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जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

डॉ० शैलेष गुप्त 'वीर' की ग़ज़लें

डॉ० शैलेष गुप्त 'वीर' की ग़ज़लें

शैलेष गुप्त 'वीर' हिन्दी की अनेक विधाओं के सिद्धहस्त कवि हैं। कई विधाओं में इन्हें महारत हासिल है। आपकी ग़ज़लें भी अच्छी, स्तरीय ग़ज़लें हैं, जो एक ओर शिल्प तथा भाषा में सधी हुई हैं, वहीं सामयिक कथ्य व सरोकार सम्पन्नता लिए हुए हैं। सीधी-सादी और चुटीली शैली इनकी ग़ज़लों को विशिष्टता प्रदान करती है। ये ग़ज़लें आम-जीवन और आम-आदमी के परिवेश की ग़ज़लें हैं।

ग़ज़ल- 01

मन में बोझ लिये बैठा हूँ
सारा ज़ह्र पिये बैठा हूँ

थोड़ी-सी ही उम्र बहुत है
सदियाँ कई जिये बैठा हूँ

पाप नहीं मिट पाये अब तक
यूँ तो होम किये बैठा हूँ

बची रहे मर्यादा तेरी
अपने होंठ सिये बैठा हूँ

ढूँढ़ रहा हूँ प्यार अभी तक
चौवन इश्क़ किये बैठा हूँ

नहीं हुई सुनवाई अब तक
अर्ज़ी कई दिये बैठा हूँ

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ग़ज़ल- 02

ज़ख़्म पर ज़ख़्म खाए जाता है
फिर भी वो मुस्कुराए जाता है

नींद आती है सुनने वालों को
दास्तां वो सुनाए जाता है

आँख से जारी है लहू उसकी
चोट पर चोट खाए जाता है

ज़द में आ सकता है मकां उसका
वो घरों को जलाए जाता है

मुब्तिला है जुनूँ में क्यूँ इंसां
ख़ून अपना बहाए जाता है

जाने क्या हो गया है 'वीर' उसे
ख़ुद को सहरा बनाए जाता है

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ग़ज़ल- 03

आदमी ही आदमी को खा रहा है देखिए
अपनी इज़्ज़त के महल ख़ुद ढा रहा है देखिए

बेवफ़ाई देखिए उस शोख़ नाहंजार की
ग़ैर के हमराह अब वो जा रहा है देखिए

छीन के दौलत ग़रीबों से यक़ीनन दोस्तो
देश का नेता यूँ काजू खा रहा है देखिए

याद बनकर रह गये मासूम बचपन के वो दिन
कितनी जल्दी वक़्त भागा जा रहा है देखिए

मेरी नज़रों में यक़ीनन 'वीर' हो सकता है वो
सब्र की ताक़त को जो अपना रहा है देखिए

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ग़ज़ल- 04

झूठी आशा, झूठी चाहत, झूठे रिश्ते
कैसी है ये दुनिया, आख़िर कैसे रिश्ते

रूह की कोई प्यास बुझाने कब आया
चारों और हैं जज़्बों के बस अंधे रिश्ते

अपनी ज़ात की अंधी दिशा में ढूँढ़ रहा हूँ
बरसों से इस धरती पर मैं सच्चे रिश्ते

पल दो पल भी ख़ुशबू के मौसम न आये
हर जानिब ही फैले हैं ये ग़म के रिश्ते

अंधी गुफा में रहकर ही ख़ुश रहता हूँ मैं
डसते हैं दुनिया के ये उजियारे रिश्ते

जाने कैसी खाद है डाली इस बगिया में
फूलों से बन बैठे हैं अंगारे रिश्ते

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ग़ज़ल- 05

वो शाहे-ऐवान नहीं है
जोगी है, सुल्तान नहीं है

सब कहते हैं पागल जिसको
इतना भी नादान नहीं है

मेरा उसका मिलना-जुलना
मुश्किल है, आसान नहीं है

कोशिश ही कर सकता है वो
इन्सां है, भगवान नहीं है

सोच-समझकर लेना यारो
कर्ज़ा है यह, दान नहीं है

सबकी इज़्ज़त करना सीखो
अब कोई दरबान नहीं है

बंगला, गाड़ी, नौकर, पैसा
सब कुछ है, सम्मान नहीं है

वह माना तो ठीक है, वरना
'वीर' मेरा नुक़सान नहीं है

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ग़ज़ल- 06

कोस-कोस सरकार को कोस
महँगाई की मार को कोस

चुनकर नेता किसने भेजा
संसद की तकरार को कोस

लूट-डकैती-हत्या-चोरी
लोकतंत्र की धार को कोस

कहीं अय्याशी, कहीं ग़रीबी
जी भर पालनहार को कोस

नाव डुबो दी रामलाल ने
नाविक की पतवार को कोस

कंधे ढीले पहले से थे
उम्मीदों के भार को कोस

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ग़ज़ल- 07

बात-बात में दंगा है
मौसम रंग-बिरंगा है

बेटे जबसे एक हुए
अम्मा का मन चंगा है

कूड़ा-करकट फेंक रहे
मोक्षदायिनी गंगा है

मत उसको समझाओ तुम
बिना वजह फिर पंगा है

मालिक की नज़रों में तो
रामू कीट-पतंगा है

युग बीते सदियाँ बीतीं
आदम अब भी नंगा है

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ग़ज़ल- 08

सच को सच ही कहना होगा
वरना चुप ही रहना होगा

छेद करोगे ख़ुद छप्पर पर
अपने को ही ढहना होगा

जीना है जब मुर्दा बनकर
धारा में ही बहना होगा

क़िस्मत कहते हो शोषण को
उत्पीड़न ही सहना होगा

फूँक दिया है शंख समर का
दुश्मन को ही गहना होगा

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ग़ज़ल- 09

अम्बर तबसे लाल गुलाबी
देखे जबसे गाल गुलाबी

दिन में देखूँ स्वप्न हजारों
फेंका उसने जाल गुलाबी

लगती है फूलों की घाटी
ओढ़े जब-जब शाल गुलाबी

दो बातें की हँसकर उसने
अपना सारा हाल गुलाबी

पानी में थी सूरत नाज़ुक
मैंने देखा ताल गुलाबी

ख़त्म दिसम्बर कल-परसों से
आने वाला साल गुलाबी

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ग़ज़ल- 10

बातें उसकी जादू-टोना
पागल दिल का कोना-कोना

देता राहत अन्तर्मन को
उसके रूप-भँवर में खोना

झूठी लगती दुनियादारी
अच्छा लगता उसका होना

जब-जब झाँका उसके मन में
मन था उसका सच्चा सोना

मिलकर उसके साथ दुखों को
सीख लिया कंधों ने ढोना

जब मझदारों में फँस जाता
बोले हरदम तुम मत रोना

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रचनाकार परिचय

शैलेष गुप्त 'वीर'

ईमेल : veershailesh@gmail.com

निवास : फ़तेहपुर (उत्तर प्रदेश)

नाम- डॉ० शैलेष गुप्त 'वीर'
जन्मतिथि-  18 जनवरी, 1981
जन्मस्थान-  ग्राम- जमेनी, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
 
शिक्षा- परास्नातक (प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विज्ञान), पी-एच.डी. (पुरातत्व विज्ञान), यूजीसी-नेट, एम.जे.एम.सी., बी.एड., डिप्लोमा इन रसियन लैंग्वेज़, डिप्लोमा इन उर्दू लैंग्वेज़, ओरियन्टेशन कोर्स इन म्यूज़ियोलॉजी एण्ड कन्ज़र्वेशन।
सम्प्रति- उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन शिक्षण-कार्य और क्षणिकाकार एवं माइक्रोपोएट्री कॉस्मॉस का अव्यावसायिक संपादन।
 
प्रकाशन/संपादन-  बिन्दु में सिन्धु, उन पलों में, शब्द-शब्द क्षणबोध, आर-पार, कई फूल - कई रंग, बार्ड्स ऑफ इलूमिनेश्‌न्‌स, कविता दस्तावेज़ है, डॉ. मिथिलेश दीक्षित का क्षणिका-साहित्य, रघुविन्द्र यादव का दोहा-साहित्य, फतेहपुर जनपद के हाइकुकार, व्यंग्य-क्षणिका के पुरोधा : डॉ. परमेश्वर गोयल उर्फ काका बिहारी, डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के सौ शेर, नयी सदी के दोहे, समकालीन दोहा, क्षणिका काव्य के हस्ताक्षर, इस दुनिया में तीसरी दुनिया, दि अण्डरलाइन क्षणिका विशेषांक, अचिन्त साहित्य दीपावली क्षणिका विशेषांक तथा अन्वेषी के कई वार्षिकांक।
 
अनुवाद-  अनेक यूरोपीय एवं एशियाई भाषाओं यथा ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन, चाइनीज, स्पेनिश, अज़रबैजानी, पुर्तगीज, इटैलियन, अल्बानियन, अरेबिक, सर्बियन, क्रोशियन, नेपाली, पंजाबी तथा असमिया आदि में कविताओं का अनुवाद। 
 
प्रसारण-  द डियर जाॅन शो, वारिंगटन, इंग्लैंड में कविता का प्रसारण और स्टोरीफेस्ट 2023, मैक्सिको-ग्रीस-रसिया में लघुकथा का प्रसारण।
विशेष : विभिन्न पत्रिकाओं यथा अन्वेषी, गुफ़्तगू, अनुनाद, अरण्य वाणी, तख़्तोताज, मौसम, शब्द-गंगा आदि के लिए पूर्व/वर्तमान में संपादन, सहसंपादन एवं कार्यकारी संपादन। हिन्दी, अंग्रेज़ी तथा उर्दू की देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं-वेबपत्रिकाओं आदि में और विविध संकलनों में पद्य एवं गद्य की विभिन्न विधाओं में रचनाएँ प्रकाशित। हिन्दी और अंग्रेज़ी की दो सौ से अधिक पुस्तकों के लिये भूमिका/विमर्श/समीक्षा/आलोचना आदि प्रकाशित। एसोसियेट एडिटर- द वायस ऑफ क्रियेटिव रिसर्च, ई-जर्नल। लघुकथा 'छंगू भाई' पर इसी नाम से लघु फ़िल्म का निर्माण।
 
सम्मान/पुरस्कार-  बेकल उत्साही सम्मान 2017, साहिर लुधियानवी सम्मान 2021, प्रदेश गौरव सम्मान 2023, टीवी प्रोग्राम यू एण्ड लिटरेचर टूडे, नाइजीरिया द्वारा लिटरेरी आइकॉन 2018, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत सम्मान 2019, अकबर इलाहाबादी स्मृति सम्मान 2021, साहित्य श्री सम्मान 2022, काव्यांजलि एवार्ड 2012 तथा सृजनशीलता सम्मान 2017 सहित कुछ अन्य सम्मान।
 
सम्पर्क- 18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005