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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की नौवीं कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की नौवीं कड़ी

देवयानी….. देवयानी! देवयांक! ओह! अपनी ग़लती से मैंने अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली। मैं भी! कौन से ज़माने में पहुँच गया। देवयांक अब छोटा बच्चा कहाँ, उसके ख़ुद मेरी छुटकी-सी लाड़ली-सी बिटिया चिया है। मेरी चिया! सबसे दूर हो गया मैं।" देव के आँखों से आँसू की अविरल धारा बहने लगी।

रात्रि के गहन नीरव अँधकार में देव साधना के लिए बैठ गया। देवयानी की यादें फिर बेचैन करने लगीं। देव गुरुजी के सिखाए अनहद नाद का अभ्यास करने की कोशिश करने लगा। देवयानी की यादें एक पल भी चैन नहीं लेने देती थीं। सुखासन में बैठ; देव ने दोनों कानों को तर्जनी उंगली से बंद किया। धीरे-धीरे ॐ का गुंजार करने लगा।

"क्या कर रहे हो देव?"
"क्या करूँगा!"
"मुझे याद!"
"तुम भूलती ही कब हो?"
खिलखिला कर हँस पड़ी देवयानी। "साधना ऐसे होती है देव? तुम तो हर काम में परफेक्शन ढूँढते हो। मिस्टर परफेक्शनिस्ट, यहाँ कैसे परफेक्शन नहीं आ रहा?"
"तुम! इसका कारण तुम हो देवयानी। तुम कोई भी काम मुझे ठीक से करने कहाँ देती हो? हर जगह टपक जाओगी। मुझे बातों में उलझा लोगी। फिर कहोगी मैं कोई काम ठीक से नहीं करता।"
"अच्छा! यह मुझे कठघरे में रखने की आदत कब जाएगी तुम्हारी? ख़ुद कुछ सलीके से करते नहीं। दोष देवयानी का तलाशते हो।"
"तुम मुझे ठीक से काम करने कब देती हो? तुम और तुम्हारा यह बेटा। देखो मेरा आसन छीन कर भाग रहा है।"
"मेरे बेटे ने क्या किया देव? बच्चा है, शरारत करेगा ही। अब उसे तो अपने काम में मन न लगने में शामिल न करो। देवयांक, आजा मेरा राजा बेटा। हम अपने कमरे में चलते हैं।"
"देवयानी रुको! मेरे बेटे के साथ कुछ देर को खेलने दो।"
"जनाब! जिस काम से गए हैं, वो काम कीजिए, न कि मुझे याद। न ही अभी देवयांक के साथ खेलना। ग़लत बात देव। जो भी करो पूरे मन से।"
"देवू!"
"तुम्हारी यही आदत मुझे नहींं पसंद। भटक जाते हो। ठहरो! ये उंगलियाँ यहाँ लाओ। बंद करो कान। अब सबको भूल जाओ। अंदर की आवाज़ सुनो देव! ब्रह्म से साक्षात्कार करो।"

देव ने आँखे खोल दीं। "देवयानी….. देवयानी! देवयांक! ओह! अपनी ग़लती से मैंने अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली। मैं भी! कौन से ज़माने में पहुँच गया। देवयांक अब छोटा बच्चा कहाँ, उसके ख़ुद मेरी छुटकी-सी लाड़ली-सी बिटिया चिया है। मेरी चिया! सबसे दूर हो गया मैं।" देव के आँखों से आँसू की अविरल धारा बहने लगी।
"देव, इतना विचलन ठीक नहीं। हम दोनों ने जो चुना है, वो हम दोनों को निभाना है। तुम कमज़ोर पड़ोगे तो मैं भी टूट जाऊँगी।"
"देवयानी, मैं सुन रहा हूँ तुम्हें। तुम सदैव छाया की तरह मेरा साथ देती हो। दो पल मेरे पास बैठो।" आँसू पोंछ देव ने आँखें खोल दीं। पर देवयानी कहीं न दिखी।
"तुम थीं अभी यहाँ। मैंने सुना है तुम्हें देवू! तुम्हारी ख़ुशबू अभी भी यहाँ बिखरी हुई है। मेरा अनहद नाद तुम हो देवयानी! मुझमें रची-बसी। तुम्हें ही सुनता हूँ मैं हर जगह?"
जब तुम पहली बार मिलीं तब से ही तुम प्राण की तरह मुझमें बस गईं देवू! कितने प्यारे थे वो लम्हे, जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा था। लगता है जैसे कल ही की बात हो। देव अब यादों की उन गलियों से विचर रहा था, जहाँ देवयानी उसे पहली बार मिली थी।

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597