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सुकेश साहनी की लघुकथा 'उतार' की मीमांसा- सीमा सिंह

सुकेश साहनी की लघुकथा 'उतार' की मीमांसा- सीमा सिंह

लघुकथाएं आकार में लघु होती हैं, वे अपने भीतर गहरे अर्थ संजोए रहती हैं। कई बार आम पाठक के तौर पर हम कथा के उस निहितार्थ तक नहीं पहुँच पाते हैं। लेखक के अभिप्राय तक पहुँचने में कथा की यह मीमांसा पाठकों को सहज सहयोग प्रदान करेगी। इस कार्य का शुभारंभ करने के लिए सुकेश साहनी जी से बढ़कर किसका नाम हो सकता था भला! लघुकथा मीमांसा की श्रृंखला में पहली कथा है- सुकेश साहनी जी की लघुकथा 'उतार'।

(कुआँ खोदने वाले मिस्त्री की डायरी से)
10 मई 1966

कुएँ की सफाई होनी थी। मुझे लगा अगर कुआँ दो फीट और गहरा कर दिया जाए तो ज़्यादा पानी देगा। प्रधान जी को मेरा मशविरा पसंद आया। खुदाई शुरु करते ही गाँव के बहुत से लड़के मेरे साथ जुट गए. दो दिन का काम हमने एक दिन में ही पूरा कर लिया। कुआँ पानी से लबालब हो गया। गाँव की औरतों ने खुशी मनाई, बताशे बाँटे पूरे गाँव में।
कुएँ की कुल गहराई: 30 फीट, चुआन (भूजल स्तर) : 14 फीट

25 मई 1976

आज पंडितों वाला कूप तैयार हो गया। यह दसवां कुआँ है इस गाँव में। मिठाई बाँटी गई- केवल पंडितों में। जबसे इन वोट वालों का आना-जाना शुरु हुआ है, गाँव का माहौल बिगड़ता जा रहा है। पहले दो कुओं से पूरा गाँव पानी लेता था, अब हर जाति का अलग कुआँ है।
कूप की कुल गहराई: 60 फीट, चुआन: 28 फीट

30 जून 1986

आज हरनाम सिंह के घर पर गाँव का पहला हैडपम्प लग गया। शहर से मिस्त्री आया था। ठाकुर के कहने पर उसने बे-मन से मुझे अपने साथ काम पर लगा लिया था। मेरे पास औजार होते तो मैं यह काम उससे कम पैसों में कर सकता था। कुल दो रुपए मज़दूरी मिली। हालात ऐसे रहे तो रोटियों के भी लाले पड़ सकते हैं।
हैंडपम्प की कुल गहराई: 90 फीट, चुआन: 45 फीट

17 जुलाई 1996

मन बहुत उदास है। मेरे द्वारा तैयार किए गए सभी कुओं का इस्तेमाल बंद हो गया है, उनमें कूड़ा करकट भरा हुआ है। उनकी सफाई में किसी की दिलचस्पी नहीं रही। इस बारे में कुछ भी कहो तो सभी मज़ाक उड़ाते हैं। बच्चे मुझे 'सूखा कुआँ' कहकर चिढ़ाने लगे हैं। घर-घर में हैंडपम्प लग रहे हैं। ठेकेदार के पास कई बोरिंग सैट हैं, मनमाने पैसे वसूल रहा है गाँव वालों से। मुझे ज़मीन के नीचे चप्पे-चप्पे की जानकारी है, ठेकेदार इस बात का पूरा फ़ायदा उठाता है, पर मज़दूरी आधी देता है। पाठशाला वाली बोरिंग का काम पूरा हो गया।
बोरिंग की कुल गहराई: 120 फीट, चुआन: 75 फीट
 
25 जुलाई 2006

तीन ठेकेदारों के सात बोरिंग सैट धरती का सीना छेदे डाल रहे हैं। पुराने लोग एक-एक कर ख़त्म होते जा रहे हैं। घर-खेतों का बँटवारा हो गया है। जहाँ चार भाइयों के खेतों पर एक बोरिंग से बखूबी काम चलता था, वहीं बँटवारे के बाद हरेक खेत में एक बोरवैल ज़रूरी हो गया है। हरेक पानी को अपनी मुट्ठी में करना चाहता है। इस बूढ़े शरीर से अब मज़दूरी नहीं होती। काश! मैं एक बोरिंग सैट ख़रीद पाता। दो रोटियों के लिए इन बदमिज़ाज लड़कों के आगे रोज़ ही जलील होना पड़ता है।
नेता जी के फार्म हाउस पर चल रहे बोरिंग के काम ने थका डाला है। काम शुरु हुए आज नौवां दिन है, पर बोरिंग क़ामयाब होती नहीं दीख रही।
कुल बोरिंग: 160 फीट, चुआन: जाने कहाँ बिला गई है!


कथा मीमांसा 
 
सुकेश साहनी जी की लघुकथा 'उतार' समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य की एक प्रतिनिधि रचना है, जो न केवल गिरते भूजल स्तर की पर्यावरणीय चिंता को स्वर देती है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के सूखते स्रोतों और ग्रामीण संस्कृति के क्षरण का भी सूक्ष्म चित्रण करती है। इस कथा की एक बहुत बड़ी विशेषता इसका शिल्प भी है।

'डायरी शैली' में लिखी गई यह कथा मात्र एक कथा न बनकर समय के दस्तावेज़ में बदल गई है। लेखक ने 1966 से 2006 तक के चार दशकों के अंतराल को पाँच अलग-अलग पड़ावों में बाँटकर विकास की उस विडंबना को उजागर किया है, जहाँ तकनीक तो बढ़ी है पर संतोष, तृप्ति और सामूहिकता जैसी भावनाएँ घटती चली गई हैं।

भाषा की दृष्टि से सुकेश साहनी जी ने अत्यंत सरल, बोलचाल वाली सहज भाषा का प्रयोग किया है, जो लघुकथा का अनिवार्य गुण भी है। 'लबालब', 'चुआन', 'बिला गई' और 'चप्पे-चप्पे' जैसे आंचलिक और ठेठ शब्दों का प्रयोग कथा को मिट्टी की सोंधी गंध और यथार्थ से जोड़ता है। मिस्त्री के माध्यम से लेखक ने जो तकनीकी विवरण दिए हैं, वे कथा में विश्वसनीयता उभारते हैं। कथा की भाषा में एक मद्धम-सी उदासी और टीस है, जो अंत तक आते-आते एक चीख़ में बदल जाती है। अंतिम पंक्ति पर पहुँच "चुआन: जाने कहाँ बिला गई है!" लेखक एक ऐसी मार्मिक व्यंजना पैदा करता है, जो पाठक को देर तक सोचने पर विवश कर देती है। यह केवल पानी के ग़ायब होने की सूचना नहीं है, बल्कि उस जीवन-रस और संवेदना के अंत की घोषणा भी है, जो कभी समाज को जोड़कर रखती थी।

शिल्प के स्तर पर 'समय का अंतराल' इस कथा की सबसे बड़ी शक्ति है। डायरी के पन्ने पलटते हुए हम गहराई के बढ़ते आँकड़ों के साथ साथ, मिस्त्री की घटती सामाजिक हैसियत और बढ़ती लाचारी भी महसूस करते हैं। 1966 में जो मिस्त्री नायक है और जिसके परामर्श पर गाँव उत्सव मनाता है, वह 2006 तक आते-आते 'सूखा कुआँ' कहलाने लगता है और दो रोटियों के लिए जलील होता है।

कथा का शीर्षक 'उतार' बहुआयामी है। यह शब्द उतार केवल भूजल का नहीं है, यह  नैतिक मूल्यों, मानवीय गरिमा और सामुदायिक सद्भभाव का भी है। लेखक ने कथा में प्रतीकों का अद्भुत उपयोग किया है। कुआँ, जहाँ सांझा संस्कृति का प्रतीक था, वहीं बोरिंग सैट व्यक्तिगत स्वार्थ और 'मुट्ठी में पानी करने' की होड़ का प्रतीक बनकर उभरा है।

यह रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने रचनाकाल में रही होगी। आज जब दुनिया 'तीसरे विश्व युद्ध' की आशंका पानी के लिए कर रही है, तब यह कथा हमें उस जड़ तक ले जाती है, जहाँ समस्या की शुरुआत हुई थी। यह कथा मशीनीकरण और पूंजीवाद के उस कुरूप चेहरे को बेनक़ाब करती है, जहाँ ठेकेदार और रसूख़दार लोग प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं और पारंपरिक ज्ञान रखने वाला कारीगर हाशिये पर धकेल दिया गया है। जातिगत राजनीति और परिवार के बँटवारे का जो चित्रण 1976 और 2006 की डायरी में मिलता है, वह आज के ग्रामीण भारत की कड़वी हक़ीक़त है। सुकेश साहनी ने बड़ी कुशलता से यह दिखाया है कि कैसे 'विकास' की अंधी दौड़ ने हमें अपनी ही जड़ों से काटकर एक रेतीले भविष्य की ओर धकेल दिया है।

कुल मिलाकर 'उतार' अपनी कसावट भरी शैली और मर्मभेदी कथ्य के कारण एक ऐसी कालजयी लघुकथा है, जो पर्यावरण और मनुष्यता के अंतर्संबंधों को नई दृष्टि प्रदान करती है।

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रचनाकार परिचय

सीमा सिंह

ईमेल : libra.singhseema@gmail.com

निवास : ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 30 नवम्बर 1973 
जन्मस्थान- बदायूँ (उत्तर प्रदेश)
लेखन विधा- लघुकथा एवं कहानी
शिक्षा- स्नातकोत्तर – (हिंदी साहित्य, मनोविज्ञान।) 
संप्रति- महासचिव,शक्ति ब्रिगेड सामाजिक एवम् साहित्यिक संस्था, सदस्य, सम्पादक मंडल, लघुकथा कलश (अर्धवार्षिक पत्रिका) एवं स्वतंत्र लेखन 
प्रकाशन- • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-28 (छह नवोदिताओं की छियासठ कथाएँ), लघुकथा-अनवरत संकलन (साझा संकलन), नई सदी की धमक (साझा संकलन), स्त्री-पुरुष सम्बन्धी लघुकथाएँ (साझा संकलन), उद्गार (सांझा संकलन) सहित चालीस से अधिक साझा संकलनों में सम्मिलित।
• लघुकथा कलश पत्रिका, शोध-दिशा पत्रिका, दृष्टि पत्रिका, साहित्य अमृत पत्रिका, मृगमरीचिका पत्रिका, चेतना पत्रिका, मरु गुलशन के साथ ही पंजाबी पत्रिका गुसाइयाँ में अनुवाद सहित विभिन्न पत्रिकाओं में। • दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान,अमर उजाला, महानगर मेल, लोकजंग सांध्य दैनिक सहित विभिन्न समाचार पत्रों में। • yourstoryclub.com, openbooksonline.com, laghukatha.com, pratilipi.com वेबसाईट, तथा सेतु (Pittsburgh), हस्ताक्षर, अटूट बंधन सहित कई अन्य वेब पत्रिकाओं में
प्रसारण- बोल हरियाणा, रेडियो पर रवि यादव द्वारा लघुकथाओं का पाठ।
सम्मान/ पुरस्कार- कलश लघुकथा गौरव सम्मान - 2017
ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा - महादेवी वर्मा सम्मान - 2017 आशा किरण समृद्धि फाउंडेशन द्वारा - शिक्षा गौरव सम्मान - 2017
रोटरी क्लब इलीट द्वारा - हिंदी भाषा सेवा सम्मान - 2018
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा - विद्या वाचस्पति सारस्वत सम्मान - 2018 रोटरी क्लब कानपुर इलीट द्वारा - वीमेन अचीवर सम्मान - 2019भारत उत्थान न्यास सम्मान - 2019
पुरस्कार: प्रतिलिपि कथा सम्मान प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2017
साहित्य सृजन संवाद कहानी प्रतियोगिता - विशिष्ट कहानी पुरस्कार - 2017
सेतु लघुकथा प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2018
संपर्क- रॉयल नेस्ट टेक ज़ोन -iv, ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर,(उत्तर प्रदेश)-201306
मोबाईल- 8948619547 / 7303311942