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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

गोविन्द गुलशन : जिनकी ज़िन्दगी ग़ज़ल थी- असलम राशिद

गोविन्द गुलशन : जिनकी ज़िन्दगी ग़ज़ल थी- असलम राशिद

गुलशन सर बताते थे कि आपने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल शादी के तक़रीबन एक साल बाद 1987 में लखनऊ के सफ़र के दौरान कही थी, और फिर वहाँ से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो अपने उरूज पर पहुँचकर भी नहीं रुका।

ऐसे वक़्त में, जब अदब से एहतराम और पाकीज़गी का रिश्ता अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा हो तब अगर कोई उस रिश्ते को आख़िरी साँस तक निभा रहा है तो वो कोई आम इंसान न होकर फ़क़ीर या संत का दर्जा रखने वाला शख़्स ही होगा, और मोहतरम गोविन्द गुलशन साहब ऐसे ही फ़क़ीराना मिज़ाज शख़्स थे। आपने ता-ज़िन्दगी ग़ज़ल से, अदब से अपने पाक, क़दीम और ख़ूबसूरत रिश्तों में कभी दरार नहीं पड़ने दी। यहाँ तक कि अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हात भी आपने ग़ज़ल गुनगुनाते हुए पूरे किये।

पतित-पावनी भागीरथी गंगा के किनारे बसा अनूपशहर, जहाँ की सुब्ह आरतियों और अज़ानों की मुक़द्दस ख़ुश्बू से होती थी, वहाँ से अपनी ज़िंदगी का सफ़र शुरूअ करने वाले गोविन्द गुलशन जी मौसिक़ी के साथ-साथ शाइरी में भी ख़ूब दिलचस्पी रखते थे। आपके घर में मौसिक़ी और अदब की ख़ुशबुएँ पहले से ही बिखरी हुई थीं इसलिये अपने वालिद मोहतरम के ज़ौक़ और शौक़ से आपने ख़ुद को भी जोड़ लिया। शाइरी की दीवानगी में आप सूफ़ियाना महफ़िलों में अपनी रातें गुज़ारने लगे और मुहतरम जनाब आले-सिद्दीक़ी (ख़लीफ़ा हज़रत क़ुर्बान शाह आँवरलवी) साहब ने आपको अपना मुरीद क़ुबूल फ़रमाया। शुरुआती दौर में अपने भाई जनाब हृदयेश कुमार 'दिव्येश' की भजनों की किताबें पढ़कर आप भजन कहने लगे और 1978 से 1982 के दर्मियान आपके पाँच भजन संग्रह मंज़र-ए-आम पर आ चुके थे।

गुलशन सर बताते थे कि आपने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल शादी के तक़रीबन एक साल बाद 1987 में लखनऊ के सफ़र के दौरान कही थी, और फिर वहाँ से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो अपने उरूज पर पहुँचकर भी नहीं रुका। गुरुवर डॉ० कुँवर बेचैन साहब की सरपरस्ती और जनाब एस० एस० शादाब भटनागर साहब की सोहबतों में आपकी ग़ज़लों ने अपनी जो ख़ुश्बू बिखेरनी शुरू की, वो जल्दी ही आपको मोहतरम कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब की चौखट तक ले आयी। नूर साहब से आपकी मुलाक़ात डॉ० कुँवर बेचैन साहब के ज़रिए नोएडा में हुई, और उसी दिन नूर साहब पहली बार आपके घर पहुँचे, और नूर साहब ने उसी दिन आपको अपना शागिर्द भी तस्लीम किया।

ब-हैसियत शाइर गोविन्द गुलशन जी ने न सिर्फ़ अपने हम-असरों को बल्कि अपने सीनियर शाइरों को भी बहुत मुतास्सिर किया। आपकी शाइरी में तग़ज़्ज़ुल, तख़य्युल, तसव्वुर रम्ज़-ओ-किनाया, और मफ़ाहिम का इंतेख़ाब अपने पूरे शऊर के साथ मौजूद दिखता है। आपका कहन और अंदाज़-ए-बयां आज भी बाइसे मसर्रत है।

गोविन्द गुलशन सर ने एक शागिर्द बनकर ग़ज़ल के अपने पहले उस्ताद गुरुवर डॉ० कुँवर बेचैन साहब से और फिर मोहतरम कृष्ण बिहारी नूर साहब से जो सीखा, ताउम्र वो अपने शागिर्दों में बाँटते रहे। ये हक़ बात है कि एक उस्ताद शाइर वो होता है, जो अपनी ज़ेहनी सतह से उतरकर शागिर्द की ज़ेहनी सतह तक उतरे और शागिर्द के मेयार के मुताबिक़ मशवरा दे। उस्ताद को अपने शागिर्द को मशवरा देते वक़्त सख़्त मराहिल से गुज़रना ही पड़ता है और इस दौर में तो ये और भी मुश्किल काम है, जब शागिर्द ज़रा से इख़्तिलाफ़ पर उस्ताद को रद्द करने पर आमादा होते हैं, मगर गुलशन सर जानते थे कि तख़्लीक़-ए-फ़न (सृजन कला) से कहीं मुश्किल तज़ईन-ए-फ़न (सँवारने की कला) है, इसलिए उन्होंने अपने शागिर्दों का हाथ कभी नहीं छोड़ा।

गोविन्द गुलशन सर ब-हैसियत बेहतरीन शाइर होने के साथ-साथ ब-हैसियत एक बेहतरीन और आला ज़र्फ़ इंसान भी थे। आपके अल्फ़ाज़ और लहजे की नरमी आपके आसपास मौजूद लोगों पर ऐसी कैफ़ियत तारी कर देती थी कि सख़्त लहजे भी फूल पैकर इख़्तियार कर लेते थे। अपनी सारी ज़िन्दगी शाइरी को देने वाले गुलशन जी ने अपने घर का नाम जब 'ग़ज़ल' रखा था तब ही ये महसूस हो गया था कि ग़ज़ल आपकी रूह में बसती है, और जब उसी 'ग़ज़ल' में आपकी रूह ने अपने जिस्म से विदा ली तब भी आपके होंठों पर ग़ज़ल ही थी।

ग़ज़ल को अपनी ज़िंदगी मानने वाले गोविन्द गुलशन सर की तीन किताबें उनके सामने ही मंज़र-ए-आम पर आ चुकी थीं मगर सद-अफ़सोस चौथी किताब का सफ़र पूरा होने से पहले गुलशन सर की ज़िंदगी का सफ़र पूरा हो गया। गोविन्द गुलशन सर ता-क़यामत अपनी ग़ज़लों में ज़िंदा रहेंगे और हमारे आँसुओं में भी।

 

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रचनाकार परिचय

असलम राशिद

ईमेल : aslem.khan@gmail.com

निवास : गुना (मध्य प्रदेश)

नाम- मोहम्मद असलम ख़ान
साहित्यिक नाम- असलम राशिद  
जन्मतिथि- 30सितंबर 1976
जन्मस्थान- गुना (मध्यप्रदेश)
लेखन विधा- शायरी ( ग़ज़ल/नज़्म)
शिक्षा- एम. ए. (अँग्रेज़ी साहित्य एवं हिंदी साहित्य)
सम्प्रति- शासकीय सेवा
प्राकाशन- विभिन्न सोशल मीडिया एवं पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित 
ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन 
सम्मान-
* महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुम्बई 2019
* नज़ीर अकबराबादी अवार्ड, कानपुर 2019
* अंतरध्वनि सम्मान (ख़्वाहिश फाउंडेशन) कानपुर 2016
* तहज़ीब फाउंडेशन, लुधियाना, 2019
* हिंदुस्तानी ग़ज़ल फाउंडेशन, मुम्बई 2015
प्रसारण-
ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली एवं विभिन्न प्रादेशिक आकाशवाणी, दूरदर्शन उर्दू, तहज़ीब टीवी, ई टीवी उर्दू, न्यूज़ 18 टीवी आदि।
पता- 3/391, हयात मंज़िल, कर्नल गंज, गुना (म.प्र.) 473001
मोबाइल- 8989671786