Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

गोविंद गुलशन : एक बरस की शनासाई, सदियों का रिश्ता- अज़ीज़ नबील

गोविंद गुलशन : एक बरस की शनासाई, सदियों का रिश्ता- अज़ीज़ नबील

गोविन्द गुलशन साहब से तअल्लुक़ का वक़्त भले ही मुख़्तसर रहा, मगर उनकी मुहब्बत और ख़ुलूस ने उसे सदियों की शनासाई बना दिया। वो सिर्फ़ शायर नहीं, उर्दू तहज़ीब की एक ज़िंदा मिसाल थे। उनकी आवाज़, उनका लहजा और उनका कलाम आज भी दिलों में गूँजता है। कुछ लोग रुख़्सत होकर भी जाते नहीं, गुलशन साहब अब भी हमारे एहसासों में एक ख़ूबसूरत बाज़गश्त की तरह मौजूद हैं।

गोविंद गुलशन साहब से मेरे तअल्लुक़ का सफ़र अगरचे एक ही बरस पर मुहीत रहा, मगर उनकी अपनाइयत, ख़ुलूस और मुहब्बत से लबरेज़ तीन–चार मुलाक़ातों ने इस क़लील वक़्त को सदियों की शनासाई में बदल दिया।

कुछ  लोग  अचानक  हमें  ऐसे भी मिले हैं
जिनसे कई जन्मों के मरासिम निकल आये

आपने 2024 के 'सुख़न रू-ब-रू क़तर' मुशायरे में मेरी दरख़्वास्त पर तशरीफ़ लाकर न सिर्फ़ महफ़िल की रौनक़ बढ़ाई, बल्कि अपनी असरदार शख़्सियत, जादूई शायरी और दिलनशीं अंदाज़ से क़तर में शायरी से मुहब्बत करने वालों को अपना गिरवीदा बना लिया।

वह उर्दू शायरी की उस मुक़द्दस तहज़ीब का अक्स थे, जो अब दिन-ब-दिन नायाब होती जा रही है। उनकी शख़्सियत की नस्तालीक़ियत और लहजे में रचा-बसा खुलूस हर दिलदादा को अपनी ओर खींच लेता था। जिन लोगों ने उन्हें क़रीब से देखा है, वे इस बात से ज़रूर इत्तिफ़ाक़ करेंगे कि गुलशन साहब हम-वक़्त आलम-ए-ख़याल में रहते और शेर-ओ-सुख़न की आबियारी में मसरूफ़ रहते थे।

गोविंद गुलशन साहब अपनी बा-वक़ार और शफ़ीक़ शख़्सियत तथा अपनी अमर शायरी के हवाले से हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगे- बिल्कुल किसी ख़ूबसूरत शेर की उस बाज़गश्त की तरह, जो वक़्त के शोर में भी कभी मद्धम नहीं पड़ती।

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रचनाकार परिचय

अज़ीज़ नबील

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निवास : क़तर