Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

सर्दियाँ धूप सेंकने की- डॉ० मुकेश असीमित

सर्दियाँ धूप सेंकने की- डॉ० मुकेश असीमित

सर्दी तो दरअसल हमारी व्यवस्था का असली आइना है, जो हर साल हमारे समाज की ठंडी पड़ती इंसानियत को, ठिठुरते हुए रिश्तों को, और बेरोज़गारी के थपेड़ों से जूझते नौजवानों को दिखा देती है। सर्दी में ठिठुरते ग़रीब, फाइलों में सिमटी सरकारी राहत योजनाएँ, हीटर के सामने बैठे साहब और सर्द रातों में जम चुकी संवेदनाएँ, यही सर्दियों का असली चित्र है, जो इस बार भी कंबल के नीचे दबी, रजाई में लिपटी और अलाव के सामने ठिठुरती दिखेगी।

सर्दियाँ आ रही हैं। आलसी-सी, उनींदी-सी। जैसे किसी ने अल-सुबह गहरी नींद से जगा दिया हो, "उठो चलो, लग जाओ काम पर।" सर्दियों का काम ही तो है कि लोगों को काम पर न लगने दे। सर्दियाँ काम करने के लिए नहीं बल्कि धूप सेंकने के लिए होती हैं। ऑफिस में धूप तले बैठकर सिंकी हुई मूँगफली निपटाने के लिए। फाइलें भी ठिठुरन में सिकुड़कर अलमारियों में गड्ड-मड्ड एक-दूसरे के ऊपर पड़ी रहती हैं, ठिठुरते हुए पिल्लों की तरह। इनका सर्दी से बचाव का यही तरीका है। ऑफिस में भी क्या करें? फाइलों को गर्मी देने के लिए पहले साहब की जेब को गर्मी देनी पड़ेगी। लोग अपनी-अपनी जेब में हाथ डाले बैठे हैं, नोटों की गर्मी से ख़ुद ही हाथ सेंक रहे हैं। ऑफिस के कर्मचारी और क्लाइंट के बीच के रिश्तों की गर्माहट को भी ठंडी हवा लग जाती है। सर्दी की ठंडी हवा में जब हवा भी जम जाती है तो रिश्तों की हवा क्यों नहीं जमेगी भला!

सर्दियाँ और शादियाँ दोनों साथ-साथ आती हैं। तबाही भी कभी अकेले आती है भला! आप ग़रीबों की छोड़िए, सर्दियाँ तो अमीरों की महिलाओं पर भी क़हर बनकर टूटती हैं। उनके स्लीवलेस और टॉपलेस फैशन का हाल ऐसा बेहाल करती हैं, जैसे 'एंटी रोमियो' दल डंडा लेकर पीछे पड़ गया हो। नंग-धड़ंग संस्कृति को कुछ ढँकने का प्रयास करती हैं ये सर्दियाँ लेकिन इन फैशन-वीरों के जज़्बे को सलाम, जो ऐसी ठिठुरती सर्दी में भी अपने डीप-नेक और स्लीवलेस ब्लाउज़ संस्कृति को कहीं भी लोक-लाज की मोटी चादर से नहीं ढँकते।

सर्दी न जाने कितने ऐबों को ढक लेती है- मोटे पेट को, गंजे सिर को और फटी एड़ियों को भी। सबके दोषों पर अपना रूमानी पर्दा डाल देती है। मोटे पेटों पर स्वेटर, कानों पर ऊनी टोपी और फटी-पुरानी एड़ियों पर ऊनी जुराबों की आड़ आ जाती है। ठंड का ये जादू हर कमज़ोरी को गर्म कपड़ों में लपेटकर मानो ख़ूबसूरत बना देता है। अब कुपोषित-सी कर देने वाले उबाऊ डाइटिंग प्लान को तिलांजलि। हाड़-तोड़ मेहनत से पसीना कर देने वाले मॉर्निंग वॉक को तिलांजलि।

सर्दी आ चुकी है अपने साथ कंबल, अलाव और मध्यमवर्गीय हसरतों का बस्ता लेकर। जहाँ अमीरों के लिए सर्दी; एक अलसाए उनींदे से आराम का, गर्म सूटों की गर्माहट का और ऊनी कोटों के लबादों से ढँकने का मौसम है, वहीं ग़रीबों के लिए ये एक और बाधा दौड़, उसके हाँफते-बदहवास से ठिठुरते जीने की जिजीविषा की दौड़ के लिए, पेट में भूख के रूप में जलता अलाव ही शायद इस ठिठुरन भरी हाड़ कंपाने वाली सर्दी से बचाव कर सकती है।

अब हम मिडिल क्लास वालों के लिए, अरे काहे की क्लास साहब, मिडिल क्लास की तो हर मौसम क्लास लेता है। यूँ समझिए अब सर्दी की आहट के साथ ही बजट की चर्चा शुरू हो जाएगी। देश का नहीं, घर का बजट। हीटर खरीदना है लेकिन बिजली का बिल बढ़ेगा। रजाई लानी है लेकिन पिछले साल की ठीक-ठाक है, फिर ख़र्च क्यों बढ़ाया जाए? "ठंड नहीं लगती तुम्हें? ऊनी कपड़े पहनो! ये सब दिखावा है, ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च मत करो।" पूरे महीने की बचत जब एक रजाई में समा सकती है, तो क्यों भला अलग-अलग रजाई! शायद मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यही तर्क है परिवार के सदस्यों के बीच दूरियाँ कम करने का।

सर्दियों में दिन छोटे हो जाते हैं, रातें लंबी। नौकरीपेशा के लिए दिन जल्दी ख़त्म हो जाता है। बेरोज़गारों को नौकरी की चिंता में लंबी रातें काटना मुश्किल हो रहा है। बेरोज़गारी की धुंध रास्तों में खड़ी है। आगे की मंज़िल कहीं साफ नहीं दिखाई दे रही।

गाँवों में सर्दी का अपना अलग ही तिलिस्म है। रातों में ठंड जैसे हड्डियों में घुस जाती है पर फिर भी लोग सुबह जल्दी उठते हैं, उम्मीदों की अलाव जलाने के लिए। हर साल की तरह इस बार भी रोज़गार के वादे ठंडे बसते में जा चुके हैं। गाँव का नौजवान शहर जाकर कुछ बनना चाहता है पर सर्दी में रिश्तेदारों के घर रहना और बेरोज़गारी का दंश दोनों ही उसे अहसास दिला देते हैं कि उसकी जगह तो वहीं है– गर्दिश की धूल और ठिठुरते रिश्तों की ठंड के बीच। सरकारी योजनाओं की गर्माहट उसके नसीब में नहीं, उन योजनाओं की गरमाई तो सरकारी कार्यालयों की ऊँची-ऊँची अलमारियों में फाइलों में दबी सिमटी पड़ी है।

सर्दियों में ऑफिस की हालत और भी ख़स्ता। साहब गर्म कोट और ग्लव्स पहने, हीटर के सामने बैठे हैं और कर्मचारी ठंडे हाथों से फाइलों में हस्ताक्षर करवाने की कोशिश कर रहे हैं। साहब हैं कि अपने ठंडे हाथों को रिश्वत की हीट से गर्म करवाने का इशारा कर रहे हैं। इशारों ही इशारों में सब समझ में आ रहा है। वैसे भी सर्दी में शब्द जम गए हैं। बोलने को कुछ रह भी नहीं गया। साहब की टेबल के पास रखे हीटर की गर्मी से बा-ख़ूबी महसूस हो सकता है कि कड़क सर्दी भी पैसे की गर्माहट के सामने नतमस्तक हो जाती है। साहब के जूतों की महक भी इतनी गरम है कि किसी ग़रीब की उम्मीद की लौ बुझा दे। गाँव में लोग धूप के टुकड़ों पर चाय की चुस्कियों में खोए हुए हैं, उम्मीदों की आंच पर दिन बीत रहा है।

परिवारों में रिश्ते भी सर्दियों की इस सिहरन से अछूते नहीं रहे। थकान और हताशा में दबे रिश्ते भी बस नाम के रह गए हैं, ठंडे पड़े हैं मानो। ऐसा लगता है जैसे सुस्त अर्थव्यवस्था ने सर्दियों के लिहाफ़ में हर उम्मीद को सुला दिया है। शहर में महंगाई से जूझता मज़दूर और गाँव में पाला पड़ने से ख़राब हुई फसल में उलझा किसान, दोनों सर्दी के इस क़हर में ज़िंदगी की तपिश ढूँढने में लगे हैं।

सर्दी में भी रिश्तों की गर्माहट को नज़रअंदाज करते हुए बस सब दौड़ रहे हैं। चाहे वह रिश्ते हों या आमदनी, सभी जम चुके हैं ठंडी परतों के नीचे। शादीशुदा जोड़े एक ही रजाई में होते हैं पर रिश्तों में पड़ी बर्फ तोड़ने के लिए कोई पहल नहीं करता। बाहर की ठंड को भगाने में लगे रहते हैं पर अंदर की ठंड में जीना सीख चुके हैं।

सर्दी में मीडिया का एक अलग ही मीना बाज़ार लगता है। न्यूज़ चैनल वाले पूरी तैयारी में हैं कि इस बार ठंड से कितने ग़रीब मरेंगे, क्या कोई नया रिकॉर्ड बनेगा? इसी बीच, कुछ संस्थाएँ कंबल इकट्ठा करके तैयार हैं, ग़रीबों को बांटने के लिए। बस थोड़ी-सी ठिठुरन और बढ़ जाए। न्यूज़ चैनल वाले आ जाएँ। फोटो शूट के लिए कैमरा भी बुलवा लिए हैं।

सर्दी तो दरअसल हमारी व्यवस्था का असली आइना है, जो हर साल हमारे समाज की ठंडी पड़ती इंसानियत को, ठिठुरते हुए रिश्तों को, और बेरोज़गारी के थपेड़ों से जूझते नौजवानों को दिखा देती है। सर्दी में ठिठुरते ग़रीब, फाइलों में सिमटी सरकारी राहत योजनाएँ, हीटर के सामने बैठे साहब और सर्द रातों में जम चुकी संवेदनाएँ, यही सर्दियों का असली चित्र है, जो इस बार भी कंबल के नीचे दबी, रजाई में लिपटी और अलाव के सामने ठिठुरती दिखेगी।

सब-कुछ तो जम गया है- नेताओं के आश्वासन, राहत बजट का आवंटन, ग़रीबों के सपने और उनकी आशाएँ भी ठंड में सिकुड़कर कहीं ग़रीब की गोदी में लिपट गई हैं। सूरज भी अपनी गर्मी बचा रहा है, जो थोड़ी-बहुत धूप देनी है, वो अमीरों के आँगन में ही देगा, जहाँ उसका गर्मजोशी से स्वागत होगा। ग़रीब के घर की तो तासीर ही ऐसी है, कोई भी मौसम नहीं पचा पाता- गर्मी में तेज़ लू और अंधड़ के थपेड़े और बरसात में टपकती छान।

1 Total Review
V

Vinod sharma

15 January 2025

बहुत सुंदर व्यंग्य। हार्दिक बधाई

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

मुकेश 'असीमित'

ईमेल : drmukeshaseemit@gmail.com

निवास : गंगापुर सिटी (राजस्थान)

मूल नाम- डॉ० मुकेश गर्ग
संप्रति- अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन विधाएँ- कविताएँ, संस्मरण, लेख एवं व्यंग्य
प्रकाशन- 'नरेंद्र मोदी का निर्माण : चायवाला से चौकीदार तक'
काव्य कुम्भ एवं काव्य ग्रन्थ, भाग- प्रथम (साझा संकलन)
देश-विदेश के जाने-माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित
सम्मान/पुरस्कार- स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन अवार्ड
संपर्क- गर्ग हॉस्पिटल, स्टेशन रोड, गंगापुर सिटी (राजस्थान)- 322201