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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

ग़ज़लकार गोविंद गुलशन तथा जीवन और मौत का फ़लसफ़ा- के० पी० अनमोल

ग़ज़लकार गोविंद गुलशन तथा जीवन और मौत का फ़लसफ़ा- के० पी० अनमोल

गोविंद गुलशन साहब को पढ़ते हुए बार-बार एक बिंदु पर ध्यान जाता रहा कि इनके लेखन में जीवन और मौत को कई तरह से समझा गया है, परिभाषित किया गया है। वे जीवन को उसकी पूरी धड़कन के साथ महसूस करते हैं तो मौत को उसकी पूरी जड़ता के साथ।

2026 की शुरुआत में उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर गोविंद गुलशन साहब इस दुनिया को अलविदा कह गये। उन्होंने जाने से पहले जीवन को भरपूर जिया और उतना ही भरपूर लेखन भी किया। लेखन के रूप में उन्होंने अपनी एक बड़ी यादगार छोड़ी, जो आने वाले कितने ही सालों तक उन्हें हमारे बीच बनाए रखेगी। ग़ज़ल विधा में उनका अपना एक मकाम है, जिसके ज़रिए वे हमेशा याद किये जाते रहेंगे और अपने चाहने वालों के दिलों में रहेंगे।

मौत जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। आज के आधुनिक मनुष्य का यहीं आकर बस नहीं चलता, जबकि उसने चाँद-सूरज, धरती-आसमान सब खंगाल लिए हैं। यह एक पहेली उसके लिए अभी भी उलझी की उलझी हुई है, ये एक पर्वत वह चढ़ नहीं पाया। आने वाले सालों में या आने वाली दुनिया में हो सकता है कि वो इस गुत्थी को खोलकर रख दे लेकिन फ़िलहाल तो वो इसके आगे बेबस है। दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक जीवन के पार वाली दुनिया में बिलकुल नहीं झाँक पाया है लेकिन कवि या साहित्यकार अपनी कल्पनाओं की उड़ान के बूते जीवन के इधर के भी राज़ समझने की कोशिशें करते रहे हैं और उधर के भी।

गोविंद गुलशन साहब को पढ़ते हुए बार-बार एक बिंदु पर ध्यान जाता रहा कि इनके लेखन में जीवन और मौत को कई तरह से समझा गया है, परिभाषित किया गया है। वे जीवन को उसकी पूरी धड़कन के साथ महसूस करते हैं तो मौत को उसकी पूरी जड़ता के साथ। लेखक चूँकि अपने समय के जन-सामान्य का प्रतिनिधि होता है, सो वह उस जन-सामान्य के स्तर तक जाकर उसके जीवन को, उसके दौर को अनुभव करने का प्रयास करता है और फिर उसे उसी फ्रेम में अभिव्यक्त भी करने की कोशिश करता है। अतः गोविंद गुलशन साहब जीवन और मौत को केवल अपनी दृष्टि, अपने लेंस से नहीं देखते बल्कि एक आम आदमी की नज़र से, समझ से देखते हैं और परिभाषित भी करते हैं।

मौत एक अटल सत्य है और जीवन एक सपना भर। हम सब जानते हैं कि यह सपना एक दिन टूटना ही है और एक दिन हम सबको उस सच से टकराना ही है, जिसे दुनिया का हर दर्शन अटल मानता है, हर मनुष्य भी। गोविंद गुलशन साहब भी इसी फ़लसफ़े को अपने एक शेर में इस तरह शब्दबद्ध करते हैं-

ख़बर क्या कहाँ टूट जाएँ ये साँसें
भरोसा  कोई ज़िंदगी का नहीं है

यही फ़लसफ़ा उनके एक और शेर में देखने को मिलता है। यहाँ वे शेर के भाव को पहले की तरह सीधे-सीधे व्यक्त नहीं करते बल्कि प्रतीकात्मकता का सहारा लेते हैं। यहाँ वे एक घड़ी को जीवन का प्रतीक चुनते हैं और उसकी टिक-टिक को धड़कन की तरह प्रस्तुत करते हैं। वक़्त को साँसें माना जा सकता है, क्यूँकि जैसे ही वह थमा, जीवन का खेल समाप्त हो जाएगा। रोज़मर्रा की ज़रूरत की एक छोटी-सी चीज़ के ज़रिए एक बहुत बड़ा दर्शन अभिव्यक्त कर देना कितना अद्भुत है!

धड़कनों की तरह चल रही है घड़ी
एक दिन वक़्त यानी ठहर जाएगा

हम कई बार ज़िंदगी से इतना तंग आ जाते हैं कि उसे मौत के बराबर कह बैठते हैं। दरअसल हम अपनी ही ग़लतियों से या सोच से ज़िंदगी को इतना मुश्किल बना बैठते हैं कि हमें उस ज़िंदगी से मौत आसान लगने लगती है। कई बार इस आवेश में लोग अपना जीवन ख़त्म तक कर बैठते हैं। अपने एक बेह्तरीन शेर के ज़रिए गुलशन साहब यही बिंदु हमें समझाने का प्रयास करते हैं कि ज़िंदगी और मौत एक जैसे नहीं होंगे, बस हमको जीने का फ़लसफ़ा बदलने की ज़रूरत है। नज़रिया बदलकर देखने की ज़रूरत है, सामने जो फिसलन भरा पहाड़ दिख रहा है उसकी किसी दूसरी तरफ सीढ़ियाँ भी हो सकती हैं। आधे ख़ाली गिलास को आधा भरा हुआ समझने की देर है, हमें वही जीवन, जो बेकार और बोझ लग रहा है, मज़ेदार लगने लगेगा। शेर देखिए-

तर्जुमा  मौत  का  न  कहिए  इसे
ज़िंदगी का है फ़लसफ़ा कुछ और

यही फ़लसफ़ा समझने की देर है बस! फिर सारा परिदृश्य बदल जाना है।

हम सबके जीवन में एक वक़्त होता है, जब डर या भय का हमसे कोई वास्ता नहीं होता। अपनी तरह और अपने ढंग से जीना हमारा शगल होता है लेकिन फिर एक वक़्त आता है कि कोई अनजाना डर हमारे भीतर आ बैठता है और हम कुछ भी ख़राब होने से खौफ़ खाने लगते हैं। हम इसे उम्र का असर कह सकते हैं लेकिन इसके पीछे कुछ और कारण भी होता है। उस कारण तक जाने से पहले एक शेर पढ़िए-

जीने-मरने  का  कोई  खौफ़  नहीं  था पहले
अब ये आलम है कि हर बात से डर लगता है

क्यूँ लगने लगता है यह डर! दरअसल जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, हम अनेक चीज़ों से जुड़ते जाते हैं और उसी जुड़ाव की वजह से हमारे भीतर एक बदलाव आना शुरू होता है। हमें मुहब्बत होने लगती है। पैसे-पद से, घर-परिवार से, बीवी-बच्चों से, दुनिया की हर उस शय से जिसे हम चाहते हैं और यही मुहब्बत वह मोह है, जिससे बड़े-बड़े दार्शनिक या अध्यात्म दूर रहने को कहते आ रहे हैं। जैसे-जैसे मोह-माया का फंदा कसता जाता है, कुछ बुरा होने का, सब ख़त्म हो जाने का डर समाता जाता है मन में। और उम्र की एक दहलीज़ पर आकर हम सोचते हैं-

ज़िंदगी  से  मुहब्बत  बहुत   हो   गयी
जाने कब दिल से मरने का डर जाएगा

हालाँकि हम तब भी जानते हैं कि 'मौत एक अटल सत्य है और जीवन एक सपना भर'। लेकिन मोह के मारे इस हक़ीक़त से ज़िंदगीभर दूर भागने का प्रयास करते रहते हैं। लेकिन कब तक! उम्र की एक सीमा निर्धारित है। 'जो आया है, उसे जाना ही है' या 'मौत का एक दिन मुअय्यन है' जैसे फ़लसफ़े समय के साथ समझ आने लगते हैं। रहते-रहते हम यह बात मानने लगते हैं कि हाँ, ये तो होना ही है। और फिर हम जान की दुहाई देना व्यर्थ समझने लगते हैं। यानी उस अटल सत्य को स्वीकारना शुरू कर देते हैं। देखिए गोविंद गुलशन साहब के शब्दों में-

इस हक़ीक़त को सभी जानते हैं
मौत  जब  आएगी मर जाना है

और यह भी-

मौत आनी है एक दिन सबको
कौन  अब  जान की दुहाई दे

और फिर एक वह दिन आता है, जब सफ़र ख़त्म होता है। सारे तामझाम के बाद, सारी धूमधाम के बाद एक पड़ाव आता है, जहाँ सिर्फ़ आपको अकेले जाना होता है। हम जाते हैं क्यूँकि हर एक सफ़र के बाद आराम की ज़रूरत होती है ताकि नए सफ़र के लिए ख़ुद को तैयार किया जा सके। हमारा भारतीय दर्शन भी मानता है कि जीवन का अंत दरअसल एक विश्राम भर है, विराम नहीं। अगले जन्म में- अगली योनि में- अगले सफ़र में निकलने से पहले यह विश्राम बहुत ज़रूरी है। इस कड़वी हक़ीक़त को शायर ने कुछ यूँ बयान किया है-

इसलिए मौत के बिस्तर पे बिछाया है बदन
हो सफ़र कोई भी, आराम ज़रूरी है बहुत

इस विश्राम के लिए किसी के पास कोई विकल्प नहीं होता। यह सबके लिए अनिवार्य है। और इसीलिए इस निर्णय के आगे किसी की भी नहीं चलती। कमज़ोर हो या बलशाली, बादशाह हो या फ़क़ीर, छोटा हो या बड़ा सबको इस निर्णय के आगे हथियार डालने होते हैं। जीवनभर हम मौत की हक़ीक़त से आँखें चुराते रहते हैं, उससे बचने के- लड़ने के हज़ार तरीक़े सोचते हैं लेकिन अंत में जाकर उसे धारण कर ही लेते हैं। ये एक ऐसी घड़ी है, जहाँ किसी की कोई तैयारी काम नहीं आती। हमारे शायर ने भी नए साल के पहले दिन अपने हथियार फेंक दिए और उस अटल सत्य को गले लगा लिया। शायद शायर इस पड़ाव के दूसरी तरफ झाँकना चाहते हों-

वक़्त जब आया तो उसने हार अपनी मान ली
जिसने की थी मौत से लड़ने की तैयारी बहुत

झाँकना चाहते हों उस दुनिया में जो इंसानी मौत के पार मानी जाती है। उस मौत की असलियत जानना चाहते हों शायद, जिसे दुनिया डरावना मानती आयी है। इस दुनिया के पार का अनुभव चाहते हों शायद और यह कहना चाहते हों शायद कि

मौत कुछ इतनी ख़ूबसूरत है
उसपे तो जांनिसार हूँ मैं भी

उस ख़ूबसूरत चीज़ पर जांनिसार होकर उस्ताद शायर गोविंद गुलशन साहब अदेह तो हो गये लेकिन उनका जिया जीवन, उनकी शायरी, उनकी मुहब्बतें कुछ भी हमसे दूर नहीं हो पाएगा। बल्कि सदियों तक वे अपने इस ख़जाने के बूते इस फ़ानी दुनिया में बने रहेंगे। ज़िंदगी और मौत के इन तमाम फ़लसफ़ों, परिभाषाओं से हम अदब-पसंद लोगों की राह रोशन करते रहेंगे। एक ज़िंदादिल और विस्मृत न किए जा सकने वाले शायर को विनम्र नमन।/

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
संपादन-
1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
4. 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन।
5. ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों का संपादन।
6. 'समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल' एवं 'दोहों का दीवान' एंड्राइड एप का संपादन।
प्रसारण- दूरदर्शन राजस्थान तथा आकाशवाणी जोधपुर एवं बाड़मेर पर ग़ज़लों का प्रसारण।
मोबाइल- 8006623499