Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

सीमा सिंह की लघु कथाएँ

सीमा सिंह की लघु कथाएँ

अपना निर्णय सुनाकर बाहर निकल कर, सामने ही खड़ी मन्नो के सिर पर हाथ फिराते हुए बोले, “अपने बाबा पर भरोसा रखना, तू उसी घर जाएगी जहाँ तेरी ज़रूरत हो। तेरे पिता के ऊँचे ओहदे, और दादा की दौलत की नहीं।”

1-ज़ुराबे

“मेरे मोज़े छेद निकल आया, कितने दिन से बता रहा हूँ! किसी को इतनी फुर्सत नहीं मिल रही ज़रा सा सुई से ठीक कर दे।” ऑफिस के लिए तैयार होते समय जूते पहनते हुए हाथ में मोज़ा उठाया ही था कि छेद वैसा का वैसा ही देखकर आपे से बाहर होकर मोहन बाबू ने मोज़े बाहर फेंक दिए।

मन्दिर से वापस आती पत्नी ने पति का स्वर सुना तो तेज़ कदमों से सीधे कमरें में जा पहुँची।

“अरे! कल सब लोग  सगाई में चले गए थे याद नहीं रहा दूसरे मोज़े देती हूँ इतना शोर क्यों मचा रहे हो सब सो रहे हैं।!”

पत्नी के स्वर की तल्खी मोहन बाबू को और खल  गई, “दूसरे,तीसरे और, और चौथे सब यहीं पड़ें हैं!” हाथ से इशारा कर फर्श पर बिखरे गंदे मोज़े की ढेरी की और पत्नी को ध्यान दिलाया।

“रुको मैं बहू से माँग लाती हूँ बेटे के मोज़े धुले होंगे!” पत्नी के स्वर की सहजता मोहन बाबू के लिए असह्य हो रही थी।

मोज़े लेकर पत्नी की जगह बहू आई और साथ में सामान की सूची भी आगे बढ़ाते हुए बोली,

“पापा जी ये राशन का सामान आना है,वापसी में लेते आइएगा!”

मोहन बाबू ने सिर्फ़ ने मोज़े पकड़े तो बहू ने सूची उनके पास टिका दी और बड़ी बेपरवाही से फर्श पर पड़े उनके गंदे मोज़े को पैरों से कुचलती हुई कमरे से बाहर निकल गई।

अपने ऑफिस बैग  में सामान ठीक कर ही रहे थे कि छोटा बेटा लगभग दौड़ता हुआ कमरें आया,

“ थैंक गॉड पापा, आप अभी निकले नहीं है,ज़रा इस फॉर्म पर साइन कर दीजिए प्लीज़!”

एक उचटती - सी नजर हाथ में पकड़े फॉर्म और बेटे के चेहरे पर डालते हुए मोहन बाबू ने पूछा ,

“क्या है ये?”

“परमिशन फॉर्म है आज लास्ट डेट है सब्मिट करने की, आप यहाँ पर साइन कर दीजिए।”

“ पर परमिशन किस चीज़ की पता तो चले?”

“ स्कूल से गोवा टूर जा रहा है, फादर के साइन और उनका ही चेक लगाना होगा पेमेंट के लिए।” बेटे का स्वर किसी कुशल शात्रीय गायक की भाँति सभी उतार-चढ़ाव बाद भी बेहद मधुर बना हुआ था।

“शाम को बात करते हैं इस पर!” बेहद ठंडे और संयत स्वर में बोलते हुए मोहन बाबू नाश्तें की मेज़ पर आकर बैठ गए थे। तभी अमरबेल - सी लहराती लचकती उनकी लाडली बेटी पीछे से आकर गले में झूल गई,

“पापा, मुझे पाँच  हज़ार रुपए चाहिए पापा!”

मोहन बाबू के मन में उठती स्नेह की नदी जैसे अचानक गर्म तपते पत्थर पर गिर गई। भावनाओं के उद्वेग को सम्भालते हुए उन्होंने बेटी से पूछा,

“ तुम्हारी पॉकेट मनी तो फिक्स है न?”

“पापा कॉलेज की कैंटीन महँगी है न”

“अभी कैश नहीं हैं मेरे पास! शाम को बात करते हैं।”

बिना नाश्ता किए अपना बैग उठा तेज़ तेज़ कदमों से गाड़ी की ओर बढ़ते हुए,जेब से मोबाईल फोन निकालकर कान में लगाया, उधर से हैलो सुनते ही कहा,

“ जी सर, अगर प्रमोशन के लिए ट्रांसफर आवश्यक है तब भी ज्वाइन कर लूँगा! आप देख लीजिए जहाँ भी पोस्ट ख़ाली हो,मैं जाने को तैयार हूँ। मेरा परिवार मेरे बिना रह सकता है।”

 

2- मटर के दाने

“मिल गया प्रवेश पत्र बेटा?”

मानसी की आहट सुन ज़मीन पर सब्जी फैलाए बैठी माँ ने आवाज़ लगाकर पूछा।

“हाँ माँ”

संक्षिप्त -सा उत्तर दे  जग में से गिलास में पानी उड़ेलकर मानसी भी कुर्सी खिसकाकर रसोईघर के सामने ही माँ के पास बैठ गई।

 “आज फिर बिजलीघर के पीछे से सब्जियाँ लेकर आई हो?”

माँ को सब्जियाँ साफ करने में व्यस्त देख मानसी ने पूछा।

“हाँ बिजली का बिल जमा करने गई थी न उधर से वापसी में आते समय लेती आई थी दोपहर के बाद वहाँ थोड़ी सस्ती मिल जाती हैं न!”

“और सड़ी हुई भी !”

मानसी ने झुक कर पालक के साग की गली हुई टहनी हवा में घुमाई और कूड़े में फेंक दी।

पालक, गोभी, धनिया सब साफ कर कपड़े में लपेटकर रखती हुई माँ ने अब मटर की फलियाँ अपने पास सरकाई और मानसी की ओर देखकर पूछा,

“तेरी क्लासेज कब तक चलेंगी? ”

“अभी तो  चल रहीं हैं माँ! अगले हफ्ते के बाद  बंद होगीं।”

“अब कुछ और पैसे-वैसे तो नहीं जमा करना होंगे?” माँ के स्वर में चिंता झलक उठी।

“नहीं माँ, फ़िक्र मत कर मैंने सोच समझकर कॉलेज और विषय चुनें थे।”

सिर झुकाकर मटर छाँटती माँ ने प्रति उत्तर में गहरी साँस छोड़ी जिसकी हवा से उसका अपना ही सफ़ेद सूना  दामन थरथराया और फिर शांत हो उसकी देह से चिपक गया।

अब उसका सारा ध्यान मटर छाँटने में लगा था। जो थोड़ी-थोड़ी खराब हो रही थी. साफ़-साफ़ फलियाँ एक तरफ रख, सड़ी फलियों में से साफ़ दाने निकालने लगी।

“यह अच्छी भली मटर हैं तो माँ, इन्ही को क्यों नही बना लेती?” मानसी ने चुनकर  ढेरी बनाई हुई साफ़ चमकीली फलियों की ओर देखते हुए थोड़ा झुंझलाहट भरे स्वर में कहा।

“वो कल काम आ जाएँगी और ये कल तक खराब हो जाएँगी।” माँ ने साधारण स्वर में कहा।

उस एक पल में मानसी की आँखों के आगे माँ का हर वो समझौता, जो उसकी माँ ने पिता के बाद घर और परिवार के लिए किया था, किसी फिल्म के दृश्य- सा घूम गया।

मानसी ने माँ के हाथ से सब्जी लेते हुए कहा,

“अब बस कर, माँ! एक अच्छे कल का सपना देखने के लिए और कितने आज खराब करेगी अपने?”

 

3-मन का उजाला

हारे जुआरी -सा, पस्त कदमों से, मन ही मन एक क्रूर निर्णय कर जब वह घर में आया, रात गहरा चुकी थी।

 

पत्नी की असामयिक मृत्यु के शोक से उबर भी न पाया था, कि व्यवसायिक पार्टनर के हाथों धोखा खा गया। वह अर्श से फर्श पर आ गया था।

 

“मुन्ना, ओ मुन्ना! अरे सो गया क्या?” उसने बेटे को पुकारा, पर कोई प्रत्युत्तर न पा, कमरे में झाँका।

 

बच्चे सो चुके थे।

 

वह वहीं, उनके पास बैठ गया। कुछ ही देर में मन की थकान से पस्त शरीर पलंग पर फैल चुका था। अँधेरे मे लगातार खुलती बन्द होती पलकों की अबकी बार मुंदने की बारी थी, कि किसी पशु की गुर्राहट जैसी आवाज़ से क्रम तोड़कर आँखें पूरी खुल गईं।

आवाज कमरे के दूसरे सिरे पर सोए हुए बच्चे की दिशा से आई थी। उसने आँखें मसल कर घूरकर देखा, तो वहां किसी स्त्री की -सी छाया थी।

वह कुछ बोल पाता तब तक उस स्त्री ने बड़े बच्चे को अपने आगोश में ले लिया, और दूसरे बच्चे की ओर बढ़ चली।

पिता अपनी सारी ताकत बटोर जोर से चिल्लाया, “कौन है! कौन है वहाँ?”

 

स्त्री ने उसकी आवाज़ पर ध्यान तक ना दिया, और दूसरे बच्चे की ओर बढ़ गई। पिता ने उठना चाहा, मगर शरीर तो जैसे पलंग से बँध गया हो।

बिस्तर पर पड़े-पड़े पिता फिर छटपटाया, ”हटो! दूर हटो, मेरे बच्चों को मत छुओ!”

स्त्री ने सिर उठाकर पिता की ओर देखा और बात को अनसुना कर बच्चे को अपनी ओर खींच लिया।

इस बार पिता ने अँधेरे में भी साफ-साफ देखीं उसकी लाल-लाल आँखे, बिखरे बाल और बढ़े हुए नाखून वाले हाथ, जो उसने अपनी ही जगह पर बैठे हुए छोटे बच्चे की ओर बढ़ा दिए थे।

पिता गिड़गिड़ा उठा, “इसको मत छुओ, इसने तो दुनिया में कुछ भी नहीं देखा है!”

स्त्री ने क्रूर हँसी हँसते हुए छोटे बच्चे का पाँव पकड़कर घसीटना चाहा। पिता ने अपनी संपूर्ण शक्ति समेट कर अपने बंधन तोड़ दिए। बिजली की- सी फुर्ती से वह अपने बच्चों और उस स्त्री के बीच आ खड़ा हुआ।

क्रोध से काँपते स्वर में उसने स्त्री से पूछा, “तू है कौन? और यहाँ मेरे घर में, मेरे बच्चों के पास क्या कर रही है ?” कहते हुए उसने स्त्री के बाल पकड़ लिए थे।

“मैं... मैं भुखमरी हूँ।”

“मेरे घर में कैसे आ गई?”

“अपनी बहन गरीबी के साथ आई थी। हमने इस घर में निराशा और कायरता को आते देखा था... तो चुपके से हम भी घुस आए।”

“मगर तू मेरे बच्चों को क्यों छू रही थी?”

“मैं और मेरी बहन शिकार करते हैं। मैं बच्चों का और बहन बड़ों का।”

आश्चर्य और भय से पिता की पकड़ जैसे ही उसके बालों पर ढीली हुई, वह स्त्री दोनो हाथों से उसको परे धकेलकर भाग निकली।

धक्के से आँख खुली तो पसीने से लथपथ पिता पलंग पर पड़ा था। तीनों बच्चे अब भी गहरी नींद में थे।

भोर का उजाला पर्दे से छन कर कमरे में आ रहा था। उसनें जेब में रात भर से रखी ज़हर की पुड़िया सिंक में बहा दी, और पिता बच्चों के लिए सुबह की चाय बनाने लगा।

 

4- दूध का जला

गुस्से से भुनभुनाते हुए अमरनाथ ने जैसे ही आँगन में कदम रखा, सामने ही फर्श पर पड़े गिलास पर खीज उतारते हुए, उसे ज़ोर से ठोकर मारी। गिलास नाचता हुआ, घर की नीरवता को झंकृत करता, दूसरे कोने में जा दीवार से टकराकर शांत हो गया।

“दिखा ले जितना गुस्सा दिखाना है! मैं भी बाप हूँ तेरा! मन्नो की शादी वहीं होगी जहाँ मैं हामी भरुँगा।” पिता अपने कमरे में से ही क्रोधित स्वर में डकराये।

घर की स्त्रियाँ समझ चुकीं थी, कि हर बार की तरह इस बार भी अमरनाथ का पसन्द किया रिश्ता पिता को समझ में नहीं आया, और रिश्ता तय होने से पहले ही टूट गया है। क्योंकि यह पहली बार नहीं था जब रिश्ता देखने गए पिता-पुत्र आपस मे उलझते हुए लौटे हों।

“पिता जी के कहे में रहे न, तब तो हो ली लड़की की शादी!” अमरनाथ क्रोध से भन्ना रहा था।

बीच-बचाव करने की गरज से माँ ने अमरनाथ के पास जाकर पूछा, “अरे, अब क्या हुआ, बेटा?”

बहू के हाथ से पानी का गिलास ले, बेटे को पकड़ा कर, उसके ही कंधे का सहारा ले बगल में बैठ गई।

माँ को समर्थन में पाकर अमरनाथ फट पड़ा, “अच्छे खाते-पीते लोग हैं। लड़का डॉक्टर है। अब कुछ तो उम्मीद उन्होंने भी लगा रखी होगी ही न! वो लोग गाड़ी चाहते हैं… हमारा बजट पूछा। पिताजी को इतने भर से लालच दिख गया उनका!”

“अच्छा! तू चिंता न कर अभी बात करती हूँ इनसे।” कहती हुई माँ ने पिताजी के कमरे का रुख किया, तो भीतर से आती बहू की आवाज़ सुन ठिठकी।

“आप परेशान मत होइए, बाबूजी! वो आपसे ऊपर थोड़े ही हैं।”

“पर, बहू, कोई इनसे भी तो पूछो! आज के ज़माने में बिना लेन-देन के शादी मुमकिन है? फिर हम समरथ हैं, तो क्यों न दें अपनी बिटिया को।” माँ ने उनकी बातचीत में शामिल होते हुए कहा।

“ये तुम कहती हो, अमर की माँ? हमने अमिता की शादी में इन छोटी-छोटी बातों पर ही तो ध्यान नहीं दिया था।”

“पर एक बार गलत लोग मिल गए, तो ज़रूरी तो नहीं सब वैसे ही हों।” अपनी बेटी का ज़िक्र आते ही माँ का स्वर नम हो गया था।

"सुनो, अमर की माँ! हम अपनी बेटी को गवाँ चुके हैं… इसी लिए, पोती के मामले में हर कदम फूँक -फूँक कर रखना है!”

अपना निर्णय सुनाकर बाहर निकल कर, सामने ही खड़ी मन्नो के सिर पर हाथ फिराते हुए बोले, “अपने बाबा पर भरोसा रखना, तू उसी घर जाएगी जहाँ तेरी ज़रूरत हो। तेरे पिता के ऊँचे ओहदे, और दादा की दौलत की नहीं।”

******************

 

 

0 Total Review

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

सीमा सिंह

ईमेल : libra.singhseema@gmail.com

निवास : ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 30 नवम्बर 1973 
जन्मस्थान- बदायूँ (उत्तर प्रदेश)
लेखन विधा- लघुकथा एवं कहानी
शिक्षा- स्नातकोत्तर – (हिंदी साहित्य, मनोविज्ञान।) 
संप्रति- महासचिव,शक्ति ब्रिगेड सामाजिक एवम् साहित्यिक संस्था, सदस्य, सम्पादक मंडल, लघुकथा कलश (अर्धवार्षिक पत्रिका) एवं स्वतंत्र लेखन 
प्रकाशन- • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-28 (छह नवोदिताओं की छियासठ कथाएँ), लघुकथा-अनवरत संकलन (साझा संकलन), नई सदी की धमक (साझा संकलन), स्त्री-पुरुष सम्बन्धी लघुकथाएँ (साझा संकलन), उद्गार (सांझा संकलन) सहित चालीस से अधिक साझा संकलनों में सम्मिलित।
• लघुकथा कलश पत्रिका, शोध-दिशा पत्रिका, दृष्टि पत्रिका, साहित्य अमृत पत्रिका, मृगमरीचिका पत्रिका, चेतना पत्रिका, मरु गुलशन के साथ ही पंजाबी पत्रिका गुसाइयाँ में अनुवाद सहित विभिन्न पत्रिकाओं में। • दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान,अमर उजाला, महानगर मेल, लोकजंग सांध्य दैनिक सहित विभिन्न समाचार पत्रों में। • yourstoryclub.com, openbooksonline.com, laghukatha.com, pratilipi.com वेबसाईट, तथा सेतु (Pittsburgh), हस्ताक्षर, अटूट बंधन सहित कई अन्य वेब पत्रिकाओं में
प्रसारण- बोल हरियाणा, रेडियो पर रवि यादव द्वारा लघुकथाओं का पाठ।
सम्मान/ पुरस्कार- कलश लघुकथा गौरव सम्मान - 2017
ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा - महादेवी वर्मा सम्मान - 2017 आशा किरण समृद्धि फाउंडेशन द्वारा - शिक्षा गौरव सम्मान - 2017
रोटरी क्लब इलीट द्वारा - हिंदी भाषा सेवा सम्मान - 2018
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा - विद्या वाचस्पति सारस्वत सम्मान - 2018 रोटरी क्लब कानपुर इलीट द्वारा - वीमेन अचीवर सम्मान - 2019भारत उत्थान न्यास सम्मान - 2019
पुरस्कार: प्रतिलिपि कथा सम्मान प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2017
साहित्य सृजन संवाद कहानी प्रतियोगिता - विशिष्ट कहानी पुरस्कार - 2017
सेतु लघुकथा प्रतियोगिता - प्रथम पुरस्कार - 2018
संपर्क- रॉयल नेस्ट टेक ज़ोन -iv, ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर,(उत्तर प्रदेश)-201306
मोबाईल- 8948619547 / 7303311942