Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

मौसमी चन्द्रा की कहानी 'सूर्यास्त'

मौसमी चन्द्रा की कहानी 'सूर्यास्त'

वो उसे देखती रही। विदाई की बेला करीब थी। अपने प्रिय से बिछड़ने की पीड़ा आँखों से टपकने लगी। पतली धार अनगिनत झुर्रियों को पार कर ठोड़ी पर आकर ठहर गयी। उसने अपना सिर बूढ़े के कांधे पर टिका दिया।

8 बाइ 8 के उस छोटे-से कमरे में केवल एक लोहे का बेड था, जिस पर पतली-सी प्लास्टिक की गद्दी बिछी थी। इसी बिस्तर पर लेटी थी वो। सन-से उजले बाल, जर्जर शरीर! बिस्तर से जुड़े रॉड में सेलाइन की बॉटल झूल रही थी। पाइप का एक सिरा बॉटल से और दूसरा उसकी सिकुड़ी हुई चमड़ी में धंसा था। सुई के आसपास खून के कुछ सूखे धब्बे थे। पास ही एक छोटा-सा स्टूल था, जिस पर वो बैठा था। चटियल-सा कुर्ता, सूती साफा बांधे, टुकटुक अपनी बुढ़िया को निहारता।

"रोटी खा..ई!" बुढ़िया ने धीरे से पूछा।
"खा लूँगा!" कहकर बूढ़े ने अपने पोपले गाल दूसरी तरफ घुमा लिए।

"तू खायेगी कुछ?" उसके पूछने पर बुढ़िया हँसी। हँसी का शोर भीतर अधिक था। एक साथ सारी नसें उभरीं और चेहरे पर जम गयीं।
जिसने पिछले दस दिन से अन्न का एक दाना न चबाया हो, उसे ऐसे सवाल पर हँसी तो आयेगी ही।

उसने पाइप की ओर इशारा करते हुए कहा-
"खा तो रही हूँ मैं।"

बूढ़ा फिर खिड़की की ओर ताकने लगा।

ये खिड़कियाँ बड़ी करामाती होती हैं। जब आपका दिमाग़ शून्य होता है तब ये कारगर होती हैं। ताकते रहो चुपचाप, कुछ न कुछ दिख ही जाएगा अतीत का।

खिड़की के बाहर बूढ़े को पगडंडियाँ दिखीं।
उन्नीस साल का छोरा, सोलह साल की छोरी को ब्याहकर लाता हुआ।
पीछे-पीछे गाँव की औरतें गीत गातीं।

"ये जी उगतऊ सुरुज बहुते नीक लागय
अतवत लाल दुल्हिनअ लेके आगेल
ये जी..."

भर हाथ लाल लहठी, सुनहरे गोटे वाली टुसटुस लाल साड़ी, पैरों में मोटा आलता, चांदी की पायल, चांदी के झुमके।
वो छोरा दुनिया का सबसे दौलतमंद इंसान था, काहे कि उसकी छोरी उसके साथ थी।
खिड़की के बाहर फिर बच्चे दिखे, हँसते-खेलते।
उसकी झोली भरती गई।
अब बच्चे बड़े हो गए थे। गाँव की पगडंडियाँ और संकरी।
एक-एक कर बच्चे इन पगडंडियों से गुज़रकर शहर की चौड़ी सड़कों पर चले गये। बूढ़े की झोली छोटी होती गयी।
खिड़की के बाहर अब उसके गाँव का बूढ़ा बरगद दिख रहा था, पोखर के पास वाला।
ख़ूब हरा-भरा बरगद!

लोगों के घर बड़े हुए और बरगद सिकुड़ने लगा। अब उसे ये याद नहीं कितने बसंत आये और कितने गये। उस पेड़ पर पतझड़ आकर ठहर गया था। थोड़े पीले पत्ते बचे थे बस!

सुनो!
आवाज़ सुनकर बूढ़ा पलटा।
"मुझे कितने दिन रखेंगे यहाँ?"

"क्यों? घर की याद आ रही क्या?"
बूढ़े ने पूछा!

उसने ना में सिर हिलाया।
"अब कौनसा घर, कौनसा द्वार! जितने दिन ढिबरी जलानी थी, जला दी अब तो..!
बूढ़े ने उसकी दोनों हथेलियाँ अपनी हाथों में कसकर दबा लीं। कुछ बोलने को कंठ कांपा पर आवाज़ अंदर ही घुट गयी।
"मैं कह रही थी, इन सुई-दवाईयों में पैसे फूँक रहे बेफालतू! घर ही ले चलो। ऐसे भी आज जी बड़ा घबरा रहा। लेटे-लेटे मन भी ऊब गया।"

"घबरा मत! तू अच्छी हो जाएगी। मेरा दिल कहता है।"
अंतिम वाक्य बोलते हुए उसकी आवाज़ लड़खड़ा गयी। झूठ बोलना आसान थोड़े होता है!

"उठकर बैठेगी थोड़ी देर? लेटे-लेटे ऊब हो ही जाती है।"

"हूँ!"

बूढ़े ने धीरे-से उसे उठाकर बिस्तर से टिका दिया। उसका माथा सहलाने लगा।
वो उसे देखती रही। विदाई की बेला करीब थी। अपने प्रिय से बिछड़ने की पीड़ा आँखों से टपकने लगी। पतली धार अनगिनत झुर्रियों को पार कर ठोड़ी पर आकर ठहर गयी। उसने अपना सिर बूढ़े के कांधे पर टिका दिया।

बूढ़ा फिर खिड़की के बाहर देखने लगा। सब स्थिर था। शांत! गर्दन पर साँसों की फड़फड़ाहट मध्यम होने लगी।
एक झटके से बरगद की पीली पत्तियाँ ज़मीन पर झड़ गयीं, पोखर के किनारे वाला बरगद ठूंठ खड़ा था।

9 Total Review
D

Deepa Singh

15 July 2025

मर्मस्पर्शी और हृदय को छू लेने वाली रचना ❤️

रश्मि सबा

11 July 2025

जीवन के अवसान का मार्मिक वर्णन

D

Dilip kumar verma

11 July 2025

इस बार तो तुम्हारी लेखनी किसी धारदार दो मुँही तेग की तरह बस दिल को चीरती हुई चली गई। आँख़ो में आँसू रह-रहकर मचलते रहे । मन भारी होता चला गया । तुम्हारी लेखनी इतनी खूबसूरत और मार्मिक तरीके से दृश्य खींचती है जैसे कोई मुस्व्वर अपनी तस्वीर में रंग भर रहा हो । तुम्हारी लेखनी का अविस्मरणीय जादू तो बस सिर चढ़कर बोलता है और दिल ओ ज़हन पर अपनी एक स्थाई अमिट छाप छोड़ जाता है । दिलीप कुमार वर्मा " दिल " शुक्रवार 11 जुलाई 2025 लखनऊ

M

Madhu Mishra

11 July 2025

दिल को छू लिया कहानी ने ... ज़िंदगी का यथार्थ ही तो है, जो आज अनगिनत घरों में घटित हो रहा है I और परिणाम देख कर भी एक झूठी आस में न जाने कितने बरगद अब भी हरे भरे होने की आस लगाए बैठे हैं ...

V

Vibha Gupta

11 July 2025

बेहद भावुक!

विभा रानी श्रीवास्तव

11 July 2025

अच्छा ताना-बाना बुना गया है : शीर्षक भी अच्छा लगा-

S

sharmilachouhan.27@gmail.com

11 July 2025

हृदय को छू लेने वाली कहानी। जीवन भर के साथ की, सुंदर बुनी कहानी। बहुत बहुत बधाई लेखिका को।

V

Varsha Garg

11 July 2025

स्तब्ध कर देने वाली कहानी है ये। कितना गहरा प्यार और फिर बिछोह..जो पीछे छूट जाता है, उसकी जिन्दगी फिर किसी सज़ायाफ्ता कैदी सी ही बीतती है। सहज ग्रामीण भाषा का वर्णन कहानी को और रोचक बनाता है। मौसमी चंद्रा जी को बहुत बहुत बधाई!

K

Kamlesh Vajpeyi

11 July 2025

बहुत सुन्दर भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी रचना..!

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

मौसमी चन्द्रा

ईमेल : moshmi.chandra11@gmail.com

निवास : पटना (बिहार)

संप्रति- कवियत्री और कहानीकार
शिक्षा- स्नातक
प्रकाशन- 'टूटती सांकलें' (कहानी संग्रह) एवं 'एक और अमृता' (कविता संग्रह) प्रकाशित।
संपादन- 'बसंत आने को है' (साझा कहानी संकलन) तथा 'बात अभी बाकी है' (चार रचनाकारों की किताब)
निवास- पटना (बिहार)