Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

एक संवेदनशील मार्गदर्शक और एक समर्पित साधक को खो दिया है- डॉ० माला कपूर 'गौहर'

एक संवेदनशील मार्गदर्शक और एक समर्पित साधक को खो दिया है- डॉ० माला कपूर 'गौहर'

गोविन्द ‘गुलशन’ जी का जाना केवल एक शायर का बिछड़ना नहीं, बल्कि साहित्य का एक सशक्त स्वर, एक संवेदनशील मार्गदर्शक और मेरे जीवन का उस्ताद खो देना है। उनकी रोशनी, उनके शब्द और उनका आशीर्वाद सदा मेरा पथ आलोकित करते रहेंगे।

फ़लक  पर  हम  सितारों  में  इज़ाफ़ा ख़ूब करते हैं
शबे-फ़ुरक़त  में  होती  है   ज़रीकारी  निगाहों  से

इस शेर के ख़ालिक़ अंतर्राष्ट्रीय ख़्याति प्राप्त आदरणीय गोविन्द ‘गुलशन’ का दिव्य शक्ति में विलीन हो जाना केवल मेरे लिए ही नहीं बल्कि साहित्य जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। मेरी शायरी के उस्ताद के जाने से न केवल मैं व्यक्तिगत रूप से गहरे शोक में हूँ, बल्कि संपूर्ण साहित्यिक समाज ने एक सशक्त स्वर, एक संवेदनशील मार्गदर्शक और एक समर्पित साधक को खो दिया है।

गोविन्द ‘गुलशन’ जी की शायरी में अनुभव की गहराई, शब्दों की गरिमा और भावनाओं की सच्चाई स्पष्ट झलकती थी। वे केवल एक रचनाकार ही नहीं, बल्कि एक सच्चे गुरु थे, जिन्होंने उदारता से अपना समय, ज्ञान और अनुभव अपने शिष्यों को दिया। उनके निर्देशन में ही मुझे सब सीखने का सौभाग्य मिला। उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन में मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जो मेरे साहित्यिक जीवन की अमूल्य धरोहर हैं।

आदरणीय ‘गुलशन’ जी मेरी संस्था 'बारादरी' के अध्यक्ष थे। उनकी अध्यक्षता में अनेक साहित्यिक गोष्ठियाँ सफलतापूर्वक संपन्न हुईं। वे संस्था के लिए केवल एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि उसकी आत्मा थे। उनके सान्निध्य में बारादरी को दिशा, गरिमा और पहचान मिली।

उनकी उपस्थिति ने साहित्य को जीवंत किया और उनके शब्दों ने असंख्य हृदयों को छुआ। साहित्य के क्षेत्र में हुई इस क्षति की भरपाई संभव नहीं है। उनका दिया हुआ प्रकाश, उनके विचार और उनकी रचनाएँ सदा हमारे साथ रहेंगी।

उनकी बीमारी के दौरान उनका ही शे’र ज़ेह्न में गूँजता रहा। मुझको इस बार दुआओं में असर देखना है.....मेरे ज़ेह्न में आदरणीय गुरुजी की यह गज़ल गूँज रही है।

मुझको  इस  बार  दुआओं  में  असर देखना है
अपनी आहों का भी अब मुझको समर देखना है

​मैं  जहाँ  तक  भी  चलूँ साथ चले मेरे खुदा
मुझको हर मोड़ पे अब तेरा गुज़र देखना है

​वो  जो  कहते  थे  कि  हम साथ रहेंगे हरदम
उनका अब बदला हुआ रंग-ए-सफ़र देखना है

​मंज़िलें  लाख  कठिन  हों  तो मुझे क्या 'गुलशन'
मुझको बस अपनी ही हिम्मत का सफ़र देखना है

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रचनाकार परिचय

डॉ. माला कपूर "गौहर"

ईमेल : drmalakapoor@gmail.com

निवास : गाजियाबाद