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डॉ० प्रवीणभाई दरजी के गुजराती लेख का रजनीकान्त एस० शाह द्वारा हिंदी अनुवाद

डॉ० प्रवीणभाई दरजी के गुजराती लेख का रजनीकान्त एस० शाह द्वारा हिंदी अनुवाद

ये जीवन है, यही है इसका रंग-रूप
(पद्मश्री डॉ० प्रवीणभाई दरजी के गुजराती में लिखे एक लेख का हिंदी अनुवाद)

कुछ समय पूर्व फेसबुक पर एक वीडियो देखा था। शायद मेरी ही तरह अन्य लोगों ने भी देखा होगा। वीडियो के तथ्यातथ्य में मुझे कोई रुचि नहीं है, पर उसमें जिस ढंग से बात हुई है, वह महत्त्वपूर्ण है। समय-समय पर ईश्वर तो मनुष्य को आगाह करता ही रहा है, पर वह स्मशान वैराग्य (मुर्दनी) जैसा ही प्रमाणित होता रहता है। आज की महामारी भी ऐसी ही ईश्वरीय चेतावनी है। वह जीवन की क्षणभंगुरता की प्रतीति कराती रहती है। मौत सबकी नज़रों से नज़र मिला रही है, फ़िर भी अभी तक मनुष्य ने कोई सीख ली हो, ऐसा लगता नहीं है। वही प्रपंच, वही माथापच्ची, वही झूठ, वही दंभ, वही अहं। कदाचित इन सबकी मात्रा थोड़ी बहुत तो बढ़ी ही होगी पर कम हुई हो ऐसा लगता नहीं है।

वीडियो का संदर्भ है- विश्व प्रसिद्ध फैशन डिज़ाइनर, ब्लॉगर और लेखिका किर्जिदा रोड्रिग्ज का। कैन्सर से मृत्यु को प्राप्त इस नारी ने यह कहा है कि उसने मृत्यु से पूर्व के जीवन के अनुभवों का निष्कर्ष अपनी एक टिप्पणी में दर्ज़ किया था। शायद वह बहुत गहरे में ऐसा भी चाहती हो कि जीवन विषयक प्रतीत हुई अपनी समझ अन्य लोगों तक भी पहुँचे। वे जीवन के अर्थ को प्राप्त करें और ख़ुद में बदलाव लाएँ। किर्जिदा कहती हैं कि उसके अपने गराज में अनेक महंगी गाड़ियाँ पड़ी हुई हैं। एक से बढ़कर एक। पर आज कैंसर की बीमारी के अंतिम चरण में किसी काम की नहीं हैं। कार अपनी जगह पर है और वह ख़ुद व्हीलचेयर में बैठकर ही कमरे में घूमती रहती है।

वह यह भी बताती हैं कि कैसे भव्य आवास में वह जी रही थी। कैसा वैविध्यपूर्ण महंगा असबाब उसके पास था। पर आज वह सब अर्थहीन साबित हुआ है। अभी तो वह हॉस्पिटल के अपने हिस्से में आए हुए एक छोटे-से कमरे में जीवन व्यतीत कर रही है। वह असबाब, कीमती चीज़-वस्तुएँ, जूते, चप्पल, परफ्यूम्स, डिज़ाइन किए हुए वस्त्र, महंगी चादरें- इनमें से कुछ भी उसके काम में आए ऐसे नहीं हैं। यहाँ तो अस्पताल के छोटे-से कमरे में एक छोटी-सी चादर से ही शरीर को ढांपकर आखिरी साँसें ले रही हैं।

यह फैशन डिज़ाइनर खुलासा करती हुई अपनी टिप्पणी में ऐसा भी लिख रही हैं कि अनेक बैंकों में उसका बेहिसाब धन जमा पड़ा है। उसे ख़ुद पता नहीं है कि वह धनराशि कितनी होगी! फ़िर भी करुणता कैसी कि यह बेहिसाब धन आज उसके किसी काम का रहा नहीं है। यह ब्लॉगर महिला ऐसा भी कह रही है, कि उसका अपना घर मात्र घर नहीं था बल्कि एक आलीशान महल था, जो हर तरह के वैभव से लैस था। जिम था, बैठक-चर्चा खंड था, स्नानागार था, मित्रों के लिए अलग कमरे थे तो अपने लिए मूड के अनुरूप रहने के लिए अलग-अलग सुशोभित कमरे थे। फिर भी अभी तो उसका घर अस्पताल ही बना हुआ है। उस डबल बेड के बिछौने में ही वह हाथ-पैर समेटे सो रही है। अपने वैभवी ठाठ की बात करते हुए वह यह भी लिखती हैं कि वह एक से बढ़कर एक ऐसे देश-विदेश के फाइव स्टार होटेल्स में आती-जाती रहती थी। वह भारी दौर-दमाम के साथ अपने काम सम्पन्न करती थी। पर कैंसर के- मृत्यु के संकेत से, वह यह स्वीकार करने लगी कि अरे, यह तो आवागमन है लेकिन एक जुदा ही किस्म का। यहाँ अब एक अस्पताल में एक ही लैब से दूसरे लैब में अलग-अलग टेस्ट कराने के लिए आना-जाना रहा है। केवल प्रयोगशालाओं के चक्कर काटते रहने का काम ही बचा हुआ है। अपनी एक समय की प्रतिष्ठा- जाहो-जलाली को भी वे लाक्षणिक ढंग से चिह्नित करती हैं। कहती हैं कि वे भी दिन थे जब युवा-युवतियाँ, अधेड़-प्रौढ़ सैंकड़ों की तादाद में उसके हस्ताक्षर (ऑटोग्राफ) लेने के लिए होड़ करते थे। कतार बनाकर खड़े हो जाते थे। आज परिस्थिति बिलकुल अलग है। डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन ही उसके हस्ताक्षर हो गए हैं! इसके उपरांत करुण स्थिति की बात को विस्तार देते हुए वह यह भी अंकित करती हैं कि एक वक्त था, जब अपने बालों की देखरेख के लिए एक-दो नहीं बल्कि सात-सात ब्यूटीशियन तैनात रहती थीं। पर विधि की यह वक्रता देखिये कि आज कैंसर के ट्रीटमेंट के चलते मेरे माथे पर एक भी बाल बचा नहीं है! यह एक ऐसा भी दिन है। आगे किर्जिदा बदले हुए भाग्य की सच्चाई को स्वीकार करती हुई कहती हैं कि एक वह भी समय था कि वह अपने जेट हवाई जहाज से चाहे उस देश में पहुँच सकती थी। सुबह-शाम का भोजन-लंच, सपर (डिनर) या दोपहर का नाश्ता अलग-अलग देश में करती थी पर ईश्वर ने उसे ऐसी स्थिति पर पहुँचाया है कि यदि उसका मन अस्पताल के अपने कमरे में से चहारदीवारी में जाने का हो तो दो-दो नर्सों की मदद लेनी पड़ती थी! यह भी एक समय है!

इसके उपरांत वह कहती हैं कि एक समय था, जब खाने और नाश्ते के लिए उसके आसपास सारे संसार के व्यंजन उपलब्ध रहते थे। आज अस्पताल में ऐसी दशा है कि दवाई की गोलियाँ और थोड़े-से पेय के अतिरिक्त खाने के लिए कुछ भी नहीं है। अंतत: किर्जिदा निष्कर्ष के रूप में कहती हैं कि ख़ुद के लिए घर, असबाब, खरबों रुपये, प्रतिष्ठा, गाड़ियाँ, जेट, प्रसिद्धि- कुछ भी आज काम का रहा है क्या? जीवन का असली चेहरा उसके समक्ष आ रहा है। अंतत: तो वह कुछ भी ख़ुशी या आराम दे सके ऐसा नहीं है। सबकुछ केवल राख और ख़ाक मात्र है। हाँ, कैंसर के इन विकट क्षणों में आश्वस्त कर सके ऐसा यदि कुछ है तो कुछ चाहनेवाले लोगों के स्मृति में आने वाले चेहरे हैं। उनके साथ लेन-देन करते वक्त अनुभव किया हो ऐसा स्पर्श या उसका रोमांच है।

किर्जिदा यह टिप्पणी लिखकर देते हुए हम सबको यह कह रही हैं कि 'मृत्यु की घंटी बज उठे, उससे पूर्व ईश्वर की शरण ग्रहण करो, इंसानों को प्यार कर लो, प्यार कर लो.....।

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Dr.Rajnikant S.Shah

05 October 2025

मैं ईरान वेब पत्रिका पाकर प्रसन्न हुआ हूं।आपने मेरे अनुवाद कर्म को प्रोत्साहित किया है। आपका धन्यवाद। इसके बारे स्तम्भ सार्थक हैं।आपकी संपादन निष्ठा प्रणम्य है।

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रचनाकार परिचय

रजनीकान्त एस० शाह

ईमेल : navkar1947@gmail.com

निवास : वडोदरा (गुजरात)

जन्मतिथि- 17 जुलाई 1948
शिक्षा- एम०ए०, बी०एड, पीएचडी
संप्रति- हिन्दी के एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद पर सेवारत रहकर अवकाश प्राप्त
प्रकाशन- `स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यासों में सामाजिक चेतना’ (शोधग्रंथ), `रचनालय’ (गुजराती के कवि स्व० धीरुभाई मोदीजी की 40 कविताओं का हिन्दी काव्व्यानुवाद), व्यावहारिक हिन्दी (पाठ्यक्रम पर आधारित संदर्भ पुस्तक), 'सर्वांगी जीवनदर्शन विज्ञान खंड-1 और 2 (अंग्रेज़ी से गुजराती अनुवाद)
पता- 2, `शील-प्रिय’, विमलनगर सोसायटी, नवाबजार, करजण, ज़िला- वडोदरा (गुजरात)- 391240
मोबाइल- 9924567512