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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

रावण दहन और दीपावली : अंधकार से प्रकाश की यात्रा- अलका मिश्रा

रावण दहन और दीपावली : अंधकार से प्रकाश की यात्रा- अलका मिश्रा

आज के युग में यह प्रश्न और भी गहराई से उठता है कि क्या हमने सच में अपने भीतर के रावण को जलाया है? क्या हर वर्ष पुतला दहन के साथ हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, स्वार्थ और असंवेदनशीलता को भी राख बना पाते हैं?

हर वर्ष दशहरे पर जब रावण का पुतला जलता है, तब हम सबमें यह गर्व जागता है कि सत्य की विजय हुई और असत्य पराजित हुआ। आसमान में उठती लपटें, आतिशबाज़ी, और जय श्रीराम के उद्घोष — यह सब हमें इतिहास के उस क्षण की याद दिलाते हैं जब धर्म ने अधर्म पर विजय पाई थी।

परंतु आज के युग में यह प्रश्न और भी गहराई से उठता है कि — क्या हमने सच में अपने भीतर के रावण को जलाया है? क्या हर वर्ष पुतला दहन के साथ हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, स्वार्थ, और असंवेदनशीलता को भी राख बना पाते हैं?

रावण का रूप और हमारे भीतर के सिर

पौराणिक ग्रंथों में रावण के दस सिर बताए गए हैं — वे केवल प्रतीक हैं उन दस नकारात्मक प्रवृत्तियों के जो हर मनुष्य के भीतर निवास करती हैं —
अहंकार, लोभ, वासना, क्रोध, ईर्ष्या, छल, असत्य, असंवेदनहीनता, स्वार्थ और मोह।
हम हर वर्ष इन सिरों का पुतला बनाते हैं, लेकिन शायद यह भूल जाते हैं कि असली रावण बाहर नहीं, भीतर है।

आज का रावण हमारे समाज में नए रूपों में उपस्थित है —
भ्रष्टाचार के रूप में, हिंसा के रूप में, झूठे दिखावे के रूप में, और कभी-कभी डिजिटल दुनिया की चकाचौंध में स्वयं के प्रति अंधेपन के रूप में। हमारी सफलता की अंधी दौड़ में जब संवेदना पीछे छूट जाती है, तब रावण फिर जीवित हो उठता है।

रावण दहन का पर्व हमें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है —
कि क्या मैंने अपने भीतर के किसी रावण को हराया है?
क्या मैंने अपने जीवन में सत्य, संयम और करुणा के दीप जलाए हैं?

दीपावली – बाहरी नहीं, भीतरी रोशनी का पर्व

दशहरे के कुछ दिनों बाद ही दीपावली आती है— अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व। हम अपने घर सजाते हैं, दिये जलाते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं — पर क्या हम अपने मन का दीपक जलाते हैं? प्रकाश केवल तेल और बाती का विषय नहीं; यह हमारे भीतर की चेतना, प्रेम और करुणा का प्रतीक है।

आज जब समाज में तनाव, असहिष्णुता और विभाजन का अंधकार फैल रहा है, तब दीपावली का सच्चा अर्थ केवल सजावट नहीं, बल्कि भीतर के अंधकार को पहचानने और उसे मिटाने में है।

प्रकाश का अर्थ है —
किसी के जीवन में आशा जगाना,
किसी के मन में स्नेह का दीप जलाना,
और उस जगह रोशनी फैलाना जहाँ अब तक उदासी और उपेक्षा थी।

यदि हम हर दीप के साथ एक संकल्प लें —
कि आज मैं किसी को क्षमा करूँगा,
किसी की सहायता करूँगा,
किसी से सच्चा संवाद करूँगा —
तो यही दीपावली का असली अर्थ होगा।

अंधकार और प्रकाश — दो नहीं, एक ही यात्रा के दो छोर

अंधकार का अर्थ केवल रोशनी का अभाव नहीं; यह वह स्थिति है जब हम अपने भीतर की सच्चाई से दूर हो जाते हैं। और प्रकाश का अर्थ है — जागरूकता, सजगता और आत्मबोध। जब हम दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाने से पहले स्वयं को टटोलते हैं, जब हम प्रतिस्पर्धा से पहले सहयोग का विचार करते हैं, जब हम आलोचना से पहले करुणा का अभ्यास करते हैं — तभी भीतर प्रकाश जलता है।

यही कारण है कि रावण दहन और दीपावली को अलग-अलग पर्व नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की एक निरंतर यात्रा के रूप में देखना चाहिए। रावण दहन हमें चेताता है कि हमारे भीतर के दोषों को पहचानो, और दीपावली हमें प्रेरित करती है कि उस पहचान के बाद, जीवन में प्रकाश, प्रेम और सौहार्द भर दो।

आज की आवश्यकता 

आज के दौर में जहाँ सूचनाओं की अधिकता है, वहीं संवेदना की कमी है। हम डिजिटल प्रकाश से तो घिरे हैं, पर मानवता के अंधकार से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में दीपावली हमें याद दिलाती है कि असली उजाला बाहर नहीं, हमारे विचारों और कर्मों की शुद्धता में है। रावण का दहन केवल एक अनुष्ठान नहीं,
बल्कि यह साहसिक स्वीकार है कि हम अपूर्ण हैं — पर बदल सकते हैं। और दीपावली वह आश्वासन है कि हर अंधकार के बाद प्रकाश आता है।

“रावण जलाना आसान है, अहंकार जलाना कठिन। दीये जलाना सरल है, पर भीतर ज्ञान, करुणा एवं प्रेम का प्रकाश जगाना कठिन।
आइए इस बार सच्ची दीवाली मनाएँ किसी से क्षमा माँग लें और किसी को क्षमादान दें। बिना किसी स्वार्थ के ढेरों खुशियाँ लुटायें और अपने आस पास प्रेम का प्रकाश फैलाएँ।”

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1 Total Review
U

Umesh Mehta

09 October 2025

Wah. Very informative. Bahot Bahot Bdhai

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रचनाकार परिचय

अलका मिश्रा

ईमेल : alkaarjit27@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि-27 जुलाई 1970 
जन्मस्थान-कानपुर (उ० प्र०)
शिक्षा- एम० ए०, एम० फिल० (मनोविज्ञान) तथा विशेष शिक्षा में डिप्लोमा।
सम्प्रति- प्रकाशक ( इरा पब्लिशर्स), काउंसलर एवं कंसलटेंट (संकल्प स्पेशल स्कूल), स्वतंत्र लेखन तथा समाज सेवा
विशेष- सचिव, ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन 
लेखन विधा- ग़ज़ल, नज़्म, गीत, दोहा, क्षणिका, आलेख 
प्रकाशन- बला है इश्क़ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित
101 महिला ग़ज़लकार, हाइकू व्योम (समवेत संकलन), 'बिन्दु में सिन्धु' (समवेत क्षणिका संकलन), आधुनिक दोहे, कानपुर के कवि (समवेत संकलन) के अलावा देश भर की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं यथा- अभिनव प्रयास, अनन्तिम, गीत गुंजन, अर्बाबे कलाम, इमकान आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
रेख़्ता, कविता कोष के अलावा अन्य कई प्रतिष्ठित वेब पत्रिकाओं हस्ताक्षर, पुरवाई, अनुभूति आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्पादन- हिज्र-ओ-विसाल (साझा शेरी मजमुआ), इरा मासिक वेब पत्रिका 
प्रसारण/काव्य-पाठ- डी डी उत्तर प्रदेश, के टी वी, न्यूज 18 आदि टी वी चैनलों पर काव्य-पाठ। रेखता सहित देश के प्रतिष्ठित काव्य मंचों पर काव्य-पाठ। 
सम्मान-
साहित्य संगम (साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था तिरोड़ी, बालाघाट मध्य प्रदेश द्वारा साहित्य शशि सम्मान, 2014 
विकासिका (साहित्यिक सामजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था कानपुर द्वारा ग़ज़ल को सम्मान, 2014
संत रविदास सेवा समिति, अर्मापुर एस्टेट द्वारा संत रवि दास रत्न, 2015
अजय कपूर फैंस एसोसिएशन द्वारा कविवर सुमन दुबे 2015
काव्यायन साहित्यिक संस्था द्वारा सम्मानित, 2015
तेजस्विनी सम्मान, आगमन साहित्य संस्था, दिल्ली, 2015
अदब की महफ़िल द्वारा महिला दिवस पर सम्मानित, इंदौर, 2018, 2019 एवं 2020
उड़ान साहित्यिक संस्था द्वारा 2018, 2019, 2021 एवं 2023 में सम्मानित
संपर्क- एच-2/39, कृष्णापुरम
कानपुर-208007 (उत्तर प्रदेश) 
 
मोबाइल- 8574722458