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शुभदा मिश्र की कहानी 'वह कोहिनूर'

शुभदा मिश्र की कहानी 'वह कोहिनूर'

इतना ज़रूर जानती हूँ कि जिनके भीतर यह कोहिनूर दमकता रहता है, वह कुछ न कुछ कर गुज़रते हैं। यह मेरा अनुभूत सत्य है कि जिनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ थीं, उन्हें जब बड़ी ज़िम्मेदारियाँ मिलीं तो संभाल नहीं सके। लड़खड़ा गये। गिर गये। जिनके पास ऐसी भारी डिग्रियाँ नहीं थीं, उन्होंने सुमेरू हथेली में उठा लिया। उनके भीतर उस कोहिनूर का प्रकाश था।

प्रिय चिंटू, मैंने तुम्हारी और तुम्हारी मम्मी की पोस्ट देखी है। तुम्हारी उद्विग्नता, तुम्हारी बेचैनी मैं समझ रही हूँ। तुम्हारी मम्मी की समझाइश भी। मैं तुम दोनों के बीच नहीं पड़ना चाहती। पर मैं तुम्हारे समूह में हूँ। सो कुछ कहे बिना मुझे चैन नहीं लग रहा। सुना, वहाँ तुम्हारे मित्र भी तुम्हें लगातार समझाते रहे हैं। समझाते रहे हैं कि 'देश' सिर्फ एक भौगोलिक सीमा है। सीमाएँ बनती-बिगड़ती रहती हैं। कोई इलाका आज किसी देश की सीमा में है, कल झगड़ा झंझट, समझौते वगैरह के बाद वही इलाका दूसरे देश का हो सकता है। भौगोलिक स्थिति ही नहीं, समय का तकाजा भी है कि आदमी अब देश की सीमाओं में बँधकर नहीं रह सकता। देखते ही होगे टी०वी० में, अक्सर अमुक देश के लोग, किसी और देश में घुस गये। चोरी छिपे घुसे, तो पकड़े गये। पकड़े गये, तो भुगत लेंगे, पर लौटकर अपने ही देश मे जाने को तैयार नहीं। जब आम लोगों का यह हाल है तो आज का महात्वाकांक्षी युवा कैसे देश की सीमाओं में बँधकर रह सकता है!

आज हमारे ही जो लोग दुनिया की शक्तिशाली कंपनियों के 'सी०ई०ओ०' के सिंहासन पर बैठे हैं, क्या वे इन ऊचाइयों पर पहुँच पाते अगर देश की सीमाओं में बंधे रह जाते। वहाँ तो कानून और व्यवस्था की जब-तब धज्जियाँ उड़ती रहती हैं। धार्मिक उन्माद कब किस शहर, किस राज्य को तहस-नहस कर दे, कोई पता नहीं। वोट की राजनीति के मारे सियासी नेताओं का दिन-रात शह-मात का गलाकाट खेल। रोज़ नये बवाल। और जनता? साफ बात, जनता सिर्फ अपना निजी स्वार्थ देखने वाली। हमें तो लगता है कि प्रजातंत्र यहाँ सही शासन व्यवस्था है ही नहीं। जब सारी बातें गड़बड़, तो हमें भी अपना सारा ध्यान अपने हितों में केन्द्रित करना है। डिग्री लो, और जहाँ बेहतर चारागाह मिले, चले चलो। अच्छे से समझ लो हम 'व्यक्ति' हैं। 'इंडिव्युजअल'। हमें अपना देखना है। अपना कैरियर। अपनी भलाई। देश एक 'आउट डेटेड कांसेप्ट' है। पुराना दम तोड़ता विचार।

तुम्हारी मम्मी की समझाइश भी देखी कि "थोड़ा धैर्य रखो। अभी वहाँ जो सरकार है, वह अलोकप्रिय हो ही चुकी है। चुनाव आने ही वाले हैं। जिस पार्टी के सत्ता में आने की पूरी संभावना है, उससे हमारे देश के अच्छे संबंध हैं। सब ठीक हो जाएगा। उत्तेजना और आक्रोश में आकर पढ़ाई छोड़ मत आ जाओ। तुम ख़ुद जानते हो, किस तरह पैसों का जुगाड़कर हमने तुम्हें वहाँ पढ़ने के लिये भेजा है।"

तुम्हारे पापा, वह बेचारे तो पहले ही चाहते थे कि तुम यहीं के किसी अच्छे से कॉलेज में दाखिला ले लो। मगर तुम्हारी मम्मी की ही ज़िद थी कि जब दूसरी महिलाओं के बच्चे विदेश जा रहे हैं पढ़ने, तो उनका इतना मेधावी बेटा क्यों न जाए! मैंने भी तब समझाने की कोशिश की थी कि "बहूरानी, पहले की बात और थी। साठ-सत्तर के दशक में हम एक ग़रीब देश थे। हमारे यहाँ के मेधावी छात्र जाते थे उच्च शिक्षा के लिये विकसित देशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में, छात्रवृति के सहारे। ये छात्रवृति वही देश देते थे कड़ी प्रतियोगिताएँ आयोजित कर।" पर वे मेरी बात नहीं समझतीं। उनका कहना था कि मम्मीजी, अब हम उतने ग़रीब लोग नहीं हैं। थोड़ा पैसा हमारे पास भी है। सो हम भी अपने बेटे को विदेश भेजने का शौक क्यों न पूरा करें! पढ़ाई तो पढ़ाई होती है चाहे नामी विश्वविद्यालय हो या दोयम तीयम दर्जे का कॉलेज। विदेश जाने की ख़ुशी में छलकते तुम्हारे दोस्त। चले तुम भी ख़ुशी में छलकते।

मगर यह ख़ुशी ज़्यादा दिन नहीं चली। तुम्हारी ख़ुशियों पर तुषारापात। तुम सन्नाटे में। आघात से जड़। यह क्या हो रहा है यहाँ। तिरंगा जलाया जा रहा हैं, भारत माँ को गंदी गालियाँ दी जा रही हैं। कौन हैं ये लोग! इन्हें तो हम बड़े वीर बहादुर समझते थे। देशभक्त समझते थे। तिस पर इनके समर्थक युवा। भारी दबंग। तुम जैसे छात्रों पर धौंस जमाते। गाली-गलौज। मारपीट। वहाँ की पुलिस इन्हीं आतताईयों की समर्थक-सी। यहाँ से गये छात्रों को मानो लकवा मार गया हो। वे एकदम चुप। आक्रोश में उबलते तुम ज़बरदस्त प्रतिकार करना चाहते हो। मगर कोई राज़ी नहीं। ज़बरदस्त नहीं, तो कोई छोटा आयोजन ही सही। कोई पोस्टर ही सही। पर सब तुमसे किनारा कर ले रहे हैं। कुछ दोस्त समझाते भी हैं, "यह दो देशों के बीच की बात है। डिप्लोमैसी चलेगी इसमें। हम किसी झंझट में पड़कर साल बर्बाद नहीं कर सकते। हमें पढ़ना है। डिग्री लेनी है। डिग्री लेकर निकल लेना है।" जहाँ ये छात्र रह रहे हैं, वह जगह भी ठिकाने की नहीं। एक डारमेंटरी में पाँच छात्र। पढ़ाई लस्टम-पस्टम। पर वे पढ़ रहे हैं। जलता रहे तिरंगा। पड़ती रहे भारत माँ को गालियाँ। हम तो वो लोग हैं, जिसने सदियों मुगलों के अत्याचार सहे। अँग्रेजों की कारगुजारियाँ सही। यह भी सह लेंगे। हमें तो अपना हित देखना है।

मगर तुमसे सहा नहीं जा रहा है। न रातों को नींद, न दिन को चैन। वेदना में झुलसते। सबसे कटकर विक्षिप्त-से। पता नहीं क्या कर बैठो!
बच्चे, ऐसा तुम्हारे साथ ही क्यों है! बच्चे, 'यह प्रकृति की तुम्हारे ऊपर विशेष कृपा है।' मैं जानती हूँ, बचपन से है। शायद जन्म से। इस कृपा का कोहिनूर हज़ारों में किसी एक को मिलता है। इस कोहिनूर की चमक, जिसके भीतर होती है, वह ग़लत बात बर्दाश्त नहीं कर सकता। राष्ट्र का अपमान तो हर्गिज नहीं। जब तुम प्रतिकार में कुछ नहीं कर पा रहे हो, तो ऐसे देश को धता बताकर अपने प्यारे देश लौट तो सकते हो! हमारे अपने छोटे से शहर का कॉलेज, अच्छा कॉलेज है। अगर यहाँ के प्राचार्य और शिक्षकों को पता चले कि तिरंगे का अपमान नहीं सह सकने के कारण लौट आये हो तो तुम्हारे दाखिले की कोई सूरत निकाल ही लेंगे। मैं तो कहती हूँ, हमारे सारे छात्र, सारे भारतीय, इस बिना पर लौट आएँ कि यहाँ की सरकार हमारे तिरंगे का जानबूझकर अपमान करवाती है, तो पल भर में वहाँ की अर्थव्यवस्था डगमग। प्रतिष्ठा दाँव पर। कटघरे में सरकार। गिड़गिड़ायेंगे छात्रों के आगे। और यहाँ आने पर? यहाँ अब कितने ही 'आचार्य कोटिल्य' सक्रिय हो उठे हैं, जो देश की आन की बात पर अपने विख्यात शिक्षा संस्थानों के कपाट खोल देंगे।

ख़ैर उनकी वे जाने, तुम तो आ ही जाओ! वैसे मैं न कहूंँ तब भी तुम आओगे। मम्मी नाराज़ हो, पापा परेशान, तब भी आओगे। लोग उपहास करें, यहाँ दाखिला न मिले, तब भी आओगे। क्योंकि दाखिला नहीं मिल पाने की भारी परेशानियांँ तुम सह सकते हो, वहाँ तिरंगे का अपमान नहीं। तब तुम क्या करोगे। तुम्हारा भविष्य क्या होगा, मैं नहीं कह सकती। मगर इतना ज़रूर जानती हूँ कि जिनके भीतर यह कोहिनूर दमकता रहता है, वह कुछ न कुछ कर गुज़रते हैं। यह मेरा अनुभूत सत्य है कि जिनके पास बड़ी बड़ी डिग्रियाँ थीं, उन्हें जब बड़ी ज़िम्मेदारियाँ मिलीं तो संभाल नहीं सके। लड़खड़ा गये। गिर गये। जिनके पास ऐसी भारी डिग्रियाँ नहीं थीं, उन्होंने सुमेरू हथेली में उठा लिया। उनके भीतर उस कोहिनूर का प्रकाश था।

इन दिनों मुझे सुप्रसिद्ध कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की यह प्रसिद्ध पंक्ति बार-बार याद आ रही है-
ब्लिस वास इन दैट डॉन टू बी एलाइव,
बट टू बी यंग वास वेरी हैवन।
यह पंक्ति उन्होंने फ्रांस राज्यक्रांति के शुरूआत के दिनों के वहाँ आशा और उत्साह से छलकते माहौल पर लिखी थी कि ऐसे दिनो में जीना ही परम आनंददायी है, और युवा होना तो समझो स्वर्ग। आज हमारे यहाँ भी ऐसी ही अनूठी आनंददायी बयार-सी बह चली है, देश को श्रेष्ठ और सशक्त राष्ट्र बनाने की उत्साह और उमंग से छलकती बयार। ऐसे में जिनके भीतर वह कोहिनूर है, उसके लिये अपार अवसर। कोई युवा भी हो और भीतर वह कोहिनूर भी चमक कर राह रौशन कर रहा हो तो क्या उसे ऐसा सुअवसर खो देना चाहिए! सो यही कहूँगी...।

विमृश्य एतत् अशेषेण यथेच्छसि तथा कुरू
हे पार्थ, मेरे इस ज्ञान को समझकर जैसी तेरी इच्छा, वैसा कर!

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रचनाकार परिचय

शुभदा मिश्र

ईमेल : smdongargarh@gmail.com

निवास : डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़)

जन्मतिथि- 01 जुलाई, 1948
जन्मस्थान- डोंगरगढ़, ज़िला- राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शिक्षा- एम० ए०
संप्रति- विभिन्न स्कूलों एवं कॉलेजों में अध्यापन, वर्तमान में स्वतंत्र लेखन
प्रकाशन-
सात कहानी संग्रह- मंथन, यहीं कहीं होगी संजीवनी, संदेसा इतना कहियो जाये, हैपी न्यू ईयर, अंतिम स्तंभ, बाबुल, यूँ हसरतों के दाग़, उपन्यासिकाओं का संग्रह- 'तीन उपन्यासिकाएँ', एक उपन्यास- स्वयंसिद्धा प्रकाशित।
सरिता, मुक्ता, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, कादम्बिनी, वामा, मनोरमा, आजकल, वागर्थ, कथादेश, कथा बिंब, साहित्य अमृत, इंडिया टुडे, समरलोक, अक्षरा, शुक्रवार, कथन, नवल, सृजन सरोवर, अभिव्यक्ति, हरिभूमि, देशबंधु, नवभारत, अमृत संदेश, प्रखर समाचार, इतवारी अखबार, सबेरा संकेत, दावा, सत्यचक्र सहित देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
आकाशवाणी, पटना से भी रचनाएँ तथा रायपुर दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम में वार्ताएँ प्रसारित।
पुरस्कार एवं सम्मान-
कादम्बिनी कहानी प्रतियोगिता, सारिका कहानी प्रतियोगिता, प्रेमचंद कहानी प्रतियोगिता आदि में पुरस्कार
स्वातन्त्रयोत्तर श्रेष्ठ बिहारी साहित्यिक सम्मान पुरस्कार, पं० रामनारायण न्यास, पटना द्वारा 1994-95
नगर गौरव सम्मान- सॉनेट क्लब डोंगरगढ़ द्वारा, 1998
साहित्य श्री पुरस्कार- नागपुर त्रिंशताब्दि पुस्तक मेला में सर्वश्रेष्ठ कहानी संग्रह 'मंथन' हेतु, 2001
नगर के टॉप टेन सम्मान- लॉयन्स इंटरनेशनल द्वारा 2006
सप्तपर्णी पुरस्कार- छत्तीसगढ़ साहित्य सम्मेलन द्वारा 2017
कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार- कथा बिंब पत्रिका द्वारा 2021
श्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान- छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा 2022
यूनिसेफ द्वारा आयोजित बाल-पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान संबंधी सम्मान
नारी सशक्तिकरण सम्मान
संपर्क- 14, पटेल वार्ड, डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़)- 491445
मोबाइल- 82695,94598