाषा सेवा सम्मान - 2018
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा - विद्या वाचस्पति सारस्वत सम्मान - 2018 रोटरी क्लब कानपुर इलीट द्वारा - वीमेन अचीवर सम्मान - 2019भारत उत्थान न्यास सम्मान - 2019
पुरस्कार: प्रतिलिपि कथा सम्मान प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2017
साहित्य सृजन संवाद कहानी प्रतियोगिता - विशिष्ट कहानी पुरस्कार - 2017
सेतु लघुकथा प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2018
संपर्क- रॉयल नेस्ट टेक ज़ोन -iv, ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर,(उत्तर प्रदेश)-201306
मोबाईल- 8948619547 / 7303311942