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जुलाई-सितंबर 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

मनोज जैन 'मधुर' की बाल कविताएँ

मनोज जैन 'मधुर' की बाल कविताएँ

कला ज्ञान-विज्ञान सिखातीं,
जीवन का हर पक्ष दिखातीं।
सबका जीवन गढ़ें किताबें।

मिस्टर बीन

मिस्टर बीन, मिस्टर बीन।
हरकत इनकी बड़ी हसीन।

जब मन चाहे जिसे हँसा दें।
जिसको चाहें उसे फँसा दें।
खट्टा-मीठा इन्हें न भाता,
अच्छा लगता है नमकीन।
मिस्टर बीन, मिस्टर बीन।

कभी बनाते रोनी सूरत।
बन जाते हैं अक्सर मूरत।
जहाँ दिखाई एक हमें दे,
इन्हें दिखाई देते तीन।
मिस्टर बीन, मिस्टर बीन।

टेडी रखते अपने साथ।
लेते हैं हाथों में हाथ।
गाल फुलाकर मुँह बिचकाते,
ख़ुद पर करते नहीं यक़ीन।
मिस्टर बीन, मिस्टर बीन।

अजब सोच का इनका ढंग।
करते रहते सबको तंग।
रहते खोए-खोए अक्सर,
या फिर रहते हैं तल्लीन।
मिस्टर बीन, मिस्टर बीन।

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अरी गिलहरी

अरी गिलहरी ऊपर आ जा!
खोल रखा मैंने दरवाजा।
नीचे घूम रही है बिल्ली,
मुझे अभी जाना है दिल्ली।
दिल्ली से वापस आऊँगा,
दस अखरोट तुझे लाऊँगा।
किट-किक कर तू खाती रहना,
मुझको गीत सुनाती रहना।

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सबको अच्छे लगते बच्चे

छोटे-बड़े उमर के कच्चे,
सबको अच्छे लगते बच्चे।

गमले में रोपे गुलाब-से,
दमक रहे हैं आफ़ताब-से,
मन के होते कितने सच्चे!

इनके होने से घर, घर है,
चिंताओं से इन्हें न डर है,
लगते हैं हम सबको अच्छे।

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गिनती गीत

एक पेड़ पर,
दो थे आम।

तीन मुसाफ़िर चलकर आए।
चार हाथ का डंडा लाए।
डंडा उछल डाल पर लटका।
पाँच नहीं, छह फुट पर अटका।

कोशिश की पर,
बना न काम।

सात-आठ दिन यही काम था।
सबके मन में पका आम था।
नौ-दस दिन ऐसे ही बीते।
हारे नहीं अंत में जीते।

फिर घर लौटे,
बुद्धूराम।

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पहाड़ा गीत

दस के बीस, बीस के पूरे,
तीस खरीदे आम।
चालीसा पढ़ पापा बोले,
हम हैं बुद्धूराम।

थैला लेकर हम जा पहुँचे,
हमें दिखा कुछ खास।
लँगड़ा आम खरीदा हमने,
देकर रुपए पचास।

दादा कहते साठ रुपए में,
आ जाता बादाम।

सत्तर-अस्सी चुसमी लाए,
हम नब्बे में पूरे।
सौ का नोट मिटाया हमने,
मम्मी हमको घूरे।

एक पहाड़ा रटते-रटते,
हुई सुबह से शाम।

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पढ़ें किताबें

पढ़ें किताबें, पढ़ें किताबें।

कला ज्ञान-विज्ञान सिखातीं,
जीवन का हर पक्ष दिखातीं।
सबका जीवन गढ़ें किताबें।

अंधकार में राह दिखा दें।
बात-बात में सबक़ सिखा दें।
हर मुश्किल से लड़ें किताबें।

बन जाती हैं सखा-सहेली।
बूझ सकें हर एक पहेली।
सबके घर में बढ़ें किताबें।

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ओ री चिड़िया

ओ री चिड़िया,
तुझे बुलाऊँ,
आ मुँड़ेर पर।

सीढ़ी चढ़कर तुझसे मिलने,
ऊपर छत पर आ जाता हूँ।
अपने मन की सारी बातें,
खुलकर तुझे सुना जाता हूँ।

मुट्ठीभर दाने लाया हूँ,
चुग इनको,
ले जा मुँड़ेर पर।

डाँट रही है दीदी मुझको,
कहती दिन भर करो पढ़ाई।
आज सुबह से इसी बात पर,
हम दोनों में ठनी लड़ाई।

टी-टी टी-टी फुदक
फुदककर फिर फिर गाना,
गा मुँड़ेर पर।

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मेरी प्यारी झबरी बकरी

मेरे साथ रहा करती है,
मेरी प्यारी झबरी बकरी।

शहनाई से लटक रहे हैं,
जी हाँ, देखो इसके कान।
छेड़ रही है मुझे देखकर,
अपनी मैं-मैं वाली तान।

चढ़ जाती है खड़ी पहाड़ी ,
भले जगह हो चौड़ी-सँकरी।

शाख-पत्तियाँ खाती रहती,
देती सबको मीठा दूध।
मैं इसको बगिया से लाया,
हरे तोड़कर दस अमरूद।

घूमा करती दिन भर ऐसे,
जैसे घूमा करती चकरी।

नयन आयताकार सुनहरे,
देखा करते चारों ओर।
चौकन्नी हो जाती पल में,
कहीं ज़रा-सा हो यदि शोर।

नटनी-सी चलती रस्सी पर,
लगी मुझे हरदम अनथक री।

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रचनाकार परिचय

मनोज जैन 'मधुर'

ईमेल : manojjainmadhur25@gmail.com

निवास : भोपाल (मध्यप्रदेश)

जन्मतिथि- 25 दिसम्बर, 1975
जन्मस्थान- ग्राम- बामौर कला, ज़िला- शिवपुरी (मध्यप्रदेश)
शिक्षा- अंग्रेज़ी साहित्य में स्नात्कोत्तर, डी० एड
प्रकाशित कृतियाँ- एक बूँद हम, धूप भरकर मुट्ठियों में (नवगीत संग्रह)
प्रकाशन/प्रसारण- अनेक शोध सन्दर्भ ग्रन्थों में नवगीत सम्मिलित। सोशल मीडिया के चर्चित (नवगीत पर एकाग्र साहित्यिक) समूह 'वागर्थ' का संचालन। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से समय-समय पर प्रसारण।
पता- 106, विट्ठल नगर, गुफामन्दिर रोड़, लालघाटी, भोपाल (मध्यप्रदेश)- 462030
मोबाइल- 9301337806