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डॉ० पूनम पाठक 'चंद्रलेखा' की लघुकथाएँ

डॉ० पूनम पाठक 'चंद्रलेखा' की लघुकथाएँ

डॉ० पूनम पाठक की लघुकथाएँ हमारे समय की विसंगतियों-आडम्बरों की पहचान कर उनके खोखलेपन पर चोट करती हैं। उनकी प्रस्तुत लघुकथाओं में पूँजीवाद का शातिरपना, चमचमाते समाज के भीतर मानवीयता का ह्रास, कन्या के दान जैसी हास्यास्पद कुप्रथा का समुचित प्रतिरोध, बदलते समय में माँ के रिश्ते का सकारात्मक अनुकूलन तथा प्रेम की सामाजिक अस्वीकृति के बाद संबंधों में पनपते वैमनस्य को उजागर कर वे हमारी मानसिकता की उस जड़ता पर चोट करती हैं, जो सदियों में प्रचलन में होने के कारण मज़बूती से भीतर तक गढ़ चुकी है। साथ ही बदलाव की युक्तियाँ भी दिखाकर उन्हें अपनाने का आग्रह भी करती हैं।

- संपादक

दुकानदारी

“भैया, सबसे बढ़िया और लेटेस्ट साड़ियाँ दिखाइए, जल्दी। गाड़ी भी पकड़नी है।” मानवी ने चेहरा रूमाल से पोंछते हुए कहा।
कई दिनों बाद ग्राहक आया था। भानु की आँखों में चमक लौट आयी। अलमारी से साड़ियाँ निकालकर वह एक-एक कर पलंग पर फैलाने लगा। हर पल्लू पर उकेरी कथा, रंगों की बुनावट, धागों का श्रम- सब बड़े मनोयोग से समझाता जाता।
"ये देखिए, शकुंतला-दुष्यंत, और इसमें सीता मैया अशोक वाटिका में, कोलकाता की एक बड़ी डिज़ाइनर भी मेरी ही साड़ियाँ लेती हैं। आपको फोटो भेज दूँगा।"
"भैया, कहानी फिर कभी। अभी जल्दी है।" मानवी ने बात काट दी।
वह साड़ियों को गौर से देखती, मन ही मन उनकी कारीगरी पर मुग्ध होती, पर चेहरे पर असंतोष टिका रहता। कहीं रंग ठीक नहीं, कहीं डिज़ाइन पुरानी।

भानु हर बार नई उम्मीद से दूसरी साड़ी खोल देता। छह महीने की बंद पड़ी बिक्री के बाद यह पहला ढंग का ग्राहक था। संकरी गलियों में बुनकर से सीधे ख़रीदने कौन आता है? दो घंटे बीत गये। आख़िरकार मानवी ने लगभग अस्सी हज़ार की साड़ियाँ अलग रख दीं- मानो बड़ी मजबूरी में।
"इतना माल लिया है, कुछ डिस्काउंट तो दो।"
"मैडम, होलसेल रेट है। मुनाफ़ा बहुत कम है।"
बहस के बाद भानु ने पाँच सौ रुपये घटा दिये। मानवी ने होंठ भींचे- "बस? तो रहने दीजिए।"
भानु क्षणभर चुप रहा। फिर भीतर गया और एक सुंदर स्टोल लाकर उसके हाथ में रख दिया।
"मेरी ओर से, गिफ्ट समझिए।"
मानवी ने स्टोल उँगलियों से टटोला- "ठीक है, इसे भी बिल में जोड़ दो, फ्री है न?"
भानु ने हल्की-सी मुस्कान ओढ़ ली। "जी, मैडम। फ्री है।"

मानवी संतोष से पैकेट समेटने लगी। उसे लगा- आज भी उसने अच्छी ‘डील’ कर ली।
दुकान के बाहर निकलते ही उसने मोबाइल निकाला- "हाँ, बिल्कुल एक्सक्लूसिव पीसेज़ हैं, लिमिटेड स्टॉक। प्राइस? बाद में बताऊँगी। पहले एडवांस भेजो।"
अंदर भानु साड़ियों को फिर से तह कर रहा था। धागों के साथ उसकी उँगलियाँ भी चुपचाप उलझी हुई थीं।
दुकानदारी दोनों तरफ़ चल रही थी।

 

 

शीशों की धुँधली चमक

पूरी तरह भीगी एक दुबली-पतली लड़की बारिश से बचने की जगह खोज रही थी। कमर से चिपका आठ-नौ महीने का बच्चा भी भीग रहा था। फटा दुपट्टा बार-बार बच्चे के सिर पर रखती वह नंगे, कीचड़ सने पाँवों से संभलती हुई आगे बढ़ती रही। महानगर की लंबी-चिकनी सड़क पर कोई पेड़ नहीं था। सामने एक बैंक की भव्य इमारत के गेट के पास, सुरक्षा कक्ष के बाहर वह ठिठक कर खड़ी हो गयी।

काँच की ऊँची दीवारों के भीतर लोगों को आते-जाते देखती हुई वह बाहर खड़ी, बारिश थमने का इंतज़ार करने लगी। तभी एक चमचमाती कार आकर रुकी। भीतर बैठी महिला बाहर निकलने से झिझकी। ड्राइवर दौड़कर अंदर गया। कुछ ही क्षण में मैनेजर छाता लेकर आया और महिला को सावधानी से भीतर ले गया। दरवाज़ा स्वचालित ढंग से बंद हो गया।

भीषण बारिश अब भी थमी नहीं थी। लड़की ने बच्चे को और कसकर सीने से लगाया और हिम्मत बटोर कर एक क़दम भीतर रखने की कोशिश की। सुरक्षा कर्मी ने बिना उसकी ओर देखे हाथ से इशारा किया- "बाहर।"
वह लौटकर उसी काँच के सामने खड़ी हो गयी अपने बच्चे को भीगने से बचाने की असफल कोशिश करती हुई।
भीतर लोग अपने खातों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे थे।
काँच दोनों के बीच अडिग था- शीशों की चमक साफ थी। धुँधली सिर्फ़ उसकी मौजूदगी थी।

 

 

अनछुई थाली

बहुप्रतीक्षित शुभ घड़ी आख़िर आ गयी थी। माधुरी का घर आज रंगीन बल्बों और झालरों से जगमगा रहा था। फूलों की ख़ुशबुओं से सारा माहौल सराबोर था। घर रिश्तेदारों व मित्रों से भरा पड़ा था। बच्चों की उछल-कूद, एक ओर ढोलक की थाप तो दूसरी ओर स्पीकर पर नए ज़माने के फ़िल्मी गानों का शोर; फिर भी माधुरी अपने मन की ख़ामोश पड़ी दीवारों से उठते उस शोर को दबा नहीं पा रही थी, जिसे आज तक वह अनसुना करती रही थी।

दुल्हन के लिबास में बेटी की ख़ूबसूरती को निहार माधुरी मन ही मन अनेक बार उसकी बलैया लेती अपने सपने को पूरा करने का निश्चय कर चुकी थी। 'नहीं, अब और नहीं सहेगी वह। बस, बहुत हो चुका। किसी की नहीं सुनेगी। सुनेगी तो केवल अपने मन की। करेगी तो अपने मन की।'

माधुरी ईश्वर से शक्ति देने की बार-बार आज प्रार्थना किए जा रही थी। रिश्तेदारों व पति से आज न जाने वह कितनी बार उलझ चुकी थी। उसे लगा कि एक बार फिर वह टूट जाएगी, कमज़ोर पड़ जाएगी। पर नहीं! अब नहीं! अपने नए सूरज का उजाला देखे बिना वह टूटेगी नहीं।

सुसज्जित विवाह मंडप में वकील, मजिस्ट्रेट व गवाहों के समक्ष रजिस्टर में हस्ताक्षर करने के बाद मंडप में अग्नि के सम्मुख यज्ञ वेदी के निकट बैठे हुए बेटी रोहिणी व दामाद अनुज वैदिक रीतियाँ संपन्न कर रहे थे। आँचल-गाँठ के पश्चात पंडित जी ने कन्यादान की रस्म शुरू करने का ऐलान किया। अपनी सारी शक्तियाँ बटोर कर माधुरी लगभग चीख़-सी पड़ी थी। बरसों के खौलते दावानल को आज बहा देना चाहती थी वह।

"नहीं, नहीं होगा कन्यादान! कोई नहीं करेगा मेरी बेटी का दान!" हॉल में सन्नाटा छा गया। आश्चर्य मिश्रित क्रोध और तिरस्कार भरी अनेक सवालिया नज़रें माधुरी की ओर उठ गयीं।
"मैं ऐसी किसी परंपरा, किसी रस्मो-रिवाज़ को नहीं होने दूँगी, जिसके कारण एक स्त्री सदियों से झुकती, सहती और प्रताड़ित होती आयी है।" पति ने आँखें दिखा कर चुप होने का इशारा किया पर बिना किसी की परवाह किये माधुरी ने सन्नाटे को चीरते हुए दोबारा कहना शुरू किया- "फेरे होंगे, सातों वचन भी पढ़े और सुने जायेंगे पर कन्यादान! हरगिज़ नहीं। शब्दों पर ज़ोर देते हुए उसने आगे कहा, "बेटी इंसान है, कोई चीज़ नहीं। कपड़े-लत्ते, रुपये-पैसों के समान अपनी बेटी का दान हरगिज़ नहीं करेगी। नहीं चाहिए वह मोक्ष, जो बेटी को पराया करके ही मिले। ऐसे स्वर्ग का वह क्या करेगी, जो अपनी कोख-जाई को दान करके ही मिलेगा।"
"पर विवाह तो कन्यादान की रस्म को पूरा किये बिना संपन्न नहीं होगा।" पंडित जी ने निर्णायक घोषणा की। रिश्तेदारों ने फिर आँखे तरेरीं।
"विवाह तो हो चुका है।" माधुरी ने शांत स्वर में कहा, "रजिस्टर में दर्ज भी है। अब किसी दान की आवश्यकता नहीं।" अपनी-अपनी विश्वासों की कुर्सियों पर विराजमान मेहमान, रिश्तेदार असहज हो उठे।
पंडित जी ने ग्रंथ बंद कर दिए। रिश्तेदारों की फुसफुसाहटें हवा में तैरने लगीं।

रोहिणी ने आगे बढ़कर माँ का हाथ थाम लिया। अनुज ने भी उसी हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
मंडप में अग्नि जल रही थी- पर पहली बार कोई बेटी अग्नि के सामने दान नहीं, स्वीकृति के साथ खड़ी थी। कन्यादान की थाली अनछुई रह गयी। अग्नि साक्षी थी। कन्यादान रुका। विवाह नहीं।

 

 

मॉम ऑन लाइन डॉट कॉम

"पोंगल पर अगर दोनों घर न जा पाए तो क्या हुआ? मैं तो हूँ ही न!" सोचती हुई सुजाता ने ‘कर्ड राइस’ के लिए दही को बर्तन में डालकर मानो अपनी स्मृतियों को ही फेंटना शुरू कर दिया था। गीतांश को पहली बार नौकरी के लिए मद्रास भेजते समय वह कितनी परेशान थी! बाहर का खाना उसे सूट नहीं करता और खाना बनाना उसे आता नहीं था। वह भी साथ जा नहीं सकती थी। माँ का मन तर्क कहाँ मानता है!

इंटरनेट खंगालते-खंगालते उसकी नज़र एक विज्ञापन पर ठिठकी, "क्या आप परेशान हैं बच्चे के खाने को लेकर? घर का, माँ के हाथ का ताज़ा भोजन- अब संभव है। संपर्क करें : मॉम ऑन लाइन डॉट कॉम।"
उँगलियाँ फोन तक पहुँचीं, फिर ठिठक गयीं।
“ऑनलाइन जालसाज़ी!!”
"पर हो सकता है सही हो…"
"बड़े शातिर होते हैं ये ऑनलाइन डकैत..." शंका फिर कुलबुलायी।
"यही तो सुनहरा जाल है। एक फोन करते ही मोबाइल की सारी सूचनाएँ उनके हवाले। फिर करती रहना अनुभव। शंका झुँझलाई।"
संशय और ममता के बीच कुछ पल रस्साकशी चली।
आख़िर माँ जीत गयी।

शर्त सरल थी- अपने शहर में एक-दो बच्चों के भोजन की ज़िम्मेदारी लीजिए; बदले में आपके बच्चे को वहाँ किसी माँ का घर मिलेगा।
"इतना ही?" वह अवाक् रह गयी।

आज महीनों से गीतांश निश्चिंत है। सेहतमंद है। उसे रोज़ घर जैसा खाना मिलता है- किसी अनजानी माँ के हाथों का।
दक्षिण भारतीय व्यंजन बनाने का शौक़ आज सुजाता के कितना काम आ रहा है, सोचकर हैरानी भरी ख़ुशी हो रही थी उसे।
'वे आते ही होंगे' सोचकर वह जल्दी-जल्दी थाली सजाने लगी। घंटी बजी। दरवाज़ा खोलते हुए उसके चेहरे पर वही उजास था, जो कभी गीतांश के लिए हुआ करता था।
स्क्रीन पर लिखी पंक्ति उसे याद आयी- 'कोई आपके लिए करे, आप किसी और के लिए करें।'
घंटी बजी। विजयलक्ष्मी और वेंकटेश भीतर आये- "आंटी, आज क्या स्पेशल है?"
सुजाता मुस्कुरा दी। दुनिया चाहे जितनी 'डिजिटल' हो जाए, माँओं का नेटवर्क अब भी ऑफलाइन ही चलता है।

 

 

रक्षाबंधन

"पक्की खबर है न!”, वह फुसफुसाया।
"बिल्कुल पक्की भाई, सौ फीसद पक्की। वह आने वाला है आज ही, अपने घर, बीबी को लेकर।"
"नज़र रखियो रे उसके घर पर! बचके न जाना चाहिए इस बार। बहुत चकमा दिया है उसने।"
"ये भी न सोचा कि एक न एक दिन तो पकड़ा ही जाएगा।" एक भद्दी-सी गाली दी उसने।

“सा...मेरी बहन को फुसलाता है। हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन से शादी करने की। पता नहीं उसे कि कौन जात हैं हम। ऐसा मज़ा चखाएंगे कि इनकी सौ पुश्तें भी हमारी बेटी-बहन को बियाहने की बात सपने में भी न सोचेगी।" भाई के सिर पर आज खून सवार था, जो उसकी आँखों में भी उतर आया था।
“तैयारी तो पूरी है न? मुँह अच्छी तरह से ढक लियो।" वह फुसफुसाया।
“उसकी चिंता न कर। हम पाँचों तैयार हैं।”
“चुप-चुप। वो आ रहा।“

दूर से मोटरसाईकिल को आता देख कच्ची दीवार की ओट में हो गये वे सब। मोटरसाईकिल रुकी। लड़की साड़ी के पल्लू से अपना मुँह ढँके भीतर चली गयी। लड़का गाड़ी को स्टैंड पर चढ़ा कर भीतर की ओर बढ़ा ही था कि उसका फोन बज उठा। बाहर आँगन में उसने फोन को कान पर लगाया ही था कि वे सबके
सब हिंसक पशु की भांति चाकू लेकर उस पर टूट पड़े और खींचते हुए सड़क पर ले आये। उसकी चीख सुनकर भीतर से लड़की भी चीखती-चिल्लाती हुई उलटे पाँव बाहर की ओर भागी।

भैया, रुक जा भैया, ऐसा अनर्थ न कर! अपनी बहन को अपने हाथों ही विधवा बनाएगा? वह मेरा पति है भैया! पाँव पड़ती हूँ तेरे, हाथ जोड़ती हूँ। राखी के धागों की लाज तो रख लेता भैया! तुझे राखी की सौगंध!" रोती-कलपती बहन अपने भाई से अपने पति के प्राणों की भीख माँगती रही, किन्तु वह उन्मादी न पसीजा।
पहला वार उस भाई की कलाई से हुआ, जिस पर पच्चीस वर्षों से वह राखी बांधती आई थी।
भीड़ में किसी की हिम्मत न हुई कि जो उन्हें ऐसा करने से रोकता। भाई के माँ-बाप सिर ऊँचा किये खून से लथपथ अपने ही दामाद और सिर पटकती बेटी को इत्मीनान से देखते रहे।

भीड़ को चीरती हुई एक स्त्री फुर्ती से आगे बढ़ी और बचाने के लिए लड़के के रक्तरंजित शरीर पर गिर पड़ी, कुछ साँसें अभी भी शेष थीं उसमें। उठे हुए हाथ जहाँ के तहाँ हाथ रुक गये।
“तू क्या करने आयी है यहाँ? ख़बरदार जो बीच में पड़ी। परे हट वरना तेरा भी आज खून हो जाएगा।” भाई ने चीखते हुए कहा।
"परे हट जा बहुरिया! खानदान की इज्जत मिट्टी में मिला दी इसने।" माँ-बाप एक साथ चीखे।
"हाथ लगा के तो दिखाओ तुम लोग! जान लेना तो मुझे भी आवे है। फुर्ती से वह उठी और पल्लू में छिपे तमंचे को खोलकर कोलाहल के बीच तनकर खड़ी हो गयी।
"धिक्कार है मुई जाति और धरम पर जो जीती जागती बेटी-बहन को जीवन भर के लिए सजा देने पर तुले हो। जिसे वहशियों की तरह चाकू से गोदे रहे हो, वह तुम्हारा दामाद और किसी का बेटा, किसी का भाई है।"

"इंस्पेक्टर साब ये हैं वे दरिंदे। गिरफ्तार कर लो सबको।" आती हुई पुलिस को देख: वह पागलों की तरह चिल्लायी।
“उठो दीदी, आँसू पोंछो। जल्दी करो। दामाद जी को हस्पताल भी ले जाना है। ईश्वर ने चाहा तो तुम सदा सुहागन रहोगी।"
उस दिन वार भाई ने किया था पर रक्षाबंधन भाभी ने निभाया।

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रचनाकार परिचय

पूनम पाठक ‘चंद्रलेखा’

ईमेल : ppathak30@gmail.com

निवास : ग्रेटर नोएडा

जन्मस्थान- अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- पी० एचडी, एम० ए० (इतिहास, हिंदी, स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन) बी० एड (हिंदी), रूसी भाषा में प्रोफ़िशिएन्सि।
संप्रति- शिक्षिका, लेखिका, मंडला चित्रकार
प्रकाशित कृतियाँ- 'सन्नाटा बुनता है कौन' (कविता संग्रह)
प्रकाशन- वागर्थ, लघुकथा डॉट कॉम, साहित्यिकी, साहित्यनामा, ध्रुवतारा आदि पत्रिकाओं में, काव्यांकुर, पोषम पा, अमर उजाला काव्य, स्टोरीमिरर, लघुकथा लोक आदि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर तथा अनेक साझा संकलनों के साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, ग़ज़लें, आलेख, शोध-पत्र, कहानियाँ, लघुकथाएँ, कविता, अनुवाद आदि प्रकाशित होते रहे हैं। आकाशवाणी व दूरदर्शन लखनऊ व कोलकाता में कहानी एवं कविता वाचन। विभिन्न समसामयिक विषयी वार्ताओं तथा कार्यक्रमों में भागीदारी।
संपर्क- डी-5-303, केन्द्रीय विहार, पॉकेट- 4, फ़ाई- 2, ग्रेटर नोएडा- 201310
मोबाइल- 8697993343