Ira Web Patrika
मार्च 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को नवरात्रि एवं ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

मयंक श्रीवास्तव के नवगीत

मयंक श्रीवास्तव के नवगीत

अल्हड़पन लेकर पछुआ का
घिर आयीं निर्दयी घटाएँ
दूर -दूर तक फैल गयी हैं
घाटी की सुरमई जटाएँ
ऐसे मदमाते मौसम में
जाने कौन-कौन तरसेंगे

आग लगती जा रही है

आग लगती जा रही है
अन्न-पानी में
और जलसे हो रहे हैं
राजधानी में

रैलियाँ पाबंदियों को
जन्म देती हैं
यातनाएँ आदमी को
बाँध लेती हैं
हो रहे रोड़े बड़े
पैदा रवानी में

खेत में लाशें पड़ी हैं
बंद है थाना
भव्य भवनों ने नहीं
यह दर्द पहचाना
क्यों बुढ़ापा याद आता
है जवानी में

लोग जो भी इस
ज़माने में बड़े होंगे
हाँ-हुजूरी की नुमाइश
में खड़े होंगे
सुख दिखाया जा रहा
केवल कहानी में

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एक अरसे बाद

एक अरसे बाद
फिर सहमा हुआ घर है
आदमी गूँगा न बन जाए
यही डर है

याद फिर भूली हुई
आयी कहानी है
एक आदमखोर
मौसम पर जवानी है
हाथ जिसका आदमी के
खून से तर है

सोच पर प्रतिबंध का
पहरा कड़ा होगा
अब बड़े नाख़ून वाला
ही बड़ा होगा
वक़्त ने फिर से किया
व्यवहार बर्बर है

पूजना होगा
सभाओं में लुटेरों को
मानना होगा हमें
सूरज अँधेरों को
प्राणहंता आ गया
तूफान सर पर है

कोंपलें तालीम लेकर
जब बड़ी होंगी
पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ
ठंडी पड़ी होंगी
वर्णमाला का दुखी
हर एक अक्षर है

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नदी

आह भरती है नदी
टेर उठती है नदी
और मौसम है कि उसके
दर्द को सुनता नहीं

रेत बालू से अदावत
मान बैठे हैं किनारे
ज़िंदगी कब तक बिताएँ
शंख-सीपी के सहारे
दर्द को सहती नदी
चीखकर कहती नदी
क्या समुन्दर में नया
तूफान अब उठता नहीं?

मन-मरुस्थल में दफ़न है
देह पर जंगल उगे हैं
तन-बदन पर किश्तियों के
ख़ून के धब्बे लगे हैं
आज क्यों चुप है सदी
प्रश्न करती है नदी
क्या नदी का दुःख
सदी की आँख में चुभता नहीं?

घाट के पत्थर उठाकर
फेंक आयी हैं हवाएँ
गोंद में निर्जीव लेटी
पेड़-पौधों की लताएँ
वक़्त से पिटती नदी
प्राण ख़ुद तजती नदी
क्योकि आँचल से समूचा
जिस्म अब ढँकता नहीं?

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पता नहीं है

पता नहीं है, लोगों को
क्यों अचरज होता है
जब भी कोई गीत प्यार का
मैं गा देता हूँ

प्यार कूल है, प्यार शूल है
प्यार फूल भी है
प्यार दर्द है, प्यार दवा है
प्यार भूल भी है
मेरे लिए प्यार की इतनी
भागीदारी है
इसको लेकर अपनी रीती
नैया खेता हूँ

प्यार एक सीढ़ी है
इस पर चढ़ना ही होता
प्यार एक पुस्तक है
इसको पढ़ना ही होता
धरती का कण-कण जब मुझसे
रूठा लगता है
गाकर गीत प्यार के ही
मन समझा लेता हूँ

प्यार दया है, प्यार धर्म है
प्यार फ़र्ज भी है
प्यार एक जीवन की लय है
प्यार मर्ज़ भी है
जब भी किया प्यार पर मैंने
न्योछावर ख़ुद को
मुझे लगा है सब हारे
मैं एक विजेता हूँ

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मेरे गाँव घिरे ये बादल

मेरे गाँव घिरे ये बादल
जाने कहाँ-कहाँ बरसेंगे

अल्हड़पन लेकर पछुआ का
घिर आयीं निर्दयी घटाएँ
दूर -दूर तक फैल गयी हैं
घाटी की सुरमई जटाएँ
ऐसे मदमाते मौसम में
जाने कौन-कौन तरसेंगे

मछुआरिन की मस्ती लेकर
मेघों की चल पड़ी कतारें
कहीं बरसने की तैयारी
कहीं-कहीं गिर पड़ी फुहारें
कितने का तो दर्द हरेंगे
कितनों को पीड़ा परसेंगे

मेरे गाँव अभागिन संध्या
रोज़-रोज़ रह जाती प्यासी
जिसके लिए जलाए दीपक
उसका ही उपहार उदासी
जाने किसका हृदय दुखेगा
जाने कौन-कौन हरषेंगे

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हुई मुनादी

सागर से पर्वत तक
ऐसी हुई मुनादी है
अपना राजा यश गाथा
सुनने का आदी है

मजमेदार वज़ीरों की
लग रही नुमाइश है
अपनी धरती पर इसकी
अच्छी पैदाइश है

हमको दम्भ देखना है
किसका फौलादी है?

आँखों में अनलिखे पृष्ठ
को पढ़ते रहना है
नित्य प्रतीक्षा की घड़ियों से
लड़ते रहना है

झुककर खड़ा दलालों
के आगे फरियादी है

अर्थ खोजना नहीं
महज शब्दों को सुनना है
फर्ज़ हमारा झूठे साँचे
सपने बुनना है

सपने दिखलाने की
संख्या और बढ़ा दी है

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नुकीला पत्थर लगता है

हाथों में हर समय नुकीला
पत्थर लगता है
हमें आदमी की छाया से
भी डर लगता है

ऊब गया है मन
अलगावों की पीड़ा सहते
कुटिल इरादों को
मुट्ठी में बंद किए रहते
जीवन जंगल के भीतर का
तलघर लगता है

संबंधों का मोल भाव है
खींचातानी है
पहले वाला कहाँ रहा
आँखों में पानी है
रिश्तों वाला सेतु
पुराना जर्जर लगता है

लोग लगे हैं सोने
चाकू रखकर सिरहाने
कविता लिखने वाला
दुनियादारी क्या जाने
हैं ऐसे हालात
कि जीना दूभर लगता है

3 Total Review
H

Harivallabh Sharma

05 May 2026

परिस्थितियों से जूझती जिंदगी के कटु यथार्थ को आपकी लेखनी ने गीत गज़लों के माध्यम से उकेरा है,आपकी इन रचनाओं में वास्तविकता की झलक है। आपको पढ़कर बहुत सीखने को मिलता है। हार्दिक बधाई आदरणीय ,🙏🙏🎉

वीरेन्द्र आस्तिक

02 May 2026

वस्तुत: मयंक जी उस व्यवस्था के भुक्तभोगी हैं जो केवल विरोधाभास देती है-गाॅव में सूखा और बादल कहीं और बरसते हैं।राजा अयोग्य है, पर प्रशंसा करनी पड़ती है।टूटते संबंध हैं।हर तरफ अलगाव और अकेलापन है।ऐसी स्थितियाँ केवल भय दे सकती हैं।मयंक जी के गीत सुस्पष्ट और संप्रेषणीय होते हैं।इस प्रस्तुति पर आप को हार्दिक बधाई! -वीरेन्द्र आस्तिक

सीमाहरि शर्मा

02 May 2026

बहुत बढ़िया है यह। दादा के गीत पढ़कर निश्चय है नई पीढ़ी भी लाभान्वित होगी।आदरणीय मयंक जी को सादर प्रणाम

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रचनाकार परिचय

मयंक श्रीवास्तव

ईमेल : mayank_shrivastava@gmail.com

निवास : भोपाल (मध्यप्रदेश)

जन्मतिथि- 11 अप्रैल 1942
जन्मस्थान- ग्राम- ऊँदनी, फ़िरोज़ाबाद (उत्तरप्रदेश)
सम्प्रति- माध्यमिक शिक्षा सेवा मंडल म.प्र. में सहायक सचिव के पद पर रहने के बाद स्वैक्षिक सेवानिवृत्त
प्रकाशित कृतियाँ- 'सूरज दीप धरे', 'सहमा हुआ घर', 'इस शहर में आजकल', 'उँगलियाँ उठतीं रहें', 'ठहरा हुआ समय', 'समय के पृष्ठ पर' (नवगीत संग्रह)। 'रामवती' (ग़ज़ल संग्रह)। डॉ० शम्भुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित 'नवगीत अर्धशती' में गीत सम्मिलित।
निवास- 242, सर्वधर्म कॉलोनी, सी-सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल (म.प्र.)- 462042
मोबाइल- 9977121221