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शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' के पर्यावरण विषयक दोहे

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' के पर्यावरण विषयक दोहे

होकर व्याकुल प्यास से, बैठा पथिक उदास।
दूर  तलक  होता नहीं,  पानी का अनुभास।।

कुंजों से झरती रही, कनक सुनहरी धूप।
धरणी ने भी धर लिया, तभी दुल्हन का रूप।।

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बंजारन-सी धूप अब, रही चिकोटी काट।
बतियाती हैं फुनगियाँ, रोशन हैं सब घाट।।

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चलकर मस्त समीर जब, गाती मंगलाचार।
सरसित होकर तब धरा, ख़ूब लुटाती प्यार।।

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फुनगी चूमी ओस ने, नाचे डाल विभोर।
तरुवर इतराने लगा, देख सुहानी भोर।।

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एक झलक पा सूर्य की, घूँघट खोले रात।
नटखट किरणें कर गयीं, दीवाना हर पात।।

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प्रीति लुटाती रश्मियाँ, पंछी करते शोर।
फुनगी पर चुंबन धरे, महक उठी है भोर।।

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तरुवर-तरुवर से कहे, चलती आरी देख।
प्रभु ने दुख में ही लिखी, अपनी किस्मत रेख।।

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तरुवर हैं सहमे हुए, पंछी सभी उदास।
दाँव लगी है ज़िंदगी, दुश्मन बना विकास।।

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होकर व्याकुल प्यास से, बैठा पथिक उदास।
दूर तलक होता नहीं, पानी का अनुभास।।

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नील-गगन रोने लगा, बंजर वसुधा देख।
मेघों ने पल में लिखे, प्रेम भरे आलेख।।

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पर्वत, सरिता और धरा, करते रोज़ गुहार।
रौंदो मत अब तो हमें, होता दर्द अपार।।

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बंजर धरती कर रही, हमसे यही सवाल।
बोलो मेरा क्यों किया, विधवा जैसा हाल।।

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वृक्षों से जीवन मिले, मिलती शीतल-छाँव।
धन-दौलत की भूख पर, इन्हें लगा मत दाँव।।

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प्राणवायु देते हमें, विटप धरा की शान।
मनुज चलाता आरियाँ, यह कैसा प्रतिदान।।

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रचनाकार परिचय

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन'

ईमेल : shakuntalaagrwal3@gmail.com

निवास : भीलवाड़ा (राज०)

जन्मतिथि- 17 मार्च, 1963
शिक्षा- स्नातकोत्तर
लेखन विधाएँ- लघुकथा, कहानी, एकांकी व छांदसिक रचनाएँ
प्रकाशन- 'दर्द की परछाइयाँ', 'बाकी रहे निशान', 'काँच के रिश्ते', 'शकुन सतसई' (दोहा संग्रह), 'भावों की उर्मियाँ' (कुंडलियाँ संग्रह),'लघुकथा कौमुदी' (लघुकथा संग्रह), 'यादों के तटबंध' (गीत संग्रह)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित।
सम्मान- जिला साहित्यकार परिषद, भीलवाड़ा द्वारा 'साहित्य सुधाकर- 2018'
विक्रमाशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा 'विद्यावाचस्पति सम्मान- 2018'
द्वारकेश साहित्य परिषद, कांकरोली द्वारा सम्मानित- 2019
संपर्क- हनुमत कृपा, 10- बी-12, आर० सी० व्यास कॉलोनी, केशव हॉस्पिटल के पास, भीलवाड़ा (राज०)- 311001
मोबाइल- 9462654500