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देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल- डॉ० मुकेश 'असीमित'

देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल- डॉ० मुकेश 'असीमित'

देवर्षि नारद ने इंद्र राजा के कटाक्ष को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा, "देवराज इंद्र! तुम अपने देवत्व पर जो फूल रहे हो न, तुम ही बताओ देवता, दानव और मानव में श्रेष्ठ कौन है?"

देवराज इंद्र की सभा लगी हुई थी। सभी देवगण एकत्रित हुए थे। सभी अपने देवत्व स्वरूप काया और इंद्रलोक की माया की चकाचौंध में फूले नहीं समा रहे थे कि तभी देवर्षि नारद आ धमके। दरअसल सभा में देवलोक का अमृतकाल महोत्सव चल रहा था। अप्सराएँ अपनी देव लुभावनी मुद्रा में नृत्य कर रही थीं। इंद्र राजा भी अमरबेल के अमर फूलों की वर्षा कर रहे थे। सोमरस की स्टॉल पर ऐसी भीड़ लगी हुई थी, जैसी मृत्युलोक में तंदूरी रोटी की स्टॉल पर लगती है! इस अमृतकाल के अमृत महोत्सव में आए इस अचानक व्यवधान से इंद्र राजा मन ही मन क्रोधित तो हुए, लेकिन बाहर अपनी कुटिल मुस्कान धारण किए बोले, "अहोभाग्य हमारे देवर्षि आप पधारे। आजकल तो आप मृत्युलोक में ज़्यादा विचरण करते हैं। देवलोक की तरफ आपका ध्यान ही नहीं! क्या चक्कर है, वहाँ कोई गठबंधन की सरकार में मंत्री पद का अवसर मिल गया क्या?"

देवर्षि नारद ने इंद्र राजा के कटाक्ष को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा, "देवराज इंद्र! तुम अपने देवत्व पर जो फूल रहे हो न, तुम ही बताओ देवता, दानव और मानव में श्रेष्ठ कौन है?" देवराज इन्द्र बोले- "आप भी नारद मुनि, अब हमारी श्रेष्ठता पर ही सवाल दागने लगे। आप मृत्युलोक में विरोधी पार्टी से मिलकर हमारा सिंहासन हिलाना चाहते है क्या?"

देवर्षि नारद ने कहा, "नहीं इंद्र, बिलकुल इस भुलावे में मत रहो। श्रेष्ठ तो मानव ही हैं। देखो, कैसे मानव ने अपना ख़ुद का संसार रच लिया है। उसे अब देवों की परवाह नहीं, दानवों की परवाह नहीं। वह ख़ुद ही अपने अवसरों के अनुसार दानव-देवता का रूप धारण कर सकता है। इतना चुटकी बजाते ही रूप बदलने की कला देवों और दानवों ने तो नहीं सिखाई, उसने ख़ुद ही ईजाद की है। हम देवताओं ने तो हमेशा मानव को देव कोप की धमकी देकर उसे नियंत्रण में रखने का प्रयास किया। हमने उसके साथ जुड़ी सभी दैहिक-भौतिक चीज़ों को देव स्वरूप बताकर उसे इनका सम्मान करने और इन्हें देव स्वरूप में पूजने का आदेश दिया था। जहाँ पहले हम आकाशवाणी करके उसे जब मन चाहे तब देव प्रकोप का भय दिखाते रहते थे ताकि वह मनमानी न कर सके, लेकिन अब देखो, उसने ख़ुद के सैटेलाइट लगा लिए। मनुष्य ही दूसरे मनुष्य को अपने भाषणों, प्रवचनों, घोषणाओं से अपनी बात मनवाने की चेष्टा कर रहा है। भड़काऊ भाषणों, धार्मिक प्रवचनों से घोले गये ज़हर से पलभर में समाज में मार-काट मचा सकता है, भाई-भाई को लड़वा सकता है, धार्मिक उन्माद का तूफ़ान खडा कर सकता है।

मानव, देवता और दानवों से तब तक कमज़ोर था, जब तक उसमें मानवता भरी हुई थी। मानवता के चलते वह अपने आपकी महत्त्वाकांक्षाओं को सीमित रखता था, पर-पीड़ा को समझता था, दूसरों के हित की सोचता था, करूणामय भाव रखता था। लेकिन ये भाव उसे देवों के समकक्ष बना देते थे। वह तो देवों से ऊपर उठना चाहता था, तो 'ना बजेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी' की तर्ज पर उसने मानवता ही छोड़ दी। जैसे ही उसने मानवता छोड़ी, मानव को लगा कि उसमें और जानवरों में कोई भेद नहीं रहना चाहिए, इसलिए वह जानवर बन गया, उसने पशुत्व धारण कर लिया। अब मानव पशुत्व का भेषधारण कर नारी की अस्मिता पर धावा बोल सकता है, भाई-भाई का गला काट सकता है, धर्म-राजनीति के नाम पर दंगे-फसाद करवा सकता है, मार-काट मचा सकता है। ये सब चुटकियों का काम हो गया है।

मानव निर्माण करते वक्त ब्रह्माजी से एक भूल हो गयी थी। उन्होंने मानवता का कोई स्वरूप नहीं दिया, इसलिए मानवताविहीन मानव भी बिल्कुल मानवता धारण किए हुए मानव जैसे नज़र आ रहे हैं और इसी का फ़ायदा उठाकर लोग अपने कुकर्मों को अंजाम दे रहे हैं। जब से मानवताविहीन मानव हुआ है, तबसे मानव आपदा में भी अवसर ढूँढने लगा है। कोरोना काल में तो यह उच्चतम स्वरुप में दिखाई दी थी! देवर्षि नारद ने अपनी वाणी को थोड़ा विराम दिया। पास ही रखा पानी का गिलास गटका और फिर शुरू हो गये। "हम ये कह सकते है कि ऐसे कुछ काल आते हैं, जब मानव अपने इस मानवताविहीन रूप का ट्रायल लेता है। अब जहाँ भी एक्सीडेंट, बाढ़, भूकंप, बिजली के करंट आदि से लोग मर रहे होते हैं, सबसे पहले उसका विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं ताकि ढेरों लाइक्स-कमेंट्स रूपी धन संचय कर सकें। जहाँ पहले राम-नाम की लूट थी, वहाँ अब लाइक-कमेंट्स की लूट का बोलबाला है और लोग इसी धन के ज़रिए अपना लोक-परलोक दोनों सुधारना चाहते हैं। पत्रकार भी अपनी ब्रेकिंग न्यूज़ 'मानवता हुई शर्मसार' के लिए ऐसी जगह पहुँचने को तत्पर रहता है, जहाँ मानवता तार-तार हो रही है ताकि लोगों को बता सके कि मानवता कैसे तार-तार होती है। लोग भी लाइव डेमो के ज़रिए लेसन सीख रहे हैं और प्रयोग के तौर पर मौक़ा आने पर ख़ुद इसे आज़मा रहे हैं। अब कोई रिश्ते-नातों की परवाह नहीं करता। समाज की परवाह नहीं करता। तुच्छ स्वार्थ के चलते बस अपने हित के बारे में सोच रहा है। उसे देवों की परवाह नहीं, दानवों की परवाह नहीं, मौत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती क्योंकि जब मानवता ही नहीं रही तो डर किस बात का। कोई करुणा नहीं रही। उसे राह चलते दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की तड़प में भी करुणा का भाव नहीं दिखता। बेटा अपनी मरी हुई माँ को कंधा देने से पहले वसीयत पर माँ के अंगूठे का हस्ताक्षर करना नहीं भूलता। लोग लाशों की चिता पर अपने हाथ सेंक रहे हैं, उसे ही कैंप फायर की अग्नि समझकर जश्न मना रहे हैं।

कुल मिलाकर इंद्र राजा, तुम अपने देवत्व पर फूल रहे हो न! कभी अपने सिंहासन से उठकर नीचे मृत्युलोक में जाओ और देखो मानव की तरक्की कि वह कहाँ से कहाँ पहुँच गया। यह युग वास्तव में मृत्युलोक का अमृतकाल है, जहाँ मानवता चंद सिक्कों की ख़ातिर अपनी नग्नता के प्रदर्शन के साथ अमृत महोत्सव मना रही है। इसके आगे आपका यह अमृत महोत्सव एकदम फीका नज़र आ रहा है।

इंद्र राजा को लगा कि उनका सिंहासन डोलने वाला है। इस तरह तो यह मानव एक दिन उसकी कुर्सी हथिया लेगा। तभी इंद्र राजा ने घोषणा की, "नाच-गान बंद करो, सभी ब्रह्माजी के पास जाकर इसका समाधान ढूंढें कि कैसे मानव में मानवता का सॉफ़्टवेयर वापस इंस्टॉल कर सकें।"

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Divakar Pandey

10 October 2025

बढ़िया व्यंग्य

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रचनाकार परिचय

मुकेश 'असीमित'

ईमेल : drmukeshaseemit@gmail.com

निवास : गंगापुर सिटी (राजस्थान)

मूल नाम- डॉ० मुकेश गर्ग
संप्रति- अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन विधाएँ- कविताएँ, संस्मरण, लेख एवं व्यंग्य
प्रकाशन- 'नरेंद्र मोदी का निर्माण : चायवाला से चौकीदार तक'
काव्य कुम्भ एवं काव्य ग्रन्थ, भाग- प्रथम (साझा संकलन)
देश-विदेश के जाने-माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित
सम्मान/पुरस्कार- स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन अवार्ड
संपर्क- गर्ग हॉस्पिटल, स्टेशन रोड, गंगापुर सिटी (राजस्थान)- 322201