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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

'अकारण' शीर्षक से पवन शर्मा की पाँच कविताएँ

'अकारण' शीर्षक से पवन शर्मा की पाँच कविताएँ

अकारण ही कभी
दिल को सुकून मिलता है
जब कोई पुराना गीत बज उठता है
उस गीत का कोई तर्क नहीं
सिर्फ़ धड़कनों से जुड़ा रिश्ता है

अकारण ही कभी
भीतर से लहर उठती है
और आँखें भीग जाती हैं
न कोई दुख सामने होता है
न कोई बिछड़न अभी-अभी घटी होती है
फिर भी
जैसे स्मृतियों का बोझ
एकाएक कंधों पर उतर आया हो

माँ की याद आती है
रसोई से आती सोंधी खुशबू
उनकी आवाज़ की गर्माहट
उनकी गोदी का वह सुरक्षित अँधेरा
आज वे पास नहीं हैं
पर अचानक लगता है
कि मैं अब भी बच्चा हूँ
और अकारण रोने लगा हूँ
क्योंकि गोदी कहीं खो गई है

**********


कभी रास्ते पर चलते-चलते
अकारण ही ठहर जाता हूँ
हवा चेहरे से टकराती है
और लगता है कोई अनकही पुकार
मेरे कानों में भर रही है
चारों ओर सब सामान्य होता है
लोग आते-जाते रहते हैं
लेकिन भीतर जैसे
किसी भूली हुई आवाज़ की गूँज उठती है

वह आवाज़ शायद दोस्त की है
जो बरसों पहले साथ चला था
फिर किसी मोड़ पर छूट गया
कोई कारण नहीं
फिर भी उस बिछड़न की चुभन
आज भी हवा की ठंडी लहरों में
मुझे रोक लेती है

**********


कभी अकारण ही हँसी आ जाती है
जब मैं अकेला बैठा होता हूँ
याद आता है वह पल
जब हम सब दोस्त
बेकार की बातों पर हँस-हँसकर
साँस रोक लेते थे
आज सब बिखर गए हैं
शहरों और कामों में
लेकिन उन हँसी के टुकड़े
अब भी भीतर बचपन की तरह पलते हैं

मुझे लगता है
शायद मन अपने आप
उन टुकड़ों को जोड़कर
अकारण ही खिल उठता है
जैसे कोई बच्चा
खाली कमरे में भी
खेल बना लेता है

**********


अकारण ही कभी
दिल को सुकून मिलता है
जब कोई पुराना गीत बज उठता है
उस गीत का कोई तर्क नहीं
सिर्फ़ धड़कनों से जुड़ा रिश्ता है

मैं बंद आँखों से सुनता हूँ
तो लगता है
जैसे मैं फिर से वही हूँ
जो बरसों पहले खिड़की पर बैठकर
सपनों को गिना करता था
तब जीवन अधूरा था
आज भी है
लेकिन गीत की लहरें
कहती हैं कि उस अधूरेपन में भी
एक पूरा संसार छिपा था

**********


कभी रात को
नींद खुल जाती है
बिना वजह, बिना शोर
चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा होता है
फिर भी भीतर एक बेचैनी
अकारण आकार लेने लगती है

मैं खिड़की खोलकर
आकाश देखता हूँ
तारे, जो हमेशा वही हैं
आज कुछ और लगते हैं
जैसे वे भी जानते हों
कि मैं अकेला हूँ
कभी लगता है
अकारण नहीं
बल्कि भीतर छुपे डर
अपने आप बाहर आ जाते हैं
जब दुनिया सो रही होती है

3 Total Review

पवन शर्मा

27 December 2025

मेरी कविताओं पर सार्थक प्रतिक्रिया देने के लिए आ. Dr. Nirmal Praval ji का हार्दिक आभार. 💐🙏

D

Dr Nirmal praval

26 December 2025

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। अकारण ही जीवन में इतना कुछ हो जाता है। सार्थक रचनाएं। बहुत बहुत बधाई शुभकामनाएं। इरा पत्रिका धन्यवाद।

पवन शर्मा

26 December 2025

मेरी कविताओं को 'इरा' में प्रकाशित करने के लिए आपका हृदय से आभार | 💐🙏💐

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रचनाकार परिचय

पवन शर्मा

ईमेल : pawansharma7079@gmail.com

निवास : जुन्नारदेव, छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)

जन्मतिथि- 30 जून, 1961
सम्प्रति- उच्च श्रेणी शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त।
प्रकाशन- देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अनेक कहानियाँ, लघुकथाएँ, कविताएँ प्रकाशित। अनेक लघुकथाओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद। चार लघुकथा संग्रह, एक कहानी संग्रह, कहानी संग्रह का उर्दू अनुवाद और एक काव्य पुस्तिका प्रकाशित। तीन लघुकथाओं पर शॉर्ट फिल्म का निर्माण।
सम्पर्क- विद्या भवन, वार्ड नंबर- 17, सुकरी चर्च, जुन्नारदेव, ज़िला- छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)- 480551
मोबाइल- 9425837079