Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

सुमिता सिन्हा की कविताएँ

सुमिता सिन्हा की कविताएँ

कुछ चिह्न
मिटते नहीं हैं
जगह बदलकर
आँखों के सामने से हटकर
मन पर आ लगते हैं

तुम हो


तुम नहीं हो
तुम्हारे होने
और नहीं होने के मध्य
एक आकाश का फ़र्क आ गया है

तुम नहीं हो
फिर भी हो
कभी किसी कुर्सी पर,
बरामदे में,
किताबों से भरी
अलमारी के पास
खाना परोसते हुए
मन में और
रसोई में, माँ के पास

तुम्हारे जाने के बाद
अब तक
घर का रंग-रौगन नहीं हुआ
कुछ रंग तुम लेकर चले गये
और कुछ रंगों को
रंगने का मन न हुआ

तुम्हारे रहने के चिह्न
अभी भी घर में
उभर आते हैं
तुम्हारे बैठने की
जगहों पर
कभी-कभी
सिलवटें पड़ी दिखती हैं मुझे
मटमैले हो गयी
दीवारों पर
तुम्हारे हाथों के निशान
दिख जाते हैं

कुछ दिनों में
ये घर तुम्हारे से
किसी और का हो जाएगा
जो दीवारें
तुम्हारे स्वेद से भीगी थीं
मैं उन्हें धीरे-धीरे
सूखते देख रही हूँ
बिछड़ जाने के पहले का मौन
आर्त चीत्कार सुन रही हूँ

मैं जानती हूँ
तुम इस घर से
कभी नहीं जाओगे
जब भी इस घर को
नए रंगों से रंगा जाएगा
उसकी दीवारों पर
तुम्हारी ही स्वेद की बूँदें उभर आएँगी
तुम्हारे रहने के सारे चिह्न
वहीं रहेंगे

कुछ चिह्न
मिटते नहीं हैं
जगह बदलकर
आँखों के सामने से हटकर
मन पर आ लगते हैं।

***********


पाप

कई बार लगता है
मैंने पाप किया

पाप करने की परिभाषा को
सम्पूर्ण ना कर पाने की अवस्था में भी
मन ये मान लेता
कि मैंने पाप किया

कई बार
पाप करने की परिभाषा को
लाँघ आने के बाद भी
पाप करने का शोक
मन में नही उभर आया

जिसे हम कर सकते थे किसी के लिए
और कर नही पाये
जो हम दे सकते थे किसी को
और दे नही पाये
मेरा मन अपने आप उन्हें
पापों की श्रेणी में ले आया

प्रेम करते हुए
उसके बैचेन मन को
अपने मन के आँचल की
छाँव न दे पाना
उसके कपोल पर
एक स्नेहसिक्त
चुम्बन न धरना
व्यथा से कांपते
उसके हृदय को
अपने हृदय में
न धरने की व्यथा से
मेरा मन भर उठता है
मन का सवाल!
यह व्यथा से भर उठना
पाप है

पाप क्या है?
ईश्वर! मेरी जानकारी में
तुम्हारे बनाए पाप की श्रेणी में
किसी को पीड़ा देना पाप है
मैंने भी
कई बार पाप किया
पीड़ा देकर

मैंने अपने पाप के बोझ को
और बढ़ा लिया
अपने आपको दर्द देकर

ईश्वर!
पाप करने की परिभाषा
कौन तय करता है?
तुम
मन
या समाज!

***********


सद्गति

बहुत कुछ छूट गया
सामने से

आगे देखने की कोशिश में
नदी किनारे उग आयी
लंबे घास को
हटाने की तरह
हटाते रहे
वक़्त को

पैरों के पास का रास्ता नहीं दिखा
हाथ में पकड़ा लम्हा
पसीने-सा बह गया

बहते लम्हे में कभी-कभी
कुछ बीते वक़्त के निशान उभरे
कुछ निशान
अंदर भी उभरे

मन के हाथ फेरती हूँ
उन निशानों पर

दर्द जल्दी ख़त्म करने को
पाँव तले रौंद डाले
कुछ निशान

मन पर पड़े निशानों की मुक्ति
देह के साथ हो जाती है
कुछ बाँस और लकड़ियों के मध्य
देह की सद्गति हो जाती है
और मन की सद्गति?

***********


लौटते हुए कुछ वक़्त

चिड़ियों के पंखों पर,
खेतों में चरते ढोरों की आँखों में,
माँ के आँचल में,
पिता की जेब में
और
तुम्हारे मन में
वक़्त हर दिन
अपने घर लौटता है

सड़कों पर
बीत रही
बच्चों की
उदास आँखों में
और ठूँठ पड़े
उन पेड़ों पर
जिनकी छाया
उनके ही पैरों तक
नहीं पहुँचती
उन्हें घर लौटने की आस का
थोड़ा वक़्त दे आऊँगी

वक्त ही तो नही था
उसके पास
एक चिट्ठी वक्त की
लिख भेजूँगी
शायद कभी
मेरे वक्त की चिट्ठी
उसकी जेब तक
पहुँचकर
उसे घर ले आए।

जो घर
ढह चुके हैं
बारूद की गंध
और रक्त की धार में
घर लौटने का कुछ वक़्त
उनकी दीवारों पर
रख आना होगा।

7 Total Review
D

Dr.ND Manawat

02 August 2025

अच्छा लिखा

वसंत जमशेदपुरी

29 July 2025

बहुत सुंदर

M

Meera Singh

16 July 2025

बेहतरीन कविताएँ ।

P

Prakash Bahadur Singh

11 July 2025

अति सुंदर

R

Rashmi kumari

11 July 2025

बेहतरीन कविताएं

D

Deep Kumar

11 July 2025

Excellent sumita

N

Nilam Kumaru

11 July 2025

मन को बहुत प्रभावित कर गई ये कविताएँ।

Leave Your Review Here

रचनाकार परिचय

सुमिता सिन्हा

ईमेल : sumitasingh6473@gmail.com

निवास : राँची (झारखण्ड)

जन्मस्थान- झारखंड
शिक्षा- स्नातक (दर्शन शास्त्र), पत्रकारिता में बैचलर डिग्री
संप्रति- स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य
विधा- गद्य और पद्य
प्रकाशन- वर्तमान अंकुर, नव उदय पत्रिका, राष्ट्रीय ज्ञान सवेरा, कविता कानन, ककसाड़, अमर उजाला आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्मान- क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित
संपर्क- Nano 401, vastu vihar phase 4, near Sharda global school, Bukru, Kanke, Ranchi (Jharkhand)- 834006
मोबाइल- 9304171395