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मृद्गंध की स्मृति : हरिगढ़ की मिट्टी से नगर के आकाश तक- डॉ० मुकेश कुमार

मृद्गंध की स्मृति : हरिगढ़ की मिट्टी से नगर के आकाश तक- डॉ० मुकेश कुमार

प्रातःकाल के सूरज की लालिमा खेतों में फैल रही थी। बालक अपने छोटे पाँव हल की पथरीली रेखाओं पर रखकर चलता और बैलों की धीमी चाल तथा हल की खुरचाइयाँ उसके भीतर जीवन में संतुलन और स्थिरता का भाव पैदा कर रही थी।

हरिगढ़ की मिट्टी में जीवन की पहली गंध समाहित थी। जब बालक विकास लांबा ने अपनी नन्हीं आँखें खोलीं, तो सूरज की पहली किरणें खेतों पर पड़कर सोने जैसी चमक बिखेर रही थीं। हल की पथरीली रेखाओं में मिश्रित मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू उसके हृदय में जीवन का पहला संगीत घोल रही थी। दादा चौधरी मुंगाराम की कठोर परिश्रमी जीवनशैली, पिता चौधरी रिछपाल सिंह की श्रमठता और माता सुनीता देवी का वात्सल्य- इन तीनों प्रवाहों ने बालक के भीतर संस्कारों की गहन धारा प्रवाहित की।

हरिगढ़ के खेतों में लहराती फ़सलें, बैलों की घंटियों की स्वरमाला, और नीम के पेड़ के नीचे बुजुर्गों की कहानियाँ, बालक की चेतना में जीवन की लय गढ़ रही थीं। वह समझता कि मिट्टी केवल अन्न का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य, संघर्ष की महत्ता और धैर्य की शिक्षा भी देती है। हल की गहरी खुरचाइयों में उगे छोटे अंकुर, सरसों के पीले फूल और खलिहान में बंधी फ़सलें- ये सभी दृश्य उसके लिए प्रतीक बन गये।

ग्राम की गलियाँ मिट्टी से बनी थीं, किन्तु उनमें इतिहास, परंपरा और संस्कृति की गूँज भी समाहित थी। दादा मुंगाराम का व्यक्तित्व स्थिर, गंभीर और जीवनदायी था। उनके कठोर परिश्रम की लकीरों में अनुशासन और देशभक्ति की झलक थी। पिता रिछपाल सिंह ने अपने कर्म और दृष्टि से पुत्र में धैर्य और परिश्रम के बीज बोये। माता सुनीता देवी का वात्सल्य और उनकी मधुर वाणी बालक के हृदय में करुणा, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीज बो रही थी। उनकी लोरी और लोकगीत बालक को भारतीयता की गूँज से ओत-प्रोत कर रहे थे।

हरिगढ़ का लोकजीवन उत्सव, सामूहिकता और परंपरा से लबरेज़ था। फ़सल कटने के पश्चात ढोलक की थाप और लोकगीतों की गूँज सम्पूर्ण ग्राम को एक सूत्र में बाँधती थी। बरसात की फुहारें, तालाब में प्रतिबिंबित मेघ और पेड़ों की सरसराहट- ये सभी प्राकृतिक संगीत बालक के भीतर आत्मा के स्वर को जागृत कर रहे थे। इसी संगीत ने उसे सिखाया कि जीवन का सौंदर्य बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि श्रम और मातृभूमि की निष्ठा में निहित है।

वह जब युवा हुआ, तो उसने समझा कि मिट्टी केवल कृषि का माध्यम नहीं, बल्कि सहिष्णुता, समर्पण और राष्ट्रभाव का भी स्रोत है। खेतों की पगडंडियाँ, पीपल के नीचे बुजुर्गों की कथाएँ, तालाब में प्रतिबिंबित अतीत- सब उसे सिखाते कि जीवन में वर्तमान, अतीत और भविष्य तीनों ही मूल्यवान हैं। उसने महसूस किया कि किसान और भूमि का संबंध केवल आर्थिक नहीं, आध्यात्मिक भी है। जैसे बीज मिट्टी में छिपकर अंकुरित होता है, वैसे ही मानव जीवन में धैर्य, समर्पण और प्रतीक्षा आवश्यक हैं।

प्रातःकाल के सूरज की लालिमा खेतों में फैल रही थी। बालक अपने छोटे पाँव हल की पथरीली रेखाओं पर रखकर चलता और बैलों की धीमी चाल तथा हल की खुरचाइयाँ उसके भीतर जीवन में संतुलन और स्थिरता का भाव पैदा कर रही थी। खेतों में सरसों की ख़ुशबू, ओस में भीगी मिट्टी और तालाब में प्रतिबिंबित आकाश- ये सभी दृश्य उसके हृदय में प्रकृति और जीवन के अद्भुत समन्वय का अनुभव करवा रहे थे।

वह नगर की ओर बढ़ते हुए भी मिट्टी से जुड़ा रहा। सी०टी०यू० में परिचालक के रूप में उसने अपने ग्राम्य संस्कारों को सेवा में रूपांतरित किया। खेतों में जो हाथ बैलों की डोर पकड़ते थे, अब वही हाथ यात्रियों को सुरक्षित मार्ग पर ले जाते हैं। नगर की आधुनिकता, शोर-शराबा और तेज़ गति ने उसके कर्म और दृष्टि को नहीं बदला, क्योंकि उसकी आत्मा हरिगढ़ की मिट्टी से जुड़ी है।

गाँव के बदलते स्वरूप ने उसे चिंतनशील बनाया। पहले जहाँ लोकगीत, नृत्य और सामूहिक उत्सव होते थे, वहाँ अब यंत्रों की हलचल और आधुनिकता का शोर है। खेतों की मेड़ पर अब मोबाइल और आधुनिक उपकरण हैं। फिर भी मिट्टी के भीतर पुराना ताप जीवित है। यह वही ग्राम है, जिसकी आत्मा आज भी लोकभावना और संस्कृति को संजोए हुए है।

विकास लांबा जब गाँव लौटता है, तब वह युवाओं और स्वयं के माध्यम से उस सुप्त जीवन को जागृत करने का संकल्प करता है। अपने चरणों में मिट्टी की गंध को महसूस कर वह कहता है, “माँ, मैं तेरा पुत्र हूँ, तेरी गंध अब भी मेरी साँसों में बसी है।”
गाँव के किसान परिवार से निकलकर सी०टी०यू० में परिचालक बनना उसके लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि सेवा का विस्तार था। वह जानता है कि किसान और यात्री दोनों ही मातृभूमि के अंश हैं। नगर के शोर और आधुनिकता के बावजूद उसकी आत्मा में वही मिट्टी बोलती है, जिसने उसे श्रम, धैर्य, सेवा और मातृभूमि की निष्ठा सिखायी।

हरिगढ़ की मिट्टी ने उसे यह सिखाया कि जीवन केवल भौतिक साधनों के लिए नहीं है, बल्कि कर्म, सेवा और सामूहिकता के माध्यम से भी आत्मा की उन्नति होती है। नगर में वह यात्रियों के मार्गदर्शन, सुरक्षा और सेवा में वही धैर्य, सजगता और नम्रता दिखाता है, जो बाल्यकाल में खेतों, हल और बैलों के साथ सीखी गयी थी। प्रत्येक मुसाफ़िर उसके लिए केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि मातृभूमि का अंश है।

आज का हरिगढ़- पहले जहाँ लोकगीत, नृत्य और सामूहिक उत्सवों की थाप गूँजती थी, अब आधुनिकता की हलचल और शहर की छाया में बदलता जा रहा है। फिर भी मिट्टी की गंध, तालाब की छाया और पीपल के नीचे बुजुर्गों की कहानियाँ, युवा मन को जड़ से जोड़ने वाली हैं। यह मिट्टी अब भी जीवन और संस्कृति का प्रतीक है, और विकास लांबा की तरह यह संदेश देती है कि जहाँ जड़ें मजबूत हों, वहाँ जीवन के पंख उन्नति की ओर उड़ते हैं।

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रचनाकार परिचय

मुकेश कुमार

ईमेल : drmkhindi@gmail.com

निवास : करनाल (हरियाणा)

शिक्षा- बी० ए० (हिंदी ऑनर्स), एम० ए० (हिंदी व संस्कृत), एम० फिल, पी० एचडी
जन्मतिथि- 05 मई, 1988
सम्प्रति- हिंदी विभाग, चौधरी रणबीर सिंह यूनिवर्सिटी, जींद (हरियाणा), अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका 'संस्कार चेतना' में उप संपादक
प्रकाशित कृतियाँ- कर्ज से मुक्ति (कहानी संग्रह), धूप के बीच बारिश (काव्य संग्रह), अज्ञेय की प्रयोगधर्मिता, चमत्कार एकांकी संग्रह संवेदना और शिल्प, खड़ी बोली हिन्दी के उन्नायक महाकवि हरिऔध, आदिकाल अभिव्यक्ति और आयाम, ब्रह्मर्षि स्वामी योगश्वरानंद सरस्वती जीवन दर्शन तथा शोध प्रविधि पुस्तकें प्रकाशित।
संपादित कृतियाँ- हिंदी कविता राष्ट्रीय चेतना संस्कृति, लोक भाषाओं में रामकाव्य, काव्य संचयन निर्मला पुत्तुल, प्रतिनिधि कविताएँ निर्मला पुतुल
सम्मान/पुरस्कार-
हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला द्वारा 'राज्य स्तरीय पाठक शिरोमणि पुरस्कार'
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्र प्रस्तुत।
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय (यू०जी०सी० केयर) में तथा अन्य पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित।
स्थाई पता- ग्राम- हथलाना, पोस्ट- मंजूरा, ज़िला- करनाल (हरियाणा)- 132001
वर्तमान पता- ग्राम व पोस्ट ऑफिस- प्योंत, ज़िला- करनाल (हरियाणा)-132036
मोबाइल- 9896004680