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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

विजय राही की कविताएँ

विजय राही की कविताएँ

तुम्हारे चले जाने पर भी
तुम्हारी याद की ही तरह
यह तपेगी
जलेगी
ढह पड़ेगी

आँधी

आँधी आती है
जंगल के पेड़ चिपक जाते हैं एक-दूसरे से
अपने आपको टूटने से बचते-बचाते हुए

वे अपनी डालियों के हाथ हिलाते हैं
हिम्मत बँधाते हैं एक-दूसरे को
नन्हें पौधों को अपनी बाँहों में छुपा लेते हैं

कुछ ऐसे पेड़ भी होते हैं
जिनका दूर तक कोई क़रीबी नहीं होता
अलग-थलग पड़े अपने कुनबे से
वे अकेले ही आँधी के थपेड़े खाते हैं
सहते हैं सहने की सब सीमाओं तक
लेकिन आख़िर टूट जाते हैं

जीवन की ऐसी ही किसी आँधी में
तुमसे बिछड़ जाने के बाद
जैसे मेरी छाती टूट गई थी

*******


गर्मियाँ

सूख गया है तालाब का कण्ठ
उसके पास खड़े पेड़-पौधे उसकी ओर झुक गये हैं
उसको जिलाए रखने के लिए हवा कर रहे हैं
उनके पत्ते झरते हैं उसकी तपती देह पर

अचानक उसकी छाती में हिलोर उठती है
एक औरत घड़ा लेकर गीत गाती आ रही है
उसको पानी पिलाने के लिए

*******


बारिश

नीम पर आकर बैठी है एक चिड़िया
उसकी चोंच से छिटककर
ख़जूर का पका फल मेरे गाल पर आ गिरा है
एक सूखी निंबोरी भी आ गिरी दूसरे गाल पर

आज ही पीहर से आई
खाट की दावण पर बैठी वह
इस दृश्य को देखती है और मुस्कराती है

मैं भी उसकी मुस्कराहट देखता हूँ
फिर आँखों की भीगी बीजणी से हवा करते हैं
हम दोनों एक-दूसरे पर

*******


याद

सौंफ कट रही है
मगर उसकी ख़ुशबू नहीं
डण्ठलों में भी उतनी ही ख़ुशबू है
जो अभी कुछ दिन और रहेगी हवाओं में

तुम्हारे चले जाने पर भी
तुम्हारी याद की ही तरह
यह तपेगी
जलेगी
ढह पड़ेगी

*******


बहन

एक घण्टे में लहसुन छीलती है
फिर भी छिलके रह जाते हैं
दो घण्टे में बर्तन माँजती है
फिर भी गंदे रह जाते हैं
तीन घण्टे में रोटी बनाती है
फिर भी जली, कच्ची-पक्की

कुएँ से पानी लाती है
मटकी फोड़ आती है
जब भी ससुराल आती है
हर बार दूसरी ढाणी का
रास्ता पकड़ लेती है

औरतें छेड़ती हैं तो चुप हो जाती है
ठसक से नहीं रहती, बेमतलब हँसने लगती है
खाने-पीने की कोई कमी नहीं है
फिर भी रोती रहती है
"काँई लखण कोनी थारी बहण में"

यह सब
बहन की सास ने कहा मुझसे
चाँदी के कडूल्यों पर हाथ फेरते हुए
जब पिछली बार बहन से मिलने गया

मैंने घर आकर माँ से कहा-
"बहन पागल हो गई है,
सास ने उसको ज़िन्दा ही मार दिया
कुएँ में पटक दिया तुमने उसे"

माँ ने कहा
लूगड़ी के पल्ले से आँखें पोंछते हुए-
"तू या बात कोई और सू मत कह दीज्यो
म्हारी बेटी खूब मौज में है!"

4 Total Review

विजय राही

06 August 2025

आप सबका बेहद शुक्रिया ‌‌। आपसे जोड़ने के लिए इरा पत्रिका और केपी अनमोल भाई का बहुत आभार 🌻

D

Dr. ND Manawat

02 August 2025

अच्छा लिखा 👍 बहुत बहुत बधाई

वसंत जमशेदपुरी

29 July 2025

आपकी कविताएँ जमीन से जुड़ी हुई हैं, मोकळी बधाई

निर्मल प्रवाल

16 July 2025

आ. विजय राही जी आपकी सभी कविताएं बहुत सुंदर हैं। सच्चाई के साथ सादगी के साथ आगे बढ़ती हैं पाठक के मन तक पहुंचती हैं। गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू का झोंका आया आपकी कविताएं पढ़ते हुए। बधाई।

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रचनाकार परिचय

विजय राही

ईमेल : vjbilona532@gmail.com

निवास : लालसोट (राजस्थान)

जन्मतिथि- 1991
सम्प्रति- राजकीय महाविद्यालय, कानोता, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी) के पद पर कार्यरत।
गतिविधियाँ- हिन्दी-उर्दू के साथ-साथ राजस्थानी भाषा में समानांतर लेखन। पहला हिन्दी कविता संग्रह 'दूर से दिख जाती है बारिश' (राजकमल प्रकाशन समूह, नई दिल्ली) से शीघ्र प्रकाश्य। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और वेबसाईट्स पर कविताएँ, ग़ज़लें, आलेख प्रकाशित।कविताओं का अंग्रेजी, उर्दू, मराठी और नेपाली में अनुवाद। दर्जनभर साझा संग्रहों में कविताएँ, ग़ज़लें प्रकाशित। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण। राजस्थान साहित्य अकादमी, रज़ा फाउंडेशन- इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर- नई दिल्ली, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में कविता पाठ।
पुरस्कार- दैनिक भास्कर प्रतिभा खोज राज्य स्तरीय प्रोत्साहन पुरस्कार- 2018
कलमकार मंच, जयपुर का द्वितीय राष्ट्रीय पुरस्कार (कविता श्रेणी)- 2019
पता- वार्ड संख्या- 06, ग्राम पोस्ट- बिलौना कलां, तहसील- लालसोट, ज़िला- दौसा (राजस्थान)- 303503
मोबाइल- 9929475744