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फ़ानी जोधपुरी की ग़ज़लें

फ़ानी जोधपुरी की ग़ज़लें

उर्दू ग़ज़ल की लम्बी और समृद्ध परम्परा का एकदम ताज़ादम चेहरा हैं फ़ानी जोधपुरी। इनकी ग़ज़लें पारंपरिकता का जितना अच्छा निर्वहन करती हैं, उतनी ही ताज़गी के साथ अपनी विधा को सींच रही हैं। इनकी ग़ज़लों में जीवन की जद्दोजहद से उपजा नैराश्य बराबर देखने में मिलता है लेकिन इस नैराश्य के बीच उम्मीद की रौशनी कभी धीमी नहीं पड़ती। यह उम्मीद इनके लेखन की ही नहीं, हमारे वर्तमान और भविष्य की भी घनघोर ज़रूरत है। दुनिया की उपस्थिति तथा उसकी समझ फ़ानी की ग़ज़लों को 'मास्टरपीस' बनाती हैं।

ग़ज़ल- 1

ख़बर नहीं है इन्हें जाऊँगा कहाँ लेकर
भटक रहा हूँ‌ ख़ुद अपनी ही अस्थियाँ लेकर

वो एक शख़्स जो दीवारो-दर में बसता था
चला गया है नए घर की चाबियाँ लेकर

अभी तो ख़ौफ़ज़दा मछलियों को नींद आई
मछेरे फिर से चले आये कश्तियाँ लेकर

किसी भी तरह समाअत बचाओ बच्चों की
सड़क पे लोग खड़े हैं कहानियाँ लेकर

न उससे पहनी गयीं और न मैं ही पहना सका
गया तो था मैं बहरहाल चूड़ियाँ लेकर

यहाँ किसी को कोई ढब नहीं है रोने का
हमारी मौत पे आना रूदालियाँ लेकर

किसी के आने की उम्मीद ऐसी है 'फ़ानी'
कोई खड़ा है सरे-राह बेरियाँ लेकर

समाअत= श्रवण शक्ति

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ग़ज़ल- 2

इस दौर का मशहूर चलन भी नहीं माँगा
चाहा भी उसे और बदन भी नहीं माँगा

चाहत के तक़ाज़े तो यूँ उसने भी निभाए
फेरे भी लिए और वचन भी नहीं माँगा

बैठी रही बस मीर की ग़ज़लों के सिरहाने
तितली ने दुआओं में चमन भी नहीं माँगा

रावण की क़ज़ा को‌ मिले अब कैसे बहाना
सीता ने तो इस बार हिरन भी नहीं माँगा

दफ़नाता रहा आँखों में ख़्वाबों के जनाज़े
'फ़ानी' ने ज़माने से कफ़न भी नहीं माँगा

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ग़ज़ल- 3

मिज़ाज जब भी बदलने लगे ज़मीनों का
मकान रहता नहीं देर तक मकीनों का

न ले के जा सकीं इक हद से आगे नज़रों को
क़ुसूर इसमें भला क्या था दूरबीनों का

वहाँ पे ज़ख़्मी कलाई छिपाएँ कैसे भला
जहाँ रिवाज नहीं कोई आस्तीनों का

वो हाल हो या कि माज़ी या फिर हो मुस्तक़बिल
हमारे क़त्ल में आया है नाम तीनों का

नगर में फिर कोई हंगामा होने वाला है
गुज़र हुआ है यहाँ से तमाशबीनों का

मकीनों= रहने वाले
हाल, माज़ी और मुस्तक़बिल= वर्तमान, भूत व भविष्य

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ग़ज़ल- 4

ढलती है ग़म की शाम मेरा वक़्त आ गया
दुनिया तुझे सलाम मेरा वक़्त आ गया

लेकर के जा रहा हूँ मैं ज़ख़्मों भरा वजूद
सुन ले ये ख़ासो-आम मेरा वक़्त आ गया

पस्ती में रहते-रहते मेरी उम्र ढल चुकी
जाता हूँ सू-ए-बाम मेरा वक़्त आ गया

आए हो मेरे दर पे दमे-मर्ग़‌ किसलिए
मैं क्यों करूँ कलाम मेरा वक़्त आ गया

किसके सबब ये‌ मौत‌ मयस्सर हुई मुझे
किस-किस का अब लूँ नाम मेरा वक़्त आ गया

रहवारे-नब्ज़‌ मंद-सी पड़ने लगी है अब
ख़िचने लगी लगाम मेरा वक़्त आ गया

जो मुश्किलें थीं 'फ़ानी' मियां सर पे आज तक
होती हैं सब तमाम मेरा वक़्त आ गया

सू-ए-बाम=ऊँचाई की ओर,
दमे-मर्ग़‌= दम निकलते वक़्त
मयस्सर= प्राप्त
रहवारे-नब्ज़‌= नब्ज़ रूपी घोड़ा

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ग़ज़ल- 5

क़रीब होने लगा जबसे ताज लोगों से
तभी से रूठ गयी लोक-लाज लोगों से

अभी-अभी है हुआ इख़्तिलाज लोगों से
अभी से पड़ने लगा काम-काज लोगों से

हमारे अहद को कुछ अच्छे लोग दे मौला
सुना है बनता है अच्छा समाज लोगों से

अकेलापन जो कि पैदाइशी मरज़ था मेरा
वो बन चुका है अभी लाइलाज लोगों से

सुलूक कैसा हो मेहमान से ख़ुदा जाने
भरा हुआ है ये घर बदमिज़ाज लोगों से

बस इंक़लाब की तख़्ती लगा के लेटे रहे
ज़रा भी हो न सका एहतिजाज लोगों से

ख़ुदा दिलों से बहुत दूर हो गया 'फ़ानी'
चिपक के रह गये रस्मो-रिवाज लोगों से

इख़्तिलाज=मेल-जोल
एहतिजाज= विरोध

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ग़ज़ल- 6

हरम में, दैर में, गिरजे में भीड़ होती है
हर एक दिन नए ख़दशे में भीड़ होती है

कभी-कभी मेरे कमरे में रूहें आती हैं
कभी-कभी मेरे कमरे में भीड़ होती है

अचंभा ये नहीं मरने पे होता है जलसा
अचंभा ये है कि जलसे‌ में भीड़ होती है

कभी जो आमदे-मेहमान हो, न घबराओ
घनेरे पेड़ के साए में भीड़ होती‌ है

समझती जादू है हर हाथ की सफ़ाई को
मदारियों के जो क़ब्ज़े में भीड़ होती है

मैं उस कहानी को हर रोज़ जीता हूँ जिसको
कभी जो सुन ले तो सकते में भीड़ होती है

बस एक कोना ही 'फ़ानी' के वास्ते है यहाँ
नगर के बस उसी कोने में भीड़ होती है

ख़दशा= आशंका

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ग़ज़ल- 7

दर्द जब आख़िरी पड़ाव में था
मैं नए ग़म के मोल-भाव में था

नींद कमबख़्त फिर वहीं टूटी
ख़्वाब का शहर जब बसाव में था

उसकी आँखों से अश्क बहते थे
मेरा सब कुछ उसी बहाव में था

कैसे दुनिया को फिर नज़र आता
घाव तो मेरे दिल के घाव में था

क्या ख़बर किसको हाथ सेंकने थे
आज पूरा नगर अलाव में था

हाथ पाकर मेरी समाअत का
झील का सारा शोर नाव में था

चुलबुलापन, शरारतें, शोख़ी
'फ़ानी' क्या-क्या तेरे सुभाव में था

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ग़ज़ल- 8

करते-करते सैर कटेंगे
उम्र के दिन हैं ख़ैर, कटेंगे

बना तो दें हम नक़्शा लेकिन
गिरजा, मस्जिद, दैर कटेंगे

हवा के अंदर घोल के ख़न्जर
क्या सोचा था ग़ैर कटेंगे

क्या हम जैसी होगी दुनिया
क्या दुनिया से बैर कटेंगे

लहरों के सौ जाल हैं लेकिन
तैर शनावर तैर, कटेंगे

'फ़ानी' ने जब चलना सीखा
पता नहीं था पैर कटेंगे

शनावर= तैराक

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ग़ज़ल- 9

जब मिला इश्क़ के सहारे बदन
बन गया इश्क़‌ रोज़गारे-बदन

क्या कहीं उसमें मैं मिला तुमको
रात जो पास था तुम्हारे बदन

इस झिझक में ही रह गये दोनों
कौन पहले-पहल उतारे बदन

जाने क्या-क्या छुपाया जाता रहा
चस्पां कर-कर के इश्तिहारे बदन

एक शहरे-ख़मोशा हूँ मैं भी
हैं जहाँ रूह के उतारे बदन

रो रहे हैं रूदालियों जैसे
मेरे घर आके सोगवारे बदन

वो जो 'फ़ानी' था जा चुका कब का
छोड़ के पीछे इक ग़ुबारे-बदन

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ग़ज़ल- 10

रेत में‌ नद्दी, झील में सहरा ढूँढ लिया
भटक-भटक कर अपना रस्ता‌ ढूँढ लिया

पहले सीखा नक्शे को गढ़ने का फ़न
फिर नक़्शे में जाने क्या-क्या ढूँढ लिया

चेहरे ने चेहरे पे चेहरे को रखकर
सुना है अबकि नया मुखौटा ढूँढा लिया

काग़ज़, क़लम, किताबें,‌ कमरा और कॉफ़ी
सब में मैंने अपना हिस्सा ढूँढ लिया

हर इक ढूँढने वाला सोचा करता है
जितना खोया था क्या उतना ढूँढ लिया!

ग़ज़ल-राह पर चलते-चलते 'फ़ानी' ने
अपने अंदर खोया बच्चा ढूँढ लिया

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रचनाकार परिचय

फ़ानी जोधपुरी

ईमेल : fani.jodhpuri@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 24 फरवरी, 1984
जन्मस्थान- जोधपुर (राजस्थान)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य), बी०एड
सम्प्रति- राजनैतिक क्षेत्र में सोशल मीडिया सलाहकार एवं विश्लेषक, स्वतंत्र लेखन, पूर्व उद्घोषक ऑल इंडिया रेडियो
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, नज़्म, गीत, मनक़बत, मर्सिया एवं कहानी
प्रकाशन- 'आसमां तक सदा नहीं जाती' एवं 'पानी बैसाखियों पे' (ग़ज़ल संग्रह)
देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के कई मुशायरों में भागीदारी
संपादन- फ़स्ले-गुल (डॉ० ज़ेबा फ़िज़ा की ग़ज़लों का संग्रह), चेहरा रिश्तों का (यूसुफ रईस की ग़ज़लों का संग्रह)
सम्मान- हिन्दुस्तान गौरव सम्मान, के.डी.'मूनिस' युवा शायर अवार्ड, निशान-ए-लतीफ़ अवार्ड, दलित साहित्य अवार्ड, शान-ए-अदब अवार्ड, त्रिसुगन्धी अवार्ड, युवा रचनाकार सम्मान
निवास- के-851, कमला नेहरू नगर, जोधपुर (राजस्थान)
मोबाइल- 9829270098