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विनय मिश्र की ग़ज़लें

विनय मिश्र की ग़ज़लें

जीवन परतों दर परतों में सिमट गया
सारा मौसम दो आंँखों में सिमट गया

होने को था मेरा क़द कुछ बड़ा मगर
मैं जीने की तरकीबों में सिमट गया


ग़ज़ल-

न कोई है उसके सिवा ज़िन्दगी भर
उसी पर मरा और जिया ज़िन्दगी भर

उदासी के इन पत्थरों में भी देखो
कोई फूल होकर खिला ज़िन्दगी भर

बिना देखे चेहरा बिना नाम जाने
उसे यूंँ ही मैंने लिखा ज़िन्दगी भर

मेरी सांँस होकर रही इस घुटन में
कोई एक ताज़ा हवा ज़िन्दगी भर

था जिसके बिना एक पल रहना मुश्किल
मैं उसके बिना भी रहा ज़िन्दगी भर

वही बस वही रह गया याद मुझको
कोई दूर इतना हुआ ज़िन्दगी भर

तुम्हारे सिवा ज़िन्दगी सच यही है
न आया कोई दूसरा ज़िन्दगी भर

*******


ग़ज़ल-

रात गए आंँखों में इसका दिखना ही तो है
पास हमारे एक सुबह का सपना ही तो है

कितने रस्ते इस बहते पानी ने खोल दिए
मेरा लिखना इस मौसम का झरना ही तो है

दुनिया भर की चिंताओं में ही डूबे रहना
अपनी चाहत की दुनिया में रहना ही तो है

उसकी सुनना उसकी कहना उसका हो जाना
यह उसके मतलब के आगे झुकना ही तो है

एक अधूरेपन में जीना अपने जीवन को
थोड़ा-थोड़ा करके पूरा करना ही तो है

यूँ टूटी-फूटी नींदों में अधसोया रहना
मेरे देखे यह ख़्वाबों का जगना ही तो है

एक ख़ुशी का रोज़ चमकना मेरी बातों में
उम्मीदों के एक दिए का जलना ही तो है

*******


ग़ज़ल-

भले कुछ ज़ख़्म गहरे साथ लेकर चल
मगर कुछ ख़्वाब अच्छे साथ लेकर चल

पुरानी नींद में ही रात क्यों ठहरे
नए सूरज के सपने साथ लेकर चल

मैं चलना चाहता हूंँ साथ ही तेरे
मुझे भी धीरे-धीरे साथ लेकर चल

इन्हीं रस्तों से ही तो लोग जाएंँगे
यही चलने के रस्ते साथ लेकर चल

दुखों में रोशनी मिल जाएगी तुझको
कभी आंँसू चमकते साथ लेकर चल

लड़ाई मौत से जब ठन गई है तो
तज़ुर्बे ज़िंदगी के साथ लेकर चल

जहांँ पर छूट जाऊंँ छोड़ देना पर
वहांँ तक उसके पहले साथ लेकर चल

मुझे भी दुख है कि तू भी अकेला है
तभी कहता हूंँ प्यारे साथ लेकर चल

इन्हीं में से खिलेगा कोई फूलों-सा
सभी दुख-दर्द अपने साथ लेकर चल

*******


ग़ज़ल-

जीवन परतों दर परतों में सिमट गया
सारा मौसम दो आंँखों में सिमट गया

जिसकी धूप का परचम दिन भर उड़ा यहाँ
वो सूरज अपने सायों में सिमट गया

सुख के सागर-सा बाज़ार लगा था पर
चाहत की सूखी नदियों में सिमट गया

वो फैला आकाश भी देखो यहांँ कि जो
उड़ती चिड़ियों के पंखों में सिमट गया

होने को था मेरा क़द कुछ बड़ा मगर
मैं जीने की तरकीबों में सिमट गया

जनता दुबकी है कोने में डरी हुई
सत्ता का सुख तो दंगों में सिमट गया

उत्तर चुप बैठे हैं कबसे पता नहीं
मैं भी केवल कुछ प्रश्नों में सिमट गया

*******


ग़ज़ल-

दुखों का कोई पल होकर हमेशा
रहा हूंँ मैं सजल होकर हमेशा

कोई इक आग है बहती है मुझसे
नदी-सी ही तरल होकर हमेशा

मैं आंँखों के सरोवर में रहा हूंँ
कोई सुंदर कमल होकर हमेशा

किसी अंधी गली में छोड़ती है
सियासत एक छल होकर हमेशा

रहा है झूठ से लड़ने की ख़ातिर
कोई सच मुझमें बल होकर हमेशा

सवालों में उलझती भी हैं बातें
नहीं निकली हैं हल होकर हमेशा

कोई भी बात पूरी हो न पाई
टँगी है आज-कल होकर हमेशा

14 Total Review
A

Asha

25 September 2025

आदरणीय विनय मिश्र की ग़ज़लें गहन अर्थ लिए रहती हैं जो ना केवल वर्तमान की बल्कि भविष्य के लिए भी संभावनाओं और आशाओं से ओतप्रोत होती हैं। आपकी गजलें विश्वास हैं आत्मा की कहीं दबी हुई आवाज है । अपको शुभकामनाएँ सर ।

सन्तोष सरस

22 September 2025

होने को था मेरा कद कुछ बड़ा मगर, जीने की तरकीबों में मै सिमट गया। दौर के विद्रूप को आईना दिखाता सुन्दर शेर।सभी ग़ज़लें प्रभावपूर्ण हैं और अपेक्षित असर पैदा करती हैं।

सन्तोष सरस

22 September 2025

होने को था मेरा कद कुछ बड़ा मगर, जीने की तरकीबों में मै सिमट गया। दौर के विद्रूप को आईना दिखाता सुन्दर शेर।सभी ग़ज़लें प्रभावपूर्ण हैं और अपेक्षित असर पैदा करती हैं।

मार्त्तण्ड

22 September 2025

विनय मिश्र न केवल चर्चित नवगीतकार हैं अपितु विशिष्ट अंदाज के प्रतिनिधि ग़ज़लकार भी हैं। उनके सारस्वत अभियान को नमन और शतशः बधाई।

R

Rakhi Semwal

22 September 2025

आपकी गज़लें पढना हमेशा ही नवचेतना जगाने वाली रही हैं..बेहद खूबसूरत गज़ल हैं...बहुत बधाई व शुभकामनाएं आपको 💐💐

सृजन गोरखपुरी

22 September 2025

"यह उसके मतलब के झुकना ही तो है" सबसे अच्छा मिसरा लगा..

S

Shiksha singh

21 September 2025

बेबाक अंदाज़ में ग़ज़लों के जरिए अपनी बात रखने वाले,छंद बद्ध गीत ग़ज़लों के साथ न्यायपूर्ण रवैया रखने वाले विनय मिश्र जी हिंदी ग़ज़लों के श्रेष्ठ रचनाकार हैं। इनकी ग़ज़लें जहां एक ओर जहां प्रेम,अधूरी इच्छाओं की बाते करती हैं वहीं कुछ शेर ऐसे हैं जो शासन ,सत्ता के गलियारे में फैले अंधेरे में लालटेन की रौशनी जैसे हैं।जो लोगों को आगाह करते हैं। इरा में प्रकाशित इनकी सभी ग़ज़लें बेहतरीन हैं। ऐसे ही प्रकाशित होते रहें,उदभासित होते रहें। ढेरों शुभकामनाएं 💐 शिक्षा सिंह

डॉ शशि जोशी

21 September 2025

विनय मिश्र जी की ग़ज़लें... यानी संवेदनाओं का ऐसा अंबर जहाँ जीवन के सारे रंग समाहित होते हैं।इन ग़ज़लों में मानव अंतस के सारे बिंब हैं ।यदि टूटन, उदासी है तो उसे तोड़कर उठ खड़े होने का हौसला भी..! प्रेम की वैयक्तिकता है तो समाज की पीड़ा भी..! भले कुछ ज़ख्म गहरे साथ लेकर चल।मगर कुछ ख्वाब अच्छे साथ लेकर चल..! विनय जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

U

Usha solanki

21 September 2025

बहुत ही सुंदर ग़ज़लें आदरणीय सर हर गजल में नई उमंग और उम्मीद भरी हुई है। आदरणीय सर की गज़लों का एक– एक शेर बेहरीन होता है। हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं सर

मीनू मदान

21 September 2025

समकालीन हिंदी ग़ज़ल के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर श्री विनय मिश्र जी को इन बेहतरीन ग़जलों के लिए हार्दिक बधाई

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रचनाकार परिचय

विनय मिश्र

ईमेल : mishravinay18@gmail.com

निवास : वाराणसी (उ०प्र०)

जन्मतिथि- 12 अगस्त, 1966
जन्मस्थान- देवरिया (उ०प्र०)
शिक्षा- पीएचडी
संप्रति- राजकीय कला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अलवर (राजस्थान) के हिंदी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्य के पश्चात् स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति व स्वतंत्र लेखन
प्रकाशित कृतियांँ- 'सच और है', 'तेरा होना तलाशूँ', 'लोग ज़िंदा हैं', 'ज़िन्दगी आने को है' और 'रंग बारिश' (ग़ज़ल संग्रह), 'समय की आंँख नम है' (गीत संग्रह), 'सूरज तो अपने हिसाब से निकलेगा' (कविता संग्रह), 'इस पानी में आग' (दोहा संग्रह) प्रकाशित।
प्रकाशन- 'ग़ज़ल दुष्यंत के बाद', 'हिंदी ग़ज़ल की नयी चेतना', 'समकालीन हिंदी ग़ज़लकार : एक अध्ययन' (प्रथम खंड), 'समकालीन हिंदी ग़ज़ल संग्रह' आदि अनेक संग्रहों एवं ग़ज़ल विशेषांकों में सहस्राधिक ग़ज़लें प्रकाशित
नचिकेता द्वारा संपादित 8 प्रतिनिधि ग़ज़लकारों के महत्वपूर्ण संग्रह 'अष्टछाप' में शामिल
डॉ० जीवन सिंह की पुस्तक 'आलोचना की यात्रा में हिंदी ग़ज़ल' में प्रतिनिधि ग़ज़लकार के रूप में शामिल
डॉ० जीवन सिंह द्वारा दस प्रतिनिधि ग़ज़लकारों की संपादित पुस्तक 'दसख़त' में शामिल
'सहयात्री समय के', 'शब्दायन', 'गीत वसुधा', 'समकालीन गीतकोश', 'नवगीत कोश', 'नयी सदी के नवगीत', 'नवगीत के नए प्रतिमान', 'नवगीत : नई
दस्तकें', 'नवगीत का लोकधर्मी सौंदर्य बोध' जैसे अनेक महत्वपूर्ण संपादित पुस्तकों में अनेक समकालीन गीत, नवगीत और जनगीत प्रकाशित।\
'समकालीन दोहा कोश' में चयनित दोहे प्रकाशित
संपादन- 'दीप ज्योति' पत्रिका के तुलसी विशेषांक का सन् 2001 में संपादन
'शब्द कारखाना' पत्रिका के समकालीन हिंदी ग़ज़ल पर केंद्रित विशेषांक का सन् 2007 में संपादन
'पलाश वन दहकते हैं' स्वर्गीय मंजु अरुण की रचनावली का सन् 2009 में संपादन
'जहीर कुरेशी : महत्व और मूल्यांकन' का सन् 2010 में संपादन
'अलाव' पत्रिका के समकालीन हिंदी ग़ज़ल की आलोचना पर केंद्रित विशेषांक का सन् 2015 में विशेष संपादन सहयोग
'बनारस की हिंदी ग़ज़ल' का सन् 2018 में संपादन
'संवदिया' समकालीन ग़ज़ल के युवा लेखन केंद्रित विशेषांक का सन् अगस्त 2021 में संपादन
विशेष- डॉ लवलेश दत्त द्वारा 'समकालीन ग़ज़ल और विनय मिश्र' प्रकाशित
श्रीधर मिश्र द्वारा 'विनय मिश्र का रचना कर्म : दृष्टि और मूल्यांकन' प्रकाशित
उदयपुर विश्वविद्यालय, अलवर विश्वविद्यालय से कविताओं और ग़ज़लों पर शोधार्थियों को पीएचडी डिग्री अवार्ड
गोरखपुर विश्वविद्यालय और रांँची विश्वविद्यालय में समग्र रचना कर्म पर शोध कार्य पंजीकृत
सम्पर्क- बी 27/64 सी एण्ड डी, दुर्गाकुंड, कुष्मांडा अपार्टमेंट, ग्राउंड फ्लोर, फ्लैट नंबर- 1, आनंद पार्क के सामने, वाराणसी (उ०प्र०)- 221005
मोबाइल- 9414810083