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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

जयप्रकाश मानस की कविताएँ

जयप्रकाश मानस की कविताएँ

सीपी, शंख, घोंघे, मोती-
तट पर बिखरे, जैसे कोई
पुरानी डाक का बस्ता खुल गया।

बाघ : एक आदिवासी गाथा

वह सिर्फ बाघ नहीं था
वह हमारा बड़ा भाई था-
जिसकी साँसों में
जंगल की रातों का अँधेरा सिमट आता था
जिसकी आँखों में
पहाड़ों की चुप्पी जलती थी

हमने उसे कभी 'जानवर' नहीं कहा
वह तो वो पहरेदार था
जो हमारे
सपनों की सीमा पर खड़ा रहता था-
एक जीता-जागता प्रतीक
उस संधि-पत्र का
जो हमने धरती से लिखा था
खून के अक्षरों में

जब वह गरजता था
नदियाँ रुक जाती थीं,
पेड़ों की जड़ें काँप उठती थीं-
पर हम जानते थे:
यह कोई ख़तरा नहीं,
बस एक स्मृति है
कि अब भी कहीं
इंसान और जंगल के बीच
कोई संवाद बचा हुआ है।

फिर एक दिन
किसी ‘सभ्य’ आदमी ने
उसकी खाल को
अपने ड्राइंग रूम की शोभा बना दिया-
तब से
हमारे बच्चे
अपनी कहानियों में
डरने लगे हैं
उस ख़ालीपन से
जो बाघ की आँखों में
अब नहीं दिखता।

वे कहते हैं-
"बाघ विलुप्त हो गया"
पर हम जानते हैं :
वह मरा नहीं - बस लौट गया है
उस आदिम अँधेरे में
जहाँ से हम सब आए थे-
और अब
हमारे और जंगल के बीच
सिर्फ एक गहरी खाई है
जिसमें गिर चुके हैं - हमारे सभी वादे

*********


पहाड़ पूछता है

पहाड़ ने पूछा-
तुम मुझसे बड़े कैसे हो गये?
मैंने कहा-
तुम्हारी चोटी पर खड़ा हूँ
तुम्हारी छाया में बैठा हूँ
तुम्हारे पत्थरों से बात करता हूँ

फिर भी मैं बड़ा हूँ
क्योंकि मेरे पैर
तुम्हारी ऊँचाई को
अपनी नींद में नाप लेते हैं

पहाड़ हँसा-
तुम्हारी नींद में
मेरी जड़ें उग आई हैं
तुम्हारे सपनों में
मेरे पत्थर फूल बन गये हैं

अब हम दोनों
एक-दूसरे से बड़े हैं
एक-दूसरे में छोटे हैं
जैसे आकाश में धूप और छाया

*********


तट की टूटी चिट्ठी

सीपी, शंख, घोंघे, मोती-
तट पर बिखरे, जैसे कोई
पुरानी डाक का बस्ता खुल गया।

समुद्र ने इन्हें छोड़ा
या लहरों ने किनारे ठेल दिया
पर इनके भीतर
उसकी बेचैन साँस
जैसे कोई रिश्ता = जो न उसका था
पर उसी की लहरों से गूँथा।

ये सब
कभी समुद्र की थपकियों में थे
उसके गीतों की लय में
उसके तूफानों की धमक में।
अब तट की रेत पर पड़े
खामोश, पर कुछ कहते हुए।

सीपी एक चिट्ठी है
जो समुद्र ने लिखी पर भेज न सका।

शंख एक सिसकी
जो उसकी गहराई में बनी पर किनारे पर बिखर गई।

घोंघा
अपनी टेढ़ी-मेढ़ी राहों में
समुद्र की उलझनों को लपेटे
चलता है, ठिठकता है।

और मोती-
वो आँख का कतरा
जो चमक में ढला
पर उसका दर्द अनलिखा।

समुद्र ने इन्हें छोड़ा
पर छोड़ते हुए
एक अधूरी बात कह गया।
जैसे हम
इस दुनिया के किनारों पर
किसी लहर के टूटे हुए टुकड़े।

क्या हम भी समुद्र के बिछड़े?
क्या हमारा होना
बस यही है-
तट पर बिखर जाना - और फिर भी
किसी की याद में ठहर जाना?

तट पर खड़ा हूँ
इन टुकड़ों को उँगलियों से छूता
सोचता-
समुद्र ने इन्हें क्यों छोड़ा?
क्या ये उसकी थकान थे
या उसके जीने की निशानी?

तट इन्हें सहेजे रखता है
जैसे कोई बूढ़ा चौकीदार
जो पुरानी चिट्ठियों में खोई बातें ढूँढता है।

*********


पानी में मछली का आँसू

मछली तैरती है पानी में
जैसे कोई ख़ामोश साँस लेता हो
उसके आँसू पानी से मिलते हैं
पर पानी उन्हें देखता नहीं
देखना क्या होता है?
पानी तो बस छूता है
मछली की त्वचा को
उसके आँसुओं की गर्मी को

पानी कहता है-
"मैं नहीं जानता आँसू क्या हैं
मगर तुम्हारी तड़प
मेरे भीतर लहर बनकर हिलती है"
मछली चुप रहती है
उसका दुख
पानी की गोद में डूबता है
जैसे पत्थर तल में जा छिपे

कभी-कभी
मछली का आँसू
पानी की सतह पर चमकता है
जैसे बूँद में सूरज झलके
पानी उसे थाम लेता है
नहीं पूछता-"क्यों रोई?"
बस अपने में समेट लेता है
जैसे नदी समुद्र को गले लगाए

मछली का दुख
पानी की लहरों में गुम होता है
पर पानी उसे भूलता नहीं
वह हर आँसू को रखता है
जैसे कोई पुरानी चिट्ठी
जो पढ़ी नहीं जाती- मगर संभालकर रखी जाती है

मछली तैरती रहती है
पानी लहराता रहता है
आँसू और पीड़ा कहीं गुम हो जाते हैं
पानी जानता है-
वह सबकुछ सहेजता है
जो मछली ने उसे सौंपा

*********


अभी-अभी जनमी बछिया है रेत

नदी बियायी गाय-सी
वन-पर्वत, खेत-खार और ज़रा घास की तलाश में
दिन-रात अनथक भटकती

अभी-अभी जनमी बछिया है रेत
माँ की कहाँ सुनती!
घर नहीं ठहरती
संग-संग आसपास
उछलती-कूदती-चिहुँकती रहती है

कहने को शायद यही- दूध ज़रा और दो न माँ
भूख अभी मिटी है कहाँ?

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वसंत जमशेदपुरी

25 September 2025

पहाड़ों और जंगलों से बात करती कविता

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रचनाकार परिचय

जयप्रकाश मानस

ईमेल : srijan2samman@gmail.com

निवास : रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

जन्मतिथि- 2 अक्टूबर, 1965
जन्मस्थान- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
शिक्षा- एम० ए० (भाषा विज्ञान), एम०एस०सी० (आईटी)
संप्रति- छ.ग. शासन में वरिष्ठ अधिकारी
प्रकाशित कृतियाँ-
तभी होती है सुबह, होना ही चाहिए आँगन, अबोले के विरूद्ध, सपनों के क़रीब हों आखें,
कविता कभी होती नहीं पुरानी (कविता संग्रह), दोपहर में गाँव (ललित निबंध, पुरस्कृत), साहित्य की सदाशयता (आलोचना), बातचीत डॉट कॉम (साक्षात्कार), पढ़ते-पढ़ते : लिखते-लिखते (डायरी), चलो चलें अब झील पर, सब बोले दिन निकला, एक बनेगें नेक बनेंगे, मिलकर दीप जलायें, जयप्रकाश मानस की बाल कविताएँ (बाल-गीत), यह बहुत पुरानी बात है, छत्तीसगढ के सखा (नवसाक्षरोपयोगी), लोक-वीथी, छत्तीसगढ़ की लोक कथाएँ (10 भाग), हमारे लोकगीत (लोक साहित्य), इंटरनेट, अपराध और कानून (विज्ञान)
संपादन- विष्णु की पाती राम के नाम (विष्णु प्रभाकर के पत्र), हिंदी का सामर्थ्य, साहित्य की पाठशाला, छत्तीसगढीः दो करोड़ लोगों की भाषा, बगर गया वसंत (बाल कवि श्री शंभुलाल शर्मा ‘वसंत’ पर एकाग्र), एक नई पूरी सुबह (कवि विश्वरंजन पर एकाग्र), विंहग (20 वीं सदी की हिंदी कविता में पक्षी), महत्व : डॉ० बलदेव, महत्व : स्वराज प्रसाद त्रिवेदी, यहाँ से वहाँ तक (बिट्रेन के प्रवासी कवियों की कविताएँ), तपश्चर्या और साधना : संत गुरु घासीदास, विजयिनी मानवता हो जाये (वैश्वीकरण और मानवता पर केंद्रित विमर्श), एक हिरण पर सौ-सौ चीते (डॉ० अजय पाठक के गीत), छत्तीसगढ़ी : कलादास के कलाकारी (छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम व्यंग्य संग्रह)
पत्रिका संपादन- साहित्यिक पत्रिका पांडुलिपि, वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम
अनुवाद- कविताओं का बांग्ला, ओडिया, पंजाबी, गुजराती, नेपाली में अनुवाद
पुरस्कार एवं सम्मान- बिसाहू दास मंहत पुरस्कार(भोपाल), अस्मिता पुरस्कार(रायपुर), अंबिका प्रसाद दिव्य रजत अंलकरण (जबलपुर), माता सुंदरी फाउंडेशन पुरस्कार (रायपुर), राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान (छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति), मिनीमाता फाउंडेशन सम्मान (रायपुर), गुरु घासीदास सम्मान (रायपुर), भाषा गौरव सम्मान (सोनभद्र), अखिल भारतीय प्रेमचंद सम्मान, (पद्मश्री नेल्सन कला गृह, भिलाई), सीएनबीसी आवाज़ एक्सीलेंसी अवार्ड फॉर लिटरेचर-2018 (मुंबई), राष्ट्र भारती सम्मान (विधि भारती परिषद, दिल्ली), उत्कल कवि सम्राट उपेंद्र भंज सम्मान (भुवनेश्वर), डॉ. कृष्णचंद्र मिश्र स्मृति हिंदी सम्मान (हिमालिनी, काठमांडू)
विशेष-
आर.बी.एस. कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, तमिलनाडू के स्नातक पाठ्यक्रम में कविताएँ
छत्तीसगढ़ के स्कूली शिक्षा विभाग के पाठ्यक्रम में रचना समादृत
हिंदी भाषा और साहित्य के वैश्विक प्रसार एवं वैश्विक समरसता के लिए विदेशों में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों (24) का आयोजन-संयोजन
संपर्क- एफ-3, आवासीय परिसर, छ.ग. माध्यमिक शिक्षा मंडल (पेंशनवाड़ा), रायपुर, छत्तीसगढ़- 492001
मोबाइल- 9424182664