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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

सविता मिश्रा 'अक्षजा' की लघुकथाएँ

सविता मिश्रा 'अक्षजा' की लघुकथाएँ

"कल तक ख़ुश होती थी मैं रिश्तेदार निर्मला की किस्मत पर परन्तु आज रूबी की क़ामयाबी को देखकर मुझे उनसे इर्ष्या हो रही है। तनिक तेरे आगे-पीछे की ही तो है उसकी भी पैदाइश, ऊपर से ऐसी! देख, फिर भी वह मेहनत से पढ़कर कलेक्टर बन गयी और तू!"

थप्पड़ का भय

एक सुगढ़ बहू उनके बेटे की पत्नी बनकर एक दिन इस घर में आएगी। सब माँओं की तरह उनका भी मेरे युवा होते ही यही एकमेव सपना था। नौकरी लगते ही वो जी जान से मेरे विवाह के पीछे पड़ी रहा करती थीं और मैं बहाने बना-बना कर उसके लिए अब तक नकारता आया था। लड़की की फोटो भी देखने से मेरे मना करने पर, उनको अपने सपने के टूटने का भय सताने लगता था। मुझको देखते ही वे आँखें तरेरकर तमतमाई हुई मेरे सामने आकर खड़ी हो जातीं। मैं उनके थप्पड़ के भय से अपने गाल पर पट से हाथ रख लेता था।

पहली बार जब उनकी एक फेवरेट प्लेट मुझसे टूट गयी थी तो माँ बहुत क्रोधित हुई थीं। बड़े अरमानों से वह डिनरसेट ख़रीदा था उन्होंने। देखते ही माँ ने 'मूरख कहीं का' चिल्लाते हुए चट से मेरे किशोरवय गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया था। पिताजी ने भी ख़ूब डाँट पिलाई थी।

उस प्लेट के गिरकर टूटने से भी तीव्र स्वर गूँज उठा है नेपथ्य में। माँ ने न मुझे थप्पड़ मारा और न ही दोनों जन मुझ पर चीखे-चिल्लाये। वातावरण में सुई-पटक सन्नाटा-सा व्याप्त हो गया है। माता-पिता द्वारा विवाह सम्बन्धी दी जाती समझाइश के मध्य, आज मैंने उनके समक्ष अपने समलैंगिक होने की बात रख दी। यह सुनते ही उनका सुनहरा सपना उस प्लेट की तरह चकनाचूर हो गया।

कदाचित समाज द्वारा अपने गाल पर झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ने का भय उन्हें सताने लगा है, जिसकी पीड़ा के आभास से ही अब वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो सिर झुकाए बैठे हैं।

 

 

हिंजड़े की माँ

लम्बी बीमारी के कारण सही से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। फिर भी पति को काम पर जाता देख; सरला अपने जवान बेटे पर बरस पड़ी।
"मुए! तेरे अशक्त बाबा काम पर गये और एक तू है हट्टा-कट्टा, एम०ए०-बी०ए० पास होकर भी घर में बैठे-बैठे खटिया तोड़ रहा है। तू क्यों नहीं निकलता है कुछ कमाने-धमाने? तुझसे तो वह हिजड़ा रूबी भली, जो हर काम में आगे है। नाम रोशन कर रही है उन माँ-बाप का, जिन्होंने उसे त्यागने का सोच लिया था।"

"त्याग दिए होते तो अच्छा रहता। उससे मेरी तुलना न होती और न ही ये रोज़-रोज़ की तेरी जली-कटी मुझे सुननी पड़ती।" बेटा चिढ़कर बोला।

"तुझे पाल-पोसकर इसके लिए बड़ा किया था क्या कि हारे-गाढ़े तू हमारी लाठी भी ना बने। ये मुआ बक्सा (लैपटाप) लेकर खटिया पर सारा दिन उतान पड़ा रहे।" माथा पिटती हुई सरला बोलती ही रही थी।

"कल तक ख़ुश होती थी मैं रिश्तेदार निर्मला की किस्मत पर परन्तु आज रूबी की क़ामयाबी को देखकर मुझे उनसे इर्ष्या हो रही है। तनिक तेरे आगे-पीछे की ही तो है उसकी भी पैदाइश, ऊपर से ऐसी! देख, फिर भी वह मेहनत से पढ़कर कलेक्टर बन गयी और तू!"

"मेहनत से नहीं अम्मा, आरक्षण से।" कहकर पुनः व्यस्त हो गया लैपटॉप में।

माँ पुनः खिसियाई और बोल पड़ी, "तेरी जगह रूबी ही मेरी कोख से क्यों नहीं जन्मी।"

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रचनाकार परिचय

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

ईमेल : 2012.savita.mishra@gmail.com

निवास : आगरा (उत्तरप्रदेश)

जन्मतिथि- 1 जून, 1973
जन्मस्थान- प्रयागराज (उ०प्र०)
शिक्षा- स्नातक
सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन, ब्लॉगर एवं यूट्यूबर
लेखन विधाएँ- लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, हाइकु-चोका आदि।
प्रकाशित कृतियाँ- 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' (लघुकथा संग्रह) तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ (कहानी संग्रह) प्रकाशित।
अनुवाद- 'अदहने क आखर' अवधी अनुबाद (लघुकथा-संकलन)
सम्पादन- 'खाकीधारी' (लघुकथा संकलन), 'अदृश्य आँसू' (कहानी संकलन), 'किस्से खाकी के' (कहानी संकलन) एवं 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' (कहानी संकलन)
प्रसारण- आकाशवाणी, आगरा से कहानियाँ प्रसारित।
सम्पर्क- फ़्लैट नंबर- 302, हिल हाउस, खंदारी अपार्टमेंट, हनुमान मन्दिर के बग़ल में, खंदारी, आगरा (उ०प्र०)- 282002
मोबाइल- 9411418621