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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

'बारादरी' की महफ़िल में याद किए गये मशहूर शायर गोविंद गुलशन

'बारादरी' की महफ़िल में याद किए गये मशहूर शायर गोविंद गुलशन

नेहरू नगर स्थित सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में गोविंद गुलशन के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहले सत्र में उनके ताज़ा ग़ज़ल संग्रह 'कल न कल तो तेरे...' का लोकार्पण के साथ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हुई। दूसरे सत्र में लोगों ने कलाम के ज़रिए गुलशन जी के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया।

ग़ाज़ियाबाद। मशहूर शायर और 'बारादरी' के अध्यक्ष गोविंद गुलशन की स्मृति में आयोजित महफ़िले-बारादरी में देशभर के कवि और शायरों ने उनसे जुड़ी यादें और अनुभव साझा किये। इस अवसर पर उनके ताज़ा ग़ज़ल संग्रह 'कल न कल तो तेरे..' का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम अध्यक्ष सुरेंद्र सिंघल ने कहा कि एक तरफ अदब की दुनिया से जहाँ 'उस्ताद शागिर्द परंपरा' ख़त्म होती जा रही है, 'बारादरी' इस परंपरा के निर्वहन का बे-मिसाल उदाहरण है। जहाँ गोविंद गुलशन की सरपरस्ती में शायरों की एक सशक्त जमात सामने आयी है। देश के विख्यात शायर इकबाल अशहर ने कहा कि गोविंद गुलशन की 'बारादरी' को हरा-भरा रखना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

नेहरू नगर स्थित सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में गोविंद गुलशन के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहले सत्र में उनके ताज़ा ग़ज़ल संग्रह 'कल न कल तो तेरे...' का लोकार्पण के साथ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हुई। दूसरे सत्र में लोगों ने कलाम के ज़रिए गुलशन जी के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया। संस्था की संस्थापक अध्यक्ष डॉ० माला कपूर 'गौहर' ने कहा कि बारादरी गुलशन जी की वह बगिया है, जिसकी ख़ुशबू से आज पूरा देश महक रहा है। उन्होंने कहा कि ग़ज़ल लेखन के क्षेत्र में वह एक मोती जैसी थी, जिसे निखारकर गुलशन जी ने 'गौहर' बना दिया। उन्होंने अपनी पंक्तियों-

इतना मशहूर कर दिया हमको
ख़ुद से ही दूर कर दिया हमको

बोझ ग़म का उठाए फिरते हैं
कैसा मज़दूर कर दिया हमको

सुरेंद्र सिंघल ने अपनी भावनाएँ अपनी नज़्म की इन पंक्तियों के ज़रिए व्यक्त कीं-

तेरी आँखों को सुन रहा हूँ मैं
दिख रही है मुझे तेरी आवाज़

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स्वाद लेता हूँ तेरी ख़ुशबू का
तेरी आहट को सूंघ लेता हूँ
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तुझ में खो जाता हूँ कुछ ऐसे मैं
ढूँढना  पड़ता  है मुझे ख़ुद को

कार्यक्रम में विशेष रूप से आये मशहूर शायर इकबाल अशहर ने अपने इन अशआर के ज़रिए अपनी भावनाएँ व्यक्त की-

अलग ना होंगे ये किरदार दास्तां से कभी
अज़ीम  लोग  गुज़रते  नहीं जहाँ से कभी

चमकने लगते हैं आँखों में आँसुओं की तरह
सितारे  टूट  भी  जाएँ  जो आसमां से कभी

मैं तेरी ख़ूबियाँ लफ्जों में किस तरह ढालूँ
ये हक़ अदा नहीं होता मेरे बयां से कभी

बिछड़ने  वालों  में उसका शुमार कैसे हो
वह आदमी तो गया ही नहीं यहाँ से कभी

संस्था की संरक्षिका डॉ० उर्वशी अग्रवाल 'उर्वी' ने कहा कि 'बारादरी' के रूप में जो विरासत गुलशन जी हमें सौंप गये हैं, उसे आबाद रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। उन्होंने अपने इन दोहों के रूप में अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं-

रहता  है  संसार  में, ख़ुशबू  की मानिंद।
गुलशन से जाता नहीं, कोई भी गोविंद।।

_____

फूल-फूल पर भाव का, छिड़का हुआ पराग।
ग़ज़ल  तुम्हारे  द्वार  पर, जलता  हे चराग़।। 

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ख़ुशबू,  चंदन  या हिना, छाया हो या धूप।
सभी यहाँ मौजूद हैं, गुलशन जी के रूप।।

मुख्य अतिथि कृष्ण कुमार 'नाज़' ने कहा कि गुलशन जी उनके गुरू भाई ही नहीं मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने कहा कि स्मृतियों की पुस्तक में ऐसे बहुत-से मुड़े हुए पन्ने हैं, जो यादों में गुलशन जी को महफूज़ रखेंगे। उन्होंने अपनी कविता 'आँसू' की पंक्तियों के ज़रिए अपने भाव व्यक्त किए-

अपना  घर  छोड़  के, ख़ुश कौन भला रह पाया,
किसको मिल पाई है, परदेस में सुख की छाया।
आँसुओं  मेरा  कहा  मानोगे,  तो संवर जाओगे,
अगर  आँखों  से  निकलोगे  तो  मर  जाओगे।

अति विशिष्ट अतिथि और संग्रह की प्रकाशक अलका मिश्रा ने कहा कि गोविंद गुलशन जी की प्रेरणा से ही उन्होंने ग़ज़ल की बारिकियाँ सीखीं। उनके न रहने के बाद उन जैसे नए लिखने वालों की हौसला अफ़ज़ाई कौन करेगा? शायर बी० के० वर्मा 'शैदी' ने अपनी इस नज़्म के ज़रिए माहौल को ग़मगीन कर दिया-

ज़िंदगी  ख़ूब  गुज़ारी  थी ग़ज़ल  की   मानिंद
इब्तिदा  बन   गयी  हस्ती  की  सूरते-मतला

वक़्त की पड़ गयी कुछ यूँ निगाहे-बद आख़िर
साले-नौ   बन गया पुरसोज़ ग़ज़ल का मकता

इस अवसर पर शायर असलम राशिद को 'बारादरी सृजन सम्मान' प्रदान किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि उस्ताद शायर गोविन्द गुलशन ग़ज़ल की आबरू को क़ायम रखने, अदब और तहज़ीब को जीने वाले शायर थे। उन्होंने रवायती ग़ज़ल के दामन को भी थामे रखा और जदीद लहजे को भी अपनाया। उन्होंने गुलशन जी के इस शेर से महफिल को ग़मजदा कर दिया-

हमसे बिछड़ गये हैं वो वादा किए बग़ैर 
रहना  पड़ेगा  धूप  में साया किए बग़ैर

मरने का खौफ़ इसलिए रहता नहीं मुझे
मैं  जी  रहा हूँ  कोई तमन्ना किए बग़ैर

उन्होंने अपने उक्त शेर के ज़रिए अपने भाव प्रकट किये-

याद उसकी लड़ रही है दूसरी इक याद से
मेरे  अंदर  संगबारी  हो  रही है इन दिनों

छोड़कर जाने लगे हैं कैसे-कैसे प्यारे लोग
ज़िंदगी  से मौत प्यारी हो रही है इन दिनों

गोविंद गुलशन साहब की बेटी और शायरा ख़ुशबू सक्सेना ने फ़रमाया-

तुम  अगर  हमसफ़र  नहीं  होते
तो मेरी हिम्मत कहीं बिखर जाती

वो अगर मुझको सांत्वना देता
मेरी  आवाज़  और भर जाती

इस अवसर पर पंडित सत्यनारायण शर्मा, कमलेश त्रिवेदी फ़र्रुखाबादी, योगेंद्र दत्त शर्मा, जगदीश पंकज, वी० के० शेखर, डॉ० तारा गुप्ता, अनिमेष शर्मा 'आतिश', राजमणि, रवि पाराशर, तूलिका सेठ, प्रदीप भट्ट, सुरेंद्र शर्मा, अमर पंकज, हशमत भारद्वाज, इकरा अम्बर, संजीव निगम, मनीषा जोशी, वागीश शर्मा, संजीव शर्मा, आशीष मित्तल और यश शर्मा ने संस्मरणों व काव्यपाठ के ज़रिए अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं। वरिष्ठ व्यंग्यकार सुभाष चंदर, रश्मि सक्सेना, ख़ुशबू सक्सेना, हिना सक्सेना, छाया सक्सेना, गुनगुन, राजेश सक्सेना, निशमा सक्सेना, सुभाष अखिल, ओंकार सिंह, अवधेश श्रीवास्तव, अशोक अग्रवाल, कुलदीप, कृष्ण प्रसाद विश्वकर्मा, आशीष मैत्रेय, शशिकांत भारद्वाज, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, गुनप्रीत कौर, हरीश कुमार, सुमन गोयल, संकल्प श्रीवास्तव, संजय भदौरिया, उत्कर्ष गर्ग, गरिमा तोमर, शलभ अग्रवाल, अनु शाह, मुस्कान शाह, प्रतिमा श्रीवास्तव, डॉ० बीना शर्मा, अजय मित्तल, प्रज्ञा मित्तल, दीपा गर्ग, विपिन शर्मा और प्रभजोत कौर समेत बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।

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रचनाकार परिचय

टीम इरा वेब पत्रिका

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