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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

सन्दीप तोमर की कहानी 'माय लाइफ इज़ नो मोर'

सन्दीप तोमर की कहानी 'माय लाइफ इज़ नो मोर'

"लेकिन क्या? तुम्हारी ख़ामोशी कंचन को खलती रही और तुम… तुम उसके सपनो से अंजान बने रहे या अंजान बनने का स्वांग रचते रहे। कब तक ... आखिर कब तक... कोई तुम्हारी ख़ामोशी को बर्दाश्त करता?"

 

"घर यानि चारदीवारी से निर्मित आकाश। बंद दीवारे बिना खिड़की के और छत में एक छोटा सा छेड़, जिससे सूरज की रोशनी, धूप की हल्की तपिश और कभी-कभार बारिश की चंद बूँदे नाजिल हो जाया करती हैं। इस सीमाओं में बंधे रहस्यमयी आकाश के कुछ कायदे कानून हैं जिन्हें समाज निर्मित कहना ही उचित होगा क्योंकि इन्हें किसने बनाया, आज तक ये रहस्य ही बना हुआ है, जैसे कंचन का मन मेरे लिये रहस्य है।"

 

इन समाज के बनाये कायदे कानूनों ने कितने व्यक्तित्व नष्ट किये उसका अनुमान लगाना भी नामुमकिन होगा। मैंने जब कभी विचारों को चारदीवारी से ऊँचा करना चाहा, कंचन... हाँ कंचन ने मुझे मेरी हदें निर्धारित करने की चेतावनी दे डाली।

 

मेरा घर जो शायद घर बना ही नहीं, आज अपनी ऊँची दीवारों के साथ खड़ा अट्टाहस कर रहा है। यह अट्टाहस धीरे-धीरे चीख में तब्दील हो उठता है। उसी घर के कोने में एक छोटा- सा कमरा है। कमरे के दायीं ओर एक टूटी -सी मेज, मेज की हालत मेरी हालत से मेल खाती है, साथ में एक कुर्सी जो उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना मेरा अस्तित्व अर्थात मैं। मैं अर्थात आज़ाद ख्याल का पुरानी कलम का अदना सा सिपाही। मेरी सिपाहियत इस बात में है कि हर एक गलत बात जो सुधार की गुंजाइश लिए होती है, मेरे लिए नागवार गुजरती है। तब मैं उसे व्यवस्था के अनुकूल/विपरीत देखने लगता हूँ। हालांकि ये दीगर बात है कि मैं स्वयं को व्यवस्था में होकर भी उसका हिस्सा मानने से परहेज करता हूँ। व्यवस्था समाज के चंद लोगो की बनायीं रांड है जिससे हर वर्चस्वशाली मौका लगने पर सहवास (अक्सर बलात्कार) कर लेता है। ऐसी व्यवस्था के साथ किसी घटना की तारतम्यता को देखना या सूत्र खोजना मुझे स्वयं भी मूर्खता ही लगती है, तब मेरा मन खीज उठता है जो अक्सर चीख में बदल मेरे रोम-रोम को झकझोर देता है। आज मैं जब कमरे की टूटी मेज के साथ रखी पुरानी कुर्सी पर बैठा हूँ तो मेरे घर की दर्दनाक चीख मेरे अंदर उभरती प्रतीत होती है। मुझे आभास होता है जैसे यह चीख मेरे अकेलेपन की चीख है।

मैं अपने अकेलेपन को खोजने लगता हूँ। उससे बतियाना चाहता हूँ। अकेलापन खामोश है, निश्चाप, नि:शब्द। अचानक एक हलचल होती है, मैं पाता हूँ अपने होंठों का एकाएक कंपकंपाना। शायद अकेलापन कुछ कहना चाहता है। अंदर से शब्द सक्रिय होते मालूम हुए। जैसे रुई का एक फोहा अचानक हृदय की तकली पर थिरक उठा है और एक मोटा उबड़-खाबड़ धागा निकला, जो महीन होना ही नहीं चाहता। शब्द वायु में प्रवाहित होते हैं- क्यों मेरा मौन भंग करने पर आमादा हो?

"मैं, कहाँ?"

"जानते हो मैं कौन हूँ?"

"अ... हाँ… तुम... और कोई नहीं... मेरा अकेलापन...।"

"मैं था कभी तुम्हारा अकेलापन लेकिन आधुनिकता और पुरातन के बीच झूलते तुम्हारे उदगारों ने मुझे अकेले रहने नहीं दिया… तुम मेरे जीवन के अकेले जिम्मेदार…।"

"आ... हाँ... शायद मैं ही... लेकिन...।"

"लेकिन क्या? तुम्हारी ख़ामोशी कंचन को खलती रही और तुम… तुम उसके सपनो से अंजान बने रहे या अंजान बनने का स्वांग रचते रहे। कब तक ... आखिर कब तक... कोई तुम्हारी ख़ामोशी को बर्दाश्त करता?"

"ओह! प्लीज बंद करो ये वार्तालाप। मैं उसे याद करना नहीं चाहता। कंचन एक बीता हुआ कल है, मात्र कल। और भूत के सहारे चलना मेरी फितरत नहीं। मैं फिसलन का आदी नहीं। भूत सिर्फ फिसलन देता है।"

"यही तो तुम्हारी विवशता है... तुम जो हो न, तुम कितनी ही बातों को झुठलाने का बहाना करते हो, पर जानते हो सच क्या है? सच ये है कि तुम कंचन को भुला नहीं पाए। चलो थोड़ी देर के लिए मैं अपने अस्तित्व को झुठला देता हूँ, मैं यानि तुम्हारी ख़ामोशी, तुम्हारा अकेलापन।"

अचानक मुझे चेतना आती है, मैं अनुभव करता हूँ मेरे शरीर पर पसीने की बूँदें चूँ पड़ी हैं। मेरा कुर्ता गीला है और बढ़ी हुई काली-सफ़ेद दाढ़ी से पानी की धारा बहती हुई गर्दन तक आ गयी है। मेरी साँसे फूल रही हैं। मैं जैसे स्वयं पर नियंत्रण खोता जा रहा हूँ। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है, अँधेरे में सब कुछ काला है, जैसे यह अमावस की रात है। मेरा मस्तिष्क शून्य में विचरण करने लगता है। यह विचारों की शून्यता का क्षण है। मैं सब कुछ भूल जाना चाहता हूँ। स्वयं को, स्वयं के अस्तित्व को, कंचन को, सबको भूल जाने की कोशिश में मैं बराबर नाकामयाब रहता हूँ। अँधेरा अचानक मुझे मेरे अतीत में धकेल देता है। घटना-दर-घटना, एक चलचित्र मेरी आँखों के सामने चल रहा है।

कंचन ने कहा- "सुदीप कल मैं अपनी बहन की शादी में जा रही हूँ। तुम नहीं चलोगे?"

"कंचन तुम मेरी व्यस्तताएँ देख रही हो, सरकारी नौकरी की मजबूरियाँ भी अच्छे से जानती हो। फिर मैंने अपने कार्यालय में नियमित जाता हूँ बिना नागा किये। मेरे लिए छुट्टी का पर्याय मात्र किसी परीक्षा का देना है। तुम चली जाओ, मैं नहीं जा पाऊँगा।"

"क्या तुम सोच समझ कर कह रहे हो? जानते हो मेरी बहन की शादी है और फिर अभी हमारी शादी को भी कितने दिन हुए हैं और तुम अभी तक मेरे मायके एक बार भी नहीं गए। मैं शादी के एक साल बाद अपने घर अकेले जाऊँगी तो लोग क्या कहेंगे?"

"लोग, फिर वही लोग। किन लोगो की बात करती हो?"

"सुदीप क्यों बहस पर उतारू हो... आखिर कारण क्या है जो तुम मेरे साथ जाना नहीं चाहते? आखिर मेरे माँ-बाप भी चाहते होंगे उनका दामाद उनके दर पर आये, दामाद की आवभगत करके कुछ धर्म लाभ वे कमा लेंगे तो तुम्हारा कुछ घट नहीं जायेगा।"

"देखो, मैं न ही तुम्हें समझाना चाहता, न ही ऐसा कर पाऊँगा। तुम अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र हो, मैंने कभी तुम्हें किसी काम से रोका भी नहीं, तुम चली जाओ। लेकिन हाँ, मुझे कभी बाध्य मत किया करो। यदि मैं तुम्हें स्वतंत्र जीवन जीने देने के ख्याल रखता हूँ तो जाहिर है स्वयं के बारे में भी ऐसा ही सोचता हूँ।"

"यही तो दुःख है सुदीप! यही तो दुःख है। मैं ऐसी स्वतंत्रता नहीं चाहती। मैं चाहती हूँ तुम मुझे रोको, टोको। मेरी गलती पर मुझे डॉटो, मुझ पर गुस्सा करो। तुम्हारी बातें सुनकर मुझे लगता है तुम एक पत्नी के मर्म को समझते ही नहीं। कोई भी पत्नी नहीं चाहती, उसका पति उसे इतनी आज़ादी दे।"

"नए जमाने की औरत भी क्यों पुराने विचारों का लबादा ओढ़े हो? आज़ादी नहीं चाहिए तो फिर क्या चाहिए? अपने आदर्शों, अपने सिद्धांतों को छोड़ दूँ। अपने अंदर के बुद्धिजीवी को नष्ट कर दूँ। देखो कंचन! मैं मैं ही बना रहना चाहता हूँ, इस समाज के निकृष्ट प्राणियों से मेरी तुलना मत किया करो। यदि पत्नी पर हुक्म चलाना, उसकी आज़ादी को नियंत्रण में रखना, उसे अपना गुलाम बनाकर रहना पुरुषत्व है तो मुझे वैसे पुरूषत्व से परहेज है।"

"तो तुम ये कहना चाहते हो कि हम दोनों एक ही चारदीवारी के नीचे अपने अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ जीवन गुजारें।"

"आखिर उसमें हर्ज क्या है?"

"हर्ज है, हर्ज है सुदीप। मेरी भी कुछ इच्छाएँ हैं, भावनाएँ हैं। मैं चाहती हूँ तुम्हारे साथ  घूमूँ-फिरुँ,  घण्टो बतियाऊँ,  नदी किनारे जाऊँ, पहाड़ों की ऊँचाई को नापूँ। झरनों की कल-कल करती आवाज़ और उसका मधुर संगीत सुनूँ और तुम्हारे साथ उसे गुनगुनाऊँ।“

तुम रोज, हर रोज मुझे अपनी बाँहों में भर चुम्बन करो। हम एक-दूजे में खोए रहें। तुम रति-क्रीड़ा की महारत का प्रदर्शन करो और मैं तुम्हें चरम तक ले जाऊँ लेकिन तुम्हारे विचार तुम्हें मुझसे कितना दूर कर देते हैं? कितने दिन हो गए जब हमने सहवास किया।

पहली बार जब मैं डोली में बैठ तुम्हारे घर आई थी और तुम अपने दोस्तों के बीच देर रात तक बैठे रहे थे तब तुम्हारी किताबो में कामसूत्र देखकर मैं कितना रोमांचित हुई थी, तुम अनुमान नहीं लगा सकते। उस वक़्त तुम मुझे किसी कामदेव की छवि में नज़र आये थे लेकिन आज जब मैं देखती हूँ तुम सहवास के लिये पहल नहीं करते तो मेरा मन तुम पर खीज उठता है। अभी पिछली बार भी जब मैं खुद को रोक नहीं पायी थी तो मैंने ही तुम्हारे समक्ष प्रस्ताव रखा था। यह जानते हुए भी कि स्त्रियाँ पहल नहीं किया करती।"

"ओह कंचन! तुम किस दुनिया में जी रही हो? तुम अच्छी तरह जानती हो मैं शारीरिक मिलन को जीवन का पर्याय नहीं मानता। आखिर मन का मिलन भी तो...।"

"यही तो दिक्कत है, तुम शरीर की आवश्यकता, उसके सच को नकारने की कोशिश करते हो जबकि...।"

"शरीर मात्र शरीर है उनमे मन के अंश...।"

"किस मन की बात करते हो सुदीप, जिसमें तुमने इंसानों की जगह कोरे आदर्श ठूँस रखे हैं।"

"कंचन, बेकार की बहस से कुछ फायदा नहीं। तुम शरीर की महत्ता पर जीवन जीना चाहती हो और मैं... मैं शरीर के अस्तित्व को ही स्वीकार करना नहीं चाहता। काम-वासना इंसान को जीने के काबिल नहीं छोड़ती। शरीर को महत्व देकर मैं बुद्धि के साथ अन्याय नहीं कर सकता।“

"लेकिन मैं अपनी कामेच्छा का क्या करूँ? मेरा शरीर कामाग्नि में तपता है, मैं इस अग्नि को सहन नहीं कर पाती। इस पिपासा पर अपने स्पर्श की ठंडी बारिश कर दो। मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।"

"मैं स्त्री को सौम्यता की मूरत मानता हूँ। स्त्री मेरे लिए पूजनीय है, भोग्य-पण्य नहीं।"

"मैं तुम्हारी पत्नी हूँ सुदीप।"

"पत्नी होने से तुम स्त्री नहीं रह गयी क्या? स्त्री की पूज्यता को तजना मेरे बूते नहीं।"

"अगर मुझे अपने साथ एक बहन की तरह ही रखना था तो शादी ही क्यों की? आखिर मेरी जिंदगी बर्बाद करने का तुम्हें क्या हक़ था?"

"क्या शरीर की भाषा में बात करना ही जिंदगी की आबादी है?"

"सुदीप! मैं हमेशा तो नहीं कहती, पर कभी तो...।"

"कंचन! तुम्हें वासना को ही तो शांत करना है न, तुम्हें तृप्ति ही चाहिए न, वो तो तुम कहीं भी...।"

"तड़ाक" -एक जोरदार थप्पड़ कंचन ने मेरे गाल पर जड़ दिया। मैं स्तब्ध खामोश। उस वक्त जरा भी उत्तेजना नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं। कंचन का यह थप्पड़ मुझे मेरे अस्तित्व पर पड़ता नज़र आया।

शाम तक उसने अपना सामान बाँधा और ऑटो पकड़ रेलवे स्टेशन का रुख किया। उसने शायद सोचा होगा कि मैं उसे रोकूँगा, मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई और उसने वापसी का रुख नहीं किया।

मेरा अकेलापन मेरा साथी बन गया। जैसा कि आज है। मैं कुर्सी से उठता हूँ। कमरे के चक्कर लगाता हूँ। हल्की सी रौशनी नज़र आती है। करीब रात्रि के 2:00 बजे का वक्त हो चला है। शायद ये तारों की रौशनी है जिसमें आशा-निराशा का मिश्रण घुला है। मेरा गला सूख रहा है। एक कोने में सुराही रखी है। मैं गिलास उठाता हूँ। अंदर तक सुराही में डुबो देता हूँ। पानी शायद कम है। सुराही को थोड़ा टेढ़ा करता हूँ तो मात्र इतना ही पानी आ पाता है जितना गले को तर मात्र कर सके। गिलास वापिस सुराही पर उल्टा रख दो कदम आगे बढ़ता हूँ। एकाएक जेब की तरफ हाथ जाता है। सिगरेट का पैकेट निकाल सिगरेट सुलगा कश लगाता हूँ। सिगरेट में जितना लम्बा कश लगता है उतनी ही तेजी से जलती सी ख़त्म होती है, धीरे-धीरे सिगरेट का आकार छोटा होता जाता है। मुझे अनुभव होता है सिगरेट और जिंदगी में कितनी समानता है। स्मृति का चलचित्र मस्तिष्क-पटल पर उभर आता है।

बड़े भैया के घर एक फूल सी बच्ची ने जन्म लिया था। बच्ची एक बड़े ऑपरेशन के बाद पैदा हुई। भाभी नर्सिंग हिम के ए. सी. रूम में थी। पूरा परिवार इकठ्ठा था। सब ख़ुशी में तल्लीन लेकिन मैं कहीं खोया था, कुछ था जो मुझे शून्य में ले जाता था। उस दिन माँ भी गॉव से आ गयी थी। मैं अपने आप में खोया सबसे नजरें बचाता उन सबके बीच उपस्थित मात्र था। लेकिन माँ की नज़रों से कैसे बचा जा सकता था? माँ ने टोक ही दिया-"क्या बात है सुदीप, तुम अकेले और साथ ही कुछ परेशान भी? कौन सा दर्द है जो छुपाने की कोशिश कर रहे हो?"

मैं मौन रहा था उस पल और बिना कुछ बोले नर्सिंग होम से बाहर निकल आया था। भैया बेटी की ख़ुशी में इतना मग्न कि उन्होंने देखा ही नहीं कि मैं कब वहाँ से निकला? सीधा घर आया। कुछ खाने का भी मन नहीं रहा। लेकिन भूख हावी थी। मुझे याद आया जब भूख हावी होती है इंसान कितना परेशान हो उठता है। यह पेट की भूख थी। उस दिन कंचन ने पेट के नीचे की भूख का, उस भूख की तड़प का जिक्र किया था।

मुझे लगा- ‘भूख तो भूख ही है पेट की भूख हो या पेट के नीचे की।"

किचन का दरवाजा खोला- डिब्बे टटोलने लगा। सब कुछ खाली था। मेरी जिन्दगी मुझे उन खाली डिब्बों जैसी लगी। कंचन के जाने के बाद घर में कोई राशन नहीं आया था इसका एहसास भी मुझे उस वक्त हो गया था। वैसे भी मुझे पता नहीं था कि राशन कब आता है?.कहाँ से आता है? सब कुछ तो वह खुद कर लिया करती थी। किचन से वापिस कमरे में आया। कुर्सी पर  बैठ गया। मैं शांत रहा मन को स्थिर करने का प्रयास करने लगा। लेकिन मन किसी अनिष्ट की आशंका से काँपने लगा।

तभी डोर बेल बजी। शायद 10 बजे का वक्त रहा होगा। मैंने सोचा इस वक़्त कौन होगा? मैं लाइट जलाने की जहमत उठाये बिना दरवाजे की ओर बढ़ गया। सिटकनी तक जाते-जाते हाथ काँपने लगे । दरवाजा खुला तो बाहर का प्रकाश कमरे के अँधेरे को कम करता नज़र आया। दरवाजे पर माँ खड़ी थी। मैं एक तरफ हट गया। माँ कमरे में दाखिल हुई।

 “सुदीप बेटा, इतने अँधेरे में बैठे हो। लाइट क्यों नहीं जलाई?“ कहते हुए माँ ने स्विच ऑन किया। कमरा रोशनी से भर उठा। माँ ने मेरे चेहरे को देखा। आँसूं की दो पतली धाराएँ मेरे गालों तक लुढ़क आई थी। माँ ने मेरा चेहरा अपने सीने पर रख दिया। आंसुओं का सैलाब बह निकला। माँ मेरा सिर सहला रही थी। मैंने हिचकियाँ लेते हुए कंचन और अपने बीच का सच माँ के सामने उगल दिया।

माँ हैरान, परेशान। मुझे सांत्वना देती रही। माँ को महसूस हुआ- मेरा शरीर तप रहा है।

“बेटे तुझे तो बुखार है। तेरा शरीर तो आग की तरह तप रहा है। क्या हालत बना ली है तूने? अब तो डॉ भी नहीं मिल पायेगा।“

माँ ने मुझे पानी में इलायची पका पानी पिलाया। और किचन में जाकर काढ़ा बनाने लगी। बचपन में जब कभी बुखार होता था तो माँ काढ़ा बना दिया करती थी। मुझे उस वक़्त बचपन याद हो आया। लगा- क्यों बचपन हमेशा नहीं रहता? वैसे ही आज माँ को देख महसूस हुआ, औलाद हमेशा बच्चे की तरह हुआ करती है, माँ –बाप के लिए बच्चे जैसे प्रोढ़ होते ही नहीं।

काढ़ा पिला माँ ने मुझे चादर ओढा दी। खुद भी चटाई बिछा लेट गयी। रोशनी में मुझे नींद नहीं आती। माँ को इस बात का शायद अहसास हुआ तो माँ ने उठकर लाइट बंद कर दी। माँ सो पाई या नहीं, पता नहीं लेकिन नींद मुझसे कोसो दूर थी।

पता नहीं कब नींद आई। आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी। माँ ने चाय बनाकर दी और खाने पीने की हिदायत देकर भैया के घर चली गयी।

बड़े भैया के घर की दूरी मेरे घर से ज्यादा नहीं थी। कुल जमा पाँच मिनट में उनके घर की दूरी नापी जा सकती थी लेकिन माँ एक बार नन्हे से मेहमान के पास गयी तो जैसे मुझे भूल ही गयी। अब तक घर में सबसे छोटा मैं ही था इसलिए सबका स्नेह मुझ पर ज्यादा रहा। अब उस नन्ही सी जान के आ जाने से सब जैसे उस पर प्यार लुटाने लगे। मैं नियम बना रोज माँ से मिलने जाता। अगर सुबह न जा पाता तो शाम को ऑफिस से आते वक्त मिल आता। माँ इस बीच एक बार भी मेरी तरफ नहीं आई। ये माँ की व्यस्तता थी। मैं माँ से मिलता जरुर रहा लेकिन संवाद कम ही होता। इसका कारण शायद भाभी के सामने खुलकर बात न कर पाना भी था। माँ मुझे आँखों से सांत्वना दे देती जैसे कह रही हो- “बेटा सब ठीक हो जायेगा।“

मैं यादों के सफ़र से लौटता हूँ। मुझे याद आता है माँ का वह मौन वाक्य- सब कुछ ठीक हो जायेगा। जैसे मैं माँ को कह रहा हूँ- “माँ क्या ठीक हुआ? कंचन मुझे आघात पर आघात देती गई और सब कुछ ठीक होने के बजाय बिगड़ता चला गया।“

मैं शरीर में ऊर्जा का क्षय अनुभव कर रहा हूँ। मुझे लग रहा है जैसे शरीर टूटता जा रहा है। मुझे कॉफ़ी की इच्छा महसूस हुई। मैं किचन में जाता हूँ। एक कॉफ़ी का कप तैयार कर कमरे में आ जाता हूँ। कप से निकलती भाप मेरे गालों को स्पर्श करती है, एक ठंडक भरी गर्माहट महसूस होती है। कॉफ़ी का आकार घटता जाता है, शरीर की गरमी लम्हा-लम्हा बढती जाती है। मैं कॉफ़ी पी चुका होता हूँ तो अचानक मुँह में कड़वाहट महसूस होती है बिलकुल कंचन के रिश्तों की तरह।       

नन्हे जीव को परिवार में आये दस-बारह दिन ही हुए थे। उस घर में खुशियों का माहौल था। मेरा घर तो जैसे बर्बादी के आलम का रहबर बना हुआ था। माँ गाँव नहीं जा पाई थी। बाबूजी कें खाने की चिंता मुझे सताती रहती। मैं अक्सर घर से दूर रहकर पढ़ा। बाहर की जिंदगी ने घर के कामकाज करना सिखा दिया था लेकिन मुझे याद है शुरू-शुरू में कैसे रोटियाँ सकते हुए हाथ जल जाया करते थे। आज अपनी अँगुलियों पर उस समय के जले हुए निशान देखता हूँ तो बाबूजी के कष्टों की कल्पना से दिल सिहर उठता है। बस ये ही चिंता सताती कि कैसे, कैसे खाना बना-खा पाते होंगे बाबूजी?

कंचन लौट आयी थी। मेरे दिल में कोई हलचल नहीं हुई थी। कंचन आयी तो मैंने उस दिन उसे कुछ नहीं बोला। किचन में जाकर चाय बनायी और मेज पर रख दी। मुझे याद है उस पल कंचन ने चाय को छुआ तक नहीं था। देर शाम गटर में डाल दिया था। मुझे उस पल लगा जैसे मेरे सपने या यूँ कहूँ मेरी जिंदगी के बेशकीमती पल चाय के साथ गटर में प्रवाहित हो रहे थे।

रात को उसने खाना बनाया था। मैं घूमकर घर 11 बजे आया। दरवाजा खुला था।

स्थिति से आभास हुआ कि कंचन डिनर करके सो चुकी थी। मैंने प्लेट में थोड़ी सब्जी निकालकर दो चपाती जैसे-तैसे ठूंसी। अपनी आदत के विपरीत दो गिलास पानी पी चटाई बिछा लेट गया। सारी रात करवटें बदलते काटी।

सुबह मैंने प्रस्ताव रखा- "बाबुजी अकेले हैं। खाना नहीं बना पाते होंगे तुम गाँव चली जाओ। बड़ों की सेवा करना हमारा फ़र्ज भी है और धर्म भी। फिर ये पुण्य कमाने का अच्छा अवसर भी है तुम्हारे पास।"

"पुण्य? किस पुण्य की बात करते हो सुदीप? जब मेरे साथ चलने की बात थी तब सिद्धान्त थे। आज तुम्हारे बाबूजी की बात है तो पुण्य याद आ रहा है। कितने रूप है तुम्हारे? कितने ढोंग सीख रक्खे हैं सुदीप बाबू?"

‘तुम्हारे बाबूजी’ शब्द सुनकर लगा था जैसे कंचन ने एक बार फिर थप्पड़ मारा था उस वक़्त।

मेरे दृढ़ विचारों के चलते कंचन का गाँव जाना तो तय था लेकिन इस जद्दोजहद में रिश्तों ने और अधिक कड़वाहट का रूप ले लिया। कारण फिर वही था। कंचन ने फिर तर्क दिया- "कितने दिनों बाद मैं आयी हूँ और तुमने मेरे शरीर को स्पर्श तक नहीं किया। आज की रात तुम्हारा संसर्ग चाहती हूँ। कल चली जाऊँगी तुम्हारे बाबूजी की दासी के अभिनय के लिए।

मैं सिर्फ कसमसा कर रह गया था का वक़्त। जी तो चाहा था कि अपने अंदर का लावा निकाल बाहर फेकूँ। लेकिन चुप रह गया। ऑफिस गया तो काम में भी मन नहीं लगा। शाम को घर आया, खाना खा लेट गया। कंचन किचन में काम करती रही। आदत से मजबूर तीन-चार घन्टे लगातार किचन में घुसे रहना उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है।

किचन का काम निपटा वह मेरे घर ऊपर पड़ गयी। मेरे चेहरे पर अनगिनत चुम्बन, जो उसने जड़ दिए थे, मुझे काँटों जैसे लगे। कंचन के हाथ सक्रिय थे। कपडा-दर-कपडा वह मुझे उघाड़ती रही और मैं लाश की मानिंद पड़ा रहा निष्क्रिय! निष्प्राण !! उनका शरीर भी अब अनावरित था। सख्त उभार मेरे मुँह में देने की आफल/असफल कोशिश करते हुए उसने अजीबोगरीब रहस्योद्घाटन किया था- "सुदीप! कब तक आखिर कब तक अपनी इच्छाओं को दबाए जिंदगी जीती रहती। मैं घर गयी थी तो बचपन का दोस्त आदित्य मिला। आदित्य, मेरे बचपन का साथी, मेरे अच्छे बुरे वक़्त का हमसफ़र। मेरे दुःख के पलों का ईश्वर। जानते हो सुदीप वह एकदम कामदेव है कामदेव। वह न मिलता तो शायद मैं तृप्त न हो पाती और फिर उन दिन तुमने भी तो कहा था कि...। ओह सुदीप, तुम आदित्य क्यों नहीं बन जाते?

मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखायी। कंचन मेरे शरीर के लिए अधिक तत्पर दिखी। वह मुझसे बलात संबंध बना रही थी, मेरे शरीर के साथ-साथ मेरे भविष्य का भी बलात्कार किया उस पल उसने। उसकी भावना और अधिक सच कहूँ तो वासना शांत हुई तो बगल में लेटते हुए सो गयी। मैं फिर शून्य में खोता चला गया।

सुबह उसने अपनी जरुरत का सामान बैग में रखा। माँ उसे लेने आ गयी थी। वे लोग नौ बजे की ट्रेन से गॉव चले गए थे। माँ उसे गॉव छोड़ वापिस भैया के पास चली गयी थी।

मैंने इस बीच गाँव से कोई संपर्क नहीं किया। कंचन के फोन आये थे एक-दो बार। मैंने अनमने मन से बात की थी। उसने फोन पर अपना ख्याल रखना, खाना समय पर खाते रहना इत्यादि हिदायते दी थी। कोई नहीं जानता था उस पल मेरे अंदर क्या चल रहा था?

नन्हे मेहमान की उम्र जब चालीस दिन हुई तो माँ का गाँव जाना तय हुआ। दो दिन बाद कंचन आ धमकी थी। मैं ऑफिस गया हुआ था। मकान की दूसरी चाबी उसके पास होती थी। उसी से गेट खोलकर वह घर में दाखिल हुई थी। शाम को घर आया तो कंचन के हाथ में मैंने लिफाफा थमा दिया था, तलाक के कागजात का लिफाफा।

कंचन ने बिना कुछ बोले कागजात पर साइन किए और अपना सामान बाँध ट्रेन पकड़ अपने मायके शायद मायके ही रवाना हो गयी थी।

मैं एक बार फिर यादों के भंवर से निकल बाहर आना चाहता हूँ। ट्रेन की आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही है। और गूँज रहे हैं कंचन के शब्द- "सुदीप तुम आदित्य क्यों नहीं बन जाते?" मैं अपने कानों पर हाथ रख लेता हूँ। मुझे अनुभव होता है मैं व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पाया हूँ। समाज में बदलाव रिश्तों में नयेपन की डिमांड करते हैं लेकिन ये कौन आ नयापन है? मैं समझ नहीं पाता हूँ। कंचन आज भी मेरा हिस्सा नहीं है। वह एक कल है गुजरा हुआ कल, फिर किस अपील के साथ वह मेरे ख्यालों में आ खड़ी होती है?

मैं एक बार फिर शून्य में खोता चला जाता हूँ। छत का छोटा सा छेद भी मुझे बंद होता नज़र आता है। वह सीमाओं में बँधा आकाश, उस रहस्यमय आकाश के अपने कायदे-कानून। आकाश का छोटा सा फलक और छोटा होता जाता है, सिकुड़ता है और अपना खालीपन लिए मेरे अंदर समाहित हो जाता है।

मेरे चेहरे पर आज भी ख़ामोशी है लेकिन इस ख़ामोशी पर गुस्साती कोई कंचन, अब कभी नहीं दिखेगी, कभी भी नहीं।

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रचनाकार परिचय

सन्दीप तोमर

ईमेल : gangdhari.sandy@gmail.com

निवास : नई दिल्ली

जन्मतिथि- जून 1975
जन्म स्थान- खतौली (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- स्नातकोत्तर (गणित, समाजशास्त्र, भूगोल), एम.फिल. (शिक्षाशास्त्र) पी.एच.डी. शोधरत
सम्प्रति- अध्यापन
प्रकाशन- 4 कविता संग्रह , 4 उपन्यास, 2 कहानी संग्रह , एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह सहित आत्मकथा प्रकाशित। 
पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन।
सम्पर्क- ड़ी 2/1 जीवन पार्क, 
उत्तम नगर नई दिल्ली 110059
मोबाइल- 8377875009