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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की आठवीं कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की आठवीं कड़ी

कुछ एहसास रूई के मानिंद नर्म और मुलायम होते हैं देव! कुछ एहसास रूह से परे मन को मुट्ठी में बाँध, आकाश में हल्के-हल्के उड़ते रहते हैं। एहसास! हाँ तुम्हारा मेरे क़रीब होने का एहसास, मन की धरती को प्रेम- प्यार में भिगोकर रखता है। तुम मेरे आस-पास हो। तुम्हारे होने के नर्म अहसास के घेरे ने मुझे चारों ओर से घेर रखा है।

ब्याह के बाद सब अपनी-अपनी दुनिया में रम गये। अपना कोई था नहीं। रिश्तेदार सब अपने-अपने घर चले गये। घर में वो रह गयी और रह गया वहाँ देव का असीम प्यार। उसे अकेले रहना कभी पसंद नहीं था लेकिन किस्मत वहाँ भी कोई नहीं था। एक संजना ही थी, जिसके साथ बोलती-बतियाती थी। यहाँ भी बस वो और देव। सारे दिन घर में परेशान-सी फिरती। ऐसे में उसका मन लगाने की कमान सँभाली देव ने।

कितनी बार तो वो हँसती, "तुम मुझे सासु माँ की कमी नहीं फील होने देते। हर वक़्त मेरे सिर पर सास की तरह ही सवार रहते हो। यह क्या किया देवयानी? यह क्यों कर रही हो देवयानी? लाल रंग क्यों पहन लिया? बिंदी बड़ी लगाया करो। चूड़ियाँ भर कर हाथ पहना करो। क़सम से सास-ननद की कमी नहीं लगती देव।"
"अच्छा जी, इनडायरेक्टली मुझे खड़ूस सास बताया जा रहा है बच्चू।"
"न बाबा न! मेरी यह मजाल!"

ऐसे ही हँसते-मुस्कुराते दिन गुज़र रहे थे। दोनों एक-दूसरे की संगत में बेहद ख़ुश थे। देव का बस चलता तो उसे अपनी पलकों से एक पल भी ओझल न होने देते। उसे थोड़ा भी जुकाम-बुख़ार भी हो जाता तो देव उसे बिस्तर से न उठने देते। उसे याद आया, ऐसे ही एक बार बुखार से परेशान थी और देव ने उसे किचन में खड़े देख लिया। बस उसे बिस्तर पर बैठाने की ठान ली देव ने।
"क्या कर रही हो किचिन में?"
"तुम्हारे लिए चाय बना रही हूँ। तुम उठते जो नहीं मेरे हाथ की चाय बिना।" देवयानी इतराई।
"मैडम! ऐसी भी सुघड़ चाय न बनातीं आप! मजबूरी में पी लेते हैं बस।"
"क्या? क्या कहा? फिर से बोलो देव! मैं इतनी बुरी कुक हूँ।"
"और नहीं तो क्या? अब मेरे हाथों का बना खाओ फिर समझोगी मैंने कैसे गुज़ारा किया है?" देव की मासूमियत चरम पर थी।
"अच्छा! तुमने मुझे इतना झेला देव!" देवयानी सदमे में डूब गयी।
"जी मोहतरमा, अब बाहर निकलिए और हमारे हाथों की चाय और स्वादिष्ट नाश्ता नोश फरमाइए।"
"तुम बनाओगे फिर मैं क्या करूँ? ऐसे ही मन नहीं लगता इतने बड़े घर में। देवयानी थोड़ी देर पहले का बुरे कुक का ताना भूल गयी।
"जाइए, अब अपने बगीचे में जी भरकर चहलक़दमी कीजिए। आपको कितनी शिकायत रहती है मैं आपकी बाग़वानी का समय भी चुरा लेता हूँ। आज अपना शौक़ मन भरकर पूरा कीजिए मोहतरमा। यहाँ खड़ी मेरा मुँह क्यों देख रही हो? जाओ भी। मेरे बनाए चाय-नाश्ते को नज़र लगाने का इरादा है या मुझे। अब इतना हैंडसम बंदा हो तो नज़र लगाना लाज़िमी है।"
"ऐसे भी ख़ूबसूरत न हैं आप! और न आपका बनाया नाश्ता इतना लज़ीज होगा। अपनी चाय तो लेकर ही न जाऊँगी!"
"बिलकुल नहीं। आप जाइए। बंदा वहीं हाज़िर हो जाएगा आपके लिए चाय लेकर, आपकी लताओं और सुगन्धित पुष्पों और आपके मनपसंद झूले के पास।"
"अच्छा! चलो आज तुम्हारे हाथ की चाय का ही स्वाद लिया जाए।" कहकर देवयानी बगीचे की ओर चल दी। तबियत वैसे ही ठीक नहीं थी। वहाँ पहुँच अनमनी-सी देवयानी अपने पारिजात को देख पारिजात-सी ही खिल गयी। गुलदावरी के रंग-बिरंगे फूल उसे देख जैसे खिलखिला दिये। डहेलिया उसे देख इठलाने लगे। वो आँखें बंद कर शीतल बयार की सुगंध में खोई हुई थी कि देव ने उसके माथे की हवा से उड़ती लटें सँवार दीं। उसने अचकचाकर आँख खोलीं।
"कब आ गये देव! पता ही नहीं चला।"
"जब आप ख़ुद भी ख़ूबसूरत मौसम का हिस्सा लग रही थीं। आप इनमें इस क़दर खोई थीं मैडम कि...."
"कि.....!"
"कि आपको ये भी नहीं पता चला ये आवारा हवा आपकी लटें चूम रही है।"
"अरे.......हाहहाहाहाहा।"
"अब हवा से भी शिकायत!"
"हाँ सबसे है, जो तुम्हें देखे, छुए। इन हवाओं से, बारिश की बूँदों से, सूरज से, इन पौधों से....... और।"
"और… .. ..।"
"हर उस चीज़ से, जो मेरी देवू को देखे, उसे छुए।"
"बस करो देव! मुझे और मत हँसाओ।"
"ये हँसने की बात है देवयानी!"
"तो और काहे की है? तुम्हारा बस चले न देव तो तुम फूलों का खिलना बंद करा दो। हवाओं का रुख़ बदल दो। चाँद की दिशा मोड़ दो।"
"हाँ बिलकुल देवयानी। जो भी तुम्हारे क़रीब आए, सबको हटा दूँ। यह हवा, यह तारे, यह सूरज, चाँद-सितारे।"
"बस करो देव।" हँसने लगी देवयानी।
"देव! तुम बिलकुल पागल हो। कहीं ऐसा भी होता है!"
"पागल तो हूँ ही। तुम्हें चाहता जो हूँ इतना। तुम्हें मेरी ज़रा भी परवाह नहीं देवयानी। मैं तुमसे इतर किसी को देखता भी नहीं न। जब जाऊँगा तब समझोगी जलन कैसी होती है।"
"नहीं होगी।"
"होगी देवयानी। बहुत होगी।"
"पहले तो तुम कहीं जाओगे ही नहीं और चले भी गये तो मैं उसे तुमसे भी ज़्यादा प्यार करुँगी।"
"अच्छा! ऐसा नहीं होता।"
"होता है देव।"
"कैसे! मुझे तो नहीं सहन होता।"
"हम जिसे बेइंतहा प्यार करते हैं, उससे जुड़ा सब प्यारा होता है देव।"
"किताबी बातें हैं ये देवयानी।"
"नहीं देव। दिल की बात है।"
"अच्छा! मैं किसी को ले आया तो तुम उसे प्यार करोगी!"
"हाँ देव।अगर ले ही आये तो मैं उसे तुमसे भी ज़्यादा प्यार करूँगी।"
"देवयानी व्हॉट ए ब्यूटीफुल जोक! तुम तुम मुझे मार ही डालोगी। किसी को देखने तो देती नहीं।"
"ये बात और है देव। ऐसा कुछ हो ही न इसलिए मना करती हूँ तुम्हें। घर ले ही आओगे तो तुमसे ज़्यादा मैं प्यार करूँगी उसे।
"किसी से बात कर लूँ तब इतना गुस्सा हो जाती हो। ले आया तो मार ही डालोगी न!"
"देव, तुम बेबाक आदत के हो। तुम्हारे मन में कुछ नहीं किसी के लिए लेकिन सामने वाला कैसे लेगा तुम क्या जानते हो? तुम किसी के मन को नहीं पढ़ सकते। तुमने खुले मन से बात की। किसी ने तुमसे दिल ही लगा लिया तो। तुम हो बहुत संवेदनशील। फिर फँस जाओगे, अब क्या करूँ? मैं तुम्हें ऐसी परिस्थिति से फँसने से बचाने के लिए ही मना करती हूँ देव।"
"मैं नहीं मानता देवयानी।" देव का मूड ख़राब होने लगा।
"न मानो। पर ये तो बताओ वो स्पेशल नाश्ता कहाँ है?" देवयानी ने बात बदली।
"ओह देवयानी! अब तक कबाब बन गया होगा। सब तुम्हारी चालाकी है। तुमने मुझे बातों में इसीलिए लगाया कि मैं भूल जाऊँ और सब जल जाये।"
"तुम भी न देव! अपनी ग़लती मेरे सर। अब मैं किचन में चली जाऊँ सरकार? तुम बेचारे झेलते हो मेरा बनाया खाना, मज़बूर हो।"
"देवयानी! मैं ही बनाऊँगा। आज ऑफिस की छुट्टी। अपनी बेग़म के लिए आख़िर इतना तो फ़र्ज़ बनता ही है।"
"नो मोर ड्रामा! सब जानती हूँ, तुम्हारे ऑफिस न जाने के एक सौ एक बहाने। चलो उठो। तैयार हो। मैं बनाती हूँ नाश्ता। तुम आॉफिस के लिए तैयार हो।"
"रोज़ तुम्हीं न करती हो देवयानी। आज बंदे को करने तो दो। अभी पाँच मिनट में सब चुटकियों में हाज़िर हो जाएगा।"
"जैसे अभी हाज़िर हुआ?"
"वो तुम्हारी ग़लती थी।"
"किसी की भी थी। अब जाओ ऑफिस।"
"जाता हूँ। पर देखना तुम बहुत ज़्यादती करती हो। पछताओगी एक दिन।"
"ठीक है। वो भी देखा जाएगा। पर अभी जाओ।"
"नहीं जाता। जाओ क्या करोगी?"
"देव! जाओ।"
"नहीं जाता।"
"ओके! तुम यहीं रहो। मैं कमरा बंद कर लेती हूँ। रहना सारे दिन अकेले।"
"जा रहा हूँ। कितना अत्याचार करती हो मुझ पर!"
"ऐसी शक्ल न बनाओ। इतने मासूम नहीं तुम। अब जाओ।"
"जा रहा हूँ, और देखना बुलाओगी तब भी नहीं आने वाला।"
"देव! देव! रुको! कहाँ जा रहे हो? मत जाओ देव।"
"देव सुनो!"

मेरे दिल की ज़मीं पर यह गुमां भी कैसे आये।
कोई पल बिना तुम्हारे भला कैसे बीत पाये।
मेरे पास तुम नहीं हो, मेरे पास कब नहीं हो।
इस सोच के इतर कोई राब्ता नहीं है।
तुम्हें किस कदर है चाहा तुमको पता नहीं है।

"किसी ने कितना सुंदर लिखा है न देव?"
"अच्छा! तुम्हें लगता है ऐसे अब तुम मुझे मना लोगी! पहले क़सम खाओ कि ऐसे कभी जाने को नहीं कहोगी तब ही वापस आऊँगा।"
"ठीक है न देव। क़सम से अब कभी जाने को नहीं कहूँगी। अब तो वापस आ जाओ।"
"नहीं आता।"
"वापस आ जाओ देव।" आँसू आँखों में ठहरे नहीं। बाहर लुढ़क पड़े। देवयानी खोई-सी खिड़की के सहारे बैठ गयी।
"कुछ एहसास रूई के मानिंद नर्म और मुलायम होते हैं देव! कुछ एहसास रूह से परे मन को मुट्ठी में बाँध, आकाश में हल्के-हल्के उड़ते रहते हैं। एहसास! हाँ तुम्हारा मेरे क़रीब होने का एहसास, मन की धरती को प्रेम- प्यार में भिगोकर रखता है। तुम मेरे आस-पास हो। तुम्हारे होने के नर्म अहसास के घेरे ने मुझे चारों ओर से घेर रखा है। हर दिन, हर पल तुम मेरे साथ हो। देखो न इस वक़्त भी तुम्हारी नर्म-नर्म अँगुलियाँ, मेरी अँगुलियों को हौले-हौले सहला रही हैं। प्रेम की दुनिया बहुत अलग और अनोखी होती है न देव!"
"हाँ! बहुत अनोखी होती है देवयानी। बेहद अनोखी। अगर प्रेम करने वाली तुम-सी हो फिर तो उस दुनिया से हसीन दुनिया कोई हो ही नहीं सकती। तुम हर पल, हर लम्हा मेरे पास होती हो। कब अपने से अलग कर पाता हूँ तुम्हें देवू।"
"कोई माने या न माने पर मैं जानती हूँ तुम मेरे पास हो। सिर्फ मेरे पास। तुम हर दिन मुझसे मिलने आते हो। देखो मेरे कितने नज़दीक, इतने कि मैं तुम्हें छू सकती हूँ।"
देवयानी ने देव को छूने के लिए हाथ बढ़ाया। हाथ खिड़की के शीशे से टकरा गया।
"देव! देव कहाँ हो तुम? अभी तो यहीं थे। मुझसे बात कर रहे थे। देखो ऐसे मत सताओ। मेरे सामने आओ देव।"

आँसू देवयानी के गालों को भिगोने लगे। देवयानी को ऐसे देख ;दु:ख की तेज लहरें अनन्ता का कलेजा चीरे दे रहीं थीं।
"मम्मी!"
"बेटा! देव कहाँ गये? अभी तो यहीं थे। तुमने देखा न उन्हें।"
"क्या हाल बना लिया मम्मी? कैसे यहाँ रहेंगी आप? साथ चलिए बस! मैं कुछ नहीं जानती। कहाँ हैं पापा यहाँ? कैसे चले गये पापा? एक बार आपके बारे में नहीं सोचा?"
देवयानी बेख़ुदी से बाहर आयी। अनजाने ही अपने प्यारों को कितना कष्ट दे रही है।
"अनी बेटा। आओ, मेरे पास बैठो। क्या है तुम्हारे हाथ में? चाय लाई थी क्या?" देवयानी ने ख़ुद को सम्हाला।
"जी मम्मी! चाय लाई थी।"
"हाँ लाओ। तुम्हारी चाय कहाँ है?"
"मैं देवयांक को चाय देकर फिर अपनी चाय लेकर आती हूँ मम्मी।"
"शर्मिष्ठा को भी चाय भिजवा देना बेटा। नई जगह है, सकुचा रही होगी।"
"जी मम्मी।"

अनन्ता देवयानी के पास बैठ गयी। देवयानी उससे चिया के बारे में बात करने लगी। अनन्ता मम्मी की बेचैनी समझ रही थी। ऊपर से कठोर पर्तों के आवरण में छिपी मम्मी अंदर से नारियल गिरी जैसी ही कोमल थीं। वो और देर वहाँ रुक देवयानी की यादों में ख़लल नहीं डालना चाहती थी।
"मम्मी, मैं शर्मिष्ठा को चाय भिजवाकर फिर आती हूँ।" देवयानी ने हाँ में सिर हिला दिया। अनन्ता चली गई। देवयानी शर्मिष्ठा के बारे में सोचने लगी।
उसके पास देव की भरपूर यादें हैं। उन दोनों का अंश उनका बेटा है। अनन्ता है। चिया है। देव का बनाया यह ख़ूबसूरत घर है। शर्मी के पास क्या है? सिवाय उस समय के, जो देव के साथ बीता।

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597