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स्वाधीनता संग्राम और 'चाँद' का ऐतिहासिक 'फाँसी अंक'- डॉ० मुकेश कुमार

स्वाधीनता संग्राम और 'चाँद' का ऐतिहासिक 'फाँसी अंक'- डॉ० मुकेश कुमार

फाँसी अंक केवल एक पत्रिका का विशेषांक मात्र नहीं था, यह औपनिवेशिक दमन-चक्र के विरुद्ध हिंदी पत्रकारिता का एक अभूतपूर्व बौद्धिक प्रतिरोध था। इसने पत्रकारिता के नैतिक उत्तरदायित्व को रेखांकित करते हुए यह दिखाया कि जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कठोर पहरे लगे हों, तब भी सत्य और राष्ट्रधर्म की स्थापना के लिए क़लम को माध्यम बनाया जा सकता है।

- इसी लेख से

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राष्ट्रीय चेतना के जागरण और ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध वैचारिक क्रांति के प्रसार में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका अत्यंत निर्णायक रही है। बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में जहाँ एक ओर हिंदी पत्रकारिता समाज सुधार और स्वदेशी आंदोलन को गति दे रही थी, वहीं दूसरी ओर इसने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को वैचारिक आधार और जन-समर्थन प्रदान करने का अभूतपूर्व कार्य किया। इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) से नवंबर 1922 में रामरख सहाय सहगल द्वारा प्रारंभ की गई मासिक पत्रिका 'चाँद' हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई। यद्यपि 'चाँद' का प्राथमिक
ध्येय सामाजिक चेतना और नारी विमर्श को बढ़ावा देना था, किंतु 1920 के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के भीषण दमन और क्रांतिकारियों के बलिदान ने पत्रिका के रुख को तीव्र रूप से स्वाधीनता संग्राम की ओर मोड़ दिया। इसका चरमोत्कर्ष नवंबर 1928 में प्रकाशित 'चाँद' के ऐतिहासिक 'फाँसी अंक' के रूप में सामने आया, जिसने न केवल तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में साहसिकता और स्वाभिमान का एक अमर अध्याय भी लिख दिया। इस अंक के मुखपृष्ठ पर अंग्रेजी में अंकित था, देखिए-
"Highly appreciated and recommended for use in Schools and Libraries by Directors of Public Instruction, Punjab, Central Provinces and Berar, United Provinces and Kashmir State etc, etc."

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपने ये शब्द फाँसी ऐतिहासिक अंक में कहे हैं, जो इस प्रकार से हैं- "प्यारी बहिनों माताओ, भाइयो और बुजुर्गो, ‘फाँसी अंक’ को दिवाली की अमावस्या समझिए! देखिए, इसमें बीसवीं शताब्दी के हुतात्मा के दिए कैसे टिमटिमा रहे हैं, और देखिए, स्थान-स्थान पर कैसी ज्वलंत अग्नि धांय-धांय कर जल रही है, और सबके बीच में जाग्रत-ज्योति-मृत्यु-सुंदरी, कैसा श्रृंगार किए छम-छम कर नाच रही है? पूजो! भाग्यहीन भारत के राजपाट, अधिकार-सत्ता और शक्तिहीन नर-नारियो, यही तुम्हारी गृहलक्ष्मी है, यही मृत्यु-सुंदरी, यही अक्षय-यौवना, यही महा महिमामयी, महामाया। तुम इसे प्यार करो, इससे परिचय प्राप्त करो, इसे वरो, तब तुम देखोगे कि क्यों ही यह तुम्हारे गले का फंदा होने के स्थान पर हृदय का हारा बनेगी, तुम्हारी सहस्रों वर्ष की गुलामी दूर हो जायगी? जैसे प्रबल रासायनिक के हाथ में आकर काल-कूट विष अमृत के समान प्रभावकारी हो जाता है, उसी प्रकार यह गले का फंदा बहिनों का सौभाग्य-सिंदूर और भाइयों की कुमकुम की पिचकारी बनेगी। ओह! उस फाग का उल्लास कब भारत की 22 करोड़ गोपियों को नसीब होगा। यह अक्षय-सुंदरी को राधा-पद देकर कब वह कृष्ण-मूर्त्ति स्फूर्ति की बंशी बजावेगी? कब? कब?? कब???

निकट ही वह दिन है। कुछ मास व कुछ वर्ष व्यतीत होने दो- एक महान विप्लव की ऑंधी सांय--सांय करती चली आ रही है, जो पचासों वर्ष तक भारत को दिवाली के दिए न जलाने देगी, परन्तु उसके बाद जो दिए जलेंगे, वे क्षुद्र मिट्टी के टिमटिमाते दिए न होंगे- वे होंगे रक्तदीप, और उन्हें साक्षात राज्य-लक्ष्मी अपने हाथों से जलावेगी।

​तब तक बहिनो और भाइयो! इस शुभ दिन में इस वीर-गम्भीर मृत्यु-बाणों से क्रीड़ा करो! जिन्हें साहस हो, वे अभ्यास करें, जिन्हें न हो वे देखें। उदीयमान जातियाँ विशेष अवसरों पर विनोद नहीं करतीं, वेदना-स्थलों की ऑंच किया करती हैं। भारत के विनोद और उल्लास के दिन नहीं, भारत के दिन मृत्यु-बाढ़ के अध्ययन करने के हैं। भारत को निकट भविष्य में उसकी परीक्षा में उत्तीर्ण होना है, और बहिन और भाई को ‘मृत्युंजय’ की उपाधि प्राप्त करना है। ‘चाँद’ इस अंक के रूप में उस परीक्षा की प्रथम पुस्तक अपनी बहिनों और भाइयों के हाथ में भेंट करता है।"
(चाँद के ऐतिहासिक फाँसी अंक की भूमिका)

उपर्युक्त शब्द ‘चाँद’ के संपादक श्री चतुरसेन शास्त्री ने ‘चाँद’ के सुप्रसिद्ध ‘फाँसी अंक’ में कहे थे। यह नवम्बर, 1928 में दीपावली के अवसर पर प्रकाशित हुआ था और 'चाँद' के सातवें वर्ष का प्रथम अंक था। मैं अपनी ‘विनयांंजलि’ के रूप में पाठकों से निवेदन करते हुए लिखता हूँ कि ‘चाँद’ संपादक ने दीपावली के प्रकाश को गुलामी के अंधकार से श्रेयस्कर न मानकर, दिन के अमावस्या के अंधकार की गुलामी के अंधकार से तुलना करके देश के जीवन पर जो ब्रिटिश सरकार की काली छाया पड़ रही थी, उस पर बड़े साहस और निर्भीकता के साथ पाठकों से कुछ निवेदन किया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘चाँद’ का फाँसी अंक प्रकाशन-दिवस से एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ ही था और उसकी ख्याति भी सम्पूर्ण हिन्दी-जगत में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में बड़ी तीव्रता के साथ हुई थी। ‘चाँद’ के ‘फाँसी अंक’ में जो सामग्री प्रकाशित की गयी थी, वह अत्यंत मूल्यवान थी। फाँसी को एक क्रूर कर्म मानते हुए इस समाज को अमानवीय और असभ्य राज-संस्कारों से जोड़ा गया था। ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ इसमें खुला विद्रोह और बग़ावत की बात भले ही न कही गयी हो, परन्तु इस सवा तीन सौ पृष्ठों के अंक में जो सामग्री संकलित की गयी है तथा देश और विदेशों से अनेक प्रामाणिक, ऐतिहासिक और मार्मिक सामग्री प्रकाशित की गयी है, वह प्रकारान्तर से विद्रोह और बग़ावत को बढ़ाने वाली है, और इसलिए ब्रिटिश सरकार ने 'चाँद' के इस अंक को ज़ब्त कर लिया था।

शायद सुनने में आपको थोड़ा आश्चर्य होगा, पर 'चाँद' पत्रिका के 'फाँसी' अंक के संपादक आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने यह बात लिखी है। अगर यह सच है तो चाँद हिंदी की अब तक सबसे अधिक बिकने वाली साहित्यिक पत्रिका थी, क्योंकि उस ज़माने मे चाहे सरस्वती हो, प्रताप हो या हंस, माधुरी या मतवाला कोई पत्रिका दस बीस हज़ार से अधिक नहीं बिकती थी। 1930 में देश में साक्षरता भी बहुत कम थी और आबादी भी कम थी। इस दृष्टि से चाँद का 2 लाख पाठक होना बड़ी बात है, क्योंकि आज भी किसी पत्रिका के इतने पाठक नहीं। देखिए, वे लिखते हैं कि- "सेवक की क़लम और मस्तिष्क ने विश्राम नहीं लिया, वह केवल इसी आशा के डोरे के सहारे अपनी समस्त वेदनाएँ, कठिनाइयाँ और विकलताएँ भूलकर, उल्लसित होना चाहता है; वह अकेला प्राण इतना छटपटा कर 'चाँद' के 2 लाख पाठक-पाठिकाओं को एक मनन करने योग्य-कम से कम एक वर्ष तक न भूलने योग्य- बिलकुल अद्भुत और नवीन विषय प्रदान कर रहा है। और वह यह भी आशा करता है कि 'चाँद' ने प्रयास के साथ जिस आन्दोलन की नींव डाली है, वह तब तक समाप्त न होगा, जब तक भारत से इस कलङ्कित दृश्य को न उठा देगा!!"

'फाँसी अंक' के प्रकाशन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इसका सीधा संबंध 1925 के काकोरी ट्रेन एक्शन और उसके पश्चात् 1927 में क्रांतिकारियों को दी गई फाँसी की सज़ाओं से था। रामप्रसाद 'बिस्मिल', अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को दिसंबर 1927 में ब्रिटिश सरकार द्वारा फाँसी पर लटका दिया गया था। इन शहादतों ने समूचे देश को गहरे शोक और आक्रोश से भर दिया था।

"काकोरी ट्रेन एक्शन के क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी होने वाली थी, उससे पहले उनके परिवार वाले उनसे मिलने पहुँचे तो उन्होंने कहा कि चिंता मत करना, भगवान को अपने सभी पुत्रों का ध्यान है। फाँसी अंक में इस बात का ज़िक्र है कि 19 दिसंबर, 1927 को जिस दिन रोशन सिंह को फाँसी होनी थी, उन्होंने सुबह उठकर स्नान किया और साफ़ कपड़े पहनकर मूंछों पर ताव देकर निकले। उनके स्वागत के लिए लोग इलाहाबाद में जेल के बाहर पहुँच गए। इस अंक में लिखा गया है कि कुछ देर बाद जेल के अंदर से गाने की आवाज़ सुनाई दी। सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। गाना समाप्त होने पर वंदेमातरम की आधी आवाज़ आकर रह गई। जेल के बाहर खड़े लोगों ने कहा- "फाँसी हो गई।" (चाँद पत्रिका, ऐतिहासिक फाँसी अंक, पृष्ठ- 321)
रामप्रसाद बिस्मिल के बारे में ऐतिहासिक फाँसी अंक में लिखा है कि- "एक दिन 9 अगस्त, सन् 1925 ई० को संध्या के आठ बजे 8 नम्बर की गाड़ी हरदोई से लखनऊ जा रही थी। एकाएक काकोरी तथा आलमनगर के बीच 52 नम्बर के खम्भे के पास गाड़ी खड़ी हो गई। कुछ लोगों ने पुकार कर मुसाफ़िरों से कह दिया कि हम केवल सरकारी ख़ज़ाना लूटने ही आए हैं। गार्ड से चाभी लेकर तिजोरी बाहर निकाली गई। इसी बीच में एक व्यक्ति नीचे उतरा और गोली से घायल होकर गिर गया। लगभग पौन घण्टा के बाद लूटने वाले चले गए। इस बार क़रीब दस हज़ार रुपया इन लोगों के हाथ लगा। 1926 सितम्बर से गिरफ़्तारियाँ आरम्भ हो गईं और उसी में हमारे नायक भी पकड़े गए। डेढ़ साल तक अभियोग चलने के बाद आपको फाँसी की सज़ा हुई। बहुत कुछ प्रयत्न किया गया, किन्तु फाँसी की सज़ा कम न हुई और 19 दिसम्बर, सन् 1927 ई० को गोरखपुर में आपको फाँसी की रस्सी से लटका दिया गया।

​इन पंक्तियों के लेखक ने उन्हें प्रथम तथा अन्तिम बार मृत्यु के केवल एक दिन पहले फाँसी की कोठरी में देखा था और उनका यह सब हाल जाना था। उस सौम्य-मूर्ति की वह मस्तानी अदा आज भी भूली नहीं है। जब कभी किसी को उनका नाम लेते सुनता हूँ तो एकदम उस प्यारे का वही स्वरूप आँखों के सामने नाचने लगता है। लोगों को उन्हें गालियाँ देते देख, हृदय कह उठता है- "क्या वह डाकू का स्वरूप था?" अन्तस्तल में छिपकर न जाने कौन बार-बार यही प्रश्न करने लगता है- "क्या वे हत्यारे की आँखें थी?" भाई! दुनिया के सभ्य लोग कुछ भी क्यों न कहें, किन्तु मैं तो उसी दिन से उनका पुजारी हूँ।" ​उस दिन माँ को देखकर उस देशभक्त पुजारी की आँखों में आँसू आ गए। उस समय उस जननी ने हृदय को पत्थर से दबाकर जो उत्तर दिया था, वह भी भूला नहीं है। वह एक स्वर्गीय दृश्य था, और उसे देखकर जेल-कर्मचारी भी दंग रह गए थे। माता ने कहा- "मैं तो समझती थी, तुमने अपने पर विजय पाई है, किन्तु यहाँ तो तुम्हारी कुछ और ही दशा है। जीवन-पर्यन्त देश के लिए आँसू बहाकर अब अन्तिम समय तुम मेरे लिए रोने बैठे हो! इस कायरता से अब क्या होगा? तुम्हें वीर की भाँति हँसते हुए प्राण देते देखकर मैं अपने आपको धन्य समझूँगी। मुझे गर्व है कि इस गए-बीते ज़माने में मेरा पुत्र देश की वेदी पर प्राण दे रहा है। मेरा काम तुम्हें पालकर बड़ा करना था, इसके बाद तुम देश की चीज़ थे और उसी के काम आ गए। मुझे इसमें तनिक भी दुख नहीं है।" उत्तर में उसने कहा- "माँ! तुम तो मेरे हृदय को भली-भाँति जानती हो! क्या तुम समझती हो कि मैं तुम्हारे लिए रो रहा हूँ अथवा इसलिए रो रहा हूँ कि मुझे कल फाँसी हो जायगी? यदि ऐसा है तो मैं कहूँगा कि तुमने जननी होकर भी मुझे समझ न पाया, मुझे अपनी मृत्यु का तनिक भी दुख नहीं है। हाँ, यदि मोम को आग के पास लाया जायगा तो उसका पिघलना स्वाभाविक है। बस, उसी प्राकृतिक संबंध से दो-चार आँसू आ गए। आपको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु से बहुत सन्तुष्ट हूँ।"

​मैं एक ओर बैठकर विमुग्ध नेत्रों से उस छवि का स्वाद ले रहा था कि किसी ने कहा- "समय हो गया।" शहर आकर दूसरे दिन सुना कि उन्हें फाँसी दे दी गई। उसी समय यह भी सुना कि तख्ते पर खड़े होकर उस प्रेम-पुजारी ने अपने आपको शिवपुरी के चरणों में समर्पित करते हुए कहा था-

मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे।
बाक़ी न मैं रहूँ न मेरी आरज़ू रहे॥

​और अंत में यह कहते हुए-

​अब न पिघले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़,
एक मिट जाने की हसरत, बस दिले-बिस्मिल में है।

​वह वीर जहाँ से आया था, वहीं को चला गया।

इतिहासकार के० के० शर्मा (2012) अपने शोध ग्रंथ 'भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता' में उल्लेख करते हैं कि काकोरी के शहीदों की पावन स्मृति को भावी पीढ़ियों के लिए सहेजने तथा उनके क्रांतिकारी विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से 'चाँद' के संपादक रामरख सहाय सहगल और आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने एक विशेषांक निकालने की योजना बनाई। इस विशेषांक का उद्देश्य केवल एक शोक संदेश प्रस्तुत करना नहीं था, बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1928 तक स्वाधीनता की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले तमाम ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों के जीवन, उनके आदर्शों, अदालती बयानों और अंतिम संदेशों का एक प्रामाणिक एवं विस्तृत दस्तावेज़ तैयार करना था।

नवंबर 1928 में प्रकाशित 'चाँद' के इस 'फाँसी अंक' में कुल 323 पृष्ठों का एक विशालकाय और अमूल्य ऐतिहासिक ग्रंथ था। इसके संपादन का मुख्य दायित्व आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने निभाया, जबकि रामरख सहाय सहगल ने इसके प्रकाशन का अभूतपूर्व जोख़िम उठाया। इस अंक की प्रामाणिकता और विशिष्‍टता का सबसे मुख्य आधार यह था कि इसमें प्रकाशित सामग्री सीधे क्रांतिकारी आंदोलन के सक्रिय सदस्यों द्वारा एकत्र और हस्तलिखित रूप में उपलब्ध कराई गई थी। 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) के प्रमुख विचारकों और क्रांतिकारियों ने गुप्त रूप से इस अंक की सामग्री तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई। क्रांतिकारी वीर भगत सिंह, जो उस समय 'बलवंत सिंह' और 'विद्रोही' के छद्म नामों से लिखा करते थे, ने इस अंक के लिए दर्जनों क्रांतिकारियों के जीवन चरित्र लिखे और प्रामाणिक तथ्य जुटाए। शिव वर्मा, यशपाल और मन्मथनाथ गुप्त जैसे क्रांतिकारियों ने भी जेल की सलाखों के पीछे से और भूमिगत रहते हुए दुर्लभ तस्वीरें, अदालती दस्तावेज़ और क्रांतिकारियों के अंतिम पत्र संपादकीय टीम तक पहुँचाए। शिव वर्मा की आत्मकथा 'संस्मरण' (1984) के अनुसार, भगत सिंह ने स्वयं कानपुर के प्रताप प्रेस और कलकत्ता के अभिलेखागारों में घंटों समय बिताकर 1857 के विद्रोहियों और ग़दर आंदोलन के शहीदों की जानकारी एकत्र की थी।
​'फाँसी अंक' की संरचना और विषय-वस्तु का विश्लेषण करने पर इसकी शोधपरक और प्रामाणिक दृष्टि का परिचय मिलता है। इस ऐतिहासिक विशेषांक को विभिन्न चरणों में विभाजित किया गया था, जिसमें प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के अमर नायकों जैसे मंगल पांडे, तात्या टोपे, महारानी लक्ष्मीबाई के साथियों से लेकर कुका आंदोलन, चापेकर बंधुओं, अनुशीलन समिति, युगांतर, ग़दर पार्टी के मदनलाल ढींगरा, अशफ़ाक उल्ला खां, करतार सिंह सराभा तथा काकोरी कांड के नायकों के बलिदानी वृत्तांत शामिल थे। इसमें क्रांतिकारियों के मुकदमे की कार्यवाहियाँ, न्यायाधीशों के पक्षपाती फैसले और क्रांतिकारियों द्वारा अपनी मातृभूमि के लिए दिए गए निर्भीक बयानों को हु-ब-हू छापा गया था।

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा का कुछ अंश तथा अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का अंतिम संदेश, जो उन्होंने फाँसी के फंदे को चूमने से पूर्व देशवासियों के नाम लिखा था, इस अंक के सबसे भावुक और प्रेरणादायी पृष्ठ थे। जो इस प्रकार से हैं- "फाँसी वाले दिन सोमवार 19 दिसंबर 1927 को अशफ़ाक़ हमेशा की तरह सुबह उठे, शौच आदि से निवृत्त हो स्नान किया। कुछ देर वज्रासन में बैठ कुरान की आयतों को पढ़ा और किताब बंद करके उसे आँखों से चूमा, फिर अपने आप जाकर फाँसी के तख्ते के पास गए और तख्ते को चुंबन दिया और उपस्थित जनता से कहा- "मेरे ये हाथ इंसान के खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्ज़ाम लगाया गया, वह ग़लत है, ख़ुदा के यहाँ मेरा इंसाफ़ होगा।" फिर अपने आप ही फंदा गले में डाल लिया और ख़ुदा का नाम लेते हुए वे दुनिया से कूच कर गए। उन्होंने मरने से पहले एक शेर पढ़ा था-

​तंग आकर हम भी उनके ज़ुल्म के बेदाग़ से
चल दिए सू-ए-अदम ज़िंदान-ए-फ़ैज़ाबाद से

"असफाकउल्लाह के हृदय में धर्मान्धता लेशमात्र के लिए भी न थी। उनके निकट मंदिर तथा मस्जिद में कोई भेद-भाव न था। उस दिन जब शाहजहांपुर में मुसलमानों में झगड़ा हो रहा था तो आप मंदिर में बिस्मिल जी के पास बैठे थे। मुसलमान के एक दल को समाज-मंदिर पर हमला करने आते देख, आप पिस्तौल लेकर बाहर आ गये और कहा- "मुसलमानो, मैं एक कट्टर मुसलमान हूँ, किंतु फिर भी मुझे इस मंदिर की एक ईंट प्राणों से अधिक प्यारी है। मेरे निकट इसमें तथा मस्जिद में भेद-भाव नहीं है। यदि तुम्हें मज़हब के नाम पर झगड़ा ही करना है, तो बाज़ार में जाकर लड़ो। यदि किसी ने भी इस पवित्र स्थान की ओर आँख उठाई तो गोली का निशाना बनेगा।"
('चाँद' पत्रिका, ऐतिहासिक फाँसी अंक, पृष्ठ 322-323)

'चाँद' पत्रिका के ऐतिहासिक फाँसी अंक में अशफ़ाक उल्ला खां का छायाचित्र लगा हुआ है, उसके नीचे उर्दू में लिखा है-

वतन हमेशा रहे शादकाम और आज़ाद
हमारा क्या है अगर हम रहे न रहे

हिंदी तथा मराठी भाषा अच्छी तरह जानते थे। उसी के समाचार-पत्र पढ़ना और अपने में मस्त रहना उनका नित्य का प्रोग्राम हो गया। डेढ़ साल तक अभियोग चलने के बाद आपको फाँसी की सज़ा हुई। वकील ने कहा- "आपकी अपील कर दी गई।" उत्तर मिला- "कोई बात नहीं।"
सुपरिन्टेण्डेण्ट ने आकर कहा- "रोशनसिंह, तुम्हारी अपील ख़ारिज हो गई!" उस समय भी वही पूर्ववत् उत्तर मिला- "कोई बात नहीं।"
फाँसी के 5 दिन पहले परिवार वालों से मुलाक़ात की और उन्हें उत्साह देते हुए कहा- "तुम लोग मेरे लिए चिंता न करना। भगवान को अपने सभी पुत्रों पर दया है।" ('चाँद' पत्रिका, ऐतिहासिक फाँसी अंक, पृष्ठ- 321)

इसके अतिरिक्त, इस अंक में विश्व के अन्य देशों- जैसे आयरलैंड, रूस और इटली के क्रांतिकारी आंदोलनों और वहाँ के शहीदों का भी तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया था, जिससे यह सिद्ध होता है कि भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन कोई एकांकी घटना नहीं, बल्कि वैश्विक स्वतंत्रता संग्रामों की ही एक कड़ी था। ​ब्रिटिश औपनिवेशिक अभिलेखों (होम पॉलिटिकल फाइल संख्या 45/1928, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली) के अनुसार, 'चाँद' के 'फाँसी अंक' के बाज़ार में आते ही ब्रिटिश ख़ुफ़िया तंत्र और गृह विभाग में हड़कंप मच गया। पत्रिका की हज़ारों प्रतियाँ हाथों-हाथ बिक गईं और देश के कोने-कोने में इसकी माँग अचानक बढ़ गई। इसके पृष्ठों पर अंकित क्रांतिकारियों की तस्वीरें और उनके ज्वलंत विचार युवाओं के लिए देशभक्ति की अग्नि में आहुति देने का मंत्र बन गए। ब्रिटिश साम्राज्यवादी अधिकारियों ने इसे अत्यंत 'राजद्रोही', 'विद्रोह भड़काने वाला' और 'ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध असंतोष फैलाने वाला' साहित्य करार दिया। संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की तत्कालीन प्रांतीय सरकार ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 99-ए के तहत 'फाँसी अंक' को ज़ब्त करने का दंडात्मक आदेश पारित कर दिया। पुलिस ने 'चाँद' के इलाहाबाद स्थित कार्यालय, मुद्रणालय और देशभर के पुस्तक विक्रेताओं पर छापे मारकर इस विशेषांक की प्रतियों को ज़ब्त कर लिया और उन्हें आग के हवाले कर दिया।

गवर्नर-इन-काउंसिल के कड़े रुख के बावजूद, 'चाँद' का 'फाँसी अंक' जनमानस तक पहुँचने से पूरी तरह नहीं रोका जा सका। स्वाधीनता प्रेमियों और क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं ने इसकी प्रतियों को छिपाकर रखा, उनकी हस्तलिखित प्रतियाँ बनाईं और गुप्त रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया। इतिहासकार सुमित सरकार (1983) ने अपनी पुस्तक 'आधुनिक भारत' में उल्लेख किया है कि 'फाँसी अंक' पर लगे प्रतिबंध ने इसकी महत्ता और जन-प्रतिष्ठा को और अधिक बढ़ा दिया था। इस अंक ने भारतीय युवाओं के भीतर से ब्रिटिश दंड-व्यवस्था और फाँसी के फंदे का भय पूरी तरह समाप्त कर दिया। इसने यह साबित कर दिया कि क्रांतिकारी केवल हिंसक मार्ग अपनाने वाले युवक नहीं थे, बल्कि वे वैचारिक रूप से परिपक्व, दृष्टि संपन्न और मातृभूमि के प्रति पूर्ण समर्पित योद्धा थे।

​आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपनी आत्मकथा 'मेरी आत्मकहानी' (1963) में लिखा है कि 'फाँसी अंक' के संपादन और प्रकाशन के कारण संपादकीय मंडल को निरंतर पुलिस निगरानी, मुकदमों की धमकियों और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। संपादक रामरख सहाय सहगल को भारी वित्तीय क्षति उठानी पड़ी और प्रेस को सील किए जाने का ख़तरा उत्पन्न हो गया, किंतु उन्होंने किसी भी प्रकार के औपनिवेशिक दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया। 'फाँसी अंक' केवल एक पत्रिका का विशेषांक मात्र नहीं था, यह औपनिवेशिक दमन-चक्र के विरुद्ध हिंदी पत्रकारिता का एक अभूतपूर्व बौद्धिक प्रतिरोध था। इसने पत्रकारिता के नैतिक उत्तरदायित्व को रेखांकित करते हुए यह दिखाया कि जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कठोर पहरे लगे हों, तब भी सत्य और राष्ट्रधर्म की स्थापना के लिए क़लम को माध्यम बनाया जा सकता है।

​'फाँसी अंक' का ऐतिहासिक मूल्यांकन करते हुए यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इसने भारतीय स्वाधीनता संग्राम की धारा को एक नया मोड़ दिया। 1929 में लाहौर अधिवेशन के दौरान जब पूर्ण स्वराज का लक्ष्य निर्धारित किया गया, तब उस जन-आक्रोश और चेतना की पृष्ठभूमि तैयार करने में 'चाँद' के इस अंक का महत्त्वपूर्ण योगदान था। इसमें संकलित सामग्रियाँ आज भी इतिहास अनुसंधानकर्ताओं के लिए प्रामाणिक प्राथमिक स्रोतों के रूप में कार्य करती हैं। काकोरी के शहीदों और ग़दर आंदोलन के क्रांतिकारियों से संबंधित अनेक ऐसे तथ्य हैं, जो यदि 'चाँद' द्वारा सहेजे न गए होते, तो शायद इतिहास के पन्नों में सदा के लिए लुप्त हो जाते।

भारत की आजादी के इतिहास में 'चाँद' पत्रिका का 'फाँसी अंक' केवल कागज़ पर मुद्रित शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि क्रांति की ज्वाला में तपे हुए विचारों का एक महान ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। इसने भारतीय समाज को अपने नायकों के बलिदान का स्मरण कराया और औपनिवेशिक सत्ता के अन्यायी चेहरे को बे-नक़ाब किया। इस अंक ने पत्रकारिता को मात्र समाचार प्रदान करने का साधन न मानकर उसे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के एक शक्तिशाली हथियार के रूप में प्रतिस्थापित किया। इस ऐतिहासिक अंक ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम की धारा को एक नया मोड़ दिया तथा जन-जन के हृदय में आज़ादी की अदम्य ज्वाला प्रज्वलित की। आज भी यह विशेषांक भारतीय पत्रकारिता के साहस, प्रामाणिकता और अदम्य राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक बना हुआ है।

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रचनाकार परिचय

मुकेश कुमार

ईमेल : drmkhindi@gmail.com

निवास : करनाल (हरियाणा)

शिक्षा- बी० ए० (हिंदी ऑनर्स), एम० ए० (हिंदी व संस्कृत), एम० फिल, पी० एचडी
जन्मतिथि- 05 मई, 1988
सम्प्रति- हिंदी विभाग, चौधरी रणबीर सिंह यूनिवर्सिटी, जींद (हरियाणा), अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका 'संस्कार चेतना' में उप संपादक
प्रकाशित कृतियाँ- कर्ज से मुक्ति (कहानी संग्रह), धूप के बीच बारिश (काव्य संग्रह), अज्ञेय की प्रयोगधर्मिता, चमत्कार एकांकी संग्रह संवेदना और शिल्प, खड़ी बोली हिन्दी के उन्नायक महाकवि हरिऔध, आदिकाल अभिव्यक्ति और आयाम, ब्रह्मर्षि स्वामी योगश्वरानंद सरस्वती जीवन दर्शन तथा शोध प्रविधि पुस्तकें प्रकाशित।
संपादित कृतियाँ- हिंदी कविता राष्ट्रीय चेतना संस्कृति, लोक भाषाओं में रामकाव्य, काव्य संचयन निर्मला पुत्तुल, प्रतिनिधि कविताएँ निर्मला पुतुल
सम्मान/पुरस्कार-
हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला द्वारा 'राज्य स्तरीय पाठक शिरोमणि पुरस्कार'
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्र प्रस्तुत।
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय (यू०जी०सी० केयर) में तथा अन्य पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित।
स्थाई पता- ग्राम- हथलाना, पोस्ट- मंजूरा, ज़िला- करनाल (हरियाणा)- 132001
वर्तमान पता- ग्राम व पोस्ट ऑफिस- प्योंत, ज़िला- करनाल (हरियाणा)-132036
मोबाइल- 9896004680