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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

चक्कर लगा रही हैं हवाएँ उसी के पास- संतोष सिंह

चक्कर लगा रही हैं हवाएँ उसी के पास- संतोष सिंह

रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उधेड़-बुन, आशा-निराशा, हार-जीत तथा धूप-छाँव को अपने में समेटती गोविन्द गुलशन जी की ग़ज़लें विविधता से भरी हुई हैं।

पारम्परिक रवायती शायरी का बड़ा नाम कृष्णबिहारी 'नूर' साहब के शिष्य गोविन्द गुलशन ग़ज़लों में नए प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। जीवन, प्रकृति, प्रेम, विरह, संवेदना, विद्रोह, अहसास का मंथन, भावनाओं की तीव्रता इनकी ग़ज़लों की विषयवस्तु है। वहीं गहन विचारों की प्रबलता को अध्यात्म से जोड़कर नए-नए रंग भरना कोई गोविन्द गुलशन जी से सीखे।

इनकी ग़ज़लें जीवन के विविध रंगों को छोटी-छोटी शीशियों में भरकर हमारे सामने रखकर उस पर विचार करने को प्रेरित करते शब्दों को शायरी में ढालकर शेर और ग़ज़लों के माध्यम से सबको अपने पास बुलाती हुई प्रतीत होती हैंI नए प्रयोग से परहेज़ किए बिना पारम्परिक ग़ज़लों को जीवित रखने का कार्य, अधूरेपन से लेकर प्रेम से होते हुए वियोग के स्वर गोविन्द गुलशन जी के यहाँ देख सकते हैं। अध्यात्म से जुड़े कई पहलू तथा आध्यात्मिक चिंतन की ओर ध्यान आकर्षित करती कई पंक्तियाँ हम महसूस कर सकते हैं। गोविन्द गुलशन जी के शेर हमें कुछ खोने-पाने की लालसा से दूर ले जाते हैं- रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उधेड़-बुन, आशा-निराशा, हार-जीत तथा धूप-छाँव को अपनी ग़ज़लों में समेटती गोविन्द गुलशन जी की ग़ज़लें विविधता से भरी हुई हैं। जहाँ एक तरफ गहन सोच के विविध रंग बिखेरती ग़ज़लें मानों रेगिस्तान की कटीली झाड़ियों में खिलते छोटे-छोटे जंगली-फूल जीवन के परिचायक होते हैं, उसी तरह जीवन की आपाधापी में, उलझन को सुलझाती ग़ज़लें जीवन में परिवर्तन तथा सार्थकता का सदेश देती हैं।

एक आशावादी व्यक्तित्व के धनी, एक ऐसा व्यक्ति जो प्रेम से बात करता हो और ज़िंदगी की तमाम परेशानियों से लड़ता हुआ चेहरे पर मुस्कान लिए, ज़िंदगी से बिना कोई शिकायत किये रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आशावादिता का सन्देश देता हुआ, संवेदनशील व्यक्तित्व अब हमारे बीच अपनी अप्रतिम ग़ज़लों के साथ जीवित हैI


दिल है उसी के पास, हैं साँसें उसी के पास
देखा  उसे  तो  रह गईं आँखें उसी के पास

बुझने से जिस चराग़ ने इनकार कर दिया
चक्कर  लगा  रही हैं हवाएँ उसी के पास
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बुझा  रही  है  चराग़ों  को वक़्त से पहले
न जाने किसके इशारों पे चल रही है हवा
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इस क़दर भीड़ कि दुश्वार है चलना सबका
और इक वो है कि रफ़्तार बना रक्खी है
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वक़्ते-रुख़्सत न दिया साथ ज़बां ने लेकिन
अश्क़ बनकर मेरी आँखों में तराने आये
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जब आँसुओं में बह गये यादों के सारे नक़्श
आँखों में कैसे रह गया मंज़र बना हुआ
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तोड़ लाए शीशा-ए-दिल फिर कहीं
तुम अँधेरे में कहाँ टकरा गये
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न बोलने की मनाही, न कोई दुश्वारी
ज़बां सभी को मयस्सर है और सब चुप हैं
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जान लेता है कभी जान बचा लेता है
फ़ितरतें रखता है दरियाओं का पानी क्या-क्या
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इस पार मैं हूँ और ये टूटी हुई-सी नाव
आवाज़ दे रहा है जो उस पार कौन है
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कोई तस्वीर अगर दिल में उतर जाती है
नींद आती ही नहीं रात ठहर जाती है

एक ही पल है बहुत ख़ुद को समझने के लिए
और उस पल के लिए उम्र गुज़र जाती है
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अभी न तोड़िए उम्मीद के नशेमन को
ख़िज़ाँ के बाद का मौसम बहार वाला है
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डूबने से मैं बचा लेता हूँ सूरज का वुजूद
ख़ुदग़रज़ हूँ कि मुझे रात से डर लगता है
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जीने-मरने का कोई ख़ौफ़ नहीं था पहले
अब ये आलम है हर इक बात से डर लगता है
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मुसलसल ज़लज़ले आने लगे हैं
निगल जाएगी सबकुछ ही ज़मीं क्या

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रचनाकार परिचय

संतोष सिंह

ईमेल : santushssing@gmail.com

निवास : ठाणे

नाम: संतोष सिंह

जन्मतिथि:3 नवम्वर 1982


जन्म स्थान: ठाणे

शिक्षा : MBA(MARKETING)
ऍम ए हिंदी

संप्रति: वाईस प्रेजिडेंट ( ऑटोमोबाइल कंपनी )

प्रकाशन: तो क्या होगा

प्रसारण:

सम्मान:महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पुरष्कृत

पता:फ्लैट नंबर A1/६०२विहंग हिल्स ,घोड़बंदर रोड ठाणे पश्चिम

ईमेल: SANTUSHSSING@GMAIL.COM


मोबाइल:7202849829