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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

शुभदा मिश्र की कहानी 'युगान्तर'

शुभदा मिश्र की कहानी 'युगान्तर'

जब यह रसूख़दार आदमी इतनी ज़मीन घेर रहा है, तो हम क्यों न घेरें। अब तक उन घरों में नई पीढ़ियाँ आ चुकी थीं। यह नई पीढ़ी तो और भी शिक्षित, संपन्न, अमीरी और दिखावे के मारी ही थी। कानून के प्रति सहज बेपरवाह। सो वह सब भी अधिक से अधिक जगह घेरने लगे, बाकायदा दीवाल बनाकर। उस रसूख़दार ने तो शायद पूरा व्यावसायिक कॉमप्लेक्स बनाने की ही योजना बना डाली थी। बाक़ी कब्ज़ा करने वालें में भी मानो होड़ लग गई।

दोपहर का समय। अपने आँगन में बैठी सब्जियाँ काट रही थी मैं। अचानक सिर उठाया तो देखा, आँगन की बाउन्ड्रीवॉल के बाहर उठता हुआ धुँए का गुबार। काले-काले सघन धुँए का गुबार ऊपर बढ़ता हुआ, ऊपर और ऊपर....आकाश में फैलता। भयानक भुजंग।
उठकर भागी मैं। बाउन्ड्रीवॉल के बाहर झाँका। बाउन्ड्रीवॉल के बाहर खड़े विशालकाय बबूल के पेड़ के नीचे रखा पहाड़-सा कचरे का ढेर जल रहा था। जलते कचरे के ढेर से निकलता धुआँ आसमान छूने बढ़ा जा रहा था। आग की लौ पेड़ के विशालकाय तने को अपने लपेटे में ले रही थी। तना अब सुलगा कि तब। मैंने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। कहीं कोई नहीं। न कचरे के ढेर के पास, न आसपास की बिल्डिंगों की छतों, बालकोनियों से झाँकता कोई चेहरा। अभागे बबूल-वृक्ष को झुलसते देखने वाली अकेली मैं, जिससे देखा नहीं जा रहा था।

वैसे कुछ दिन पहले ही भारी आहटें सुनी थीं मैंने। ऐसे ही दोपहर का समय, ऐसे ही काम छोड़कर बाउन्ड्रीवॉल के बाहर झाँका था मैंने। तब देखा था, एक बलिष्ठ मज़दूर फावड़ा टँगिया लिये आसपास फैले कचरे को उस बबूल वृक्ष के नीचे इकट्ठा कर रहा था। बल्कि सारा कचरा उस बबूल वृक्ष के वृहदकाय तने से सटाने में जुटा हुआ था। और कचरा भी क्या था, उसी बबूल वृक्ष की काटी गयी शाखाएँ। कुछ दिन पहले ही काटी गई थीं ये शाखाएँ। जैसे वह बबूल वृक्ष भारी भरकम विशाल, वैसे ही भारी भरकम विशाल उसकी शाखाएँ। कटी हुई शाखाएँ वहीं अस्त-व्यस्त पड़ी हुई थीं। वह बलिष्ठ मज़दूर उन भारी भरकम शाखाओं को टँगिये से काटकर छोटा करता और बबूल वृक्ष के तने से सटाकर रखता। रखता ऐसे, जैसे चिता जलाने के लिये लकड़ियाँ जमाते हैं। उस समय भी पास-दूर कहीं कोई सूरत नज़र नहीं आई थी। देखने वाली सिर्फ मैं। मगर मुझे बिल्कुल भी समझ नहीं आया था कि यह तो इस विशालकाय बबूल वृक्ष को ज़िंदा जलाने की चिता है।

उस विशालकाय बबूल वृक्ष को ख़तम करने का यह नया प्रयास था। पहला प्रयास कई महीने पहले किया गया था। उस पहले प्रयास में इस बबूल वृक्ष को कटवाकर सीधे ही ख़तम कर देने की योजना थी। उस समय भी ऐसा ही दोपहर का सन्नाटा था। ठाँय-ठाँय कुल्हाड़ी चलने की आवाज़ आई थी तो मैंने बाउन्ड्रीवॉल के बाहर झाँका था। वृक्ष कटते देख फौरन नगर पालिका को ख़बर की थी। नगरपालिका से कोई आदमी आया और वृक्ष काटना रुक गया। "पेड़ कटवाना तो गैरकानूनी है, इस कमबख्त महिला ने देख भी लिया है।" सो रुक गए। सोच-विचार कर वृक्ष को सीधे जला देने की योजना रची गई। ऐसा ही दोपहर का सन्नाटा। जड़ और तने पर पेट्रोल डालकर आग लगाई गई थी। ऐसा ही धुँए का आसमान छूता गुबार दिखा था मुझे अपने आँगन से। ऐसे ही आँगन की बाउन्ड्रीवॉल से झाँका था मैंने। वृहत्ताकार तना धू-धू कर जलता हुआ। लाल-लाल लपटें धुँए के काले-काले गुबार छोड़ती। गुबार के भयावह ढेर आसमान की ओरं बढ़ते। फैलते। एकदम थर्रा गई थी मैं। चारों ओर नज़र दौड़ाई। आसपास की शानदार बिल्डिंगों में कहीं कोई नहीं। जलते हुए वृक्ष से कुछ दूर, कुछ ओट में दो-तीन लोग दिखे मुझे। मैं ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ देने लगी- "ये कौन हैं आप लोग? यह क्या कर रहे हैं?"
मेरी आवाज़ गूँजने लगी। आख़िरकार एक व्यक्ति सामने आया। इस व्यक्ति को मैं पहचानती थी। शहर का भारी रसूख़दार व्यक्ति था। कुछ हँसते हुए बोला- "कुछ नहीं कचरा जला रहे हैं।"
"कचरा जला रहे हैं? आप तो पूरा वृक्ष जला रहे हैं।"
वह व्यक्ति पास खड़े लोगों से बोला- "बुझा दो भाई आग।"
पास खड़े उसके लोग उसकी नई बनती बिल्डिंग के भीतर लगी पानी की लंबी पाईप लाकर आग बुझाने लगे।

उस समय तो मुझे लगा, मैंने एक ग़लत काम होने से रोक दिया है पर मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। अगली सुबह मेरे घर के सामने लगे हुए बिजली के मीटर का ढक्कन टूटा हुआ मिला। दरवाज़े के सामने लटकता हुआ टूटा ढक्कन बड़ा बुरा लग रहा था। अपशकुन-सा। मैंने किसी तरह उसे ठीक करने की कोशिश की। दूसरे दिन फिर वही लटकती हुई स्थिति। मैंने फिर जमाया। तीसरे दिन फिर वही। चौथे दिन पूरा मीटर ही लटका दिया।

निश्चय ही आप यह जानना चाहते होंगे कि यह रसूख़दार व्यक्ति कौन था और आपकी बाउन्ड्रीवॉल के बाहर खड़े उस विशाल वृक्ष को क्यों जला रहा था। दरअसल मेरे आँगन की बाउन्ड्रीवॉल के बाहर एक विस्तृत ज़मीन थी। यह ज़मीन किसी ज़माने में एक तालाब हुआ करती थी। तालाब सूख गया था सो तालाब की जगह बड़ी-सी ख़ाली ज़मीन नज़र आने लगी थी। नगरपालिका ने घोषणा कर दी कि उस ज़मीन पर 'बाल-उद्यान' बनायेगी यानी 'चिल्ड्रन-पार्क'। काफी समय हो गया। ढीली-ढाली नगरपालिका बाल-उद्यान बना नहीं पाई। सो तालाब के चारों ओर रहने वालों की मौज हो गई। उनके घर का सामना तो सड़क की ओर था और पिछवाड़ा तालाब की ओर। तालाब तो अब सूखकर ख़ाली ज़मीन हो चुका था। सो उन लोगों ने अपने पिछवाड़े का हिस्सा आगे बढा़ते हुए ख़ाली ज़मीन का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा घेर लिया था। कुछ ने लकड़ी की खपच्चियों से, तो कुछ ने झाड़ियों से। यह रसूख़दार आदमी तालाब के किनारे नहीं रहता था। शहर के रौनकदार हिस्से में इसकी अपनी शानदार रिहायशी बिल्डिंग थी। और भी कई बिल्डिंगें थी। दूकानें थीं। गोदाम थे। कई तरह के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कारोबार थे। इसने इस तालाब के किनारे रहने वाले एक व्यक्ति से उसका मकान ख़रीद लिया। बेचने वाले ने तो थोड़ी ही ज़मीन घेरी थी, इसने बेहिसाब ज़मीन घेरना शुरू किया। यह ज़मीन तो अधिक से अधिक घेरना चाहता था पर रास्ते में खड़ा था विशाल बबूल का पेड़। प्रकृति की गोद में पैदा हुआ, पला-बढ़ा, निर्द्वंद खेला, मस्ती से आसमान छूता, यह बबूल वृक्ष कुछ विशेष ही बलिष्ठ, सघन,दमदार बल्कि विशाल हो चुका था। वह रसूख़दार उस विकराल बबूल़ को छू नहीं पाया। बबूल के पेड़ से दो हाथ पहले ही घेरा बना पाया। घेरा कोई तारों या लकड़ी की खपच्चियों का नहीं। बाकायदा दीवाल बनाकर। जब दीवाल की नींव खोदे जाने की, आवाज़ें होने लगी थीं तो मैंने पहली बार बाउन्ड्रीवॉल से झाँका। एकदम बिगड़ी। यह क्या कर रहे हैं आप, यह तो नगरपालिका की ज़मीन है। उसका मुँह फूल गया था। उसे तो ऐसा सवाल करने वाला कोई नहीं था बल्कि जिन लोगों ने थोड़ी जगह घेरी थी, उनकी भी आँखें चमकने लगीं थीं। जब यह रसूख़दार आदमी इतनी ज़मीन घेर रहा है, तो हम क्यों न घेरें। अब तक उन घरों में नई पीढ़ियाँ आ चुकी थीं। यह नई पीढ़ी तो और भी शिक्षित, संपन्न, अमीरी और दिखावे के मारी ही थी। कानून के प्रति सहज बेपरवाह। सो वह सब भी अधिक से अधिक जगह घेरने लगे, बाकायदा दीवाल बनाकर। उस रसूख़दार ने तो शायद पूरा व्यावसायिक कॉमप्लेक्स बनाने की ही योजना बना डाली थी। बाक़ी कब्ज़ा करने वालें में भी मानो होड़ लग गई।

नहीं, चुप नहीं बैठी मैं। सबसे पहले मैंने नगरपालिका को ख़बर की। फिर जिलाधीश को पत्र लिखकर सूचित किया। फिर अख़बार में एक लेख लिखा। मेरे लेख के छपने के बाद कई प्रमुख समाचार पत्रों ने विस्तृत रपट छाप दी। शासन में हरकत हुई। अवैध निर्माण कार्यों को ढहाने बुलडोजर आ गया। बुलडोजर देख भीड़ जमा हो गई। सारे अवेध कब्ज़ा करने वालों के चेहरों पर हवाईयाँ उड़ने लगीं। दौड़े अपने नेता के पास। उन दौड़ने वालों का अगुआ यही रसूख़दार। रसूखदार का संबंध राज्य के भारी सियासी नेताओं से। दो मिनट की गुप्त मंत्रणा और बुलडोजर लौटा उल्टे पाँव। भीड़ को कहा गया कि कल नाप-जोख करनेवाले कर्मचारी आयेंगे। दूसरे दिन सुबह से भारी हलचल। मुझे लगा नाप-जोख करने वाले आ गये। बाउन्ड्रीवॉल से झाँका। अवाक् देखती रही। वहाँ कहाँ नाप-जोख करने वाले कर्मचारी! वहाँ तो डटे हुए हैं सैंकड़ों बल्कि हज़ारों मज़दूर, मिस्त्री, ईंजीनियर। सारे अवैध कब्ज़ाधारी मानो रातों-रात अपनी बिल्डिंगें खड़ी कर लेना चाहते हों। मज़दूर, मिस्त्री, ईंजीनियर पिले रहे दिन-रात। देखते-देखते बिल्डिंगें खड़ी हो गईं। एक से एक आकर्षक डिजाईनों की। पलस्तर, रंग-रोगन सब हो गया। दमकने लगीं वे शानदार बिल्डिंगें। उनके हाते-बालकोनियों में खिलखिलाने लगे मनोहारी बाग़-बगीचे। संपन्न, सुशिक्षित, आकर्षक परिवारों की छवि नज़र आने लगी उन बिल्डिंगों के झरोखों, बालकोनियों, छतों से। लचर प्रशासन आँख मूदें रहा। सभ्य संपन्न शहरी दाद देते रहे कि कितनी होशियारी से अवैध काम को वैध बना रहे हैं। बाक़ी तो सदियों से मानते आये हैं 'समरथ को नहीं दोष गुसाईं'। इस भारी समरथ रसूख़दार की लालसा पीगें भरने लगी। बाक़ी अवैध कब्ज़ा करनेवालों की बिल्डिंगें सज-संवर कर आबाद हो गईं। मगर इसका निर्माण रूका ही नहीं। इसके आकाक्षाओं के नये-नये भवन उठने लगे। सामुदायिक भवन, तो होटल, तो माल। मगर कुढ़न भी बढ़ती गई। "यह कमबख्त बबूल न होता तो और भी जगह घेर सकता था। सो सबसे पहले तो इस बबूल को कटवाना है।" जैसे ही कुल्हाड़ी चलने की आवाज़ आई थी, मैंने झाँक दिया था, वृहदाकार तने पर दना-दन चलती कुल्हाड़ी। फौरन नगरपालिका को ख़बर कर दी थी मैंने। एक कर्मचारी आया। रसूख़दार से शायद समझौता हुआ, "कुछ दिन रूक जाइये।" कुछ दिन रूककर इसने पेट्रोल डालकर जलाने वाली योजना बनाई। सुलगता हुआ बबूल का तना धुआँ छोड़ने लगा कि मैंने फिर झाँक दिया। टोका, बिगड़ी। उसे पानी डलवाकर बुझाना पड़ा। पर उसका शातिर दिमाग़ चलता रहा। "तना काटकर पूरा पेड़ कटवा नहीं सकते। पेट्रोल डालकर जला नहीं सकते।" अब उसने इसकी विशाल शाखाएँ कटवानी शुरू कीं कि ये शाखाएँ उसके निर्माण कार्य में बाधा डाल रही है।" कुछ शाखाएँ उसके निर्माण कार्य की तरफ थीं भी, बाक़ी दूसरी तरफ। मगर यह कटवाये चला गया। जब शाखाएँ कटवाने की आवाज़ें आई थीं, मैंने फिर झाँक दिया था। रसूख़दार और उसके गुर्गे तो कहीं छुपे हुए थे। सो मैं अपने मोबाइल से शाखाएँ काटने की तस्वीरें लेने लगी। तस्वीरें लेते देख कुल्हाड़ी लिये, पेड़ काटते मज़दूर भाग लिये। आसमान छूता शिखर का हिस्सा बच ही गया।
मैंने शहर के एक धाकड़ पत्रकार को बुलाया, जो किसी समय मेरा छात्र रह चुका था। तस्वीरें दिखाईं। उसने सब तस्वीरें अपने मोबाइल पर ले लीं। मैंने पूछा, तुम इनका क्या करोगे? उसने कहा कि ऐसे अवैध धंधे करनेवालों की तो गर्दन पकड़ते हैं अवैध धंधों पर ही फलने फूलने वाले गिरोह। अगर अवैध धंधे करने वाले न हों तो अवैध धंधों पर पनपने वाले गिरोह तो भूखों मरेंगे। आप तो अब सब मुझ पर छोड़ दीजिये। मैंने उसके विवेक पर छोड़ दिया।

हाँ, मुझे अपनी गुस्ताखियों की कीमत चुकानी पड़ती। घर के सामने लगा बिजली का मीटर तो मेरे पहले विरोध के साथ ही उखाड़ने लगे थे। फिर जितनी बार मैं विरोध करूँ, उतनी बार नई यंत्रणाएँ। कभी आँगन में गंदगी पड़ी मिलती। कभी आँगन के शौचालय का दरवाज़ा उखाड़कर ले गए। कभी आधी रात को कोई मेरा नाम लेकर आवाज़ें लगाता। कभी घर के सामने कोई शराबी हुड़दंग करे। वैसे लोग मेरा बहुत सम्मान करते हैं। मगर इन मामलों में कोई कुछ न बोले।
शाखाएँ काटने की घटना के बाद मैं दिल को तसल्ली देने लगी कि भले शाखाएँ कट गई, पर पेड़ तो बच गया, लुंजपुंज ही सही। ज़िंदा है, फिर कपोल फूटेंगे, फिर शाखाएँ उगा लेगा। ऐसी ही विशाल। ऐसी ही सघन पत्तों से भरी। मस्त। दमदार। हवाओं में झूमता। पंछियों का बसेरा। नेत्रों को लुभावना। चित्त को आनंददायी। पर एक दोपहर फिर पिछवाड़े भारी आहटें सुनीं। फिर झाँका। देखा, एक पहलवान-सा बलिष्ठ मज़दूर उन कटी हुई भारी-भरकम शाखाओं को काट काटकर छोटे-छोटे टुकड़े कर रहा है। उन मोटे-मोटे टुकड़ों को ठूंठ से खड़े उसे अभागे बबूल के तने से सटाकर जमा रहा है, जैसे चिता जमाई जाती है। मुझे अटपटा तो लगा पर सोचा कि मज़दूर लोग शायद बाद में इन टुकड़ों को अपने घर ईंधन के लिये ले जायेंगे। इसीलिये जमा रहा हो।

और आज आसमान छूता सघन धुँए का गुबार देखकर फिर दौड़ी बाउन्ड्रीवाल की ओर। लुंज-पुंज ठूंठ खड़े बबूल को जलाती चिता। उसी की अंग-प्रत्यंग काटकर बनाई गई चिता। बबूल सुलग रहा था। धू-धू कर जलने लगा था। मेरा तो सर्वांग जल उठा। रोआँ-रोआँ मानो चीख उठा- "कोई तो पानी लाओ। बुझाओ इस जलते बबूल को। बबूल पर जल पड़ेगा तो मेरे तन-प्राण शीतल होंगे।" पिछली बार हल्ला मचाया था तो पानी का पाईप लाकर बुझाना पड़ा था। बुझाना पड़ा था क्योंकि वे पेड़ जला रहे थे मगर अभी तो कचरा जलाया जा रहा है। कचरे में आग लगाकर भाग गए हैं। सूनसान है। किसे आवाज़ दूँ। कि अचानक दशकों पुराना एक दृश्य झलकने लगा मेरे सामने। वह साठ का दशक था। मैं छोटी बच्ची थी। विकास की योजनाएँ लगातार बन रही थीं। पर दूर-दराज गाँव-खेड़ों में अभी नहीं पहुँच पाई थीं। हमारा गाँव तो दूर-दराज ही नहीं, बिल्कुल अनजान, अपरिचित, खोया-सोया-सा गाँव। विकास का नाम न जाने, न समझे। हमारे पिछवाड़े की यह ज़मीन तब तालाब थी। तालाब के चारों ओर मकान थे। कच्चे, अधपक्के, झुके-झुके, दबे-दबे-से। झोपड़ियाँ भी थीं। पेड़ भी थे। सामान्य-से फलते-फूलते पेड़। कुछेक के पत्ते झरे हुए। एक तो ठूंठ ही हो चुका था। गर्मी के दिन आये। उन दिनो की भीषण गर्मी। आग उगलता आसमान। जाने कैसे उस ठूंठ से पेड़ में आग लग गई। आग की लपटें जब आसमान छूने लगीं तो पास वाले घरों में दुबके लोग बाहर निकले। धू-धू कर जलता अभागा ठूंठ। देखते ही चीत्कार उठे। हृदय विदारक चीत्कार। सारे लोग बाहर आ गए। कोहराम मच गया। गोया उनके ही अस्तित्व का कोई अभिन्न अंग जल रहा हो। दौड़े घरों से बाल्टियाँ, घड़े, पतीले लेकर। तालाब से पानी ले-लेकर उस ठूंठे पेड़ को बचाने में भिड़ गए। बच्चे, बूढ़े, जवान सभी। स्त्रियाँ भी। साठ की दशक के वे अनपढ, गवाँर, दारिद्य के मारे लोग। तन में चीथड़े-से कपड़े। हाथों में पुरानी, घिसी हुई छेदों वाली बाल्टियाँ, घड़े, पतीले। दौड़-दोड़ कर पानी ला रहे है, बचा रहे हैं, उस ठूंठ को। बचा ही लिया उन कुपोषण के मारे काले कलूटे एक हड्डी के लोगों ने। मरगिल्ले चेहरे अद्भुत हँसी से दमक उठे। आनंददायी देहाती गवांर ठहाके छूटने लगे। बाल्टी, घड़े, पतीले बजा-बजा कर नाचने-गाने लगे। लोग नाचते, पेड़-पौधे झमकते, सरोवर जल चमकता, पूरा पर्यावरण ही मानो आनंदित हो विहँस रहा हो।

और आज हज़ारों पंछियों को बसेरा देने वाला, हमारे पर्यावरण को आश्वस्त करता, वह दमदार प्यारा मसीहा, वह विशाल बबूल, धू-धू कर जल रहा है। बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से। प्रथम चरण, द्वितीय चरण, तृतीय चरण। पहले पूरा पेड़ ही कटवा देने का प्रयास, फिर पेट्रोल डालकर जला देने का प्रयास, फिर शाखाएँ कटवा देने का, फिर उन शाखाओं को जमाकार चिता-सा बनाने का, अंततः आज उस चिता को आग लगाकर पूरे पेड़ को जला देने का उद्यम। अवैध कब्ज़ा करने वालों की चमचमाती बिल्डिंगें पूरी मक्कारी से ताकती खड़ी हैं। उनके भीतर दुबके हैं, सभ्य, सुशिक्षित, सुंदर, संपन्न, सम्मानित लोग। यह तभी बाहर निकलेंगे जब बबूल पूरी तरह जल कर खाक हो जायगा। जब मैं यहाँ से हट जाऊँगी। फिर एक दिन ये ऑक्सीजन देने वाले पौधे लाकर अपने घरों में सजायेंगे। ऑक्सीजन वाले मास्क पहनेंगे। ऑक्सीजन सिलिंडर के लिये लड़ मरेंगे।

बबूल जला। जितनी उसकी वे मज़बूर कटी शाखाएँ अपने ही जनक को जला सकती थीं, जलाईं। अधजले ठूंठ को देखकर मेरी छाती फटती रहती। प्रेत-सा खड़ा बबूल मानो मुझे हर पल धिक्कारता रहता, इतनी ही थी तुम्हारी संवेदनशीलता। इतनी ही औकात। लानत खाती छटपटाती रहती मैं। चिंता में घुली भी जाती, क्योंकि यह अकेला मामला नहीं था। मेरे दाहिनी बग़ल रहनेवाले ने तो अपने पिछवाड़े में विशालकाय 'पीपल का वृक्ष' होते हुए भी भारी ज़मीन कब्ज़ा कर रखा है। पीपल का वृक्ष उसके कब्ज़े के अंदर। उस विशाल पीपल के चलते वह कोई ढंग का निर्माण कार्य नहीं करवा रहा है। सो वह भी मौका पाते ही चुपके-चुपके एक-एक शाखा कटवाता रहता है। एक तो बग़ल है, दूसरे उसकी दीवारें ऊंची। मुझे ठीक से दिख नहीं पाता। मज़े की बात, जब उस ओर से कुल्हाड़ी चलने की आवाज़ आती है, मैं आँगन में आती हूँ कि आवाज़ बंद। मैं उसे पकड़ नहीं पाती। ऐसे कुछ घने पेड़़ और भी हैं। कुछ कब्ज़ाधारियों की बाउन्ड्रीवाल के भीतर, कुछ ऐसे ही ज़रा से बाहर। मेरे घर से काफी दूर पड़ते हैं। अभी ये कब्ज़ाधारी ऐसे ही चुपके-चुपके पेड़ साफ करवा रहे हैं। हिम्मत बढ़ेगी तो ऐसे ही जलवा देंगे। अधिकारियों को लिखकर देख लिया। अख़बार में लिखकर देख लिया। क्या अब मैं भी किसी सियासी नेता से मिलकर अपनी बात कहूँ! मैं कभी किसी सियासी नेता से नहीं मिली। नाम भी ठीक से नहीं जानती किसी का। इतना ही जानती हूँ कि हमारा निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। जो हो, क्या ये मेरी बात सुनेंगे। सुनेंगे तो गंभीरता समझेंगे! ऐसे ही कंटीले उधेड़बुनों में खोई एक दिन अस्त-व्यस्त बदरंग कपड़ों में घर की नालियाँ साफ कर रही थी कि बाहर सड़क पर काफी हलचल-सी सुनाई दी। बाहर निकलकर देखा, एक नेतानुमा व्यक्ति घूम रहा है हमारे मुहल्ले में, किसी प्रचार के सिलसिले में। अपने साथियों के साथ। मध्यम कद का सांवला-सा बेहद सामान्य-सा युवा। पर नेताई तेवर। मैंने पड़ोसी से पूछा, कौन है? बोला, यही तो है हमारा नगरपालिका अध्यक्ष। मेरे घर के सामने जैसे ही वह गुज़रा, मैंने उसे ईशारे से बुलाया- इधर आईये।

अपनी तेवर में चूर युवा नेता को एक बेढंगी, बदरंग महिला का यूँ ईशारे से बुलाया जाना एकदम अच्छा नहीं लगा। वह अनदेखा करने लगा।
मैंने ज़ोर से कहा- आईये आईये, डरिये मत।
मेरे बार-बार डरिये मत, डरिये मत, कहने पर वह टालमटोल करता किसी तरह आया। मैं उसे डरिये मत, डरिये मत कहती भीतर ले चली, आँगन की बाउंड्री वाल के पास। उसे बाउन्ड्रीवाल के बाहर झाँकने को कहा। उसने झाँका। मैंने कहा- देख रहे हें?
वह मेरा ही मुँह देखने लगा।
मैं बोली- देखिये इस विशाल वृक्ष की शाखाएँ काट-काटकर इसे ठूंठ बना दिया गया है। कुछ दिन पहले इसे जलाने की कोशिश की गई। झुलसा हुआ पेड़ दिख नहीं रहा आपको?
बोला- कोई अपना पेड़ काटे चाहे जलाये, उसका हक़ है।
मैं बोली- यह उसका पेड़ नहीं है।
तो किसका है?
नगरपालिका का है।
नगरपालिका का है?
हाँ, यह नगरपालिका की ज़मीन पर खड़ा है।
यह नगरपालिका की ज़मीन है?
आप नगरपालिका अध्यक्ष हैं। आपको नहीं मालूम की यह नगरपालिका की ज़मीन है। इस आदमी ने नगरपालिका की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है। एक से एक बड़े निर्माण कार्य करवाये जा रहा है।
ये आदमी कौन है?
वह ऐसा पप्पू कि मुझसे ही प्रश्न करने लगा। इस आदमी का नाम क्या है? कहाँ रहता है? क्या काम करता हे? यहाँ कैसे आ गया? तंग आकर मैं साथ खड़े आदमियों से बोली- बताओ भई अपने नगरपालिका अध्यक्ष को, कौन आदमी है। किसकी ज़मीन है। किसका पेड़ है।
यहीं के लोग थे। सब जानते थे। पूरा इतिहास ही बताने लगे। कैसे कभी यहाँ तालाब था। कैसे सूखकर ज़मीन बन गया। लोग कब्ज़ा करने लगे। इस महाबली रसूख़दार ने कैसे भारी ज़मीन घेर ली। इसके क्या क्या धंधे हैं। इससे प्रेरणा लेकर बाकी लोगों ने ज़मीनें घेरीं। ये सारी शानदार बिल्डिंगें अवैध ज़मीन पर ही बनी हुई हेंं। अब सब मिलकर अमुक-अमुक कानून का सहारा लेकर इसे वैध बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन लोगों ने कब्ज़ा करनेवालों सभी के नाम भी गिना दिये। उस महाबली रसूख़दार का भी। किस भारी नेता के वरदहस्त से यह सब हुआ है बताते हुए उसकी तारीफ के पुल भी बाँधने लगे कि वाकई में, है वह असल लीडर। धन-बल सब उसकी मुट्ठी में। अपने आदमियों को साफ बचा लेता है। कुछ भी कर लो, उसके चरणों में गिर जाओ। सारे दंदी-फंदी कारोबारी भक्त हैं उसके। भारी वोट बैंक है उसके हाथ में। अपने तो चुनाव नहीं लड़ता पर चुनाव लड़ने वाले जाते हैं उसी की शरण में। क्या जनप्रतिनिधि, क्या प्रशासन, सब सलाम करते हैं उसे। भैया है वह असली लीडर।

मैं मुँह फाड़े उनकी बातें सुन रही थी कि पप्पूजी बोल उठे- आपके बाउन्ड्रीवाल के बाद भी तो इतनी ज़मीन दिख रही है। आप भी उसमें कब्ज़ा कर लीजिये। आपको पेड़ कटने का दुख है। कब्जा कर लीजिये और ख़ूब पेड़ लगाईये।
मैं अवाक् उसका मुँह देखने लगी।
कि उसके एक साथी को मुझ पर दया आ गई। कहने लगा- देखिये मैम, आपसे कब्ज़ा तो होगा नहीं। आप यहाँ जलती-कुढ़ती-सड़ती रहेंगी। यहाँ कब्ज़ा किये ये सारे लोग आपसे कुढ़ते हैं ही। आप तो ऐसा कीजिये, यह जगह छोड़ दीजिये। इस मकान को बेच दीजिये और कहीं और मकान ले लीजिये। हम ये मकान अच्छे दामो में बिकवा देंगे और अच्छी कॉलोनी में बढ़िया मकान दिलवा देंगे। वहाँ आप शांति से रह पायेंगी।

मेरा भेजा उड़ गया। भड़क उठी। हाँ, मैं अपना मकान बेच दूं। घर-बार छोड़कर चली जाऊं अनजान जगह में। क्यों? क्योंकि हमारे ये नेता, ये जनप्रतिनिधि, अवैध कारोबारियों, अपराधियों को कुछ नहीं कह सकते। छू तक नहीं सकते। क्योंकि ये लोग माफिया डॉन के आदमी हैं। मेरे जैसे जाने कितनों से ऐसे ही घर-बार छुड़वाया है इन लोगों ने। हँसता-खेलता संसार उजड़वाया है। हर कहीं लोग प्रताड़ित हैं इन आक्रांताओं से। उनके गुर्गो से। तरह-तरह की प्रताड़ना। नासमझ बेचारे रोते-गिड़गिड़ते जाते हैं जनप्रतिनिधियों के आगे। अब ये जनप्रतिनिधि तो ख़ुद बने है उन्हीं की कृपा से। डरते हैं उनसे। सो भैया, इन आतातायियों के गिरफ्त से मुक्ति पानी है तो अब ऐसे दमदार जनप्रतिनिधि लायेंगे हम जिनसे ये महाबली ही डरें।
वे हँसने.लगे। कहाँ मिलेंगे ऐसे जनप्रतिनिधि?
कहाँ मिलेंगे! अरे आ चुके हैं कुछेक, और आने वाले हैं। पलक पाँवड़े बिछा रहे हैं लोग ऐसे दमदार जाँबाजों के लिये। रेवड़ियाँ बाँटने वाले अब नहीं चलेंगे।
वे चौंके और आने वाले हैं जैसे कि आपको ख़बर हो।
हाँ, मुझे ख़बर है। आपको नहीं। ख़बर है क्योंकि मैं आम नागरिक हूँ। दशकों से एक के बाद एक विभिन्न हालात से गुज़रते, भुगतते, समझते, परखते हम आने वाले कदमों की आहट सहज पहचान लेते हें। हम आम जागरूक नागरिक।
वे भयभीत से मेरा मुँह देखने लगे।

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रचनाकार परिचय

शुभदा मिश्र

ईमेल : smdongargarh@gmail.com

निवास : डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़)

जन्मतिथि- 01 जुलाई, 1948
जन्मस्थान- डोंगरगढ़, ज़िला- राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शिक्षा- एम० ए०
संप्रति- विभिन्न स्कूलों एवं कॉलेजों में अध्यापन, वर्तमान में स्वतंत्र लेखन
प्रकाशन-
सात कहानी संग्रह- मंथन, यहीं कहीं होगी संजीवनी, संदेसा इतना कहियो जाये, हैपी न्यू ईयर, अंतिम स्तंभ, बाबुल, यूँ हसरतों के दाग़, उपन्यासिकाओं का संग्रह- 'तीन उपन्यासिकाएँ', एक उपन्यास- स्वयंसिद्धा प्रकाशित।
सरिता, मुक्ता, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, कादम्बिनी, वामा, मनोरमा, आजकल, वागर्थ, कथादेश, कथा बिंब, साहित्य अमृत, इंडिया टुडे, समरलोक, अक्षरा, शुक्रवार, कथन, नवल, सृजन सरोवर, अभिव्यक्ति, हरिभूमि, देशबंधु, नवभारत, अमृत संदेश, प्रखर समाचार, इतवारी अखबार, सबेरा संकेत, दावा, सत्यचक्र सहित देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
आकाशवाणी, पटना से भी रचनाएँ तथा रायपुर दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम में वार्ताएँ प्रसारित।
पुरस्कार एवं सम्मान-
कादम्बिनी कहानी प्रतियोगिता, सारिका कहानी प्रतियोगिता, प्रेमचंद कहानी प्रतियोगिता आदि में पुरस्कार
स्वातन्त्रयोत्तर श्रेष्ठ बिहारी साहित्यिक सम्मान पुरस्कार, पं० रामनारायण न्यास, पटना द्वारा 1994-95
नगर गौरव सम्मान- सॉनेट क्लब डोंगरगढ़ द्वारा, 1998
साहित्य श्री पुरस्कार- नागपुर त्रिंशताब्दि पुस्तक मेला में सर्वश्रेष्ठ कहानी संग्रह 'मंथन' हेतु, 2001
नगर के टॉप टेन सम्मान- लॉयन्स इंटरनेशनल द्वारा 2006
सप्तपर्णी पुरस्कार- छत्तीसगढ़ साहित्य सम्मेलन द्वारा 2017
कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार- कथा बिंब पत्रिका द्वारा 2021
श्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान- छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा 2022
यूनिसेफ द्वारा आयोजित बाल-पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान संबंधी सम्मान
नारी सशक्तिकरण सम्मान
संपर्क- 14, पटेल वार्ड, डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़)- 491445
मोबाइल- 82695,94598