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अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

विजय सिंह नाहटा की कविताएँ

विजय सिंह नाहटा की कविताएँ

विजय सिंह नाहटा की कविताएँ अपने समय के सन्दर्भों से टकराकर उसी बेचैनी को जीती हैं, जिन्हें उनका समाज जीने को अभिशप्त है। तीखी और मारक कहन के माध्यम से कवि अपनी कविताओं को एक औजार में बदलने को तत्पर दिखता है। एक ऐसा औजार, जो अपने उधड़े हुए दौर की तुरपाई कर सके। इस जद्दोजहद में स्मृति, प्रकृति और कविता उनके 'ठहराव-बिंदु' की तरह खड़े दिखते हैं।

भय

अन्याय का प्रतिकार करने के लिए
तुम एक भाषा ईजाद करोगे
लगभग इतनी तीव्र और बेधक
विद्रोह की बू आने लगे जिसमें
तब
क्रान्ति की पदचाप सुनाई देगी
किसी तानाशाह को

फलतः
रातों-रात हत्यारे घोषित किये जाओगे
फिर
किसी नम सुबह मारे जाओगे
अ-घटना की तरह

जब तलक बने रहोगे तथाकथित सभ्य- शालीन
चुप रहोगे : बेजुबान
हर तमस को ज्ञाता द्रष्टा भाव से घटित होते
देखते रहोगे
फलतः इतिहास की किसी जिल्द में
नेक कहलाओगे

मुझे भय है
कि सहसा यह पृथ्वी एक दिन
नेक लोगों से भर जाएगी।

*********


थोड़ी-सी कविता ने बचाया जीवन

रक्तपात को उठे हाथ अब सहमने लगे हैं
आर्तनाद के स्वर होने लगे हैं मंद
बंदूकों का शोर थम-सा गया है
थोड़ी करुणा जो बच रही
उसी ने थाम रखी जीवन-पतवार

एक लय में दौड़ रहीं दुनिया की सड़कों पर गाड़ियाँ
और तेज़ी से दौड़ रहा रक्तचाप
सोचना एक क्रिया भर नहीं
यह सोया हुआ दावानल है
कब लपटें घेर लें
और चीखें सुनायी न दें
पर पहले से भय कुछ कम होने लगा है

इस अराजक समय में
हर शाम हर घर की देहरी पर वही शख्स होता दाख़िल
जो मुकर्रर है
यह एक हल्की नैतिक जीत है
पर उत्सव दिखाई नहीं देता
एक मोड़ पर आ खड़े हम
जहाँ थोड़ी अच्छी चीज़ें उम्मीद को जगाए चलती सरेराह

यदि
जीवन एक अनुज्ञा भर है-
हर नये पथिक के लिए
किसी नये वृत्तांत का प्रवेशद्वार
तो आप पाएँगे
वहाँ कविता ने अदा किया
मनुष्यता के हक़ में
नागरिकता का प्रथम शुल्क

थोड़ी-सी कविता ने बचाया भरा-पूरा जीवन।

*********


स्मृति एक रंग है

एक स्मृति से दूसरी स्मृति में
ऐसी अंतहीन स्मृतियों के जाल पर
टहलता हूँ ता-उम्र

पहले अंकुर-सी फूटती है
अनादि से उलीचती जल
अब लचीली नहीं
सख्त पथरीली है
जीवन-शिलालेख पर
गोया, उत्कीर्ण ठोस इबारत

एक आदिम पगडंडी
स्मृति को बिछाकर जिस पर
फिर उसमें तह करता हूँ अनगिन
बसंत औ पतझड़
स्मृति में ओढ़ता-बिछाता हूँ
अनन्त जीवन
किसी तेजोमय दिवस में

मुझे आलोकित करती रही होगी
वो बदरंग, धूसर-सी स्मृतियाँ
मेरे होने के किसी रिक्त कोने को भरती

एक ही जीवन में स्मृति की अनंत छवियों से
तराशता हूँ जीवन
कृतज्ञ हो जीवन-रथ खींचता हूँ
त्रासद औ सुखद के दो पहियों से
अस्मिता के प्रांगण में
जीवन : यदि एक महाआख्यान हुआ
तो, स्मृति जैसे ; महज सूत्र-वाक्य
समा जाता जिसमें समूचा वृत्तान्त

यदि
हज़ारों रंग हैं जीवन में
तो स्मृति एक रंग है-
गाढ़ा और पारदर्शी।

*********


मैं ऐसा हो जाऊँ

प्रभो!
मुझमें इतना अक्षय भर दो
कि मेरा होना
किसी और के ठहरने की
वजह बन जाए

मेरी चुप्पी इतनी अर्थपूर्ण हो
कि जहाँ संवाद दरकने लगे
वहाँ समझ के नवीन वातायन खुल जाएँ

मुझे इतना हल्का कर दो
चिड़िया के पंख-सा निर्भार
कि मैं बोझ न रहूँ
और इतना थिर
कि डगमगाते इरादे
मेरे पास आकर
संतुलन का पाठ सीख लें

मेरे हिस्से की थकान
अगर किसी अन्य की
राह आसान कर दे
तो
मुझे विश्राम की कतई ज़रूरत नहीं

मेरी असफलताएँ
किसी और के
साहस का आधार बनें
और मेरी ख़ामोशी
किसी के टूटते विश्वास को संभाल ले

मैं चाहता हूँ
मेरा अंत
किसी अंतहीन शून्य का विस्तार न बने
बल्कि किसी आरम्भ की
मौन घोषणा हो

मेरे रहने से अगर किसी का डर कम हो
और मेरे पथ से हटने से
किसी का विश्वास बढ़े
तो वही मेरी एकमेव सार्थकता हो

मैं कोई उदाहरण
कोई किंवदंती नहीं बनना चाहता
बस इतना काफ़ी है
कि मेरे होने की वजह से
किसी का रास्ता कम कठिन हो जाए
और एक मंद उजास
सहसा क्षितिज से झाँकने लगे।

*********


हर बार

हर बार एक जैसी फरवरी आती है
आता है वही सितम्बर
बसंत में उठती समानधर्मा हूक
पतझर में वही जंगल धू-धू जलता है

एक जैसी सर्दियाँ मंडराती
बर्फ गिरती बाहर
सुदूर टिमटिमाती रोशनी बूढ़े पर्वत पर

अलग कुछ भी नहीं
एक जैसा होता हर बार रचाव
हर बार घेर लेते समान अहसास

स्मृतियों की अंतहीन सड़क है
सड़क के अंतहीन छोर पर हैं एक जैसी स्मृतियाँ
अलग हुलिए में एक तरह के होते तमाम लोग
हर बार एक जैसे लोगों की बस्ती में घूमता यायावर मौसम
अंतहीन चौखट है जहाँ होकर हर बार जीवन गुज़रता है
हर बार गुज़रता एक जीवन अलग-अलग उपस्थितियों में
जो किसी दूसरे जीवन में थिर हैं
इस जीवन का स्पर्श पाकर जाते हैं अनंत यात्रा पथ पर
जहाँ से नहीं दिखाई देते एक ही किस्म के खिलते हुए प्राचीन सुबह के फूल
ओझल रहते पार्क में खेलते एक जैसी मुस्कान फेंकते बच्चे

ईश्वर महज मंज़िल का अहसास भर है
जन्म-मरण का सतत प्रवाह
अंतहीन अनुक्रम आवाजाही का लगा हो जैसे
ईश्वर गोया निर्लिप्त है
प्रारब्ध अलग-अलग हैं
पर कोई सूत्र जोड़ता है

एक लय में बहता चला जाता जीवन-गान
अनेक जीवन में बजता एक जैसा स्वर संगीत
एक जैसी दीप्ति में मंडित होती सकल आत्माएँ

देखो! अविकल प्रेम, जो बह रहा
एक शाश्वत आनन्द, जो गाया जा रहा
एक मुक्तिकामी सपना, धीमे-धीमे पक रहा।

*********


कर्मवीरा है नदी

समुद्र की पुत्री है नदी
भाप बन उठती क्षितिज तक
बादल के आँगन
अपने होने को होमकर
बनती है अकेली बूँद

नदी की यात्रा
दरअस्ल
एक बूँद की आपबीती है

बूँद से बूँद जोड़कर बनाती है
जलराशि
फिर एक अनवरत वेगवान प्रवाह
प्रान्तर, गिरि-कन्दराओं को
हरिताभ बनाता बहता है
बहना एक यात्रा में होना है।

गिरकर समुद्र में विलीन होना ही
उसका कुल जमा हासिल भर है
अदद संज्ञा भर है समुद्र
कर्मवीरा है नदी,
जो बूँद को प्रवाह
समुद्र को बनाती है समुद्र।

*********


कहीं तो होगी एक नदी

कहीं तो होगी एक नदी
बहती हुई चुपचाप

कभी बहती थी
थार के ऐन बीचो-बीच
नदी वो 'सरस्वती'
गाया था वेदों ने जिसे
नदी नहीं जीवन रेखा थी
महान मरूस्थल की

कभी का बदल चुकी पाट
इस रेतीले विस्तार में
झिलमिलाता है
एक नदी का खोया अतीत

कहते हैं अब उसे
लुप्त मान लिया गया है
पर नदी कभी मरती नहीं
बहती होगी धरती के भीतर कहीं
अंतः सलिला की तरह

अभी तक याद होंगे एक नदी को
अपने घाट, किनारे, यात्रा-पथ,
पशु-पक्षी, मनुष्य
अब भी याद होगा
उसे अपना नदी होना
भूली नहीं होगी बहते जाना
कहीं तो गूँजता होगा जल निनाद

जल-पक्षी करते क्रीड़ाएँ
तोड़ते सन्नाटा
तैरते होंगे जलयान
उम्मीद के नये क्षितिज की ओर
होते जाते ओझल

किन्हीं आदिम मनुज को पढ़ाती
सभ्यता की वर्णमाला
कहीं तो होगी एक बहती हुई नदी
शिलालेख की इबारत की तरह
जिस पर मढी है
एक सूखे मरूस्थल की
सजल स्मृतियाँ।

2 Total Review

वसंत जमशेदपुरी

01 August 2026

भावनात्मक अभिव्यक्ति

H

Hukum chand Kothari

19 July 2026

All poems are fantastic.

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रचनाकार परिचय

विजय सिंह नाहटा

ईमेल : nahatavijay60@gmail.com

निवास : जयपुर (राजस्थान)

शिक्षा- एम० ए०
सम्प्रति- राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
प्रकाशन- 'है यहाँ भी जल' 2007, 'लिखना कि जैसे आग' 2013, 'अग्निपाखी' 2020, 'कविता की दीठ' 2023 (कविता संग्रह)
न्यू वर्ड पब्लिकेशन के 'समकाल की आवाज़' श्रृंखला के तहत कविता संग्रह- 'प्रतिनिधि कविताएँ' प्रकाशित।
राजस्थानी कविता संग्रह 'गम्योड़ै समदर रा सपना' (2023) प्रकाशित।
'कविता से कविता तक', 'इक्कीसवीं सदी री राजस्थानी कविता', 'थार सप्तक' (चतुर्थ), 'युगीन काव्या' प्रेम विशेषांक, 'शतदल', समकालीन सृजन 'यात्राओं का जिक्र' अंक, 'समकालीन कविता कोश', 'कविता के बहाने', 'अक्षर ख़बर' बीकानेर संभाग रचनाकार विशेषांक, कल हमारा है, दर्पण, सेतु, दूर कहीं,समर्पण, नाना मुंङे मोटी बात, रेत पर चलती नाव, कविता के प्रमुख हस्ताक्षर, काव्य के मोती, काव्य मंदाकिनी, झंकार, स्वर्णिमा, काव्य कलश, काव्य कुसुम, जकासा काव्य मंजूषा, विश्व की अखंड किरणें, 'कथारंग' (साहित्य वार्षिकी) आदि समवेत काव्य संग्रहों, विशेषांकों में कविताएँ प्रकाशित।
संपर्क- बी- 92, स्कीम- 10 बी, गोपालपुरा बाइपास, जयपुर (राजस्थान)- 302018
मोबाइल- 7850873701