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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की दसवीं कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की दसवीं  कड़ी

चम्पा, बेला, रात-रानी सब पर खुलकर निखार चढ़ा था। देव को पहले पौधों से कोई ख़ास प्यार नहीं था। लेकिन देवयानी के शौक़ को देख देव को भी पौधों से प्यार होने लगा था।

चाय ख़त्म कर देवयानी बाहर निकल आई। मौसम पर झूमकर रंगत आई हुई थी। चम्पा, बेला, रात-रानी सब पर खुलकर निखार चढ़ा था। देव को पहले पौधों से कोई ख़ास प्यार नहीं था। लेकिन देवयानी के शौक़ को देख; देव को भी पौधों से प्यार होने लगा था। कहते हैं, जिससे प्यार होता है, उससे जुड़ी हर चीज़ प्यारी लगने लगती है। शायद यही कारण था देव का वक़्त भी ऑफिस के बाद देवयानी के साथ बगीचे में गुज़रने लगा। देवयानी ने बगीचे के बीच फव्वारे लगवा कर साइड में झूला लगवाया था। देव के जाने के बाद अक्सर यहाँ बैठ किताबें पढ़ती रहती। और देव यहाँ बैठ अपनी कविताएँ लिखता। देव के ऑफिस जाने से पहले सुबह-सवेरे और ऑफिस से आने के बाद फुरसत के क्षणों में वो और देव दोनों ही झूले पर बैठ जाते। देवयानी झूले पर बैठ; उन मीठे दिनों की बातों में खो गई।

कितने सुकूनकुन दिन थे वो। दिन-ब-दिन देव का प्यार देवयानी के लिए बढ़ता ही जा रहा था। देवयानी के बिना देव रहना ही नहीं चाहता था। आँख खुले तो देवयानी सामने हो और सोये तब भी देवयानी को देखकर।
"चलो देवयानी।"
"कहाँ देव?"
"जैसे तुम जानती नहीं। बहुत हुआ काम। अब अंदर चलो। मेरा अकेले मन नहीं लग रहा।"
हँसने लगी देवयानी, "देव घर में तुम एकदम बच्चे हो। सोचती हूँ कैसे तुम पूरा ऑफिस सँभाल लेते हो!"
"तुम बातों में मत उलझाओ। मैं तारीफ़ के जाल में नहीं फँसने वाला। तुम चलो अंदर।"
"थोड़ी देर देव! बस थोड़ा-सा काम बचा है।"
"हर वक़्त किचिन! तुम बिस्तर किचिन में ही क्यों नहीं लगा लेती?"
"लगा तो लेती। लेकिन हमारी किचिन इतनी भी बड़ी नहीं कि ट्रिपल बैड का लोड झेल ले।"
"लेकिन ट्रिपल बैड क्यों देवयानी? तुम तो धान-पान-सी हो!"
"पर तुम तो दो के बराबर एक हो।" ज़ोर से हँस दी देवयानी।
"तुम! अभी रुको तुम्हें मैं बताता हूँ।"
"मैं तो रुकी हूँ जा तो तुम रहे हो?"
"कहाँ जा रहा हूँ मैं?"
"ऑफिस के काम से जनाब! आपने मना कर दिया है। महत्वपूर्ण डील है। इस काम के लिए स्टाफ से कोई नहीं जाएगा। जाना तो आपको होगा ही।"
"कहीं नहीं जाना मुझे। कोई काम तुमसे इम्पोर्टेन्ट नहीं मेरे लिए। और तुम्हें ये उल्टी-सीधी ख़बरें कौन देता है?"
"मेरे जासूस, जो तुम्हारी पल-पल की ख़बर देते हैं मुझे। और जाना तो तुम्हें पड़ेगा।"
"तुम अकेली कैसे रहोगी देवयानी?"
"जैसे पहले रहती थी। और मैं कोई बच्ची नहीं देव।"
"मैं तो हूँ न।"
"तुम तो सच में बच्चे ही हो।"
"अब चलो फिर। नींद आ रही मुझे।"
"तो तुम जाकर सो जाओ। मुझे काम है अभी।"
"कोई काम नहीं अब। चलो।"
"अरे दो मिनट तो रुको। ऐसे खींच कर कहाँ ले चले?"
"सोने। तुम्हें आँखों में नहीं भरूँगा तो नींद नहीं आएगी। तुम जानती हो फिर भी तंग करती हो!"
"देव!"
"क्या देव!"
"अभी तो किचिन में बिस्तर लगवा रहे थे?"
"हाँ तो और क्या करूँ?"
"मज़ाक में ही सही पर आइडिया बहुत अच्छा दिया तुमने। तुम अंदर कमरे में जाकर सो जाओ। मैं तो किचिन में ही बिस्तर लगा लेती हूँ।"
"देवू!"
"आइडिया किसका था देव!"
"तुम चलती हो कि तुम्हें उठाकर ले जाऊँ!"
"हाँ, यह आइडिया भी बुरा नहीं।"

देव के मज़बूत हाथों में वो कोमल गुड़िया-सी लग रही थी। देव की आँखों में छलकते हुए असीम प्यार को देख उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। किचिन से बेडरूम तक का लम्हों का सफ़र उसे ज़िंदगी का सफ़र महसूस हुआ। देव की शिद्दतों से वो घबरा जाती कि हज़ार वसवसे मन में उठने लगते। देव उसके डर पर मुस्कुरा देता कि उसकी जान देवयानी में अटकी है। फिर काहे का डर! सामने से शर्मिष्ठा चली आ रही थी। वो अतीत के कोमल लम्हों से वर्तमान के कठोर धरातल पर आ गई। उसका डर सही तो साबित हुआ था।

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597