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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

गोविन्द गुलशन की बीस ग़ज़लें

गोविन्द गुलशन की बीस ग़ज़लें

बेहद सादा और आसान ज़ुबान में हर आम और ख़ास के मन की बातों को शायरी में ढालते हैं गोविन्द गुलशन साहब। जहाँ इनकी ग़ज़लों के शिल्प और भाषा एकदम पके-पकाये मालूम पड़ते हैं, वहीं इनका कथ्य बिलकुल हमारे जीवन का, हमारे मन का होता है। गुलशन साहब की शायरी में शायरी का परंपरागत स्वरूप अपने आपको संरक्षित पाता है। वहीं दुनिया की समझ और इनका अपना कहन उसे और ख़ास बनाते हैं।

- के० पी० अनमोल

ग़ज़ल- 01

वो मेरे ख़्वाब में आया तो खुल गयीं आँखें
सुकून फिर भी न पाया तो खुल गयीं आँखें

वो उड़ रहा था हवा के परों पे हो के सवार
ख़ुद अपना बोझ उठाया तो खुल गयीं आँखें

वो मेरा दोस्त था अमृत पिलाने वाला था
फिर उसने ज़हर पिलाया तो खुल गयीं आँखें

मैं गहरी नींद में सोया हुआ था लेकिन फिर
किसी ने मुझको जगाया तो खुल गयीं आँखें

वो मुझको गहरे कुएँ में गिरा के लौट गया
किसी ने शोर मचाया तो खुल गई आँखें

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ग़ज़ल- 02

तुम आजकल ये नई रस्म क्यूँ निभाने लगे
अभी  तो आए थे, बैठे नहीं कि जाने लगे

बस एक चराग़ जलाया था आपने और फिर
कई  चराग़  निगाहों  में   जगमगाने   लगे

वो लम्हे और मनाज़िर जो कल की बात हुए
अभी  ख़याल  से  गुज़रे  तो  याद आने लगे

वहाँ जो भीड़ इकट्ठा थी सब मुख़ालिफ़ थी
तो हर तरफ़ से मेरी सिम्त ही निशाने लगे

ये जान लेना मुहब्बत हुई है उससे तुम्हें
भुलाना चाहो जिसे और याद आने लगे

बुलंदियों में सदाओं को कीजिए शामिल
कहीं  न ऐसा हो आवाज़ डूब जाने लगे

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ग़ज़ल- 03

है दर किसका ये सर पहचानता है
जबीं किसकी है, दर पहचानता है

परिंदों  को  शजर पहचानता है
मेरी साँसों को घर पहचानता है

दिया बुझ ही नहीं सकता अगर वो
हवाओं  का  हुनर  पहचानता   है

कहाँ किस दिल में क्या है, जान लेगा
वो  ज़ालिम  हर  नज़र  पहचानता है

पुराना सिलसिला है कश्मकश का
किनारा  हर  लहर  पहचानता  है

ये आलम है मेरी आवारगी का
मुझे  सारा  नगर पहचानता है

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ग़ज़ल- 04

इक परी का ख़याल है दुनिया
हाय क्या बे-मिसाल है दुनिया

दुनियादारी  समझ  में आयी तो
दिल ये बोला- कमाल है दुनिया

ऊँचा उड़ने की हसरतें हैं मगर
हसरतों  का  मलाल   है दुनिया

दिल की दुनिया का हाल क्या मैं कहूँ
दर्द     से   मालामाल    है   दुनिया

ज़िन्दगी जिसकी क़ैद में ख़ुश है
ऐसे  रेशम  का जाल है दुनिया

सबकी दुनिया अलग-अलग है यहाँ
अपनी  जाम-ए-सिफ़ाल  है दुनिया

चाँद  के जैसी गोल है ये ज़मीं
यानी चाँदी का थाल है दुनिया

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ग़ज़ल- 05

दिलों  में  पोशीदा  बेक़रारी  अभी नहीं है, कभी नहीं थी
कि उसकी आँखों में राज़दारी अभी नहीं है, कभी नहीं थी

हमीं  उठाएँगे  बोझ  सर पर हमीं उतारेंगे बोझ सर से
तुम्हारी कोई भी ज़िम्मेदारी अभी नहीं है, कभी नहीं थी

रवायतों से तुम्हारी रग़बत तुम्हारा रिश्ता कभी नहीं था
तुम्हारे लहजे में इन्किसारी अभी नहीं है, कभी नहीं थी

किसी की साँसें उधार लेकर, न हम जिए हैं, न जी रहे हैं
हमारी  कोई  भी  देनदारी  अभी  नहीं  है, कभी नहीं थी

बचा के रक्खा है नस्ल-ए-नौ को नई हवा की लपट से हमने
हमारे  बच्चों  में  होशियारी  अभी  नहीं  है,  कभी  नहीं थी

तुम्हारी आँखों में सिर्फ़ तुम हो, न कोई सूरत न चाँद कोई
तुम्हारी  सोचों  में  दुनियादारी अभी नहीं है, कभी नहीं थी

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ग़ज़ल- 06

कर लिए मैंने मुहब्बत में अना के टुकड़े
रह  गये  पास  मेरे  मेरी वफ़ा के टुकड़े

रूठने  की  उसे  आदत  थी, मनाने की मुझे
आ गये मुझमें भी कुछ उसकी अदा के टुकड़े

रोशनी  पर  कोई  तलवार नहीं चल सकती
चाहे कर लीजिए कितने  भी ज़िया के टुकड़े

ये  तो  मालूम  नहीं  कितनी सज़ा है लेकिन
और कम हो गये कुछ अपनी सज़ा के टुकड़े

डूबने  वाले  को  इक  चाह  यही  रहती  है
काश! मिल जाएँ कुछ ऐसे में हवा के टुकड़े

उसने इक बार कभी दिल से पुकारा था मुझे
आज  भी  गूँज  रहे  हैं  वो  सदा  के टुकड़े

आँधियाँ चलती रहीं उड़ते रहे पैराहन
दूर होते गये जिस्मों से हया के टुकड़े

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ग़ज़ल- 07

लफ़्ज़ अगर कुछ ज़हरीले हो जाते हैं
होंठ  न  जाने  क्यों  नीले हो जाते हैं

चलती हैं जब सर्द हवाएँ यादों की
ज़ख़्म  हमारे  दर्दीले  हो  जाते हैं

जेब में जब गर्मी का मौसम आता है
हाथ  हमारे  ख़र्चीले   हो  जाते   हैं

आँखों को आँसू की ज़रूरत पड़ने पर
याद  के  बादल  रेतीले  हो  जाते  हैं

रंग-बिरंगे सपने दिल में ही रखना
आँखों  से  सपने  गीले  हो जाते हैं

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ग़ज़ल- 10

कोई तस्वीर अगर दिल में उतर जाती है
नींद  आती  ही नहीं, रात ठहर जाती है

ज़िक्र जब होता है उसका तो ख़यालों में मेरे
फूल-से खिलते हैं, ख़ुश्बू-सी बिखर जाती है

टूट जाता है अगर दिल तो तमन्ना दिल की
कहने  वाले यही कहते हैं कि मर जाती है

एकही पल है बहुत ख़ुद को समझने के लिए
और  उस  पल  के  लिए  उम्र गुज़र जाती है

खाक़ हो जाता है ये जिस्म सभी जानते हैं
आत्मा  का  नहीं  मालूम  किधर जाती है

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ग़ज़ल- 11

दिल है उसी के पास, हैं साँसें उसी के पास
देखा  उसे  तो  रह गयीं आँखें उसी के पास

बुझने से जिस चराग़ ने इनकार कर दिया
चक्कर  लगा  रही हैं हवाएँ उसी के पास

मज़हब का नाम दीजिए या कोई और नाम
सब  जा  रही  हैं दोस्तो राहें उसी के पास

वो  दूर  तो  बहुत  है  मगर इसके बावजूद
गुज़री हैं फुरक़तों की भी रातें उसी के पास

उसको  पता  नहीं है वफ़ा क्या है, क्या ज़फा
हम छोड़ आए दिल की किताबें उसी के पास

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ग़ज़ल- 12

सुब्ह होती है तो फूलों से लिपट जाती है धूप
शाम  होते  ही चराग़ों में सिमट जाती है धूप

कोशिशें  करती  है  मेरे  सहन में आने की ख़ूब
रोज़ आकर घर  की दीवारों से सट जाती है धूप

कब  ज़रूरत  के  दिनों  में साथ देता है कोई
सर्दियाँ आते ही सूरज की भी घट जाती है धूप

हर  तरफ़  मेरे मकां से बन गये ऊँचे मकान
मेरे हिस्से की तो रस्ते में ही कट जाती है धूप

जो भी मिलता है फ़क़ीरों को कहाँ रखते हैं पास
आइनों  के  पास  आते  ही  पलट  जाती है धूप

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ग़ज़ल- 13

जो  बशर  पैकरे-किरदार नहीं हो सकता
वो कभी साहिब-ए-दस्तार नहीं हो सकता

अक्स भी टूटे हुए आएँ नज़र मुमकिन है
आईना  टूट  के  बेकार  नहीं हो सकता

फ़ितरतें जिसमें हों जैसी वो बनी रहती हैं
फूल कैसा भी हो तलवार नहीं हो सकता

अपने दामन को जो काँटों से बचा लेता हो
ख़ुश्बुओं  का  वो  परस्तार नहीं हो सकता

ख़ुद  ही  तामीर  करे  और मिटा दे ख़ुद ही
चाहे वो कुछ भी हो फ़नकार नहीं हो सकता

उसकी यादों को कलेजे से लगाए रखिए
जीना-मरना कभी दुश्वार नहीं हो सकता

साज़िशों में कोई शामिल है क़रीबी अपना
एक-सा  हादिसा  हर बार नहीं हो सकता

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ग़ज़ल- 14

अजीब ख़्वाब है फ़ितरत बदल रहा हूँ मैं
ज़मीन  छोड़  के  पानी पे चल रहा हूँ मैं

ये और बात हवाओं को खल रहा हूँ मैं
चराग़े-अम्न  हूँ  बेख़ौफ़  जल रहा हूँ मैं

मिले-मिले न मिले तू कहीं मुझे लेकिन
तेरी तलाश में घर से निकल रहा हूँ मैं

ख़ुद अपने आपको झूठी तसल्लियाँ देकर
न जाने कितने ही जनमों से छल रहा हूँ मैं

सितारे  हाथ नहीं आएँगे ख़बर है मुझे
जुनून देखिए फिर भी उछल रहा हूँ मैं

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ग़ज़ल- 15

कौन  अपना है ये चेहरों से नहीं जानते हैं
हम तो नाबीना हैं, आवाज़ से पहचानते हैं

घूम  लेते  हैं  जहाँ भर में कहीं जाए बग़ैर
हम वो आवारा हैं जो ख़ाक नहीं छानते हैं

बात निकलेगी जो मुँह से तो बिखर जाएगी
आप इस शहर के लोगों को नहीं जानते हैं

सामना करते हैं तूफ़ान का जी-जान से हम
हम  सफ़ीने  पे  कभी  पाल  नहीं तानते हैं

झूठ हम बोलें मुनासिब तो नहीं लगता मगर
सच  अगर  साफ़  कहें, लोग बुरा मानते हैं

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ग़ज़ल- 16

ज़रा-सा  ज़ोर हवा का दिखाई देता है
चिराग़ बुझता हुआ-सा दिखाई देता है

वो इक नदी हो, समंदर हो या वो सहारा हो
जिसे  भी  देखिए  प्यासा  दिखाई  देता   है

क़रीब जाने से चलता है शख़्सियत का पता
ज़मीं  से  चाँद  ज़रा-सा  दिखाई  देता   है

रुतें गुज़र गयीं आकर ख़िज़ाओं की लेकिन
अभी  ये  पेड़  हरा-सा  दिखाई  देता   है

न जाने कौन-सी दुनिया में आ गया हूँ मैं
हर  एक  चेहरा  नया-सा दिखाई देता है

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ग़ज़ल- 17

गुज़ारे  के  लिए  इक  आशियाना कम नहीं होता
महल वालों से छप्पर का ठिकाना कम नहीं होता

मेरे घर जो भी आता है वो बरकत साथ लाता है
परिंदे  छत  पे  आते हैं तो दाना कम नहीं होता

बहाना  ढूँढ़ते   हैं  आप मिलने का न जाने क्या
हक़ीक़त ये है मिलने का बहाना कम नहीं होता

मुहब्बत ऐसी दौलत है कि जो दिन-रात बढ़ती है
लुटाए  जाइए  लेकिन  ख़ज़ाना  कम  नहीं होता

ज़ुबां से बात कह देना बहुत लाज़िम नहीं 'गुलशन'
अमीर-ए-शहर  से  आँखें मिलाना कम नहीं होता

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ग़ज़ल- 18

दिलों में ख़ौफ़ रहता है, जुबानें बंद रहती हैं
यहाँ जब हादिसा होता है, साँसें बंद रहती हैं

ख़यालों के परिंदे क़ैद में रहते नहीं लेकिन
परों  के  टूट जाने पर उड़ानें बंद रहती हैं

तसव्वुर में ये मुमकिन है कि उससे गुफ़्तगू हो जाए
मगर  जब  ऐसा  होता  है  तो  आँखें बंद रहती हैं

झुकी रहती हैं वो पलकें नज़र मिल ही नहीं पाती
पढ़ें हम क्या, वो आँखों की किताबें बंद रहती हैं

सहर होने से पहले ही महकने लगता है 'गुलशन'
करिश्मा  देखिए  फूलों  की  पाँखें  बंद रहती हैं

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ग़ज़ल- 19

क्या  नया  है,  नया  क्या है, कुछ भी नहीं
दर्द-ए-दिल के सिवा क्या है, कुछ भी नहीं

कुछ चराग़ों से यह कह रहा था चराग़
सोचिए  ये  हवा क्या है, कुछ भी नहीं

चैन पड़ता नहीं दिल को कुछ रोज़ से
सोचिए तो हुआ क्या है, कुछ भी नहीं

आपको  दिल  की हर बात मालूम है
आपसे तो छुपा क्या है, कुछ भी नहीं

सब्र  से  काम  लेना   पड़ेगा तुम्हें
रास्ता दूसरा क्या है, कुछ भी नहीं

ख़ुदकुशी  इश्क़  की इब्तिदा है मगर
इश्क़ की इंतेहा क्या है, कुछ भी नहीं

दिल  है  मंज़िल तो आँखें हैं इक रास्ता
और इसके सिवा क्या है, कुछ भी नहीं

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ग़ज़ल- 20

दोस्तों  से  मिलना-जुलना, आशनाई कुछ तो हो
हम-नवाई, ख़ुश-अदाई, लब-कुशाई कुछ तो हो

आ गया वो दौर, अपने आपको साबित करो
बादशाही,  पारसाई, ख़ुद-नुमाई कुछ तो हो

बे-तअल्लुक़  हो  रही  हैं  आपकी ख़ामोशियाँ
दिल-रुबाई, कज-अदाई, बेवफ़ाई कुछ तो हो

कब तलक एहसास को ताबूत में रक्खे रहें
रु-नुमाई, इब्तिदाई, इन्तिहाई कुछ तो हो

ऐ सुहागन ज़िन्दगी! बेवा बनी फिरती है क्यूँ
माँग में सिंदूर या दस्त-ए-हिनाई कुछ तो हो

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रचनाकार परिचय

गोविन्द गुलशन

ईमेल :

निवास : ग़ाज़ियाबाद (उत्तरप्रदेश)


मूल नाम- गोविन्द कुमार सक्सैना
जन्मतिथि- 07 फ़रवरी, 1957
जन्मस्थान- अनूपशहर (उ०प्र०)
शिक्षा- स्नातक
सम्प्रति- पूर्व विकास अधिकारी एवं राजभाषा अधिकारी (सेवानिवृत्त) नेशनल इंश्योरेन्स कम्पनी
प्रकाशन/- जलता रहा चराग़ एवं हवा के टुकड़े (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित।
प्रसारण- देश के अनेक कवि सम्मलेनों और मुशायरों में निरंतर काव्य-पाठ।
दूरदर्शन और अन्य अनेक टी० वी० चैनलों से काव्य प्रसारण।
देश विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन।
सम्मान/पुरस्कार-
नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (उपक्रम), दिल्ली (राजभाषा विभाग. गृह मंत्रालय) द्वारा 'युग प्रतिनिधि सम्मान' सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित।
विशेष- भारत के अनेक शहरों में नई पीढ़ी के युवाओं को कविता/शायरी की शिक्षा प्रदान करना।
सम्पर्क- 'ग़ज़ल' 224, सैक्टर- 1, चिरंजीव विहार, ग़ाज़ियाबाद (उत्तरप्रदेश)- 201002
मोबाइल- 8826828708