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रहीम का नीतिकाव्य- कृष्ण बिहारी पाठक

रहीम का नीतिकाव्य- कृष्ण बिहारी पाठक

हिंदी साहित्य के नीति काव्यकारों में अब्दुर्रहीम खानखाना एक महत्वपूर्ण नाम है। रहीम ने अपने जीवन में बचपन से ही राजसी वैभव, राजनीतिक षड़यंत्र, युद्ध की त्रासदी, अमीरी-ग़रीबी आदि के अनुभवों को आत्मसात किया था। रहीम ने सच्चे अर्थों में दुनिया और दुनियादारी देखी थी। जगत व्यवहार का ख़ासा अनुभव उनके पास था।

आज के जटिल, दुर्विनीत और आत्मकेंद्रित समय में जब मानवीय नैतिकता के मापदंड कुछ धुंधले से पड़ गये हैं, हमें ऐसे साहित्य के अनुशीलन की आवश्यकता है, जो जीवन के अनुभवों के बीच सिरजा गया हो। तकनीकी और विज्ञान के इस क्रांतिकारी युग में निस्संदेह हमने भौतिक क्षेत्रों में उन्नति और उत्कर्ष का स्पर्श किया है परंतु हमारे जीवन के नैतिक, सामाजिक और भावात्मक आयाम कमतर रह गये हैं। विडंबना यह है कि इस कमतरी के प्रति अभी सार्वजनिक स्वीकृति का भाव और सहमति भी उस रूप में नहीं बन सकी है कि वह चर्चा, चिंतन और समाधान के मार्ग ढूँढने की इच्छा जगाए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 में इस ओर ध्यान दिया गया है। सामाजिक, भावात्मक, नैतिक अधिगम अर्थात सी-लर्निंग को विद्यार्थियों की पाठ्यचर्या और जीवनचर्या का अंग बनाने का आग्रह यहाँ प्रबल है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति यह तो सुझाती है कि सामाजिक, भावात्मक, नैतिक अधिगम को बढ़ावा दिया जाना चाहिए परंतु इसके क्रियान्वयन को लेकर यह अभी प्रक्रिया की अवस्था में है पूर्णता की अवस्था में नहीं। सुखद है भारतीय साहित्य इस दिशा में आशा जगाता है। भारतीय साहित्य में उपस्थित समृद्ध नीति कविता आज भी प्रासंगिक है।

हिंदी साहित्य के नीति काव्यकारों में अब्दुर्रहीम खानखाना एक महत्वपूर्ण नाम है। रहीम ने अपने जीवन में बचपन से ही राजसी वैभव, राजनीतिक षड़यंत्र, युद्ध की त्रासदी, अमीरी-ग़रीबी आदि के अनुभवों को आत्मसात किया था। रहीम ने सच्चे अर्थों में दुनिया और दुनियादारी देखी थी। जगत व्यवहार का ख़ासा अनुभव उनके पास था। रहीम ने अपनी आँखों देखी दुनिया की ऊँच-नीच, अच्छाई-सच्चाई, विद्रूप और बुराईयों को अपनी कविता का विषय बनाकर उसे नीति कविता के कलेवर में प्रस्तुत किया ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस अनुभव से सीखकर जीवन के नैतिक आदर्शों को सँवार सकें।

आत्मकेंद्रित आपाधापी और एकाकीपन के संकुचित स्वार्थ घेरे में सिमटी मानवता को परिजनों के प्रति प्रेम, विश्वास और आत्मीयता सिखाने और एकजुट रहने की राह सिखाता यह छंद देखें, जिसमें वटवृक्ष के संकटकाल अर्थात अंतिम दिनों में उसकी शाखाएँ ही संबलन प्रदान करती हैं। इसी तरह परिवार में कुटुम्ब भावना का महत्व है। परिजन मिल-जुल कर साथ रहें तो आपात में एक-दूसरे को संबलन प्रदान कर सकते हैं-

आबत काज रहीम कहि, गाढ़े बंधु सनेह।
जीरन होत न पेड़ ज्यों, थामे बरै बरेह॥1

राज-दरबारों और उनके रंग-ढंग को निकट से देखते हुए रहीम ने यह अनुभव किया कि राजपाट और धन-वैभव के लिए अपने परिजनों के बीच होने वाली मारकाट के पीछे मनुष्य की जन्मजात संचय-वृत्ति है, जिसके चलते मनुष्य अपने लिए ही नहीं, पीढ़ियों तक के लिए धन-वैभव का संचय करना चाहता है किसी भी क़ीमत पर। मानव मन की इस दुर्बलता को लक्ष्य करके ही रहीम ने दानशीलता, त्याग और परोपकार से संबंधित नीति की कविता लिखी।

रहीम ने अपने कथन के प्रमाण में प्राकृतिक अवयवों को सामने रखा तो इसका पहला कारण यह था कि प्राकृतिक अवयव अपना मौलिक स्वभाव इतनी आसानी से नहीं छोड़ते-बदलते इसलिए उनकी क़सम खाई जा सकती है, उनकी नज़ीर दी जा सकती है। दूसरे यह कि प्राकृतिक अवयव सार्वजनिक तौर सार्वभौमिक अनुभव से जुड़े होते हैं। पेड़-पौधौं और जल-स्रोतों से सौजन्य की सीख लेने के लिए वे प्रमाण देते हैं-

तरुवर फल नहीं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहिं सुजान॥2

महत्वपूर्ण बात यह है कि रहीम की कविता में निहित नैतिकता कोरी उपदेशात्मकता नहीं है बल्कि वह जीवन में व्यवहार रूप में अपनाया और अनुभव किया गया सत्य है। रहीम केवल यह उपदेश देते नहीं फिरते थे कि संचय छोड़कर दान करो बल्कि वे स्वयं बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी दानशीलता और परोपकार से संबंधित अनेक प्रसंग इतिहास और साहित्य में मिल जाते हैं।

रहीम की दानशीलता अपना वैभव प्रदर्शन या अहंकार दिखाने वाली नहीं थी बल्कि अंतर्मन से सच्ची परोपकार भावना वाली दानशीलता थी। दातार, परमात्मा और याचक के बीच रहीम ने अपने आपको निमित्त मात्र माना है। दान देते हुए भी नज़र झुकाने वाले रहीम से किसी के पूछने पर उन्होंने यह उत्तर दिया था-

देनहार कोउ और है , भेजत सो दिन-रैन।
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥3

विनय की कैसी सरल-तरल भूमि और भूमिका है। कर्ता भाव से स्वयं को निर्लिप्त रखते हुए कार्य करना ही तो निष्काम कर्मयोग है। यह भारतीय संस्कृति की उदात्त परंपराओं का अनुगमन भी है, जहाँ दस सिर चढ़ाकर रावण को मिली सुवर्णमय लंका को भी विभीषण को देते समय 'सकुचि दीन्ह रघुनाथ' का उदात्त मनोभाव निखरता है।

दान, परोपकार, परहित, त्याग का अहंकार कैसा! इधर रहीम दानी को अहंकार के निषेध की सीख देते हैं तो उधर याचक को भी कर्मनिष्ठा और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा वे देते हैं। याचना निर्विकल्प होने पर ही की जाए तो क्षम्य है अन्यथा जब चेतना है तब तक व्यक्ति को आत्मनिर्भर जीवन जीना चाहिए।

दान के महत्व को स्वीकारते हुए भी रहीम याचना के पक्ष में नहीं हैं। याचना से अंततः पद घटता है ही, चाहे वह कितना ही बड़ा काम करे, जैसे तीन पग में संपूर्ण सृष्टि को नापने का बड़ा काम करने वाले विष्णुजी नाम वामन अर्थात बौना ही रहा। अंतिम विकल्प तक याचना से बचना ही चाहिए परंतु दानी का 'मैं' भाव भी श्रेयस्कर नहीं है। जब दानशीलता का अहंकार साथ हो और याचक की अकर्मण्यता साथ हो तो ऐसे दानी और याचक दोनों को ही धिक्कार हैं-

रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥4

जनमानस में भारतीय सांस्कृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक पात्र-प्रतीक रचे-बसे होते हैं, ऐसे में उन्हें प्रमाण कोटि बनाकर प्रस्तुत किया जाए तो प्रभाव और परिणाम स्थायी होते हैं। रहीम ने भारतीय मनीषा के इस विशेषक को समझकर अपनाया और अपनी सर्जना का अनिवार्य अंग बनाया।

क्षमाशीलता को बड़प्पन से जोड़ते हुए रहीम श्रीहरि विष्णु का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने अपने ऊपर लात मारने वाले भृगु ऋषि को मुस्कुराते हुए क्षमा कर दिया था। सम्मान के साथ ग्रहण किया गया विष, अपमान उपेक्षा के अमृत से कहीं अधिक उत्तम है। ज़हर पीकर भी शिव जगदीश ही कहलाए उधर अमृत पीकर भी राहु को शीश कटवाना पड़ा।

रहीम ने अपने जीवन-अनुभवों को आधार बनाकर समान प्रकृति के विशेषकों को श्रेणीवार छंदबद्ध कर नीति कविता की इस नवीन धारा को समृद्ध किया। प्राणी की कुशलता, हत्याकांड, खाँसी का रोग, प्रसन्नता, शत्रुता और मित्रता तथा मदपान आदि में एक विशेषता ऐसी है, जो उभयनिष्ठ है वह यह कि इन्हें छुपाया नहीं जा सकता है। जगत व्यवहार में ऐसे अनुभव और प्रसंग बहुत महत्व रखते हैं। रहीम लिखते हैं-

खैर, ख़ून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान॥5

नैतिकता, सहकार, सामाजिकता और सौजन्य से जुड़ी अनगिनती बातें रहीम के नीतिकाव्य की शोभा हैं। 'रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजै डारि' में जहाँ लघुमानव और साधारणता का महत्व बनाने का उदात्त संस्कार हैं, वहीं 'जुरै गांठ परि जाय' में परिवार, समाज और परिवेश में आत्मीय संबंधों की गर्माहट और ताज़गी को बचाए रखने की सीख।

विशेषकर संबंध और अनुबंधों के इस अंधे युग में और आपाधापी की अंधी दौड़ में खुली आँखों से देखने और खुले मन से सोचने के लिए ऐसे साहित्य के अनुशीलन की महती आवश्यकता है, जो हमारी मानवीय संवेदनाओं, संवेगों की सुरुचि और सुकुमारता को बचा सके, सँवार सके, सहेज सके। रहीम का नीति काव्य ऐसा ही साहित्य है।

 

 

संदर्भ-

1. रहीम, संस्करण : 1985 रहीम ग्रंथावली, वाणी प्रकाशन
2. रहीम, संस्करण : 1985 रहीम ग्रंथावली, वाणी प्रकाशन
3. रहीम, संस्करण : 1985 रहीम ग्रंथावली, वाणी प्रकाशन
4. रहीम, संस्करण : 1985 रहीम ग्रंथावली, वाणी प्रकाशन
5. रहीम, संस्करण : 1985 रहीम ग्रंथावली, वाणी प्रकाशन

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रचनाकार परिचय

कृष्ण बिहारी पाठक

ईमेल : kbpkbp1984@gmail.com

निवास : हिंडौन सिटी (राजस्थान)

संप्रति- व्याख्याता (हिंदी)
पता- तिरुपति नगर, हिंडौन सिटी, ज़िला- करौली (राजस्थान)- 322230
मोबाइल- 9887202097