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लद्दो देवी और ड्राइविंग का लोकतंत्र- - प्रीति 'अज्ञात'

लद्दो देवी और ड्राइविंग का लोकतंत्र- - प्रीति 'अज्ञात'

लोग कहते हैं, डर का भी एक संस्कार होता है, हमारी लद्दो देवी उसी कुल की कन्या थीं। बचपन में साइकिल चलाने से डर, कॉलेज में स्कूटर से डर, शादी के बाद कार से डर और बुढ़ापे में ओला-उबर से प्यार; लद्दो देवी का विकास-क्रम यही रहा।

लद्दो देवी का असली नाम लतिका था, पर मुहल्ले में किसी ने भी उन्हें उस नाम से कभी नहीं पुकारा। बचपन में जब बाक़ी लड़कियाँ 'कैंची वाली साइकिल' पर मोहल्ले की गली में हवा से बातें करतीं, तब लद्दो देवी घबराई-सी पापा या भैया की साइकिल के पीछे बैठी, उनकी पीठ से चिपकी रहतीं। उनके हाथ में घंटी नहीं होती पर बैक-सीट पर चिपकने की कला में वे दक्ष थीं। चलाने वाले को इतना टाइट पकड़तीं, जैसे बेरोज़गारी ने युवाओं को पकड़ा हुआ है। इन्हें यही भय सताता कि कहीं गिर न् जाएँ। जहाँ बाक़ी बच्चों के पैर पैडल पर घूमते, ये पीछे बैठी हुई भी धरती से अपना संपर्क यदा-कदा ही छोड़तीं। यही कारण है कि ‘ब्रेक’ लगाने से पहले उतर जाने का अनोखा हुनर इन्हें बचपन से ही प्राप्त था। लोग कहते हैं, डर का भी एक संस्कार होता है, हमारी लद्दो देवी उसी कुल की कन्या थीं। बचपन में साइकिल चलाने से डर, कॉलेज में स्कूटर से डर, शादी के बाद कार से डर और बुढ़ापे में ओला-उबर से प्यार; लद्दो देवी का विकास-क्रम यही रहा।

कॉलेज में जब सहेलियाँ हवा में लहराते दुपट्टे, आँखों में झिलमिलाते सपनों की धूप लिए, क़ातिल मुस्कान के साथ प्रवेश करतीं, तब लद्दो देवी की आँखों में सिर्फ डर का धुआँ होता। वे तनाव में डूबी साइकिल के हैंडल को ऐसे पकड़ती चली आतीं, मानो युद्ध में शत्रु का गला दबा रही हों। साइकिल के साथ इनका रिश्ता बड़ा विचित्र था। वह यह कि साइकिल चलाना इनके वश की बात नहीं थी, लेकिन साइकिल को धकेलना इनके नियंत्रण में था। जाते समय गली के बच्चे रोज़ तमाशा देखते, "देखो देखो, आज लद्दो दी फिर उतरीं!"
अब दी भी क्या ही करें! सामने कोई भी वाहन दिखता, गाय- रिक्शा या हवा में उड़ता हुआ प्लास्टिक का थैला ही क्यों न हो तो ये तुरंत उतरकर 'साइकिल-पैदल यात्रा' आरम्भ कर देतीं। इनका आत्मविश्वास उतना ही टिकाऊ था, जितना पतंग की डोर के आख़िरी छोर पर बाँधा गया धागा। साइकिल चलाने से डर, ब्रेक लगाने से डर, हैंडल घुमाने से डर,और सामने से आती गाय से तो प्रलय-स्तर का डर। यही इनका स्थायी भाव था।

कभी ये थरथराती हुई साइकिल से कहतीं, "अरे डर लग रहा है यार, उतर रही अब।" हारकर साइकिल भी मुस्कुराती हुई बोल देती, "कोई बात नहीं, चल तू मेरा हाथ थाम। मुझे साइकिल स्टैन्ड तक पहुँचा दे बस।" वे साइकिल को स्टैन्ड पर खड़ी करतीं लेकिन लौटते समय फिर यही झमेला, वापस भी तो जाना है कॉलेज से। कभी चढ़तीं, कभी उतरतीं, कभी घबरातीं। कई बार इनकी प्रिय सखी को इन पर दया आ जाती और वह अपनी साइकिल पर इन्हें बिठा ले जाती थी। हालत ये थी कि धीरे-धीरे मुहल्ले ने इनका नाम रख दिया- लद्दो! क्योंकि इन्हें साइकिल पर लादकर ले जाना कई सहेलियों का नियमित व्यायाम बन गया था।

समय बदला। घर में स्कूटर आया। मगर इनके जीवन का 'टू-व्हीलर अध्याय' वहीं का वहीं रह गया। जब पापा ने कहा, "सीख ले बिटिया, काम आएगा। पैदल-रिक्शा से हर जगह नहीं पहुँच पाओगी!" तब लद्दो देवी की आँखें भर आईं। उन्हें लगा जैसे पापा उन्हें युद्धभूमि में भेज रहे हैं।
पड़ोस की रमा आंटी स्कूटर पर मस्ती से उड़तीं, बालों में सनसनाती हवा, चेहरे पर आत्मविश्वास। उधर लद्दो देवी खिड़की से झाँकते हुए सोचतीं, "हे भगवान, ये लोग गिरती नहीं क्या? इन्हें मरने से डर नहीं लगता क्या?" अब इनका डर तो ऐसा था कि स्कूटर की आवाज़ से भी दिल धक-धक करने लगता। इनके जीवन में तो हर वाहन किसी संभावित श्मशान की घंटी ही था। जबकि बाक़ी दुनिया कह रही थी, 'ड्राइव करो, आगे बढ़ो।’ मगर लद्दो देवी का जीवन-मंत्र था, 'बहिन किसी और से चलवा लो, तुम बस बैठो।'

समय ने करवट ली। लद्दो देवी अब 'मिस' से 'मिसेज' हो चुकी थीं। पति देव अच्छी नौकरी में थे, तनख्वाह सम्मानजनक थी और समाज की नज़रों में वे एक 'सभ्य स्त्री' थीं। घर में बच्चों के लिए एक्टिवा आई। उसकी चाबी भगवान की मूर्ति के पास रखी रहती क्योंकि लद्दो रानी के लिए वह सिर्फ दर्शनार्थ थी।
समय और आगे बढ़ा। घर में कार आई। साथ में ड्राइवर भी आया। जैसे ही ड्राइवर ने गाड़ी में तौलिया डालकर ‘सीट एडजस्ट’ की, लद्दो देवी ने महसूस किया कि उनके जीवन का सबसे बड़ा संकट टल गया है। अब वे गाड़ी में ऐसे बैठतीं, जैसे महारानी विक्टोरिया का पुनर्जन्म लेकर लौटी हों। गाड़ी उनके घर से मार्केट तक जाती, फिर वहाँ से मंदिर, फिर वापस घर आ जाती पर स्टीयरिंग व्हील उनके जीवन से हमेशा दूर ही रहा। वह उन्हें हमेशा बरमूडा ट्राइऐंगल ही लगता रहा, जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं।

कभी किसी ने कहा, "भाभी जी, आप ख़ुद क्यों नहीं चलातीं कार?"
तो वे पूरी गंभीरता से उत्तर देतीं, "फिर ये बेचारे ड्राइवर लोग क्या करेंगे? हम चलाने लगे तो इनका घर कैसे चलेगा?"
यह उत्तर इतना ‘सेवा-भाव’ से भरा होता कि सामने वाला लज्जा से पूरा पिघल जाता। यानी दूसरों की जीविका की चिंता ने इनके 'ड्राइविंग भय' को राष्ट्रसेवा का दर्जा दे दिया था। ऐसा परोपकार तो गांधीजी को भी ईर्ष्या करा दे।

आधुनिक भारत के साथ लद्दो देवी का नवजागरण काल आया। तकनीक का युग करवटें ले रहा था और समय का पहिया ओला-उबर की दिशा में घूम गया। अब घर में ड्राइवर रखने की ज़रूरत नहीं थी। बस फोन उठाओ, ऐप खोलो, कार आ जाएगी। लद्दो देवी की तो मानो मोक्ष प्राप्ति हो गई। उन्हें उनकी स्वतंत्रता के अनगिनत ठेकेदार जो मिल गए थे। अब उन्हें कोई ‘लद्दो’ नहीं बुलाता था। हर ड्राइवर उन्हें 'थैंक यू, मैडम' कहता। उनके भीतर वर्षों से दबा आत्मविश्वास अचानक ऐप-स्टोर से डाउनलोड हो गया।

अब लद्दो देवी हर सुबह गर्व से कहती हैं, 'देखो, हम भी अब टेक-सैवी हो गए हैं।' जो महिला वर्षों तक साइकिल के ब्रेक से डरती रही, वह अब ऐप पर 'एड टिप' भेज रही थी। हर बार जब ड्राइवर पाँच स्टार रेटिंग माँगता, तो लद्दो देवी मुस्कुराकर कहतीं, "हम तो सभी को पाँच ही देते हैं, भई किसी का रोज़गार न छिने।" यानी डर को भी नैतिकता का रूप देना कोई लद्दो देवी से सीखे। बोलो, बोलो कहीं देखा है आत्मनिर्भरता का ऐसा आउटसोर्स रूप?
लद्दो देवी के अनुसार, आत्मनिर्भरता का मतलब है- 'मुझे ख़ुद कुछ न करना पड़े, पर सब कुछ हो जाए।' और भारत जैसे देश में यह दर्शन बहुत लोकप्रिय है।
हम बिजली नहीं बनाएँगे, पर इन्वर्टर ज़रूर रखेंगे। हम खाना नहीं पकाएँगे, पर ज़ोमैटो से ऑर्डर देंगे। हम ड्राइव नहीं करेंगे, पर उबर बुला लेंगे। यानी काम वही, आत्मनिर्भरता की परिभाषा नई।

सार यह कि लद्दो देवी उस युग की प्रतिनिधि हैं, जिसकी आधी ज़िंदगी दूसरों की सीट पर बैठकर बीत जाती है। फर्क बस इतना है कि पहले वे साइकिल पर लदकर जाती थीं, अब कार में बुक होकर जाती हैं! वे अब समाज के लिए एक मिसाल हैं कि कैसे भय को भी नैतिकता का परिधान पहनाया जा सकता है। उन्होंने ही दुनिया को ये परम ज्ञान दिया कि डर को सुसंस्कृत कैसे दिखाया जाता है और निर्भरता को, परजीविता को 'संवेदनशीलता' का चोगा कैसे ओढ़ाया जाता है।

दरअसल हम सब किसी न किसी रूप में ‘ड्राइविंग’ से डरने वाले लद्दो देवी हैं। किसी को वाहन से डर है, किसी को निर्णय लेने से, किसी को जीवन की स्टीयरिंग थामने से। तो भाइयो-बहनो, दोस्तो! ज़रा सोचिए कि ड्राइविंग के इस डर का समाज-शास्त्र क्या है?
सच यह है, हमारी लद्दो देवी अकेली नहीं; हर गली-मुहल्ले में एक लद्दो छिपी है। लद्दो देवी का मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, एक मनोविज्ञान का है। यह उस सामाजिक प्रशिक्षण का हिस्सा है, जहाँ लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि 'सड़क पर ध्यान रखना, गाड़ी मत चलाना, गिर जाओगी, चोट लग जाएगी'। यह भी कह देते हैं कि फिर शादी कौन करेगा (गोया विवाह ही जीवन का परम उद्देश्य है)? परिणाम यह कि आत्मनिर्भरता का पहिया दूसरों के हाथों में चला जाता है।

खैर! अब समय बदल रहा है। इसलिए अगर आपके आसपास भी कोई 'ड्राइविंग से डरने वाली' आत्मा हो, तो उसका मज़ाक मत उड़ाइए क्योंकि वही कल ऐप पर ‘कैब बुक’ कर के आपको भी लिफ्ट देने वाली है!

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रचनाकार परिचय

प्रीति 'अज्ञात'

ईमेल : preetiagyaat@gmail.com

निवास : अहमदाबाद (गुजरात)

सम्प्रति- संस्थापक एवं प्रधान संपादक, हस्ताक्षर वेब पत्रिका
प्रकाशन- मध्यांतर (काव्य, 2016), दोपहर की धूप में (आलेख, 2019), सर्वे भवन्तु सुखिनः (आलेख, 2021) एवं देश मेरा रंगरेज़ (व्यंग्य, 2022)
सम्मान- गुजरात साहित्य अकादमी सहित दर्जनों सम्मान।
निवास- अहमदाबाद (गुजरात)