Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

बाल साहित्य में पर्यटन- कृष्ण बिहारी पाठक

बाल साहित्य में पर्यटन- कृष्ण बिहारी पाठक

पर्यटन के अनुभव बालक के निजी अनुभव बनते हैं इसलिए विभिन्न संदर्भ में प्रचलित राय, दृष्टिकोण आदि को तथ्यात्मकता की कसौटी पर परखने लगता है। पर्यटन से उसका समालोचनात्मक चिंतन और कौशल निखरता है। इसी तरह रचनात्मकता भी पर्यटन के स्पर्श से निखरने लगती है।

बालमन! कितना सैलानी! कैसा यायावर! अहो, घुमक्कड़! अनथक पथिक, चिरंतन राही, सच्चे अर्थों में पर्यटक। बढ़ता हुआ बालक जैसे-जैसे दुनिया से परिचय विस्तार पाता है, उसे अपनी आँखों देखना और अपने हाथों छूना चाहता है। अपने पैरों पर चलकर नापना चाहता है संसार की दूरी और विस्तार।

सैलानी मन में कल्पना के पंख लग जाएँ तो कहना ही क्या! उत्सवधर्मी बालमन कभी तारों-सितारों की सैर बुनता है, कभी प्राकृतिक नज़ारों की। वह मन की आँखों से देखे सुदूर देश-देशांतर का सैलानी है। वह अपने कानों सुनी कहानियों में रचे-बसे पर्वत-मैदान, समुद्र-आकाश, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों से मिलने को आतुर यायावर है।

बालक का यात्रामय जीवन पहले माँ की गोद में बैठकर घर-आँगन की चारदीवारी तक, फिर परिजनों की अंगुली पकड़कर गली मोहल्ले की दरो-दीवार तक, तत्पश्चात बाल-सखाओं के साथ बाग़-बगीचों और मैदानों में हिलमिल खेलते हुए प्रारंभ होता है। आगे चलकर बाल साहित्य को पढ़ते-सुनते हुए भी उसका यायावर मन जगत और जीवन की टोह लेता है।

परिजन, गुरुजन और सहजनों के साथ रहकर वह जिस जगत को देख-छू नहीं पाता, उसका सैर सपाटा अपनी कल्पनाओं में करने लगता है। इसी तरह यात्रा प्रसंगों और यायावर अनुभवों पर आधारित बाल साहित्य की रचनाओं को पढ़ते-सुनते, बुनते-गुनते वह यायावरी का आनंद लेता है, ज्ञानार्जन करता है और सुरुचि को संतृप्त करता है।

यात्रा चाहे स्वयं चलकर की गई हो, अपने कानों किसी और की यात्रा का वर्णन सुना गया हो अथवा साहित्यिक विधाओं में सँवरे यात्रा प्रसंग पढ़कर आनंद मनाया हो, इन सभी माध्यमों के साथ समानता यह है कि इनसे गुज़रते हुए बालमन प्रकृति, परिवेश और प्राणियों के प्रति एक अपनापन अवश्य अनुभव करने लगता है।

पर्यटन या यात्रा केंद्रित बाल साहित्य की बाल-विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। यात्रा साहित्य मनोसंरचना में विहित संकीर्ण और सीमित संकल्पनाओं के बंधन को तोड़ता है। वह बालमन में दृढ़तापूर्वक यह संभावना पोषित करता है कि उसके द्वारा देखी-सुनी गई दुनिया के साथ-साथ ऐसी दुनिया भी हो सकती है, जो वह सोच सकता है अथवा जो उसकी सोच से भी परे है। ऐसी दृष्टि जिज्ञासा और अनुसंधान की भावना को सतत बनाए रखने में कारगर है।

बाल साहित्य के आधारभूत आयामों यथा कल्पना, रोमांच, साहस, जिज्ञासा, खेल-कूद, मानवेतर प्रकृति और परिवेश से सहकार के साथ यात्रा साहित्य में संभावनाओं के अनंत विस्तार की परतें खुलती हैं। पर्यटन केंद्रित साहित्य सीमाओं में सँवरे बालमन के अनुभवों को विस्तार देता है और जीवन की ज्ञात-अज्ञात चुनौतियों से निपटने की दृष्टि और दिशा प्रदान करता है। थोड़ा और व्यापक अर्थों में देखें तो सीखना भी एक यात्रा है, जीवन भी यात्रा है। धरती माता, चंदा मामा भी तो चिरयात्री हैं।

यह बहुत सहजता से लक्ष्य किया जा सकता है कि बाल साहित्य के साथ-साथ पाठ्यचर्या रूपरेखा, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक निर्माण में पर्यटन केंद्रित साहित्य को प्रारंभ से ही महत्वपूर्ण स्थान मिला है। पर्यटन केंद्रित बाल साहित्य को भारत ही नहीं, वैश्विक स्तर पर अनुमोदन मिला है। विश्व के किसी भी देश में और भारत में केंद्रीय अथवा राज्य स्तर पर निर्मित प्राथमिक, उच्च प्राथमिक स्तर की पुस्तकों में सैर-सपाटे, यात्रा या पर्यटन पर केंद्रित पाठ्य सामग्री एक अनिवार्य अवयव के रूप में स्थान पाती रही है।

कथा सम्राट प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानी 'ईदगाह' में हामिद और उसकी मित्र-मंडली गाँव से ईदगाह तक जाते हुए जो अनुभव बटोरती है, वह पर्यटन ही तो है। उनकी बातचीत में रास्ते में आने वाले जिन्नातों की दुनिया है तो ईदगाह पहुँचते-पहुँचते शुरू होती है खिलौनों, मिठाईयों और झूलों की खेलती-कूदती मिठास भरी झूमती दुनिया और अंततः संवेदनाओं के सुरुचिपूर्ण स्पर्श के साथ यह कहानी खिलती है और यह प्रमाणित करती है कि बाल साहित्य में पर्यटन विषयक लेखन में एक बार में ही कितनी विमाओं को, आयामों को परिभाषित किया जा सकता है।

गुलीवर की यात्रा सबसे लोकप्रिय यात्रा केंद्रित बाल साहित्य में गिनी जाती है। बच्चों की एकाधिक पीढ़ियों ने इसका आस्वादन किया है। आज तक भी बाल केंद्रित पाठ्यक्रम में इसका स्थान अक्षुण्ण है। गुलीवर की यात्रा को पढ़ते-सुनते हुए बालमन जैसे अपने को गुलीवर ही मान लेता है। यह अभिन्नता और तादात्म्य ही इस रचना की शक्तिमत्ता का मूल है।

गुलीवर एक नाविक है। वह यात्री है। परंतु यात्रा पर वह अकेला नहीं निकला है। जैसे-जैसे बालक उसे पढ़ते जाते हैं, अपनी कल्पनाओं में पूरी संवेदनाओं, रोमांच, जिज्ञासा और आनंद से परिपूर्ण होकर साथ उसके चल पड़ते हैं। एक उत्कृष्ट यात्रा साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण विशेषक भी तो यही है कि वह पाठक को अपने साथ एकरस करते हुए चलता है।

गुलीवर की नाव कभी विशालकाय प्राणियों की धरती पर जा लगती है, जहाँ बैल से दस गुना बड़ी बिल्ली है। वहाँ के मनुष्य इतने विशालकाय हैं कि गुलीवर को मुट्ठी में उठा लेते हैं। उनकी रोटी का परिमाप कोई दस फुट का है, लगभग एक कमरे के बराबर की रोटी। अहा! बच्चों के आनंद की तो सीमा ही क्या है! वो देखो, उस महादेश के किसान का बेटा गुलीवर को हाथ में उठाकर उसका सिर अपने मुँह में डालने वाला है। शुक्र है, गुलीवर सही वक्त पर चिल्लाता है और बच्चा, जो कोई पंद्रह फुट ऊँचा है, डरकर गुलीवर को नीचे गिरा देता है। अगर बच्चे की माँ ने गुलीवर के नीचे अपना एप्रन नहीं रखा होता तो उसकी गर्दन टूट जाती।

अब बच्चे को खिलौने जैसे गुलीवर से दोस्ती हो गई है। वह गुलीवर को अपने बिस्तर पर लिटाकर एक साफ सफेद रूमाल ओढ़ाता है। गुलीवर अपने घर, अपनी पत्नी और अपने बच्चों के सपने देखते हुए सो गया है। बच्चे भी अपनी कल्पनाओं और सपनों में एक और नई ज़मीन पर, नवेले देश में पहुँच गये हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में भी ऐसी अनेक यात्राओं की श्रृंखला है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी बालमन को समृद्ध करती आ रही है। ऋषि-मुनियों के यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम-लक्ष्मण की वनयात्रा, श्रीकृष्ण के बाल लीला प्रसंगों में आने वाली यात्राएँ और हनुमान जी की समुद्र यात्रा आदि भी रोमांच, साहस, सूझ-बूझ, कल्पनाशीलता और आनंद से बाल-जगत को लबरेज़ करती हैं।

पर्यटन की सुरुचि और बाल-मन से यात्रा का जुड़ाव एक महत्वपूर्ण विशेषक है, जिसका आधार लेकर यात्रा केंद्रित ऐसा बाल साहित्य रचा जा सकता है, जिसमें बाल्यावस्था के अनुरूप आवश्यक अधिगम सामग्री को खेल-खेल में जोड़ा गया हो। ज्ञान-विज्ञान, कला, अनुशासन, सामाजिकता, संवेदना और संवेग सहित शायद ही कोई ऐसा आयाम हो, जिसे पर्यटन केंद्रित बाल साहित्य में सहजता से न जोड़ा जा सके।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 के साथ और नवीन संदर्भों में इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों के बरक्स कौशल विकास और क्षमता संवर्धन में पर्यटन केंद्रित बाल साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका के साथ उम्मीद जगाता है। विषय विस्तार, वैविध्य और गांभीर्य की दृष्टि से पर्यटन का साहित्य अपार संभावनाओं के साथ आश्वस्त करता है।

इक्कीसवीं सदी के कौशलों में मुख्यतः जिन विशेषकों को कौशल के रूप में रेखांकित किया गया है, उनमें स्वजागरुकता, संप्रेषण कौशल, अंतर्वैयक्तिक संबंध, टीम वर्क, समालोचनात्मक चिंतन, रचनात्मक चिंतन, जुझारूपन, समस्या समाधान, नेतृत्व कौशल, नैतिक मूल्य, नागरिकता कौशल, वित्तीय साक्षरता, डिजिटल साक्षरता और जलवायु परिवर्तन की समझ आदि चौदह थीम शामिल हैं। इनमें से अधिकांश विशेषकों को बालक पर्यटन तथा पर्यटन साहित्य के माध्यम से सहज ही हृदयंगम कर सकते हैं।

पर्यटन से जुड़कर बालक का मनोगत संसार खुलता है। वह अपनी वास्तविक छवि और दुनिया के बीच दिखाई देने वाली छवि के बीच के अंतर को समझने लगता है। अपने व्यक्तित्व के ऐसे आयामों को, जिन्हें वह अपनी कमतरी या न्यूनता के रूप में देखता है, बाहरी संसार से छिपाने का आग्रह रखता है परंतु पर्यटन के दौरान जब वह अनेक लोगों को उन न्यूनताओं के बावजूद भी जीवन को आनंदपूर्वक आत्मविश्वास से जीते हुए देखता है तो उसकी स्वजागरुकता परिष्कृत होती है।

पर्यटन से जुड़कर बाहरी और भीतरी व्यक्तित्व के बीच की दूरी घटती जाती है। जीवन और जगत की बहुरंगी विविधता के प्रति उसकी समझ बढ़ती है। बालक में समालोचनात्मक और रचनात्मक चिंतन विकसित करने के लिए पर्यटन से बेहतर और क्या हो सकता है।

पर्यटन के अनुभव बालक के निजी अनुभव बनते हैं इसलिए विभिन्न संदर्भ में प्रचलित राय, दृष्टिकोण आदि को तथ्यात्मकता की कसौटी पर परखने लगता है। पर्यटन से उसका समालोचनात्मक चिंतन और कौशल निखरता है। इसी तरह रचनात्मकता भी पर्यटन के स्पर्श से निखरने लगती है।

रचनात्मक चिंतन और कौशल विकास के लिए तो यात्राओं से बढ़कर दूसरा विकल्प हो भी नहीं सकता है कि यात्राओं के दौरान प्रकृति की रचनात्मकता और मौलिकता से सीधा संवाद और संपर्क करने के अधिकतम अवसर प्राप्त होते हैं। जिस तरह बात में बात निकलती है, उसी तरह रचना में से रचना। एक रचना दूसरी रचना की निर्मिति के लिए इंगित करने वाला संकेतक ही तो है।

जुझारूपन और समस्या समाधान का संबंध भी बहुत निकटता से यात्राओं से लगा हुआ है। बालक में नैतिक एवं नागरिक मूल्यों के पल्लवन, विकसन से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। यात्राओं के दौरान एक निश्चित जेब ख़र्च के साथ बच्चे अपनी ज़रूरत और इच्छाओं के बीच के अंतर को समझते हुए ज़रूरत को प्राथमिकता देना सीख जाते हैं। इस तरह इक्कीसवीं सदी का एक महत्वपूर्ण कौशल वित्तीय साक्षरता पूरा होता है। 'ईदगाह' कहानी में हामिद द्वारा अपनी इच्छाओं से ऊपर उठकर ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए दादी माँ के लिए चिमटा ख़रीदना वित्तीय साक्षरता और कौशल का ही उदाहरण है।

बालक के सर्वांगपूर्ण विकास की दृष्टि से और विशेषकर इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों के बरक्स उसके क्षमता संवर्धन के लिए पर्यटन और उस पर केंद्रित बाल साहित्य आज की महत्वपूर्ण अधिगम आवश्यकता है। पर्यटन बाल-विकास का एक महत्वपूर्ण पक्ष है और उससे जुड़ा साहित्य इसका बेहतरीन माध्यम।

0 Total Review

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

कृष्ण बिहारी पाठक

ईमेल : kbpkbp1984@gmail.com

निवास : हिंडौन सिटी (राजस्थान)

संप्रति- व्याख्याता (हिंदी)
पता- तिरुपति नगर, हिंडौन सिटी, ज़िला- करौली (राजस्थान)- 322230
मोबाइल- 9887202097