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अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

अंजू केशव के दोहे

अंजू केशव के दोहे

प्रतिरोध का भाव लिए हुए अंजू केशव के ये दोहे अपने समय की अनेक विसंगतियों को उजागर करते हैं। इन कुछ दोहों में ही विभिन्न समकालीन विमर्श पूरी मुखरता के साथ दर्ज हो रहे हैं। रचनाकार इन दोहों के माध्यम से हमारे समय की विकृत तथा संकीर्ण सोच पर करारी चोट करती हैं।

- संपादक

कहा सिर्फ तहज़ीब में, ख़ुद को था नाचीज़।
लिया आपने मान ही, सच में हमें कनीज़।।

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सागर को कब चाहिए, था उनका सर्वस्व।
उसे दिखाना सिर्फ था, नदियों पर वर्चस्व।।

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अपने साथी पर मुझे, बेशक बहुत गुरूर।
पर मेरी पहचान है, नहीं सिर्फ सिंदूर।।

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दुनिया ने जितना मुझे, छाँटा कह गुस्ताख।
उतनी ही फूली फली, फिर से मेरी शाख।।

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सिर पर रक्खेगा अगर, कोई मेरे धूल।
कैसे कह देंगे उसे, हाँ है मुझे कबूल।।

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बाज़ारों से आज ये, ख़बर हो गई लीक।
आउटडेटेड जो हुआ, कहो उसे एंटीक।।

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बात-बात पर टूटता, है उसका सम्मान।
जाने कब से हो गया, शीशे का भगवान।।

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होना ही था आपका, निश्चित बेड़ा गर्क।
सत्ता से करने चले, आप महाशय तर्क।।

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जिनको बनना था कभी, नवभारत की सोच।
बेच रहे हैं आज वो, गुटका निःसंकोच।।

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सर पर मंडराता रहा, आरी का आतंक।
जंगल भी कितना सहे, रोज़ प्रगति का डंक।।

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रचनाकार परिचय

अंजू केशव

ईमेल : keshawanju@gmail.com

निवास : जमशेदपुर (झारखंड)

जन्मतिथि- 24 अप्रैल
जन्मस्थान- पटना (बिहार)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (हिंदी)
सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, कविता, कहानी, लघुकथा आदि
प्रकाशन- 'सन्नाटे में शोर बहुत है' (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं एवं साँझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्मान/पुरस्कार- सृजन साहित्य सम्मान, मैथिली शरण गुप्त सम्मान
पता- 40, पी०एस०, रो नं०- 3, संकोशाई, डिमना रोड, जमशेदपुर (झारखंड)- 831012
मोबाइल- 8210046398