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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

समय के सवाल और हमारी जवाबदेही

समय के सवाल और हमारी जवाबदेही

इरा मासिक वेब पत्रिका एक साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक वैचारिकी का एक प्लेटफ़ॉर्म है। अतः साहित्यिक और संपादकीय लेखन का दायित्व केवल घटनाओं का दस्तावेज़ बनना नहीं, बल्कि समय को आईना दिखाना भी है। बीता वर्ष हमें चेतावनी देकर गया है और नया वर्ष हमें अवसर दे रहा है, एक अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज गढ़ने का।
आगामी नए वर्ष में शुभकामनाओं के साथ यही हमारी कामना भी है और ज़िम्मेदारी भी।

एक और वर्ष इतिहास की परतों में दर्ज हो गया। वर्ष का अंत केवल तारीख़ों का परिवर्तन नहीं होता, यह आत्ममंथन का वह क्षण होता है जहाँ समाज, व्यवस्था और व्यक्ति—तीनों को आईने में देखने का अवसर मिलता है। बीता वर्ष हमें यह साफ़-साफ़ बता गया कि आज का विश्व केवल विकास और तकनीक की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, असहिष्णुता, संवेदनहीनता और उम्मीद—सभी का साझा दस्तावेज़ है।
बीते वर्ष में प्रगति के साथ बढ़ती दरारें नज़र आईं । विगत वर्ष में विश्व ने युद्धों की विभीषिका देखी, जलवायु संकट की चेतावनियाँ सुनीं और आर्थिक असमानता को गहराते महसूस किया। एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विज्ञान ने असंभव को संभव बनाया, वहीं दूसरी ओर मानव जीवन की गरिमा बार-बार सवालों के घेरे में रही। लोकतांत्रिक मूल्यों पर दबाव बढ़ा, असहमति को अपराध की तरह देखा जाने लगा और समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग एक बार फिर सबसे अधिक प्रभावित हुए।
यह समय हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या विकास की हमारी परिभाषा अधूरी तो नहीं? क्या हम सचमुच सबके लिए आगे बढ़ रहे हैं?

3 दिसंबर को मनाया जाने वाला "विश्व विकलांगता दिवस" केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं होना चाहिए। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि दिव्यांगजन आज भी शिक्षा, रोज़गार, सार्वजनिक जीवन और सांस्कृतिक मंचों पर बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। विकलांगता व्यक्ति की सीमा नहीं है, बल्कि समाज की सोच और व्यवस्था की विफलता है। यह स्वीकार करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इसी संघर्ष के बीच ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन जैसे संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन ने विकलांगता को दया या सहानुभूति के चश्मे से नहीं, बल्कि अधिकार, आत्मसम्मान और अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से देखने की पहल की है। संस्था द्वारा आयोजित विकलांगता पर आधारित फिल्म उत्सव इस दिशा में एक सार्थक और प्रभावी प्रयास है।
यह फिल्म उत्सव केवल परदे पर कहानियाँ दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के भीतर जमी हुई रूढ़ियों को तोड़ने का सशक्त औजार है। जब दर्शक दिव्यांग व्यक्तियों को संघर्ष करते, सपने देखते और सफलता हासिल करते हुए देखते हैं, तब संवेदना जागती है और दृष्टिकोण बदलता है। ऐसे आयोजन समाज को यह सिखाते हैं कि दिव्यांगजन सहायता के पात्र नहीं, समान अवसरों के अधिकारी हैं। यही इन आयोजनों की सबसे बड़ी उपयोगिता और सार्थकता है।
क्रिसमस पर भारत meँ उत्सव पर असहिष्णुता का साया नज़र आया जो कि सोचनीय है। भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर धर्म और पर्व ने इस मिट्टी में प्रेम और सहअस्तित्व की जड़ें जमाई हैं। क्रिसमस भी ऐसा ही पर्व है, जो करुणा, सेवा और भाईचारे का संदेश देता है। परंतु यह विडंबना ही है कि हाल के वर्षों में क्रिसमस जैसे शांतिपूर्ण पर्व के दौरान भी कट्टर हिंदूवादी समूहों द्वारा हिंसा, धमकी और उत्पात की घटनाएँ सामने आई हैं।
धर्म के नाम पर नफरत फैलाना न केवल अल्पसंख्यक समुदायों को डराता है, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा को भी आहत करता है। चर्चों पर हमले, प्रार्थनाओं में व्यवधान और झूठे आरोप—ये सभी घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि असहिष्णुता धीरे-धीरे सामान्य बनाई जा रही है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि जब उत्सव भय में बदल जाए, तो समाज का नैतिक स्वास्थ्य गंभीर संकट में होता है।
यह समय स्पष्ट रूप से कहने का है कि कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता। उग्रता और कट्टरता किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का पर्याय नहीं हो सकती।
नया वर्ष में नए लक्ष्यों से अधिक नई चेतना की आवश्यकता है। नववर्ष के आगमन पर संकल्पों की लंबी सूची बनती है, परंतु अधिकांश संकल्प व्यक्तिगत सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाते। आज आवश्यकता है कि हम अपने लक्ष्यों में सामाजिक जिम्मेदारी को भी शामिल करें। दिव्यांगजनों के लिए समावेशी वातावरण, धार्मिक सौहार्द, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों की रक्षा, ये सभी विषय केवल मंचों और लेखों तक सीमित न रहें।
नया वर्ष हमसे यह माँग करता है कि हम दर्शक नहीं, सहभागी बनें। चुप्पी की जगह संवाद, डर की जगह संवेदना और विभाजन की जगह एकता को चुनें।

संपादकीय : समय के सवाल और हमारी जवाबदेही
एक और वर्ष इतिहास की परतों में दर्ज हो गया। वर्ष का अंत केवल तारीख़ों का परिवर्तन नहीं होता, यह आत्ममंथन का वह क्षण होता है जहाँ समाज, व्यवस्था और व्यक्ति—तीनों को आईने में देखने का अवसर मिलता है। बीता वर्ष हमें यह साफ़-साफ़ बता गया कि आज का विश्व केवल विकास और तकनीक की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, असहिष्णुता, संवेदनहीनता और उम्मीद—सभी का साझा दस्तावेज़ है।
बीते वर्ष में प्रगति के साथ बढ़ती दरारें नज़र आईं । विगत वर्ष में विश्व ने युद्धों की विभीषिका देखी, जलवायु संकट की चेतावनियाँ सुनीं और आर्थिक असमानता को गहराते महसूस किया। एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विज्ञान ने असंभव को संभव बनाया, वहीं दूसरी ओर मानव जीवन की गरिमा बार-बार सवालों के घेरे में रही। लोकतांत्रिक मूल्यों पर दबाव बढ़ा, असहमति को अपराध की तरह देखा जाने लगा और समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग एक बार फिर सबसे अधिक प्रभावित हुए।
यह समय हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या विकास की हमारी परिभाषा अधूरी तो नहीं? क्या हम सचमुच सबके लिए आगे बढ़ रहे हैं?

3 दिसंबर को मनाया जाने वाला "विश्व विकलांगता दिवस" केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं होना चाहिए। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि दिव्यांगजन आज भी शिक्षा, रोज़गार, सार्वजनिक जीवन और सांस्कृतिक मंचों पर बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। विकलांगता व्यक्ति की सीमा नहीं है, बल्कि समाज की सोच और व्यवस्था की विफलता है। यह स्वीकार करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इसी संघर्ष के बीच ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन जैसे संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन ने विकलांगता को दया या सहानुभूति के चश्मे से नहीं, बल्कि अधिकार, आत्मसम्मान और अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से देखने की पहल की है। संस्था द्वारा आयोजित विकलांगता पर आधारित फिल्म उत्सव इस दिशा में एक सार्थक और प्रभावी प्रयास है।
यह फिल्म उत्सव केवल परदे पर कहानियाँ दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के भीतर जमी हुई रूढ़ियों को तोड़ने का सशक्त औजार है। जब दर्शक दिव्यांग व्यक्तियों को संघर्ष करते, सपने देखते और सफलता हासिल करते हुए देखते हैं, तब संवेदना जागती है और दृष्टिकोण बदलता है। ऐसे आयोजन समाज को यह सिखाते हैं कि दिव्यांगजन सहायता के पात्र नहीं, समान अवसरों के अधिकारी हैं। यही इन आयोजनों की सबसे बड़ी उपयोगिता और सार्थकता है।
क्रिसमस पर भारत meँ उत्सव पर असहिष्णुता का साया नज़र आया जो कि सोचनीय है। भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर धर्म और पर्व ने इस मिट्टी में प्रेम और सहअस्तित्व की जड़ें जमाई हैं। क्रिसमस भी ऐसा ही पर्व है, जो करुणा, सेवा और भाईचारे का संदेश देता है। परंतु यह विडंबना ही है कि हाल के वर्षों में क्रिसमस जैसे शांतिपूर्ण पर्व के दौरान भी कट्टर हिंदूवादी समूहों द्वारा हिंसा, धमकी और उत्पात की घटनाएँ सामने आई हैं।
धर्म के नाम पर नफरत फैलाना न केवल अल्पसंख्यक समुदायों को डराता है, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा को भी आहत करता है। चर्चों पर हमले, प्रार्थनाओं में व्यवधान और झूठे आरोप—ये सभी घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि असहिष्णुता धीरे-धीरे सामान्य बनाई जा रही है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि जब उत्सव भय में बदल जाए, तो समाज का नैतिक स्वास्थ्य गंभीर संकट में होता है।
यह समय स्पष्ट रूप से कहने का है कि कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता। उग्रता और कट्टरता किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का पर्याय नहीं हो सकती।
नया वर्ष में नए लक्ष्यों से अधिक नई चेतना की आवश्यकता है। नववर्ष के आगमन पर संकल्पों की लंबी सूची बनती है, परंतु अधिकांश संकल्प व्यक्तिगत सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाते। आज आवश्यकता है कि हम अपने लक्ष्यों में सामाजिक जिम्मेदारी को भी शामिल करें। दिव्यांगजनों के लिए समावेशी वातावरण, धार्मिक सौहार्द, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों की रक्षा, ये सभी विषय केवल मंचों और लेखों तक सीमित न रहें।
नया वर्ष हमसे यह माँग करता है कि हम दर्शक नहीं, सहभागी बनें। चुप्पी की जगह संवाद, डर की जगह संवेदना और विभाजन की जगह एकता को चुनें।

इरा मासिक वेब पत्रिका एक साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक वैचारिकी का एक प्लेटफ़ॉर्म है। अतः साहित्यिक और संपादकीय लेखन का दायित्व केवल घटनाओं का दस्तावेज़ बनना नहीं, बल्कि समय को आईना दिखाना भी है। बीता वर्ष हमें चेतावनी देकर गया है और नया वर्ष हमें अवसर दे रहा है, एक अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज गढ़ने का।
आगामी नए वर्ष में शुभकामनाओं के साथ यही हमारी कामना भी है और ज़िम्मेदारी भी।

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2 Total Review

पवन शर्मा

26 December 2025

बेहतर, गंभीर संपादकीय है, जो हमारी जवाबदेही को तय करने की ओर इंगित करता है।

वसंत जमशेदपुरी

26 December 2025

सकारात्मक चिंतनं

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रचनाकार परिचय

अलका मिश्रा

ईमेल : alkaarjit27@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि-27 जुलाई 1970 
जन्मस्थान-कानपुर (उ० प्र०)
शिक्षा- एम० ए०, एम० फिल० (मनोविज्ञान) तथा विशेष शिक्षा में डिप्लोमा।
सम्प्रति- प्रकाशक ( इरा पब्लिशर्स), काउंसलर एवं कंसलटेंट (संकल्प स्पेशल स्कूल), स्वतंत्र लेखन तथा समाज सेवा
विशेष- सचिव, ख़्वाहिश फ़ाउण्डेशन 
लेखन विधा- ग़ज़ल, नज़्म, गीत, दोहा, क्षणिका, आलेख 
प्रकाशन- बला है इश्क़ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित
101 महिला ग़ज़लकार, हाइकू व्योम (समवेत संकलन), 'बिन्दु में सिन्धु' (समवेत क्षणिका संकलन), आधुनिक दोहे, कानपुर के कवि (समवेत संकलन) के अलावा देश भर की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं यथा- अभिनव प्रयास, अनन्तिम, गीत गुंजन, अर्बाबे कलाम, इमकान आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
रेख़्ता, कविता कोष के अलावा अन्य कई प्रतिष्ठित वेब पत्रिकाओं हस्ताक्षर, पुरवाई, अनुभूति आदि में रचनाएँ प्रकाशित।
सम्पादन- हिज्र-ओ-विसाल (साझा शेरी मजमुआ), इरा मासिक वेब पत्रिका 
प्रसारण/काव्य-पाठ- डी डी उत्तर प्रदेश, के टी वी, न्यूज 18 आदि टी वी चैनलों पर काव्य-पाठ। रेखता सहित देश के प्रतिष्ठित काव्य मंचों पर काव्य-पाठ। 
सम्मान-
साहित्य संगम (साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था तिरोड़ी, बालाघाट मध्य प्रदेश द्वारा साहित्य शशि सम्मान, 2014 
विकासिका (साहित्यिक सामजिक एवं सांस्कृतिक) संस्था कानपुर द्वारा ग़ज़ल को सम्मान, 2014
संत रविदास सेवा समिति, अर्मापुर एस्टेट द्वारा संत रवि दास रत्न, 2015
अजय कपूर फैंस एसोसिएशन द्वारा कविवर सुमन दुबे 2015
काव्यायन साहित्यिक संस्था द्वारा सम्मानित, 2015
तेजस्विनी सम्मान, आगमन साहित्य संस्था, दिल्ली, 2015
अदब की महफ़िल द्वारा महिला दिवस पर सम्मानित, इंदौर, 2018, 2019 एवं 2020
उड़ान साहित्यिक संस्था द्वारा 2018, 2019, 2021 एवं 2023 में सम्मानित
संपर्क- एच-2/39, कृष्णापुरम
कानपुर-208007 (उत्तर प्रदेश) 
 
मोबाइल- 8574722458