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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

कथाकार प्रतिमा श्रीवास्तव का साक्षात्कार- अमरीक सिंह 'दीप'

कथाकार प्रतिमा श्रीवास्तव का साक्षात्कार- अमरीक सिंह 'दीप'

अमरीक सिंह 'दीप' द्वारा प्रतिमा श्रीवास्तव का पूर्व में लिया गया रोचक साक्षात्कार 

किदवई नगर के साईड नं. २ में एक विस्तृत मैदान है औरत के होसले जैसा उस मैदान के उत्तरी छोर पर एक वृत्ताकार मंदिर है औरत के दिल की तरह इस दिल के ठीक सामने लोहे के सफेद गेट पर रानी कलर की बोगनविला की फूलों की लता झुकी हुई है। यों जैसे गेट के पन्नों पर कोई अनकही कथा लिखना चाह रही हो। कॉपी के वर्कों से इस गेट के पीछे निर्मल वर्मा के उपन्यास लाल टीन की छत की याद दिलाता एक घर है। कलात्मक, सुरुचिपूर्ण लेकिन उदास। ये घर है उभरती हुई सशक्त लेखिका प्रतिमा श्रीवास्तव का
मैं जब अपनी प्रश्न उत्सुकता ले कर इस घर में पहुँचा तो प्रतिमा श्रीवास्तव मिट्टी के एक मध्याकार कलश को उन्नादी पेंट से रंग कर उस पर सफेद रंग से बेल बूटे बना, छोटे- छोटे वृत्ताकार दर्पण जड़ रही थीं। फुर्सत की मुद्रा में आते ही मैंने चाय की चुस्कियों के बीच अपना प्रश्न बंच खोल दिया-
 
अमरीक सिंह 'दीप'- प्रतिमा, कहानी लिखने और जीने का शौक़ कब और कैसे पैदा हुआ तुम में।
 
प्रतिमा श्रीवास्तव- ज़िन्दगी जीने का शौक तो तब से लगा | जब इस धरती पर मेरी पहली चीख गूँजी थी।  ये बात अलग है कि ज़िन्दगी का पीछा मैं बराबर करती रही और ज़िन्दगी फिसलती रही। पीछा जारी है।... जहाँ तक लिखने का प्रश्न है, तो ठीक-ठीक तो नहीं बता सकती। इतना ज़रूर है कि वह एक ख़ास उम्र जब हर व्यक्ति कवि होता है, तभी से शुरुआत है और प्रकाशित होना बहुत बाद में शुरु हुआ। कब से..... आप जानते हैं।
 
अमरीक सिंह 'दीप'- ऐसा क्यों होता है कि विद्रोह का झण्डा उठाकर चलने वाली नई नारी एक सरहद पर आकर ठिठक जाती है। और उसका अक्रामक रुख धीरे- धीरे पलायनवादिता का ग्रास होता चला जाता है। तुम्हारी कहानी सरहद की नायिका भी इसका अपवाद नहीं है। ऐसा क्यों?
 
प्रतिमा श्रीवास्तव- मुझे नहीं लगता विद्रोह का झण्डा उठा कर चलने वाली नारी एक सरहद पर आकर ठिठक जाती है। सचमुच का विद्रोही कभी ठिठकता नहीं, टूटता अवश्य है। एक बिन्दु ऐसा आ जाता है, जब वह टूटन महसूस करती है। और उस बिन्दु के पार जाना सचमुच कठिन है। जहां तक प्रश्न है सरहद की नायिका का कि वह पलायनवादी है, मैं ऐसा नहीं मानती। सरहद विद्रोह या पलायन नहीं प्रेम के एहसास की कहानी है। अधिकार ले के लेने, माँगने या विद्रोह की कहानी नहीं है। प्रेम जीवित रहे उसके लिए वहाँ पलायन ज़रूरी था।
 
अमरीक सिंह 'दीप'- प्रगति और परिवर्तनों के ढेर से दावों बावजूद आज भी इस देश की औरत दहेज की आग के बीच घिरी हुई है। जल रही है। दोष किसका है? पुरुष का? स्वयं नारी का? या कि समाज व्यवस्था का? अथवा अन्य कोई?
 
प्रतिमा श्रीवास्तव- कोई भी कुप्रथा अकेले नारी या अकेले पुरुष के बल पर नहीं चलेती। दोनों की साझीदारी ही प्रथा या कुप्रथा को आगे बढ़ाती है। मैं आपसे शर्त- प्रतिशत सहमत हूं कि नारी भी दहेज जैसी कुप्रथा से मुक्त नहीं हो पायी है। दोष नारी का ही है। पुरुष तो बेचारा है। यह तो अपने माता-पिता की इज्जत के लिए दहेज लेता है। नारी को ही आगे आना चाहिए। भले ही इसके लिए जाति, धर्म की दीवारें तोड़नी पड़ें। मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकती. जिसे दहेज देकर खरीदा जाए उसे प्रेम भी किया जा सकता है।
 
अमरीक सिंह 'दीप'- प्रतिमा क्या पुरुष का प्यार औरत के लिए कवच की तरह होता है। जिसके हुए बिना औरत अपंग है, अधूरी है, असुरक्षित है। मेरा इंगल तुम्हारी कवच कहानी की ओर है।
 
प्रतिमा श्रीवास्तव- हाँ भाई दीप जी, पुरुष का प्यार औरत के लिए एक कपच की ही तरह होता है। औरत सचमुच अधूरी है प्रेम के बिना। मुझे तो लगता है कि ईश्वर ने औरत को धरती पर प्रेम करते। और प्रेम बांटने के लिए ही भेजा है। औरत अपने औरतपन से तभी साक्षात्कार कर सकती है जब वह प्रेम में हो। प्रेम के बिना औरत स्वयं से वंचित हो जायेगी।
 
अमरीक सिंह 'दीप'- तुमने अज्ञेय, निर्मल वर्मा और रमेश बक्षी का काफी साहित्य पढ़ा है। तुम्हें नहीं लगता इन लेखकों ने प्रेम के नाम पर जो प्रयोग साहित्य में और जीवन में किए, छतविहीन और दीवारविहीन घर के नाम पर प्रेमिकाएँ (स्त्रियाँ) बदलने वाले, बैसा अगर कोई लेखिका करती तो उसे भी साहित्य में इतना ही सम्मान, इतनी ही मान्यता मिलती ?
 
प्रतिमा श्रीवास्तव- यह तो बहुत बड़ी बहस का मुद्दा है। इसका जवाब थोड़े से शब्दों में नहीं दिया जा सकता
है।
 
अमरीक सिंह 'दीप'- अन्तिम प्रश्न, स्त्री होना अच्छा लगता है तुम्हें?
 
प्रतिमा श्रीवास्तव- स्त्री होना मुझे बहुत अच्छा लगा है। मैं तो हर जन्म में औरत होना चाहूंगी। मुझे लगता सी बहुत है औरत के हिस्से में भगवान पवित्र चीजें दी है। सबसे बड़ी चीज, सृजन उसके हाथ में हैं।
 
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3 Total Review

राजेश क़दम

15 September 2024

बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये साक्षात्कार बस प्रकाशनार्थ साक्षात्कार बनकर रह गया ! अमरीक सिंह दीप और प्रतिमा श्रीवास्तव जी दोनों ही साहित्य की समृद्धि से भरे पड़े हैं l जीवन जीने वाले सारे अनुभव और दुनियावी तत्व इनमें रचे बसे हैं फिर भी खुलकर प्रश्न नही आ पाए l जब प्रश्न नहीं तो प्रतिउत्तर कैसे ? कुल मिलाकर समेटा हुआ साक्षात्कार है l

राजेश क़दम

15 September 2024

बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये साक्षात्कार बस प्रकाशनार्थ साक्षात्कार बनकर रह गया ! अमरीक सिंह दीप और प्रतिमा श्रीवास्तव जी दोनों ही साहित्य की समृद्धि से भरे पड़े हैं l जीवन जीने वाले सारे अनुभव और दुनियावी तत्व इनमें रचे बसे हैं फिर भी खुलकर प्रश्न नही आ पाए l जब प्रश्न नहीं तो प्रतिउत्तर कैसे ? कुल मिलाकर समेटा हुआ साक्षात्कार है l

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Rekha Srivastava

15 September 2024

साक्षात्कार लेने वाले और देनेवाली दोनों ने ही पूर्ण न्याय किया है। मैं तौलकर बता सकती हूँ कि कितना निष्पक्ष है ये। दोनों विद्वानों को साधुवाद।

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रचनाकार परिचय

अमरीक सिंह 'दीप'

ईमेल : amriksinghdeep1@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 5 अगस्त 1942 
जन्मस्थान- कानपुर (उत्तर प्रदेश)
प्रकाशन-
प्रकाशित कृतियाँ- * एक और पांचाली, तीर्थाटन के बाद (दो उपन्यास )
*कहाँ जायेगा सिद्धार्थ , कालाहाण्डी, चाँदनी हूँ मैं, सिर फोड़ती चिड़िया, काली बिल्ली,एक कोई और,वनपाखी,अमरीक सिंह दीपः चुनी हुई कहानियां, यह मिथक नहीं, कब आयेगा अमृतसर, मेरी 11 प्रिय कहानियाँ। ( ग्यारह कहानी संग्रह प्रकाशित )
* आजादी की फसल व सपने में औरत ( दो लघुकथा संग्रह )
* कड़े पानी का शहर व झाड़े रहो क्लक्टरगंज (दो लेख संग्रह की पुस्तकें  )
अनुवाद- रेत में डूबी नदियाँ (उपन्यास ), बिहारी एक्सप्रेस (उपन्यास) कनक का क़त्लेआम( उपन्यास ) ज़मीनों वाले(उपन्यास)               
ऋतु नागर, शाने पंजाब, बर्फ का दानव, नो मैन्स लैण्ड, विदिशा की बासंती, पंजाबी की चुनी हुई कहानियाँ व 6-45 pm (11पुस्तकें पंजाबी से हिन्दी में अनूदित)
सम्पादित पुस्तकें- राजेन्द्र रावः चुनी हुई कहानियाँ, कृष्ण बिहारीः चुनी हुई कहानियाँ, विश्वम्भर नाथ शर्मा 'कौशिक':चुनी हुई कहानियाँ
माँ(उपन्यास) विश्वम्भर नाथ शर्मा 'कौशिक',  भिखारणी (उपन्यास ) विश्वम्भर नाथ शर्मा 'कौशिक'
अन्य भाषाओं में अनुवाद- 11 कहानियाँ पंजाबी एवं 6 कहानियाँ उर्दू में अनूदित ।
* दो दर्जन के लगभग कहानियाँ विविध संग्रहों में संग्रहीत ।
* सारिका, हंस, नया ज्ञानोदय, पहल, वसुधा, बहुवचन , कहानियाँ, कथाक्रम, वागर्थ, निहारिका, लमही, पुनर्नवा, समकालीन भारतीय साहित्य, साक्षात्कार, उत्तर प्रदेश मासिक, समकालीन सरोकार, कादम्बिनी, कला, मुहिम, कतार, सम्बोधन, कथाबिम्ब, वर्तमान साहित्य, आउटलुक, जनसत्ता, अमर उजाला, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका  इत्यादि पत्र पत्रिकाओं में 200 से अधिक कहानियाँ प्रकाशित।
प्रसारण- आकाशवाणी लखनऊ से 6 कहानियों का प्रसारण
विशेष- * 'तीर्थाटन के बाद ' उपन्यास पर ' ढाई घर ' फीचर फिल्म निर्मित एवं सन् 2023 के गोवा फिल्म फेस्टिवल की पुरुस्कार प्रतियोगिता के लिए चयनित।
* बेस्ट वर्कर कहानी पर राँची दूरदर्शन व्दारा टेली फिल्म निर्मित व बेस्ट वर्कर कहानी का अबूधाबी एम्बेसी में नाट्य मंचन।
* कहानी 'दन्तकथा' उ० प्र० माध्यमिक शिक्षा परिषद , इलाहाबाद की हाईस्कूल में पढ़ाई जा रही पंजाबी सलेबस की पुस्तक  'गद्य - पद्य' में।
* विगत 23 वर्ष से हो रहे कथाकार सम्मेलन 'संगमन' के संस्थापक सदस्य।
* साहित्य की 'अकार'  व 'आशय' पत्रिका में सम्पादन सहयोग।
पुरस्कार/ सम्मान- सर्वभाषा कथा प्रतियोगिता में 'बेस्ट वर्कर' कहानी प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत।
बिगुल कथा प्रतियोगिता में  'सैण्डी और सेमल का वृक्ष' कहानी द्वितीय पुरस्कार से पुरस्कृत।
विश्वम्भर नाथ शर्मा 'कौशिक' कथा पुरस्कार ।
के० टी० फ़ाउण्डेशन साहित्य शिरोमणि सम्मान ।
सम्पर्क- फ्लैट न० 101, गोल्डी अपार्टमेंट ,
119/372- बी०, दर्शनपुरवा, कानपुर- 208012
मोबाइल- 6394221435